महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
२११-
एकादशाधिकद्विशततमोऽध्यायः
तिलोत्तमापर मोहित होकर सुन्द-उपसुन्दका आपसमें लड़ना और मारा जाना एवं तिलोत्तमाको ब्रह्माजीद्वारा वरप्राप्ति तथा पाण्डवोंका द्रौपदीके विषयमें नियम-निर्धारण
नारद उवाच
जित्वा तु पृथिवीं दैत्यौ निःसपत्नौ गतव्यथौ ।
कृत्वा त्रैलोक्यमव्यग्रं कृतकृत्यौ बभूवतुः ॥ १ ॥
**नारदजी कहते हैं—**युधिष्ठिर! वे दोनों दैत्य सुन्द और उपसुन्द सारी पृथ्वीको जीतकर शत्रुओंसे रहित एवं व्यथारहित हो तीनों लोकोंको पूर्णतः अपने वशमें करके कृतकृत्य हो गये ॥ १ ॥
देवगन्धर्वयक्षाणां नागपार्थिवरक्षसाम् ।
आदाय सर्वरत्नानि परां तुष्टिमुपागतौ ॥ २ ॥
देवता, गन्धर्व, यक्ष, नाग, मनुष्य तथा राक्षसोंके सभी रत्नोंको छीनकर उन दोनों दैत्योंको बड़ा हर्ष प्राप्त हुआ ॥ २ ॥
यदा न प्रतिषेद्धारस्तयोः सन्तीह केचन ।
निरुद्योगौ तदा भूत्वा विजह्रातेऽमराविव ॥ ३ ॥
जब त्रिलोकीमें उनका सामना करनेवाले कोई नहीं रह गये, तब वे देवताओंके समान अकर्मण्य होकर भोग-विलासमें लग गये ॥ ३ ॥
स्त्रीभिर्माल्यैश्च गन्धैश्च भक्ष्यभोज्यैः सुपुष्कलैः ।
पानैश्च विविधैर्हृद्यैः परां प्रीतिमवापतुः ॥ ४ ॥
सुन्दरी स्त्रियों, मनोहर मालाओं, भाँति-भाँतिके सुगन्ध-द्रव्यों, पर्याप्त भोजन-सामग्रियों तथा मनको प्रिय लगनेवाले अनेक प्रकारके पेय रसोंका सेवन करके वे बड़े आनन्दसे दिन बिताने लगे ॥ ४ ॥
अन्तःपुरवनोद्याने पर्वतेषु वनेषु च ।
यथेप्सितेषु देशेषु विजह्रातेऽमराविव ॥ ५ ॥
अन्तःपुरके उपवन और उद्यानमें, पर्वतोंपर, वनोंमें तथा अन्य मनोवांछित प्रदेशोंमें भी वे देवताओंकी भाँति विहार करने लगे ॥ ५ ॥
ततः कदाचिद् विन्ध्यस्य प्रस्थे समशिलातले ।
पुष्पिताग्रेषु शालेषु विहारमभिजग्मतुः ॥ ६ ॥
तदनन्तर एक दिन विन्ध्यपर्वतके शिखरपर जहाँकी शिलामयी भूमि समतल थी और जहाँ ऊँचे शाल-वृक्षोंकी शाखाएँ फूलोंसे भरी हुई थीं, वहाँ वे दोनों दैत्य विहार करनेके लिये गये ।। ६ ।।
दिव्येषु सर्वकामेषु समानीतेषु तावुभौ ।
वरासनेषु संहृष्टौ सह स्त्रीभिर्निषीदतुः ।। ७ ।।
वहाँ उनके लिये सम्पूर्ण दिव्य भोग प्रस्तुत किये गये, तदनन्तर वे दोनों भाई श्रेष्ठ आसनोंपर सुन्दरी स्त्रियोंके साथ आनन्दमग्न होकर बैठे ।। ७ ।।
ततो वादित्रनृत्याभ्यामुपतिष्ठन्त तौ स्त्रियः ।
गीतैश्च स्तुतिसंयुक्तैः प्रीत्या समुपजग्मिरे ।। ८ ।।
तदनन्तर बहुत-सी स्त्रियाँ प्रेमपूर्वक उनके पास आयीं और वाद्य, नृत्य, गीत एवं स्तुति-प्रशंसा आदिके द्वारा उन दोनोंका मनोरंजन करने लगीं ।। ८ ।।
ततस्तिलोत्तमा तत्र वने पुष्पाणि चिन्वती ।
वेशं साऽऽक्षिप्तमाधाय रक्तेनैकेन वाससा ।। ९ ।।
इसी समय तिलोत्तमा वहाँ वनमें फूल चुनती हुई आयी। उसके शरीरपर एक ही लाल रंगकी महीन साड़ी थी। उसने ऐसा वेश धारण कर रखा था, जो किसी भी पुरुषको उन्मत्त बना सकता था ।। ९ ।।
नदीतीरेषु जातान् सा कर्णिकारान् प्रचिन्वती ।
शनैर्जगाम तं देशं यत्रास्तां तौ महासुरौ ।। १० ।।
नदीके किनारे उगे हुए कनेरके फूलोंका संग्रह करती हुई वह धीरे-धीरे उसी स्थानकी ओर गयी, जहाँ वे दोनों महादैत्य बैठे थे ।। १० ।।
तौ तु पीत्वा वरं पानं मदरक्तान्तलोचनौ ।
दृष्ट्वैव तां वरारोहां व्यथितौ सम्बभूवतुः ।। ११ ।।
उन दोनोंने बहुत अच्छा मादक रस पी लिया था, जिससे उनके नेत्र नशेके कारण कुछ लाल हो गये थे। उस सुन्दर अंगोंवाली तिलोत्तमाको देखते ही वे दोनों दैत्य कामवेदनासे व्यथित हो उठे ।। ११ ।।
तावुत्थायासनं हित्वा जग्मतुर्यत्र सा स्थिता ।
उभौ च कामसम्मत्तावुभौ प्रार्थयतश्च ताम् ।। १२ ।।
और अपना आसन छोड़कर खड़े हो उसी स्थानपर गये, जहाँ वह खड़ी थी। दोनों ही कामसे उन्मत्त हो रहे थे, इसलिये दोनों ही उसे अपनी स्त्री बनानेके लिये उससे प्रेमकी याचना करने लगे ।। १२ ।।
दक्षिणे तां करे सुभ्रूं सुन्दो जग्राह पाणिना ।
उपसुन्दोऽपि जग्राह वामे पाणौ तिलोत्तमाम् ।। १३ ।।
सुन्दने सुन्दर भौंहोंवाली तिलोत्तमाका दाहिना हाथ पकड़ा और उपसुन्दने उसका बायाँ हाथ पकड़ लिया ।। १३ ।।
वरप्रदानमत्तौ तावौरसेन बलेन च ।
धनरत्नमदाभ्यां च सुरापानमदेन च ।। १४ ।।
एक तो वे दुर्लभ वरदानके मदसे उन्मत्त थे, दूसरे उनपर अपने स्वाभाविक बलका नशा सवार था। इसके सिवा धनमद, रत्नमद और सुरापानके मदसे भी वे उन्मत्त हो रहे थे ।। १४ ।।
सर्वैरेतैर्मदैर्मत्तावन्योन्यं भ्रुकुटीकृतौ ।
(तौ कटाक्षेण दैत्येन्द्रावाकर्षति मुहुर्मुहुः ।
दक्षिणेन कटाक्षेण सुन्दं जग्राह कामिनी ।।
वामेनैव कटाक्षेण उपसुन्दं जिघृक्षती ।
गन्धाभरणरूपैस्तौ व्यामोहं जग्मतुस्तदा ।।)
मदकामसमाविष्टौ परस्परमथोचतुः ।। १५ ।।
इन सभी मदोंसे उन्मत्त होनेके कारण आपसमें ही एक-दूसरेपर उनकी भौंहें तन गयीं। तिलोत्तमा कटाक्षद्वारा उन दोनों दैत्यराजोंको बार-बार अपनी ओर आकृष्ट कर रही थी। उस कामिनीने अपने दाहिने कटाक्षसे सुन्दको आकृष्ट कर लिया और बायें कटाक्षसे वह उपसुन्दको वशमें करनेकी चेष्टा करने लगी। उसकी दिव्य सुगन्ध, आभूषणराशि तथा रूपसम्पत्तिसे वे दोनों दैत्य तत्काल मोहित हो गये। उनमें मद और कामका आवेश हो गया; अतः वे एक-दूसरेसे इस प्रकार बोले— ।। १५ ।।
मम भार्या तव गुरुरिति सुन्दोऽभ्यभाषत ।
मम भार्या तव वधूरुपसुन्दोऽभ्यभाषत ।। १६ ।।
सुन्दने कहा—'अरे! यह मेरी पत्नी है, तुम्हारे लिये माताके समान है।' यह सुनकर उपसुन्द बोल उठा—'नहीं-नहीं, यह मेरी भार्या है, तुम्हारे लिये तो पुत्रवधूके समान है' ।। १६ ।।
नैषा तव ममैषेति ततस्तौ मन्युराविशत् ।
तस्या रूपेण सम्मत्तौ विगतस्नेहसौहृदौ ।। १७ ।।
'यह तुम्हारी नहीं है, मेरी है', यही कहते-कहते उन दोनोंको क्रोध चढ़ आया। तिलोत्तमाके रूपसे मतवाले होकर वे दोनों स्नेह और सौहार्दसे शून्य हो गये ।। १७ ।।
तस्या हेतोर्गदे भीमे संगृहीतावुभौ तदा ।
प्रगृह्य च गदे भीमे तस्यां तौ काममोहितौ ।। १८ ।।
उस सुन्दरीको पानेके लिये दोनों भाइयोंने उस समय हाथमें भयंकर गदाएँ ले लीं। दोनों ही उसके प्रति कामसे मोहित हो रहे थे ।। १८ ।।
अहं पूर्वमहं पूर्वमित्यन्योन्यं निजघ्नतुः ।
तौ गदाभिहतौ भीमौ पेततुर्धरणीतले ॥ १९ ॥ 'पहले मैं इसे प्राप्त करूँगा', 'नहीं, पहले मैं'; ऐसा कहते हुए दोनों एक-दूसरेको मारने लगे। इस प्रकार गदाओंकी चोट खाकर वे दोनों भयानक दैत्य धरतीपर गिर पड़े ॥ १९ ॥ रुधिरेणावसिक्ताङ्गौ द्वाविवाकौ नभश्च्युतौ । ततस्ता विद्रुता नार्यः स च दैत्यगणस्तथा ॥ २० ॥ पातालमगमत् सर्वो विषादभयकम्पितः । ततः पितामहस्तत्र सह देवैर्महर्षिभिः ॥ २१ ॥ आजगाम विशुद्धात्मा पूजयंश्च तिलोत्तमाम् । वरेणच्छन्दयामास भगवान् प्रपितामहः ॥ २२ ॥ उनके सारे अंग खूनसे लथपथ हो रहे थे। ऐसा जान पड़ता था, मानो आकाशसे दो सूर्य पृथ्वीपर गिर गये हों। उनके मारे जानेपर वे सब स्त्रियाँ वहाँसे भाग गयीं और दैत्योंका वह सारा समुदाय विषाद और भयसे कम्पित होकर पातालमें चला गया। तत्पश्चात् विशुद्ध अन्तःकरणवाले भगवान् ब्रह्माजी देवताओं और महर्षियोंके साथ तिलोत्तमाकी प्रशंसा करते हुए वहाँ आये और भगवान् पितामहने उसे वरके द्वारा प्रसन्न किया ॥ २०—२२ ॥ वरं दित्सुः स तत्रैनां प्रीतः प्राह पितामहः । आदित्यचरिताँल्लोकान् विचरिष्यसि भाविनि ॥ २३ ॥ तेजसा च सुदृष्टां त्वां न करिष्यति कश्चन । एवं तस्यै वरं दत्त्वा सर्वलोकपितामहः ॥ २४ ॥ इन्द्रे त्रैलोक्यमाधाय ब्रह्मलोकं गतः प्रभुः । वर देनेके लिये उत्सुक हुए ब्रह्माजी स्वयं ही प्रसन्नतापूर्वक बोले—'भामिनि! जहाँतक सूर्यकी गति है, उन सभी लोकोंमें तू इच्छानुसार विचर सकेगी। तुझमें इतना तेज होगा कि कोई आँख भरकर तुझे अच्छी तरह देख भी न सकेगा।' इस प्रकार सम्पूर्ण लोकोंके पितामह ब्रह्माजी तिलोत्तमाको वरदान देकर तथा त्रिलोकीकी रक्षाका भार इन्द्रको सौंपकर पुनः ब्रह्मलोकको चले गये ॥ २३-२४ १/२ ॥
नारद उवाच एवं तौ सहितौ भूत्वा सर्वार्थेष्वेकनिश्चयौ ॥ २५ ॥ तिलोत्तमार्थं संक्रुद्धावन्योन्यमभिजघ्नतुः । तस्माद् ब्रवीमि वः स्नेहात् सर्वान् भरतसत्तमाः ॥ २६ ॥ यथा वो नात्र भेदः स्यात् सर्वेषां द्रौपदीकृते । तथा कुरुत भद्रं वो मम चेत् प्रियमिच्छथ ॥ २७ ॥ नारदजी कहते हैं—युधिष्ठिर! इस प्रकार सुन्द और उपसुन्दने परस्पर संगठित और सभी बातोंमें एकमत रहकर भी तिलोत्तमाके लिये कुपित हो एक-दूसरेको मार डाला। अतः
भरतवंशशिरोमणियो! मैं तुम सब लोगोंसे स्नेहवश कहता हूँ कि यदि मेरा प्रिय चाहते हो, तो ऐसा कुछ नियम बना लो, जिससे द्रौपदीके लिये तुम सब लोगोंमें फूट न होने पावे। तुम्हारा कल्याण हो॥ २५–२७॥
वैशम्पायन उवाच
एवमुक्ता महात्मानो नारदेन महर्षिणा ।
समयं चक्रिरे राजंस्तेऽन्योन्यवशमागताः ।
समक्षं तस्य देवर्षेर्नारदस्यामितौजसः ॥ २८ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! देवर्षि नारदके ऐसा कहनेपर एक-दूसरेके अधीन रहनेवाले उन अमिततेजस्वी महात्मा पाण्डवोंने देवर्षिके सामने ही यह नियम बनाया—॥ २८ ॥
(एकैकस्य गृहे कृष्णा वसेद् वर्षमकल्मषा ।)
द्रौपद्या नः सहासीनानान्योन्यं योऽभिदर्शयेत् ।
स नो द्वादश वर्षाणि ब्रह्मचारी वने वसेत् ॥ २९ ॥
‘हममेंसे प्रत्येकके घरमें पापरहित द्रौपदी एक-एक वर्ष निवास करे। द्रौपदीके साथ एकान्तमें बैठे हुए हममेंसे एक भाईको यदि दूसरा देख ले, तो वह बारह वर्षोंतक ब्रह्मचर्यपूर्वक वनमें निवास करे’॥ २९ ॥
कृते तु समये तस्मिन् पाण्डवैर्धर्मचारिभिः ।
नारदोऽप्यगमत् प्रीत इष्टं देशं महामुनिः ॥ ३० ॥
धर्मका आचरण करनेवाले पाण्डवोंद्वारा यह नियम स्वीकार कर लिये जानेपर महामुनि नारदजी प्रसन्न हो अभीष्ट स्थानको चले गये॥ ३० ॥
एवं तैः समयः पूर्वं कृतो नारदचोदितैः ।
न चाभिद्यन्त ते सर्वे तदान्योन्येन भारत ॥ ३१ ॥
भारत! इस प्रकार नारदजीकी प्रेरणासे पाण्डवोंने पहले ही नियम बना लिया था। इसीलिये वे सब आपसमें कभी एक-दूसरेके विरोधी नहीं हुए॥ ३१ ॥
(एतद् विस्तरशः सर्वमाख्यातं ते नरेश्वर ।
काले च तस्मिन् सम्पन्नं यथावज्जनमेजय ॥)
नरेश्वर जनमेजय! उस समय जो बातें जिस प्रकार घटित हुई थीं, वे सब मैंने तुम्हें विस्तारपूर्वक बतायी हैं।
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि विदुरागमनराज्यलम्भपर्वणि सुन्दोपसुन्दोपाख्याने एकादशाधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २११ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत विदुरागमनराज्यम्भपर्वमें सुन्दोपसुन्दोपाख्यानविषयक दो सौ ग्यारहवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २११ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ३ १/२ श्लोक मिलाकर कुल ३४ १/२ श्लोक हैं)
(अर्जुनवनवासपर्व)
(अर्जुनवनवासपर्व)
द्वादशाधिकद्विशततमोऽध्यायः
अर्जुनके द्वारा ब्राह्मणके गोधनकी रक्षाके लिये नियमभंग और वनकी ओर प्रस्थान
वैशम्पायन उवाच
एवं ते समयं कृत्वा न्यवसंस्तत्र पाण्डवाः ।
वशे शस्त्रप्रतापेन कुर्वन्तोऽन्यान् महीक्षितः ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! इस प्रकार नियम बनाकर पाण्डवलोग वहाँ रहने लगे। वे अपने अस्त्र-शस्त्रोंके प्रतापसे दूसरे राजाओंको अधीन करते रहते थे ॥ १ ॥
तेषां मनुजसिंहानां पञ्चानाममितौजसाम् ।
बभूव कृष्णा सर्वेषां पार्थानां वशवर्तिनी ॥ २ ॥
कृष्णा मनुष्योंमें सिंहके समान वीर और अमित तेजस्वी उन पाँचों पाण्डवोंकी आज्ञाके अधीन रहती थी ॥ २ ॥
ते तया तैश्च सा वीरैः पतिभिः सह पञ्चभिः ।
बभूव परमप्रीता नागैर्भोगवती यथा ॥ ३ ॥
पाण्डव द्रौपदीके साथ और द्रौपदी उन पाँचों वीर पतियोंके साथ ठीक उसी तरह अत्यन्त प्रसन्न रहती थी जैसे नागोंके रहनेसे भोगवतीपुरी परम शोभायुक्त होती है ॥ ३ ॥
वर्तमानेषु धर्मेण पाण्डवेषु महात्मसु ।
व्यवर्धन् कुरवः सर्वे हीनदोषाः सुखान्विताः ॥ ४ ॥
महात्मा पाण्डवोंके धर्मानुसार बर्ताव करनेके कारण समस्त कुरुवंशी निर्दोष एवं सुखी रहकर निरन्तर उन्नति करने लगे ॥ ४ ॥
अथ दीर्घेण कालेन ब्राह्मणस्य विशाम्पते ।
कस्यचित् तस्करा जह्रुः केचिद् गा नृपसत्तम ॥ ५ ॥
महाराज! तदनन्तर दीर्घकालके पश्चात् एक दिन कुछ चोरोंने किसी ब्राह्मणकी गौएँ चुरा लीं ॥ ५ ॥
ह्रियमाणे धने तस्मिन् ब्राह्मणः क्रोधमूर्च्छितः ।
आगम्य खाण्डवप्रस्थमुदक्रोशत् स पाण्डवान् ॥ ६ ॥
अपने गोधनका अपहरण होता देख ब्राह्मण अत्यन्त क्रुद्ध हो उठा और खाण्डवप्रस्थमें आकर उसने उच्चस्वरसे पाण्डवोंको पुकारा— ।। ६ ।।
ह्रियते गोधनं क्षुद्रैर्नृशंसैरकृतात्मभिः ।
प्रसह्य चास्मद्विषयादभ्यधावत पाण्डवाः ।। ७ ।।
‘पाण्डवो! हमारे गाँवसे कुछ नीच, क्रूर और पापात्मा चोर जबरदस्ती गोधन चुराकर लिये जा रहे हैं। उसकी रक्षाके लिये दौड़ो ।। ७ ।।
ब्राह्मणस्य प्रशान्तस्य हविर्ध्वाङ्क्षैः प्रलुप्यते ।
शार्दूलस्य गुहां शून्यां नीचः क्रोष्टाभिमर्दति ।। ८ ।।
‘आज एक शान्तस्वभाव ब्राह्मणका हविष्य कौए लूटकर खा रहे हैं। नीच सियार सिंहकी सूनी गुफाको रौंद रहा है ।। ८ ।।
अरक्षितारं राजानं बलिषड्भागहारिणम् ।
तमाहुः सर्वलोकस्य समग्रं पापचारिणम् ।। ९ ।।
‘जो राजा प्रजाकी आयका छठा भाग करके रूपमें वसूल करता है, किंतु प्रजाकी रक्षाकी कोई व्यवस्था नहीं करता, उसे सम्पूर्ण लोकोंमें पूर्ण पापाचारी कहा गया है ।। ९ ।।
ब्राह्मणस्वे हृते चौरैर्धर्मार्थे च विलोपिते ।
रोरूयमाणे च मयि क्रियतामस्त्रधारणम् ।। १० ।।
‘मुझ ब्राह्मणका धन चोर लिये जा रहे हैं, मेरे गौके न रहनेपर दुग्ध आदि हविष्यके अभावसे धर्म और अर्थका लोप हो रहा है तथा मैं यहाँ आकर रो रहा हूँ। पाण्डवो! (चोरोंको दण्ड देनेके लिये) अस्त्र धारण करो’ ।। १० ।।
वैशम्पायन उवाच
रोरूयमाणस्याभ्याशे भृशं विप्रस्य पाण्डवः ।
तानि वाक्यानि शुश्राव कुन्तीपुत्रो धनंजयः ।। ११ ।।
श्रुत्वैव च महाबाहुर्मा भैरित्याह तं द्विजम् ।
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! वह ब्राह्मण निकट आकर बहुत रो रहा था। पाण्डुपुत्र कुन्तीनन्दन धनंजयने उसकी कही हुई सारी बातें सुनीं और सुनकर उन महाबाहुने उस ब्राह्मणसे कहा—‘डरो मत’ ।। ११ ½ ।।
आयुधानि च यत्रासन् पाण्डवानां महात्मनाम् ।। १२ ।।
कृष्णया सह तत्रास्ते धर्मराजो युधिष्ठिरः ।
सम्प्रवेशाय चाशक्तो गमनाय च पाण्डवः ।। १३ ।।
महात्मा पाण्डवोंके अस्त्र-शस्त्र जहाँ रखे गये थे, वहीं धर्मराज युधिष्ठिर कृष्णाके साथ एकान्तमें बैठे थे। अतः पाण्डुपुत्र अर्जुन न तो घरके भीतर प्रवेश कर सकते थे और न खाली हाथ चोरोंका ही पीछा कर सकते थे ।। १२-१३ ।।
तस्य चार्थस्य तैर्वाक्यैश्चोद्यमानः पुनः पुनः । आक्रन्दे तत्र कौन्तेयश्चिन्तयामास दुःखितः ॥ १४ ॥ इधर उस आर्त ब्राह्मणकी बातें उन्हें बार-बार शस्त्र ले आनेको प्रेरित कर रही थीं। जब वह अधिक रोने-चिल्लाने लगा, तब अर्जुनने दुःखी होकर सोचा— ॥ १४ ॥
ह्रियमाणे धने तस्मिन् ब्राह्मणस्य तपस्विनः । अश्रुप्रमार्जनं तस्य कर्तव्यमिति निश्चयः ॥ १५ ॥ 'इस तपस्वी ब्राह्मणके गोधनका अपहरण हो रहा है; अतः ऐसे समयमें इसके आँसू पोंछना मेरा कर्तव्य है। यही मेरा निश्चय है ॥ १५ ॥
उपक्षेपणजोऽधर्मः सुमहान् स्यान्महीपतेः । यद्यस्य रुदतो द्वारि न करोम्यद्य रक्षणम् ॥ १६ ॥ 'यदि मैं राजद्वारपर रोते हुए इस ब्राह्मणकी रक्षा आज नहीं करूँगा, तो महाराज युधिष्ठिरको उपेक्षाजनित महान् अधर्मका भागी होना पड़ेगा ॥ १६ ॥
अनास्तिक्यं च सर्वेषामस्माकमपि रक्षणे । प्रतितिष्ठेत लोकेऽस्मिन्नधर्मश्चैव नो भवेत् ॥ १७ ॥ 'इसके सिवा लोकमें यह बात फैल जायगी कि हम सब लोग किसी आर्तकी रक्षारूप धर्मके पालनमें श्रद्धा नहीं रखते। साथ ही हमें अधर्म भी प्राप्तहोगा ॥ १७ ॥
अनादृत्य तु राजानं गते मयि न संशयः । अजातशत्रोर्नृपतेर्मम चैवानृतं भवेत् ॥ १८ ॥ 'यदि राजाका अनादर करके मैं घरके भीतर चला जाऊँ, तो महाराज अजातशत्रुके प्रति मेरी प्रतिज्ञा मिथ्या होगी ॥ १८ ॥
अनुप्रवेशे राज्ञस्तु वनवासो भवेन्मम । सर्वमन्यत् परिहृतं धर्षणात् तु महीपतेः ॥ १९ ॥ 'राजाकी उपस्थितिमें घरके भीतर प्रवेश करनेपर मुझको वनमें निवास करना होगा। इसमें महाराजके तिरस्कारके सिवा और सारी बातें तुच्छ होनेके कारण उपेक्षणीय हैं ॥ १९ ॥
अधर्मो वै महानस्तु वने वा मरणं मम । शरीरस्य विनाशेन धर्म एव विशिष्यते ॥ २० ॥ 'चाहे राजाके तिरस्कारसे मुझे नियमभंगका महान् दोष प्राप्त हो अथवा वनमें ही मेरी मृत्यु हो जाय तथापि शरीरको नष्ट करके भी गौ-ब्राह्मण-रक्षारूप धर्मका पालन ही श्रेष्ठ है' ॥ २० ॥
एवं विनिश्चित्य ततः कुन्तीपुत्रो धनंजयः । अनुप्रविश्य राजानमापृच्छ्य च विशाम्पते ॥ २१ ॥ धनुरादाय संहृष्टो ब्राह्मणं प्रत्यभाषत । जनमेजय! ऐसा निश्चय करके कुन्तीकुमार धनंजयने राजासे पूछकर घरके भीतर प्रवेश करके धनुष ले लिया और (बाहर आकर) प्रसन्नतापूर्वक ब्राह्मणसे कहा— ॥ २१ १/२ ॥
ब्राह्मणागम्यतां शीघ्रं यावत् परधनैषिणः ॥ २२ ॥ न दूरे ते गताः क्षुद्रास्तावद् गच्छावहे सह । यावन्निवर्तयाम्यद्य चौरहस्ताद् धनं तव ॥ २३ ॥ ‘विप्रवर! शीघ्र आइये। जबतक दूसरोंके धन हड़पनेकी इच्छावाले वे क्षुद्र चोर दूर नहीं चले जाते, तभीतक हम दोनों एक साथ वहाँ पहुँच जायँ। मैं अभी आपका गोधन चोरोंके हाथसे छीनकर आपको लौटा देता हूँ’ ॥ २२-२३ ॥
सोऽनुसृत्य महाबाहुर्धन्वी वर्मी रथी ध्वजी । शरैर्विध्वस्य तांश्चौरानवजित्य च तद् धनम् ॥ २४ ॥ ऐसा कहकर महाबाहु अर्जुनने धनुष और कवच धारण करके ध्वजायुक्त रथपर आरूढ़ हो उन चोरोंका पीछा किया और बाणोंसे चोरोंका विनाश करके सारा गोधन जीत
लिया ।। २४ ।। ब्राह्मणं समुपाकृत्य यशः प्राप्य च पाण्डवः । ततस्तद् गोधनं पार्थो दत्त्वा तस्मै द्विजातये ॥ २५ ॥ आजगाम पुरं वीरः सव्यसाची धनंजयः । सोऽभिवाद्य गुरून् सर्वान् सर्वैश्चाप्यभिनन्दितः ॥ २६ ॥
फिर ब्राह्मणको वह सारा गोधन देकर प्रसन्न करके अनुपम यशके भागी हो पाण्डुपुत्र सव्यसाची वीर धनंजय पुनः अपने नगरमें लौट आये। वहाँ आकर उन्होंने समस्त गुरुजनोंको प्रणाम किया और उन सभी गुरुजनोंने उनकी बड़ी प्रशंसा एवं अभिनन्दन किया ॥ २५-२६ ॥
धर्मराजमुवाचेदं व्रतमादिश मे प्रभो । समयः समतिक्रान्तो भवत्संदर्शने मया ॥ २७ ॥ वनवासो गमिष्यामि समयो ह्येष नः कृतः ।
इसके बाद अर्जुनने धर्मराजसे कहा—'प्रभो! मैंने आपको द्रौपदीके साथ देखकर पहलेके निश्चित नियमको भंग किया है; अतः आप इसके लिये मुझे प्रायश्चित्त करनेकी आज्ञा दीजिये। मैं वनवासके लिये जाऊँगा; क्योंकि हमलोगोंमें यह शर्त हो चुकी है' ॥ २७ ॥
इत्युक्तो धर्मराजस्तु सहसा वाक्यमप्रियम् ॥ २८ ॥ कथमित्यब्रवीद् वाचा शोकार्तः सज्जमानया । युधिष्ठिरो गुडाकेशं भ्राता भ्रातरमच्युतम् ॥ २९ ॥ उवाच दीनो राजा च धनंजयमिदं वचः । प्रमाणमस्मि यदि ते मत्तः शृणु वचोऽनघ ॥ ३० ॥
अर्जुनके मुखसे सहसा यह अप्रिय वचन सुनकर धर्मराज शोकातुर होकर लड़खड़ाती हुई वाणीमें बोले—'ऐसा क्यों करते हो?' इसके बाद राजा युधिष्ठिर धर्ममर्यादासे कभी च्युत न होनेवाले अपने भाई गुडाकेश धनंजयसे फिर दीन होकर बोले—'अनघ! यदि तुम मुझको प्रमाण मानते हो, तो मेरी यह बात सुनो— ॥ २८—३० ॥
अनुप्रवेशे यद् वीर कृतवांस्त्वं मम प्रियम् । सर्वं तदनुजानामि व्यलीकं न च मे हृदि ॥ ३१ ॥
'वीरवर! तुमने घरके भीतर प्रवेश करके तो मेरा प्रिय कार्य किया है, अतः उसके लिये मैं तुम्हें आज्ञा देता हूँ; क्योंकि मेरे हृदयमें वह अप्रिय नहीं है ॥ ३१ ॥
गुरोरनुप्रवेशो हि नोपघातो यवीयसः । यवीयसोऽनुप्रवेशो ज्येष्ठस्य विधिलोपकाः ॥ ३२ ॥
'यदि बड़ा भाई घरमें स्त्रीके साथ बैठा हो, तो छोटे भाईका वहाँ जाना दोषकी बात नहीं है; परंतु छोटा भाई घरमें हो, तो बड़े भाईका वहाँ जाना उसके धर्मका नाश करनेवाला
है ॥ ३२ ॥ निवर्तस्व महाबाहो कुरुष्व वचनं मम । न हि ते धर्मलोपोऽस्ति न च ते धर्षणा कृता ॥ ३३ ॥ ‘अतः महाबाहो! मेरी बात मानो; वनवासका विचार छोड़ दो। न तो तुम्हारे धर्मका लोप हुआ है और न तुम्हारे द्वारा मेरा तिरस्कार ही किया गया है’ ॥ ३३ ॥
अर्जुन उवाच
न व्याजेन चरेद् धर्ममिति मे भवतः श्रुतम् । न सत्याद् विचलिष्यामि सत्येनायुधमालभे ॥ ३४ ॥ अर्जुन बोले— प्रभो! मैंने आपके ही मुखसे सुना है कि धर्माचरणमें कभी बहानेबाजी नहीं करनी चाहिये। अतः मैं सत्यकी शपथ खाकर और शस्त्र छूकर कहता हूँ कि सत्यसे विचलित नहीं होऊँगा ॥ ३४ ॥ (आज्ञा तु मम दातव्या भवता कीर्तिवर्धन । भवदाज्ञामृते किंचिन्न कार्यमिति निश्चितम् ॥) यशोवर्धन! मुझे आप वनवासके लिये आज्ञा दें, मेरा यह निश्चय है कि मैं आपकी आज्ञाके बिना कोई कार्य नहीं करूँगा ॥
वैशम्पायन उवाच
सोऽभ्यनुज्ञाय राजानं वनचर्याय दीक्षितः । वने द्वादश वर्षाणि वासायानुजगाम ह ॥ ३५ ॥ वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! राजाकी आज्ञा लेकर अर्जुनने वनवासकी दीक्षा ली और वनमें बारह वर्षोंतक रहनेके लिये वे वहाँसे चल पड़े ॥ ३५ ॥
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि अर्जुनवनवासपर्वणि अर्जुनतीर्थयात्रायां द्वादशाधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २१२ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत अर्जुनवनवासपर्वमें अर्जुनतीर्थयात्राविषयक दो सौ बारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २१२ ॥ (दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलकर कुल ३६ श्लोक हैं)
२१३-
त्रयोदशाधिकद्विशततमोऽध्यायः
अर्जुनका गङ्गाद्वारमें ठहरना और वहाँ उनका उलूपीके साथ मिलन
वैशम्पायन उवाच
तं प्रयान्तं महाबाहुं कौरवाणां यशस्करम् ।
अनुजग्मुर्महात्मानो ब्राह्मणा वेदपारगाः ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! कौरववंशका यश बढ़ानेवाले महाबाहु अर्जुन जब जाने लगे, उस समय बहुत-से वेदज्ञ महात्मा ब्राह्मण उनके साथ हो लिये ॥ १ ॥
वेदवेदाङ्गविद्वांसस्तथैवाध्यात्मचिन्तकाः ।
भैक्षाश्च भगवद्भक्ताः सूताः पौराणिकाश्च ये ॥ २ ॥
कथकाश्चापरे राजन् श्रमणाश्च वनौकसः ।
दिव्याख्यानानि ये चापि पठन्ति मधुरं द्विजाः ॥ ३ ॥
वेद-वेदाङ्गोंके विद्वान्, अध्यात्मचिन्तन करनेवाले, भिक्षाजीवी ब्रह्मचारी, भगवद्भक्त, पुराणोंके ज्ञाता सूत, अन्य कथावाचक, संन्यासी, वानप्रस्थ तथा जो ब्राह्मण मधुर स्वरसे दिव्य कथाओंका पाठ करते हैं, वे सब अर्जुनके साथ गये ॥ २-३ ॥
एतैश्चान्यैश्च बहुभिः सहायैः पाण्डुनन्दनः ।
वृतः श्लक्ष्णकथैः प्रायान्मरुद्भिरिव वासवः ॥ ४ ॥
जैसे इन्द्र देवताओंके साथ चलते हैं, उसी प्रकार पाण्डुनन्दन अर्जुन पूर्वोक्त पुरुषों तथा अन्य बहुत-से मधुरभाषी सहायकोंके साथ यात्रा कर रहे थे ॥ ४ ॥
रमणीयानि चित्राणि वनानि च सरांसि च ।
सरितः सागरांश्चैव देशानपि च भारत ॥ ५ ॥
पुण्यान्यपि च तीर्थानि ददर्श भरतर्षभः ।
स गङ्गाद्वारमाश्रित्य निवेशमकरोत् प्रभुः ॥ ६ ॥
भारत! नरश्रेष्ठ अर्जुनने मार्गमें अनेक रमणीय एवं विचित्र वन, सरोवर, नदी, सागर, देश और पुण्यतीर्थ देखे। धीरे-धीरे गङ्गाद्वार (हरद्वार)-में पहुँचकर शक्तिशाली पार्थने वहीं डेरा डाल दिया ॥ ५-६ ॥
तत्र तस्याद्भुतं कर्म शृणु त्वं जनमेजय ।
कृतवान् यद् विशुद्धात्मा पाण्डूनां प्रवरो हि सः ॥ ७ ॥
जनमेजय! गङ्गाद्वारमें अर्जुनका एक अद्भुत कार्य सुनो, जो पाण्डवोंमें श्रेष्ठ विशुद्धचित्त धनंजयने किया था ॥ ७ ॥
निविष्टे तत्र कौन्तेये ब्राह्मणेषु च भारत ।
अग्निहोत्राणि विप्रास्ते प्रादुश्चक्रुरनेकशः ॥ ८ ॥
भारत! जब कुन्तीकुमार और उनके साथी ब्राह्मणलोग गङ्गाद्वारमें ठहर गये, तब उन ब्राह्मणोंने अनेक स्थानोंपर अग्निहोत्रके लिये अग्नि प्रकट की ॥ ८ ॥
तेषु प्रबोध्यमानेषु ज्वलितेषु हुतेषु च ।
कृतपुष्पोपहारेषु तीरन्तरगतेषु च ॥ ९ ॥
कृताभिषेकैर्विद्वद्भिर्नियतैः सत्पथि स्थितैः ।
शुशुभेऽतीव तद् राजन् गङ्गाद्वारं महात्मभिः ॥ १० ॥
गंगाके तटपर जब अलग-अलग अग्नियाँ प्रज्वलित हो गयीं और सन्मार्गमें स्थित एवं मन-इन्द्रियोंको वशमें रखनेवाले विद्वान् ब्राह्मणलोग स्नान करके फूलोंके उपहार चढ़ाकर जब पूर्वोक्त अग्नियोंमें आहुति दे चुके, तब उन महात्माओंके द्वारा उस गंगाद्वार नामक तीर्थकी शोभा बहुत बढ़ गयी ॥ ९-१० ॥
तथा पर्याकुले तस्मिन् निवेशे पाण्डवर्षभः ।
अभिषेकाय कौन्तेयो गङ्गामवततार ह ॥ ११ ॥
इस प्रकार विद्वान् एवं महात्मा ब्राह्मणोंसे जब उनका आश्रम भरा-पूरा हो गया, उस समय कुन्तीनन्दन अर्जुन स्नान करनेके लिये गंगामें उतरे ॥ ११ ॥
तत्राभिषेकं कृत्वा स तर्पयित्वा पितामहान् ।
उत्तितीर्षुर्जलाद् राजन्नग्निकार्यचिकीर्षया ॥ १२ ॥
अपकृष्टो महाबाहुर्नागराजस्य कन्यया ।
अन्तर्जले महाराज उलूप्या कामयानया ॥ १३ ॥
राजन्! वहाँ स्नान करके पितरोंका तर्पण करनेके पश्चात् अग्निहोत्र करनेके लिये वे जलसे निकलना ही चाहते थे कि नागराजकी पुत्री उलूपीने उनके प्रति आसक्त हो पानीके भीतरसे ही महाबाहु अर्जुनको खींच लिया ॥ १२-१३ ॥
ददर्श पाण्डवस्तत्र पावकं सुसमाहितः ।
कौरव्यस्याथ नागस्य भवने परमार्चिते ॥ १४ ॥
नागराज कौरव्यके परम सुन्दर भवनमें पहुँचकर पाण्डुनन्दन अर्जुनने एकाग्रचित्त होकर देखा, तो वहाँ अग्नि प्रज्वलित हो रही थी ॥ १४ ॥
तत्राग्निकार्यं कृतवान् कुन्तीपुत्रो धनंजयः ।
अशङ्कमानेन हुतस्तेनातुष्यद् हुताशनः ॥ १५ ॥
उस समय कुन्तीपुत्र धनंजयने निर्भीक होकर उसी अग्निमें अपना अग्निहोत्रकार्य सम्पन्न किया। इससे अग्निदेव बहुत संतुष्ट हुए ॥ १५ ॥
अग्निकार्यं स कृत्वा तु नागराजसुतां तदा ।
प्रहसन्निव कौन्तेय इदं वचनमब्रवीत् ॥ १६ ॥
अग्निहोत्रका कार्य कर लेनेके पश्चात् अर्जुनने नागराजकन्यासे हँसते हुए-से यह बात कही— ॥ १६ ॥ किमिदं साहसं भीरु कृतवत्यसि भाविनि । कश्चायं सुभगे देशः का च त्वं कस्य वाऽऽत्मजा ॥ १७ ॥ ‘भीरु! तुमने ऐसा साहस क्यों किया है? भाविनि! यह कौन-सा देश है? सुभगे! तुम कौन हो? किसकी पुत्री हो?’ ॥ १७ ॥
उलूप्युवाच ऐरावतकुले जातः कौरव्यो नाम पन्नगः । तस्यास्मि दुहिता राजन्नुलूपी नाम पन्नगी ॥ १८ ॥ **उलूपीने कहा—**राजन्! ऐरावत नागके कुलमें कौरव्य नामक नाग उत्पन्न हुए हैं, मैं उन्हींकी पुत्री नागिन हूँ। मेरा नाम उलूपी है ॥ १८ ॥ साहं त्वामभिषेकार्थमवतीर्णं समुद्रगाम् । दृष्ट्वैव पुरुषव्याघ्र कन्दर्पेणाभिमूर्च्छिता ॥ १९ ॥ नरश्रेष्ठ! जब आप स्नान करनेके लिये समुद्रगामिनी नदी गंगामें उतरे थे, उस समय आपको देखते ही मैं कामवेदनासे मूर्च्छित हो गयी थी ॥ १९ ॥ तां मामनङ्गलपितां त्वत्कृते कुरुनन्दन । अनन्यां नन्दयस्वाद्य प्रदानेनात्मनोऽनघ ॥ २० ॥ निष्पाप कुरुनन्दन! मैं आपके ही लिये कामदेवके तापसे जली जा रही हूँ। मैंने आपके सिवा दूसरेको अपना हृदय अर्पण नहीं किया है। अतः मुझे आत्मदान देकर आनन्दित कीजिये ॥ २० ॥
अर्जुन उवाच ब्रह्मचर्यमिदं भद्रे मम द्वादशवार्षिकम् । धर्मराजेन चादिष्टं नाहमस्मि स्वयंवशः ॥ २१ ॥ **अर्जुन बोले—**भद्रे! यह मेरे बारह वर्षोंतक चालू रहनेवाले ब्रह्मचर्यव्रतका समय है। धर्मराज युधिष्ठिरने मुझे इस व्रतके पालनकी आज्ञा दी है। अतः मैं अपने वशमें नहीं हूँ ॥ २१ ॥ तव चापि प्रियं कर्तुमिच्छामि जलचारिणि । अनृतं नोक्तपूर्वं च मया किंचन कर्हिचित् ॥ २२ ॥ जलचारिणि! मैं तुम्हारा भी प्रिय करना चाहता हूँ। मैंने पहले कभी कोई असत्य बात नहीं कही है ॥ २२ ॥ कथं च नानृतं मे स्यात् तव चापि प्रियं भवेत् । न च पीड्येत मे धर्मस्तथा कुर्या भुजङ्गमे ॥ २३ ॥
नागकन्ये! तुम ऐसा कोई उपाय करो, जिससे मुझे झूठका दोष न लगे, तुम्हारा भी प्रिय हो और मेरे धर्मको भी हानि न पहुँचे ॥ २३ ॥
उलूप्युवाच
जानाम्यहं पाण्डवेय यथा चरसि मेदिनीम् ।
यथा च ते ब्रह्मचर्यमिमादिष्टवान् गुरुः ॥ २४ ॥
**उलूपीने कहा—**पाण्डुनन्दन! आप जिस उद्देश्यसे पृथ्वीपर विचर रहे हैं और आपके बड़े भाईने जिस प्रकार आपको ब्रह्मचर्य-पालनका आदेश दिया है, वह सब मैं जानती हूँ ॥ २४ ॥
परस्परं वर्तमानान् द्रुपदस्यात्मजां प्रति ।
यो नोऽनुप्रविशेन्मोहात् स वै द्वादशवार्षिकम् ॥ २५ ॥
वने चरेद् ब्रह्मचर्यमिति वः समयः कृतः ।
आपलोगोंने आपसमें यह शर्त कर रखी है कि हम लोगोंमेंसे कोई भी यदि द्रौपदीके पास रहे, उस दशामें यदि दूसरा मोहवश उस घरमें प्रवेश करे, तो वह बारह वर्षोंतक वनमें रहकर ब्रह्मचर्यका पालन करे ॥ २५ ½ ॥
तदिदं द्रौपदीहेतोरन्योन्यस्य प्रवासनम् ॥ २६ ॥
कृतवांस्तत्र धर्मार्थमत्र धर्मो न दुष्यति ।
परित्राणं च कर्तव्यमार्तानां पृथुलोचन ॥ २७ ॥
अतः आपके बड़े भाईने वहाँ धर्मकी रक्षाके लिये केवल द्रौपदीको निमित्त बनाकर यह एक-दूसरेके प्रवासका नियम बनाया है। यहाँ आपका धर्म दूषित नहीं होता। विशाल नेत्रोंवाले अर्जुन! आपको आर्त प्राणियोंकी रक्षा करनी चाहिये ॥ २६-२७ ॥
कृत्वा मम परित्राणं तव धर्मो न लुप्यते ।
यदि वाप्यस्य धर्मस्य सूक्ष्मोऽपि स्याद् व्यतिक्रमः ॥ २८ ॥
स च ते धर्म एव स्याद् दत्त्वा प्राणान् ममार्जुन् ।
भक्तां च भज मां पार्थ सतामेतन्मतं प्रभो ॥ २९ ॥
मेरी रक्षा करनेसे आपके धर्मका लोप नहीं होगा। यदि आपके इस धर्मका थोड़ा-सा व्यतिक्रम भी हो जाय तो भी मुझे प्राणदान देनेसे तो आपको महान् धर्म होगा ही। अतः मेरे स्वामी कुन्तीकुमार अर्जुन! मैं आपकी भक्त हूँ, मुझे स्वीकार कीजिये; यह आर्तरक्षण सत्पुरुषोंका मत है ॥ २८-२९ ॥
न करिष्यसि चेदेवं मृतां मामुपधारय ।
प्राणदानान्महाबाहो चर धर्ममनुत्तमम् ॥ ३० ॥
महाबाहो! यदि आप मेरी प्रार्थना पूर्ण नहीं करेंगे तो निश्चय जानिये, मैं मर जाऊँगी। अतः मुझे प्राणदान देकर अत्यन्त उत्तम धर्मका अनुष्ठान कीजिये ॥ ३० ॥
शरणं च प्रपन्नास्मि त्वामद्य पुरुषोत्तम । दीनाननाथान् कौन्तेय परिरक्षसि नित्यशः ॥ ३१ ॥ पुरुषोत्तम! आज मैं आपकी शरणमें आयी हूँ। कुन्तीकुमार! आप प्रतिदिन न जाने कितने दीनों और अनाथोंकी रक्षा करते हैं ॥ ३१ ॥ साहं शरणमभ्येमि रोरवीमि च दुःखिता । याचे त्वां चाभिकामाहं तस्मात् कुरु मम प्रियम् । स त्वमात्मप्रदानेन सकामां कर्तुमर्हसि ॥ ३२ ॥ मैं भी यही आशा लेकर शरणमें आयी हूँ और बार-बार दुःखी होकर रोती-गिड़गिड़ाती हूँ। मैं आपके प्रति अनुरक्त हूँ और आपसे समागमकी याचना करती हूँ। अतः मेरा प्रिय मनोरथ पूर्ण कीजिये। मुझे आत्मदान देकर मेरी कामना सफल कीजिये ॥ ३२ ॥
वैशम्पायन उवाच
एवमुक्तस्तु कौन्तेयः पन्नगेश्वरकन्यया । कृतवांस्तत् तथा सर्वं धर्ममुद्दिश्य कारणम् ॥ ३३ ॥ वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! नागराजकी कन्या उलूपीके ऐसा कहनेपर कुन्तीकुमार अर्जुनने धर्मको ही सामने रखकर वह सब कार्य पूर्ण किया ॥ ३३ ॥ स नागभवने रात्रिं तामुषित्वा प्रतापवान् । उदितेऽभ्युत्थितः सूर्ये कौरव्यस्य निवेशनात् ॥ ३४ ॥ प्रतापी अर्जुनने नागराजके घरमें ही वह रात्रि व्यतीत की। फिर सूर्योदय होनेपर वे कौरव्यके भवनसे ऊपरको उठे ॥ ३४ ॥ आगतस्तु पुनस्तत्र गङ्गाद्वारं तया सह । परित्यज्य गता साध्वी उलूपी निजमन्दिरम् ॥ ३५ ॥ उलूपीके साथ अर्जुन फिर गंगाद्वारमें आ पहुँचे। साध्वी उलूपी उन्हें वहाँ छोड़कर पुनः अपने घरको लौट गयी ॥ ३५ ॥ दत्त्वा वरमजेयत्वं जले सर्वत्र भारत । साध्या जलचराः सर्वे भविष्यन्ति न संशयः ॥ ३६ ॥ (पुत्रमुत्पादयामास स तस्यां सुमनोहरम् । इरावन्तं महाभागं महाबलपराक्रमम् ॥) भारत! जाते समय उसने अर्जुनको यह वर दिया 'कि आप जलमें सर्वत्र अजेय होंगे और सभी जलचर आपके वशमें रहेंगे, इसमें संशय नहीं है।' इस प्रकार अर्जुनने उलूपीके गर्भसे अत्यन्त मनोहर तथा महान् बल-पराक्रमसे सम्पन्न इरावान् नामक महा उत्पन्न किया ॥ ३६ ॥
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि अर्जुनवनवासपर्वण्युलूपीसङ्गमे च त्रयोदशाधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २१३ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत अर्जुनवनवासपर्वमें उलूपी-समागमविषयक दो सौ तेरहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २१३ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल ३७ श्लोक हैं)
२१४-
चतुर्दशाधिकद्विशततमोऽध्यायः
अर्जुनका पूर्वदिशाके तीर्थोंमें भ्रमण करते हुए मणिपुरमें जाकर चित्रांगदाका पाणिग्रहण करके उसके गर्भसे एक पुत्र उत्पन्न करना
वैशम्पायन उवाच
कथयित्वा च तत् सर्वं ब्राह्मणेभ्यः स भारत ।
प्रययौ हिमवत्पार्श्वं ततो वज्रधरात्मजः ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! रातकी वह सारी घटना ब्राह्मणोंसे कहकर इन्द्रपुत्र अर्जुन हिमालयके पास चले गये ॥ १ ॥
अगस्त्यवटमासाद्य वसिष्ठस्य च पर्वतम् ।
भृगुतुङ्गे च कौन्तेयः कृतवाञ्छौचमात्मनः ॥ २ ॥
अगस्त्यवट, वसिष्ठपर्वत तथा भृगुतुंगपर जाकर उन्होंने शौच-स्नान आदि किये ॥ २ ॥
प्रददौ गोसहस्राणि सुबहूनि च भारत ।
निवेशांश्च द्विजातिभ्यः सोऽददत् कुरुसत्तमः ॥ ३ ॥
भारत! कुरुश्रेष्ठ अर्जुनने उन तीर्थोंमें ब्राह्मणोंको कई हजार गौएँ दान कीं और द्विजातियोंके रहनेके लिये घर एवं आश्रम बनवा दिये ॥ ३ ॥
हिरण्यविन्दोस्तीर्थे च स्नात्वा पुरुषसत्तमः ।
दृष्टवान् पाण्डवश्रेष्ठः पुण्यान्यायतनानि च ॥ ४ ॥
हिरण्यबिंदुतीर्थमें स्नान करके पाण्डवश्रेष्ठ पुरुषोत्तम अर्जुनने अनेक पवित्र स्थानोंका दर्शन किया ॥ ४ ॥
अवतीर्य नरश्रेष्ठो ब्राह्मणैः सह भारत ।
प्राचीं दिशमभिप्रेप्सुर्जगाम भरतर्षभः ॥ ५ ॥
जनमेजय! तत्पश्चात् हिमालयसे नीचे उतरकर भरत-कुलभूषण नरश्रेष्ठ अर्जुन पूर्व दिशाकी ओर चल दिये ॥ ५ ॥
आनुपूर्व्येण तीर्थानि दृष्टवान् कुरुसत्तमः ।
नदीं चोत्पलिनीं रम्यामरण्यं नैमिषं प्रति ॥ ६ ॥
नन्दामपरनन्दां च कौशिकीं च यशस्विनीम् ।
महानदीं गयां चैव गङ्गामपि च भारत ॥ ७ ॥
भारत! फिर उस यात्रामें कुरुश्रेष्ठ धनंजयने क्रमशः अनेक तीर्थोंका तथा नैमिषारण्यतीर्थमें बहनेवाली रमणीय उत्पलिनी नदी, नन्दा, अपरनन्दा, यशस्विनी कौशिकी
(कोसी), महानदी, गयातीर्थ और गंगाजीका भी दर्शन किया ॥ ६-७ ॥
एवं तीर्थानि सर्वाणि पश्यमानस्तथाऽऽश्रमान् ।
आत्मनः पावनं कुर्वन् ब्राह्मणेभ्यो ददौ च गाः ॥ ८ ॥
इस प्रकार उन्होंने सब तीर्थों और आश्रमोंको देखते हुए स्नान आदिसे अपनेको पवित्र करके ब्राह्मणोंके लिये बहुत-सी गौएँ दान कीं ॥ ८ ॥
अङ्गवङ्गकलिङ्गेषु यानि तीर्थानि कानिचित् ।
जगाम तानि सर्वाणि पुण्यान्यायतनानि च ॥ ९ ॥
तदनन्तर अंग, वंग और कलिंग देशोंमें जो कोई भी पवित्र तीर्थ और मन्दिर थे, उन सबमें वे गये ॥ ९ ॥
दृष्ट्वा च विधिवत् तानि धनं चापि ददौ ततः ।
कलिङ्गराष्ट्रद्वारेषु ब्राह्मणाः पाण्डवानुगाः ।
अभ्यनुज्ञाय कौन्तेयमुपावर्तन्त भारत ॥ १० ॥
और उन तीर्थोंका दर्शन करके उन्होंने विधिपूर्वक वहाँ धन-दान किया। कलिंग राष्ट्रके द्वारपर पहुँचकर अर्जुनके साथ चलनेवाले ब्राह्मण उनकी अनुमति लेकर वहाँसे लौट गये ॥ १० ॥
स तु तैरभ्यनुज्ञातः कुन्तीपुत्रो धनंजयः ।
सहायैरल्पकैः शूरः प्रययौ यत्र सागरः ॥ ११ ॥
परंतु कुन्तीपुत्र शूरवीर धनंजय उन ब्राह्मणोंकी आज्ञा ले थोड़े-से सहायकोंके साथ उस स्थानकी ओर गये, जहाँ समुद्र लहराता था ॥ ११ ॥
स कलिङ्गानतिक्रम्य देशानायतनानि च ।
हर्म्याणि रमणीयानि प्रेक्षमाणो ययौ प्रभुः ॥ १२ ॥
कलिंग देशको लाँघकर शक्तिशाली अर्जुन अनेक देशों, मन्दिरों तथा रमणीय अट्टालिकाओंका दर्शन करते हुए आगे बढ़े ॥ १२ ॥
महेन्द्रपर्वतं दृष्ट्वा तापसैरुपशोभितम् ।
समुद्रतीरेण शनैर्मणिपूरं जगाम ह ॥ १३ ॥
इस प्रकार वे तपस्वी मुनियोंसे सुशोभित महेन्द्र पर्वतका दर्शन कर समुद्रके किनारे-किनारे यात्रा करते हुए धीरे-धीरे मणिपूर पहुँच गये ॥ १३ ॥
तत्र सर्वाणि तीर्थानि पुण्यान्यायतनानि च ।
अभिगम्य महाबाहुरभ्यगच्छन्महीपतिम् ॥ १४ ॥
वहाँके सम्पूर्ण तीर्थों और पवित्र मन्दिरोंमें जानेके बाद महाबाहु अर्जुन मणिपूरनरेशके पास गये ॥ १४ ॥
मणिपूरेश्वरं राजन् धर्मज्ञं चित्रवाहनम् ।
तस्य चित्राङ्गदा नाम दुहिता चारुदर्शना ॥ १५ ॥