महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1472, कुल 2256 में से
संदर्भ में पढ़ेंतौ गदाभिहतौ भीमौ पेततुर्धरणीतले ॥ १९ ॥ 'पहले मैं इसे प्राप्त करूँगा', 'नहीं, पहले मैं'; ऐसा कहते हुए दोनों एक-दूसरेको मारने लगे। इस प्रकार गदाओंकी चोट खाकर वे दोनों भयानक दैत्य धरतीपर गिर पड़े ॥ १९ ॥ रुधिरेणावसिक्ताङ्गौ द्वाविवाकौ नभश्च्युतौ । ततस्ता विद्रुता नार्यः स च दैत्यगणस्तथा ॥ २० ॥ पातालमगमत् सर्वो विषादभयकम्पितः । ततः पितामहस्तत्र सह देवैर्महर्षिभिः ॥ २१ ॥ आजगाम विशुद्धात्मा पूजयंश्च तिलोत्तमाम् । वरेणच्छन्दयामास भगवान् प्रपितामहः ॥ २२ ॥ उनके सारे अंग खूनसे लथपथ हो रहे थे। ऐसा जान पड़ता था, मानो आकाशसे दो सूर्य पृथ्वीपर गिर गये हों। उनके मारे जानेपर वे सब स्त्रियाँ वहाँसे भाग गयीं और दैत्योंका वह सारा समुदाय विषाद और भयसे कम्पित होकर पातालमें चला गया। तत्पश्चात् विशुद्ध अन्तःकरणवाले भगवान् ब्रह्माजी देवताओं और महर्षियोंके साथ तिलोत्तमाकी प्रशंसा करते हुए वहाँ आये और भगवान् पितामहने उसे वरके द्वारा प्रसन्न किया ॥ २०—२२ ॥ वरं दित्सुः स तत्रैनां प्रीतः प्राह पितामहः । आदित्यचरिताँल्लोकान् विचरिष्यसि भाविनि ॥ २३ ॥ तेजसा च सुदृष्टां त्वां न करिष्यति कश्चन । एवं तस्यै वरं दत्त्वा सर्वलोकपितामहः ॥ २४ ॥ इन्द्रे त्रैलोक्यमाधाय ब्रह्मलोकं गतः प्रभुः । वर देनेके लिये उत्सुक हुए ब्रह्माजी स्वयं ही प्रसन्नतापूर्वक बोले—'भामिनि! जहाँतक सूर्यकी गति है, उन सभी लोकोंमें तू इच्छानुसार विचर सकेगी। तुझमें इतना तेज होगा कि कोई आँख भरकर तुझे अच्छी तरह देख भी न सकेगा।' इस प्रकार सम्पूर्ण लोकोंके पितामह ब्रह्माजी तिलोत्तमाको वरदान देकर तथा त्रिलोकीकी रक्षाका भार इन्द्रको सौंपकर पुनः ब्रह्मलोकको चले गये ॥ २३-२४ १/२ ॥
नारद उवाच एवं तौ सहितौ भूत्वा सर्वार्थेष्वेकनिश्चयौ ॥ २५ ॥ तिलोत्तमार्थं संक्रुद्धावन्योन्यमभिजघ्नतुः । तस्माद् ब्रवीमि वः स्नेहात् सर्वान् भरतसत्तमाः ॥ २६ ॥ यथा वो नात्र भेदः स्यात् सर्वेषां द्रौपदीकृते । तथा कुरुत भद्रं वो मम चेत् प्रियमिच्छथ ॥ २७ ॥ नारदजी कहते हैं—युधिष्ठिर! इस प्रकार सुन्द और उपसुन्दने परस्पर संगठित और सभी बातोंमें एकमत रहकर भी तिलोत्तमाके लिये कुपित हो एक-दूसरेको मार डाला। अतः