भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 453

फेनपांश्च तथा वत्सान् न दुहन्ति स्म मानवाः । न कूटमानैर्वणिजः पण्यं विक्रीणते तदा ॥ २२ ॥ जबतक बछड़े केवल दूधपर रहते, घास नहीं चरते, तबतक मनुष्य गौओंका दूध नहीं दुहते थे। व्यापारीलोग बेचने योग्य वस्तुओंका झूठे माप-तौलद्वारा विक्रय नहीं करते थे ॥ २२ ॥

कर्माणि च नरव्याघ्र धर्मोपेतानि मानवाः । धर्ममेवानुपश्यन्तश्चक्रुर्धर्मपरायणाः ॥ २३ ॥ नरश्रेष्ठ! सब मनुष्य धर्मकी ही ओर दृष्टि रखकर धर्ममें ही तत्पर हो धर्मयुक्त कर्मोंका ही अनुष्ठान करते थे ॥ २३ ॥

स्वकर्मनिरताश्चासन् सर्वे वर्णा नराधिप । एवं तदा नरव्याघ्र धर्मो न ह्रसते क्वचित् ॥ २४ ॥ राजन्! उस समय सब वर्णोंके लोग अपने-अपने कर्मके पालनमें लगे रहते थे। नरश्रेष्ठ! इस प्रकार उस समय कहीं भी धर्मका ह्रास नहीं होता था ॥ २४ ॥

काले गावः प्रसूयन्ते नार्यश्च भरतर्षभ । भवन्त्यृतुषु वृक्षाणां पुष्पाणि च फलानि च ॥ २५ ॥ भरतश्रेष्ठ! गौएँ तथा स्त्रियाँ भी ठीक समयपर ही संतान उत्पन्न करती थीं। ऋतु आनेपर ही वृक्षोंमें फूल और फल लगते थे ॥ २५ ॥

एवं कृतयुगे सम्यग् वर्तमाने तदा नृप । आपूर्यत मही कृत्स्ना प्राणिभिर्बहुभिर्भृशम् ॥ २६ ॥ नरेश्वर! इस तरह उस समय सब ओर सत्ययुग छा रहा था। सारी पृथ्वी नाना प्रकारके प्राणियोंसे खूब भरी-पूरी रहती थी ॥ २६ ॥

एवं समुदिते लोके मानुषे भरतर्षभ । असुरा जज्ञिरे क्षेत्रे राज्ञां तु मनुजेश्वर ॥ २७ ॥ भरतश्रेष्ठ! इस प्रकार सम्पूर्ण मानव-जगत् बहुत प्रसन्न था। मनुजेश्वर! इसी समय असुरलोग राजपत्नियोंके गर्भसे जन्म लेने लगे ॥ २७ ॥

आदित्यैर्हि तदा दैत्या बहुशो निर्जिता युधि । ऐश्वर्याद् भ्रंशिताः स्वर्गात् सम्बभूवुः क्षिताविह ॥ २८ ॥ उन दिनों अदितिके पुत्रों (देवताओं)-द्वारा दैत्यगण अनेक बार युद्धमें पराजित हो चुके थे। स्वर्गके ऐश्वर्यसे भ्रष्ट होनेपर वे इस पृथ्वीपर ही जन्म लेने लगे ॥ २८ ॥

इह देवत्वमिच्छन्तो मानुषेषु मनस्विनः । जज्ञिरे भुवि भूतेषु तेषु तेष्वसुरा विभो ॥ २९ ॥ प्रभो! यहीं रहकर देवत्व प्राप्त करनेकी इच्छासे वे मनस्वी असुर भूतलपर मनुष्यों तथा भिन्न-भिन्न प्राणियोंमें जन्म लेने लगे ॥ २९ ॥