भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 467

नरश्रेष्ठ! बुद्धिमान् पुलस्त्य मुनिके पुत्र राक्षस, वानर, किन्नर तथा यक्ष हैं ॥ ७ ॥

पुलहस्य सुता राजञ्छरभाश्च प्रकीर्तिताः ।
सिंहाः किम्पुरुषा व्याघ्रा ऋक्षा ईहामृगास्तथा ॥ ८ ॥
राजन्! पुलहके शरभ, सिंह, किम्पुरुष, व्याघ्र, रीछ, और ईहामृग (भेड़िया) जातिके पुत्र हुए ॥ ८ ॥

क्रतोः क्रतुसमाः पुत्राः पतङ्गसहचारिणः ।
विश्रुतास्त्रिषु लोकेषु सत्यव्रतपरायणाः ॥ ९ ॥
क्रतु (यज्ञ)-के पुत्र क्रतुके ही समान पवित्र, तीनों लोकोंमें विख्यात, सत्यवादी, व्रतपरायण तथा भगवान् सूर्यके आगे चलनेवाले साठ हजार वालखिल्य ऋषि हुए ॥ ९ ॥

दक्षस्त्वजायताङ्गुष्ठाद् दक्षिणाद् भगवानृषिः ।
ब्रह्मणः पृथिवीपाल शान्तात्मा सुमहातपाः ॥ १० ॥
भूमिपाल! ब्रह्माजीके दाहिने अँगूठेसे महातपस्वी शान्तचित्त महर्षि भगवान् दक्ष उत्पन्न हुए ॥ १० ॥

वामादजायताङ्गुष्ठाद् भार्या तस्य महात्मनः ।
तस्यां पञ्चाशतं कन्याः स एवाजनयन्मुनिः ॥ ११ ॥
इसी प्रकार उन महात्माके बायें अँगूठेसे उनकी पत्नीका प्रादुर्भाव हुआ। महर्षिने उसके गर्भसे पचास कन्याएँ उत्पन्न कीं ॥ ११ ॥

ताः सर्वास्त्वनवद्याङ्ग्यः कन्याः कमललोचनाः ।
पुत्रिकाः स्थापयामास नष्टपुत्रः प्रजापतिः ॥ १२ ॥
वे सभी कन्याएँ परम सुन्दर अंगोंवाली तथा विकसित कमलके सदृश विशाल लोचनोंसे सुशोभित थीं। प्रजापति दक्षके पुत्र जब नष्ट हो गये, तब उन्होंने अपनी उन कन्याओंको पुत्रिका बनाकर रखा (और उनका विवाह पुत्रिकाधर्मके अनुसार ही किया*) ॥ १२ ॥

ददौ स दश धर्माय सप्तविंशतिमिन्दवे ।
दिव्येन विधिना राजन् कश्यपाय त्रयोदश ॥ १३ ॥
राजन्! दक्षने दस कन्याएँ धर्मको, सत्ताईस कन्याएँ चन्द्रमाको और तेरह कन्याएँ महर्षि कश्यपको दिव्य विधिके अनुसार समर्पित कर दीं ॥ १३ ॥

नामतो धर्मपत्न्यस्ताः कीर्त्यमाना निबोध मे ।
कीर्तिर्लक्ष्मीर्धृतिर्मेधा पुष्टिः श्रद्धा क्रिया तथा ॥ १४ ॥
बुद्धिर्लज्जा मतिश्चैव पत्न्यो धर्मस्य ता दश ।
द्वाराण्येतानि धर्मस्य विहितानि स्वयम्भुवा ॥ १५ ॥