भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

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पृष्ठ 1483

अग्निहोत्रका कार्य कर लेनेके पश्चात् अर्जुनने नागराजकन्यासे हँसते हुए-से यह बात कही— ॥ १६ ॥ किमिदं साहसं भीरु कृतवत्यसि भाविनि । कश्चायं सुभगे देशः का च त्वं कस्य वाऽऽत्मजा ॥ १७ ॥ ‘भीरु! तुमने ऐसा साहस क्यों किया है? भाविनि! यह कौन-सा देश है? सुभगे! तुम कौन हो? किसकी पुत्री हो?’ ॥ १७ ॥

उलूप्युवाच ऐरावतकुले जातः कौरव्यो नाम पन्नगः । तस्यास्मि दुहिता राजन्नुलूपी नाम पन्नगी ॥ १८ ॥ **उलूपीने कहा—**राजन्! ऐरावत नागके कुलमें कौरव्य नामक नाग उत्पन्न हुए हैं, मैं उन्हींकी पुत्री नागिन हूँ। मेरा नाम उलूपी है ॥ १८ ॥ साहं त्वामभिषेकार्थमवतीर्णं समुद्रगाम् । दृष्ट्वैव पुरुषव्याघ्र कन्दर्पेणाभिमूर्च्छिता ॥ १९ ॥ नरश्रेष्ठ! जब आप स्नान करनेके लिये समुद्रगामिनी नदी गंगामें उतरे थे, उस समय आपको देखते ही मैं कामवेदनासे मूर्च्छित हो गयी थी ॥ १९ ॥ तां मामनङ्गलपितां त्वत्कृते कुरुनन्दन । अनन्यां नन्दयस्वाद्य प्रदानेनात्मनोऽनघ ॥ २० ॥ निष्पाप कुरुनन्दन! मैं आपके ही लिये कामदेवके तापसे जली जा रही हूँ। मैंने आपके सिवा दूसरेको अपना हृदय अर्पण नहीं किया है। अतः मुझे आत्मदान देकर आनन्दित कीजिये ॥ २० ॥

अर्जुन उवाच ब्रह्मचर्यमिदं भद्रे मम द्वादशवार्षिकम् । धर्मराजेन चादिष्टं नाहमस्मि स्वयंवशः ॥ २१ ॥ **अर्जुन बोले—**भद्रे! यह मेरे बारह वर्षोंतक चालू रहनेवाले ब्रह्मचर्यव्रतका समय है। धर्मराज युधिष्ठिरने मुझे इस व्रतके पालनकी आज्ञा दी है। अतः मैं अपने वशमें नहीं हूँ ॥ २१ ॥ तव चापि प्रियं कर्तुमिच्छामि जलचारिणि । अनृतं नोक्तपूर्वं च मया किंचन कर्हिचित् ॥ २२ ॥ जलचारिणि! मैं तुम्हारा भी प्रिय करना चाहता हूँ। मैंने पहले कभी कोई असत्य बात नहीं कही है ॥ २२ ॥ कथं च नानृतं मे स्यात् तव चापि प्रियं भवेत् । न च पीड्येत मे धर्मस्तथा कुर्या भुजङ्गमे ॥ २३ ॥