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महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

१५७-

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सप्तपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः

ब्राह्मणीका स्वयं मरनेके लिये उद्यत होकर पतिसे जीवित रहनेके लिये अनुरोध करना

ब्राह्मण्युवाच

न संतापस्त्वया कार्यः प्राकृतेनेव कर्हिचित् ।
न हि संतापकालोऽयं वैद्यस्य तव विद्यते ॥ १ ॥
ब्राह्मणी बोली—प्राणनाथ! आपको साधारण मनुष्योंकी भाँति कभी संताप नहीं करना चाहिये। आप विद्वान् हैं, आपके लिये यह संतापका अवसर नहीं है ॥ १ ॥

अवश्यं निधनं सर्वैर्गन्तव्यमिह मानवैः ।
अवश्यम्भाविन्यर्थे वै संतापो नेह विद्यते ॥ २ ॥
एक-न-एक दिन संसारमें सभी मनुष्योंको अवश्य मरना पड़ेगा; अतः जो बात अवश्य होनेवाली है, उसके लिये यहाँ शोक करनेकी आवश्यकता नहीं है ॥ २ ॥

भार्या पुत्रोऽथ दुहिता सर्वमात्मार्थमिष्यते ।
व्यथां जहि सुबुद्ध्या त्वं स्वयं यास्यामि तत्र च ॥ ३ ॥
एतद्धि परमं नार्याः कार्यं लोके सनातनम् ।
प्राणानपि परित्यज्य यद् भर्तृहितमाचरेत् ॥ ४ ॥
पत्नी, पुत्र और पुत्री—ये सब अपने ही लिये अभीष्ट होते हैं। आप उत्तम बुद्धि-विवेकका आश्रय लेकर शोक-संताप छोड़िये। मैं स्वयं वहाँ (राक्षसके समीप) चली जाऊँगी। पत्नीके लिये लोकमें सबसे बढ़कर यही सनातन कर्तव्य है कि वह अपने प्राणोंको भी निछावर करके पतिकी भलाई करे ॥ ३-४ ॥

तच्च तत्र कृतं कर्म तवापीदं सुखावहम् ।
भवत्यमुत्र चाक्षय्यं लोकेऽस्मिंश्च यशस्करम् ॥ ५ ॥
पतिके हितके लिये किया हुआ मेरा वह प्राणोत्सर्गरूप कर्म आपके लिये तो सुखकारक होगा ही, मेरे लिये भी परलोकमें अक्षय सुखका साधक और इस लोकमें यशकी प्राप्ति करानेवाला होगा ॥ ५ ॥

एष चैव गुरुर्धर्मो यं प्रवक्ष्याम्यहं तव ।
अर्थश्च तव धर्मश्च भूयानत्र प्रदृश्यते ॥ ६ ॥
यह सबसे बड़ा धर्म है, जो मैं आपसे बता रही हूँ। इसमें आपके लिये अधिक-से-अधिक स्वार्थ और धर्मका लाभ दिखायी देता है ॥ ६ ॥

यदर्थमिष्यते भार्या प्राप्तः सोऽर्थस्त्वया मयि ।

कन्या चैका कुमारश्च कृताहमनृणा त्वया ॥ ७ ॥
जिस उद्देश्यसे पत्नीकी अभिलाषा की जाती है, आपने वह उद्देश्य मुझसे सिद्ध कर लिया है। एक पुत्री और एक पुत्र आपके द्वारा मेरे गर्भसे उत्पन्न हो चुके हैं। इस प्रकार आपने मुझे भी उऋण कर दिया है ॥ ७ ॥
समर्थः पोषणे चासि सुतयो रक्षणे तथा ।
न त्वहं सुतयोः शक्ता तथा रक्षणपोषणे ॥ ८ ॥
इन दोनों संतानोंका पालन-पोषण और संरक्षण करनेमें आप समर्थ हैं। आपकी तरह मैं इन दोनोंके पालन-पोषण तथा रक्षाकी व्यवस्था नहीं कर सकूँगी ॥ ८ ॥
मम हि त्वद्विहीनायाः सर्वप्राणधनेश्वर ।
कथं स्यातां सुतौ बालौ भरेयं च कथं त्वहम् ॥ ९ ॥
मेरे सर्वस्वके स्वामी प्राणेश्वर! आपके न रहनेपर मेरे इन दोनों बच्चोंकी क्या दशा होगी? मैं किस तरह इन बालकोंका भरण-पोषण करूँगी? ॥ ९ ॥
कथं हि विधवानाथा बालपुत्रा विना त्वया ।
मिथुनं जीवयिष्यामि स्थिता साधुगते पथि ॥ १० ॥
मेरा पुत्र अभी बालक है, आपके बिना मैं अनाथ विधवा सन्मार्गपर स्थित रहकर इन दोनों बच्चोंको कैसे जिलाऊँगी ॥ १० ॥
अहंकृतावलिप्तैश्च प्रार्थ्यमानामिमां सुताम् ।
अयुक्तैस्तव सम्बन्धे कथं शक्ष्यामि रक्षितुम् ॥ ११ ॥
जो आपके यहाँ सम्बन्ध करनेके सर्वथा अयोग्य हैं, ऐसे अहंकारी और घमंडीलोग जब मुझसे इस कन्याको माँगेंगे, तब मैं उनसे इसकी रक्षा कैसे कर सकूँगी ॥ ११ ॥
उत्सृष्टमामिषं भूमौ प्रार्थयन्ति यथा खगाः ।
प्रार्थयन्ति जनाः सर्वे पतिहीनां तथा स्त्रियम् ॥ १२ ॥
साहं विचाल्यमाना वै प्रार्थ्यमाना दुरात्मभिः ।
स्थातुं पथि न शक्ष्यामि सज्जनेष्टे द्विजोत्तम ॥ १३ ॥
जैसे पक्षी पृथ्वीपर डाले हुए मांसके टुकड़ेको लेनेके लिये झपटते हैं, उसी प्रकार सब लोग विधवा स्त्रीको वशमें करना चाहते हैं। द्विजश्रेष्ठ! दुराचारी मनुष्य जब बार-बार मुझसे याचना करते हुए मुझे मर्यादासे विचलित करनेकी चेष्टा करेंगे, उस समय मैं श्रेष्ठ पुरुषोंके द्वारा अभिलषित मार्गपर स्थिर नहीं रह सकूँगी ॥ १२-१३ ॥
कथं तव कुलस्यैकामिमां बालामनागसम् ।
पितृपैतामहे मार्गे नियोक्तुमहमुत्सहे ॥ १४ ॥
आपके कुलकी इस एकमात्र निरपराध बालिकाको मैं बाप-दादोंके द्वारा पालित धर्ममार्गपर लगाये रखनेमें कैसे समर्थ होऊँगी ॥ १४ ॥
कथं शक्ष्यामि बालेऽस्मिन् गुणानाधातुमीप्सितान् ।

अनाथे सर्वतो लुप्ते यथा त्वं धर्मदर्शिवान् ।। १५ ।।
आप धर्मके ज्ञाता हैं, आप जैसे अपने बालकको सद्गुणी बना सकते हैं, उस प्रकार मैं आपके न रहनेपर सब ओरसे आश्रयहीन हुए इस अनाथ बालकमें वांछनीय उत्तम गुणोंका आधान कैसे कर सकूँगी ।। १५ ।।
इमामपि च ते बालामनाथां परिभूय माम् ।
अनर्हाः प्रार्थयिष्यन्ति शूद्रा वेदश्रुतिं यथा ।। १६ ।।
जैसे अनधिकारी शूद्र वेदकी श्रुतिको प्राप्त करना चाहता हो, उसी प्रकार अयोग्य पुरुष मेरी अवहेलना करके आपकी इस अनाथ बालिकाको भी ग्रहण करना चाहेंगे ।। १६ ।।
तां चैदहं न दित्सेयं त्वद्गुणैरुपबृंहिताम् ।
प्रमथ्यैनां हरेयुस्ते हविर्ध्वाङ्क्षा इवाध्वरात् ।। १७ ।।
आपके ही उत्तम गुणोंसे सम्पन्न अपनी इस पुत्रीको यदि मैं उन अयोग्य पुरुषोंके हाथमें न देना चाहूँगी तो वे बलपूर्वक इसे उसी प्रकार हर ले जायँगे, जैसे कौए यज्ञसे हविष्यका भाग लेकर उड़ जायँ ।। १७ ।।
सम्प्रेक्षमाणा पुत्रं ते नानुरूपमिवात्मनः ।
अनर्हवशमापन्नामिमां चापि सुतां तव ।। १८ ।।
अवज्ञाता च लोकेषु तथाऽऽत्मानमजानती ।
अवलिप्तैर्नरैर्ब्रह्मन् मरिष्यामि न संशयः ।। १९ ।।
ब्रह्मन्! आपके इस पुत्रको आपके अनुरूप न देखकर और आपकी इस पुत्रीको भी अयोग्य पुरुषके वशमें पड़ी देखकर तथा लोकमें घमंडी मनुष्योंद्वारा अपमानित हो अपनेको पूर्ववत् सम्मानित अवस्थामें न पाकर मैं प्राण त्याग दूँगी, इसमें संशय नहीं है ।। १८-१९ ।।
तौ च हीनौ मया बालौ त्वया चैव तथाऽऽत्मजौ ।
विनश्येतां न संदेहो मत्स्याविव जलक्षये ।। २० ।।
जैसे पानी सूख जानेपर वहाँकी मछलियाँ नष्ट हो जाती हैं, उसी प्रकार मुझसे और आपसे रहित होकर अपने ये दोनों बच्चे निस्संदेह नष्ट हो जायँगे ।। २० ।।
त्रितयं सर्वथाप्येवं विनशिष्यत्यसंशयम् ।
त्वया विहीनं तस्मात् त्वं मां परित्यक्तुमर्हसि ।। २१ ।।
नाथ! इस प्रकार आपके बिना मैं और ये दोनों बच्चे—तीनों ही सर्वथा विनष्ट हो जायँगे—इसमें तनिक भी संशय नहीं है। इसलिये आप केवल मुझे त्याग दीजिये ।। २१ ।।
व्युष्टिरेषा परा स्त्रीणां पूर्वं भर्तुः परां गतिम् ।
गन्तुं ब्रह्मन् सपुत्राणामिति धर्मविदो विदुः ।। २२ ।।
ब्रह्मन्! पुत्रवती स्त्रियाँ यदि अपने पतिसे पहले ही मृत्युको प्राप्त हो जायँ तो यह उनके लिये परम सौभाग्यकी बात है। धर्मज्ञ विद्वान् ऐसा ही मानते हैं ।। २२ ।।

(मितं ददाति हि पिता मितं माता मितं सुतः । अमितस्य हि दातारं का पतिं नाभिनन्दति ॥) पिता, माता और पुत्र—ये सब परिमित मात्रामें ही सुख देते हैं, अपरिमित सुखको देनेवाला तो केवल पति है। ऐसे पतिका कौन स्त्री आदर नहीं करेगी? परित्यक्तः सुतश्चायं दुहितेयं तथा मया । बान्धवाश्च परित्यक्तास्त्वदर्थं जीवितं च मे ॥ २३ ॥ आर्यपुत्र! आपके लिये मैंने यह पुत्र और पुत्री भी छोड़ दी, समस्त बन्धु-बान्धवोंको भी छोड़ दिया और अब अपना यह जीवन भी त्याग देनेको उद्यत हूँ ॥ २३ ॥ यज्ञैस्तपोभिर्नियमैर्दानैश्च विविधैस्तथा । विशिष्यते स्त्रिया भर्तुर्नित्यं प्रियहिते स्थितिः ॥ २४ ॥ स्त्री यदि सदा अपने स्वामीके प्रिय और हितमें लगी रहे तो यह उसके लिये बड़े-बड़े यज्ञों, तपस्याओं, नियमों और नाना प्रकारके दानोंसे भी बढ़कर है ॥ २४ ॥ तदिदं यच्चिकीर्षामि धर्मं परमसम्मतम् । इष्टं चैव हितं चैव तव चैव कुलस्य च ॥ २५ ॥ अतः मैं जो यह कार्य करना चाहती हूँ, यह श्रेष्ठ पुरुषोंसे सम्मत धर्म है और आपके तथा इस कुलके लिये सर्वथा अनुकूल एवं हितकारक है ॥ २५ ॥ इष्टानि चाप्यपत्यानि द्रव्याणि सुहृदः प्रियाः । आपद्धर्मप्रमोक्षाय भार्या चापि सतां मतम् ॥ २६ ॥ अनुकूल संतान, धन, प्रिय, सुहृद् तथा पत्नी—ये सभी आपद्धर्मसे छूटनेके लिये ही वांछनीय हैं; ऐसा साधु पुरुषोंका मत है ॥ २६ ॥ आपदर्थे धनं रक्षेद् दारान् रक्षेद् धनैरपि । आत्मानं सततं रक्षेद् दारैरपि धनैरपि ॥ २७ ॥ आपत्तिके लिये धनकी रक्षा करे, धनके द्वारा स्त्रीकी रक्षा करे और स्त्री तथा धन दोनोंके द्वारा सदा अपनी रक्षा करे ॥ २७ ॥ दृष्टादृष्टफलार्थं हि भार्या पुत्रो धनं गृहम् । सर्वमेतद् विधातव्यं बुधानामेष निश्चयः ॥ २८ ॥ पत्नी, पुत्र, धन और घर—ये सब वस्तुएँ दृष्ट और अदृष्ट फल (लौकिक और पारलौकिक लाभ)-के लिये संग्रहणीय हैं। विद्वानोंका यह निश्चय है ॥ २८ ॥ एकतो वा कुलं कृत्स्नमात्मा वा कुलवर्धनः । न समं सर्वमेवेति बुधानामेष निश्चयः ॥ २९ ॥ एक ओर सम्पूर्ण कुल हो और दूसरी ओर उस कुलकी वृद्धि करनेवाला शरीर हो तो उन दोनोंकी तुलना करनेपर वह सारा कुल उस शरीरके बराबर नहीं हो सकता; यह विद्वानोंका निश्चय है ॥ २९ ॥

स कुरुष्व मया कार्यं तारयात्मानमात्मना । अनुजानीहि मामार्य सुतौ मे परिपालय ॥ ३० ॥ आर्य! अतः आप मेरे द्वारा अभीष्ट कार्यकी सिद्धि कीजिये और स्वयं प्रयत्न करके अपनेको इस संकटसे बचाइये। मुझे राक्षसके पास जानेकी आज्ञा दीजिये और मेरे दोनों बच्चोंका पालन कीजिये ॥ ३० ॥

अवध्यां स्त्रियमित्याहुर्धर्मज्ञा धर्मनिश्चये । धर्मज्ञान् राक्षसानाहुर्न हन्यात् स च मामपि ॥ ३१ ॥ धर्मज्ञ विद्वानोंने धर्म-निर्णयके प्रसंगमें नारीको अवध्य बताया है। राक्षसोंको भी लोग धर्मज्ञ कहते हैं। इसलिये सम्भव है, वह राक्षस भी मुझे स्त्री समझकर न मारे ॥ ३१ ॥

निस्संशयं वधः पुंसां स्त्रीणां संशयितो वधः । अतो मामेव धर्मज्ञ प्रस्थापयितुमर्हसि ॥ ३२ ॥ पुरुष वहाँ जायँ, तो वह राक्षस उनका वध कर ही डालेगा इसमें संशय नहीं है; परंतु स्त्रियोंके वधमें संदेह है। (यदि राक्षसने धर्मका विचार किया तो मेरे बच जानेकी आशा है) अतः धर्मज्ञ आर्यपुत्र! आप मुझे ही वहाँ भेजें ॥ ३२ ॥

भुक्तं प्रियाण्यवाप्तानि धर्मश्च चरितो महान् । त्वत् प्रसूतिः प्रिया प्राप्ता न मां तप्स्यत्यजीवितम् ॥ ३३ ॥ मैंने सब प्रकारके भोग भोग लिये, मनको प्रिय लगनेवाली वस्तुएँ प्राप्त कर लीं, महान् धर्मका अनुष्ठान भी पूरा कर लिया और आपसे प्यारी संतान भी प्राप्त कर ली। अब यदि मेरी मृत्यु भी हो जाय तो उससे मुझे दुःख न होगा ॥ ३३ ॥

जातपुत्रा च वृद्धा च प्रियकामा च ते सदा । समीक्ष्यैतदहं सर्वं व्यवसायं करोम्यतः ॥ ३४ ॥ मुझसे पुत्र उत्पन्न हो गया, मैं बूढ़ी भी हो चली और सदा आपका प्रिय करनेकी इच्छा रखती आयी हूँ। इन सब बातोंपर विचार करके ही अब मैं मरनेका निश्चय कर रही हूँ ॥ ३४ ॥

उत्सृज्यापि हि मामार्य प्राप्स्यस्यन्यामपि स्त्रियम् । ततः प्रतिष्ठितो धर्मो भविष्यति पुनस्तव ॥ ३५ ॥ आर्य! मुझे त्याग करके आप दूसरी स्त्री भी प्राप्त कर सकते हैं। उससे आपका गृहस्थ-धर्म पुनः प्रतिष्ठित हो जायगा ॥ ३५ ॥

न चाप्यधर्मः कल्याण बहुपत्नीकृतां नृणाम् । स्त्रीणामधर्मः सुमहान् भर्तुः पूर्वस्य लङ्घने ॥ ३६ ॥ कल्याणस्वरूप हृदयेश्वर! बहुत-सी स्त्रियोंसे विवाह करनेवाले पुरुषोंको भी पाप नहीं लगता। परंतु स्त्रियोंको अपने पूर्वपतिका उल्लंघन करनेपर बड़ा भारी पाप लगता है ॥ ३६ ॥

एतत् सर्वं समीक्ष्य त्वमात्मत्यागं च गर्हितम् ।
आत्मानं तारयाद्याशु कुलं चेमौ च दारकौ ॥ ३७ ॥
इन सब बातोंको विचार करके और अपने देहके त्यागको निन्दित कर्म मानकर आप अब शीघ्र ही अपनेको, अपने कुलको और इन दोनों बच्चोंको भी संकटसे बचा लीजिये ॥ ३७ ॥

वैशम्पायन उवाच

एवमुक्तस्तया भर्ता तां समालिङ्ग्य भारत ।
मुमोच बाष्पं शनकैः सभार्यो भृशदुःखितः ॥ ३८ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**भारत! ब्राह्मणीके यों कहनेपर उसके पति ब्राह्मणदेवता अत्यन्त दुःखी हो उसे हृदयसे लगाकर उसके साथ ही धीरे-धीरे आँसू बहाने लगे ॥ ३८ ॥

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि बकवधपर्वणि ब्राह्मणीवाक्ये
सप्तपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १५७ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत बकवधपर्वमें ब्राह्मणीवाक्यविषयक एक सौ सत्तावनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १५७ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल ३९ श्लोक हैं)

१५८-

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अष्टपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः

ब्राह्मण-कन्याके त्याग और विवेकपूर्ण वचन तथा कुन्तीका उन सबके पास जाना

वैशम्पायन उवाच

तयोर्दुःखितयोर्वाक्यमतिमात्रं निशम्य तु ।
ततो दुःखपरीताङ्गी कन्या तावभ्यभाषत ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! दुःखमें डूबे हुए माता-पिताका यह (अत्यन्त शोकपूर्ण) वचन सुनकर कन्याके सम्पूर्ण अंगोंमें दुःख व्याप्त हो गया; उसने माता और पिता दोनोंसे कहा— ॥ १ ॥

किमेवं भृशदुःखार्तौ रोरूयेतामनाथवत् ।
ममापि श्रूयतां वाक्यं श्रुत्वा च क्रियतां क्षमम् ॥ २ ॥

‘आप दोनों इस प्रकार अत्यन्त दुःखसे आतुर हो अनाथकी भाँति क्यों बार-बार रो रहे हैं? मेरी भी बात सुनिये और उसे सुनकर जो उचित जान पड़े, वह कीजिये ॥ २ ॥

धर्मतोऽहं परित्याज्या युवयोर्नात्र संशयः ।
त्यक्तव्यां मां परित्यज्य त्राहि सर्वं मयैकया ॥ ३ ॥

‘इसमें संदेह नहीं कि एक-न-एक दिन आप दोनोंको धर्मतः मेरा परित्याग करना पड़ेगा। जब मैं त्याज्य ही हूँ, तब आज ही मुझे त्यागकर मुझ अकेलीके द्वारा इस समूचे कुलकी रक्षा कर लीजिये ॥ ३ ॥

इत्यर्थमिष्यतेऽपत्यं तारयिष्यति मामिति ।
अस्मिन्नुपस्थिते काले तरध्वं प्लववन्मया ॥ ४ ॥

‘संतानकी इच्छा इसीलिये की जाती है कि यह मुझे संकटसे उबारेगी। अतः इस समय जो संकट उपस्थित हुआ है, उसमें नौकाकी भाँति मेरा उपयोग करके आपलोग शोकसागरसे पार हो जाइये ॥ ४ ॥

इह वा तारयेद् दुर्गादुत वा प्रेत्य भारत ।
सर्वथा तारयेत् पुत्रः पुत्र इत्युच्यते बुधैः ॥ ५ ॥

‘जो पुत्र इस लोकमें दुर्गम संकटसे पार लगाये अथवा मृत्युके पश्चात् परलोकमें उद्धार करे—सब प्रकार पिताको तार दे, उसे ही विद्वानोंने वास्तवमें पुत्र कहा है ॥ ५ ॥

आकाङ्क्षन्ते च दौहित्रान् मयि नित्यं पितामहाः ।
तत् स्वयं वै परित्रास्ये रक्षन्ती जीवितं पितुः ॥ ६ ॥

‘पितरलोग मुझसे उत्पन्न होनेवाले दौहित्रसे अपने उद्धारकी सदा अभिलाषा रखते हैं, इसलिये मैं स्वयं ही पिताके जीवनकी रक्षा करती हुई उन सबका उद्धार करूँगी ॥ ६ ॥ भ्राता च मम बालोऽयं गते लोकममुं त्वयि । अचिरेणैव कालेन विनश्येत न संशयः ॥ ७ ॥ ‘यदि आप परलोकवासी हो गये तो यह मेरा नन्हा-सा भाई थोड़े ही समयमें नष्ट हो जायगा, इसमें संशय नहीं है ॥ ७ ॥ तातेऽपि हि गते स्वर्गं विनष्टे च ममानुजे । पिण्डः पितॄणां व्युच्छिद्येत् तत् तेषां विप्रियं भवेत् ॥ ८ ॥ ‘पिता स्वर्गवासी हो जायें और मेरा भैया भी नष्ट हो जाय, तो पितरोंका पिण्ड ही लुप्त हो जायगा, जो उनके लिये बहुत ही अप्रिय होगा ॥ ८ ॥ पित्रा त्यक्ता तथा मात्रा भ्रात्रा चाहमसंशयम् । दुःखाद् दुःखतरं प्राप्य म्रियेयमतथोचिता ॥ ९ ॥ ‘पिता, माता और भाई—तीनोंसे परित्यक्त होकर मैं एक दुःखसे दूसरे महान् दुःखमें पड़कर निश्चय ही मर जाऊँगी। यद्यपि मैं ऐसा दुःख भोगनेके योग्य नहीं हूँ, तथापि आप लोगोंके बिना मुझे वह सब भोगना ही पड़ेगा ॥ ९ ॥ त्वयि त्वरोगे निर्मुक्ते माता भ्राता च मे शिशुः । संतानश्चैव पिण्डश्च प्रतिष्ठास्यत्यसंशयम् ॥ १० ॥ ‘यदि आप मृत्युके संकटसे मुक्त एवं नीरोग रहे तो मेरी माता, मेरा नन्हा-सा भाई, संतान-परम्परा और पिण्ड (श्राद्धकर्म)—ये सब स्थिर रहेंगे; इसमें संशय नहीं है ॥ १० ॥ आत्मा पुत्रः सखा भार्या कृच्छ्रं तु दुहिता किल । स कृच्छ्रान्मोचयात्मानं मां च धर्मे नियोजय ॥ ११ ॥ ‘कहते हैं पुत्र अपना आत्मा है, पत्नी मित्र है; किंतु पुत्री निश्चय ही संकट है, अतः आप इस संकटसे अपनेको बचा लीजिये और मुझे भी धर्ममें लगाइये ॥ ११ ॥ अनाथा कृपणा बाला यत्रक्वचनगामिनी । भविष्यामि त्वया तात विहीना कृपणा सदा ॥ १२ ॥ ‘पिताजी! आपके बिना मैं सदाके लिये दीन और असहाय हो जाऊँगी, अनाथ और दयनीय समझी जाऊँगी। अरक्षित बालिका होनेके कारण मुझे जहाँ कहीं भी जानेके लिये विवश होना पड़ेगा ॥ १२ ॥ अथवाहं करिष्यामि कुलस्यास्य विमोचनम् । फलसंस्था भविष्यामि कृत्वा कर्म सुदुष्करम् ॥ १३ ॥ ‘अथवा मैं अपनेको मृत्युके मुखमें डालकर इस कुलको संकटसे छुड़ाऊँगी। यह अत्यन्त दुष्कर कर्म कर लेनेसे मेरी मृत्यु सफल हो जायगी ॥ १३ ॥ अथवा यास्यसे तत्र त्यक्त्वा मां द्विजसत्तम ।

पीडिताहं भविष्यामि तदवेक्षस्व मामपि ॥ १४ ॥
‘द्विजश्रेष्ठ पिताजी! यदि आप मुझे त्यागकर स्वयं राक्षसके पास चले जायँगे तो मैं बड़े दुःखमें पड़ जाऊँगी। अतः मेरी ओर भी देखिये ॥ १४ ॥

तदस्मदर्थं धर्मार्थं प्रसवार्थं स सत्तम ।
आत्मानं परिरक्षस्व त्यक्तव्यां मां च संत्यज ॥ १५ ॥
‘अतः हे साधुशिरोमणे! आप मेरे लिये, धर्मके लिये तथा संतानकी रक्षाके लिये भी अपनी रक्षा कीजिये और मुझे, जिसको एक दिन छोड़ना ही है, आज ही त्याग दीजिये ॥ १५ ॥

अवश्यकरणीये च मा त्वां कालोऽत्यगादयम् ।
किं त्वतः परं दुःखं यद् वयं स्वर्गते त्वयि ॥ १६ ॥
याचमानाः परादन्नं परिधावेमहि श्ववत् ।
त्वयि त्वरोगे निर्मुक्ते क्लेशादस्मात् सबान्धवे ।
अमृते वसती लोके भविष्यामि सुखान्विता ॥ १७ ॥
‘पिताजी! जो काम अवश्य करना है, उसका निश्चय करनेमें आपको अपना समय व्यर्थ नहीं जाने देना चाहिये (शीघ्र मेरा त्याग करके इस कुलकी रक्षा करनी चाहिये)। हमलोगोंके लिये इससे बढ़कर महान् दुःख और क्या होगा कि आपके स्वर्गवासी हो जानेपर हम दूसरोंसे अन्नकी भीख माँगते हुए कुत्तोंकी तरह इधर-उधर दौड़ते फिरें। यदि मुझे त्यागकर आप अपने भाई-बन्धुओंसहित इस क्लेशसे मुक्त हो नीरोग बने रहें तो मैं अमरलोकमें निवास करती हुई बहुत सुखी होऊँगी ॥ १६-१७ ॥

इतः प्रदाने देवाश्च पितरश्चेति न श्रुतम् ।
त्वया दत्तेन तोयेन भविष्यन्ति हिताय वै ॥ १८ ॥
‘यद्यपि ऐसे दानसे देवता और पितर प्रसन्न नहीं होते, ऐसा मैंने सुन रखा है, तथापि आपके द्वारा दी हुई जलांजलिसे वे प्रसन्न होकर अवश्य हमारा हित-साधन करनेवाले होंगे’ ॥ १८ ॥

वैशम्पायन उवाच

एवं बहुविधं तस्या निशम्य परिदेवितम् ।
पिता माता च सा चैव कन्या प्ररुरुदुस्त्रयः ॥ १९ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! इस तरह उस कन्याके मुखसे नाना प्रकारका विलाप सुनकर पिता-माता और वह कन्या तीनों फूट-फूटकर रोने लगे ॥ १९ ॥

ततः प्ररुदितान् सर्वान् निशम्याथ सुतस्तदा ।
उत्फुल्लनयनो बालः कलमव्यक्तमब्रवीत् ॥ २० ॥

तब उन सबको रोते देख ब्राह्मणका नन्हा-सा बालक उन सबकी ओर प्रफुल्ल नेत्रोंसे देखता हुआ तोतली भाषामें अस्पष्ट एवं मधुर वचन बोला— ।। २० ।। मा पिता रुद मा मातर्मा स्वसस्त्विति चाब्रवीत् । प्रहसन्निव सर्वास्तानेकैकमनुसर्पति ।। २१ ।। ततः स तृणमादाय प्रहृष्टः पुनरब्रवीत् । अनेनाहं हनिष्यामि राक्षसं पुरुषादकम् ।। २२ ।। ‘पिताजी! न रोओ, माँ! न रोओ, बहिन! न रोओ, वह हँसता हुआ-सा प्रत्येकके पास जाता और सबसे यही बात कहता था। तदनन्तर उसने एक तिनका उठा लिया और अत्यन्त हर्षमें भरकर कहा—‘मैं इसीसे उस नरभक्षी राक्षसको मार डालूँगा’ ।। २१-२२ ।। तथापि तेषां दुःखेन परीतानां निशम्य तत् । बालस्य वाक्यमव्यक्तं हर्षः समभवन्महान् ।। २३ ।। यद्यपि वे सब लोग दुःखमें डूबे हुए थे, तथापि उस बालककी अस्पष्ट तोतली बोली सुनकर उनके हृदयमें सहसा अत्यन्त प्रसन्नताकी लहर दौड़ गयी ।। २३ ।। अयं काल इति ज्ञात्वा कुन्ती समुपसृत्य तान् । गतासूनमृतेनेव जीवयन्तीदमब्रवीत् ।। २४ ।। ‘अब यही अपनेको प्रकट करनेका अवसर है’ यह जानकर कुन्तीदेवी उन सबके निकट गयीं और अपनी अमृतमयी वाणीसे उन मृतक (तुल्य) मानवोंको जीवन प्रदान करती हुई-सी बोलीं ।। २४ ।।

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि बकवधपर्वणि ब्राह्मणकन्यापुत्रवाक्ये अष्टपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः ।। १५८ ।। इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत बकवधपर्वमें ब्राह्मणकी कन्या और पुत्रके वचन-सम्बन्धी एक सौ अट्ठावनवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १५८ ।।

१५९-

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एकोनषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः

कुन्तीके पूछनेपर ब्राह्मणका उनसे अपने दुःखका कारण बताना

कुन्त्युवाच

कुतोमूलमिदं दुःखं ज्ञातुमिच्छामि तत्त्वतः ।
विदित्वाप्यपकर्षेयं शक्यं चेदपकर्षितुम् ॥ १ ॥

कुन्तीने पूछा— ब्रह्मन्! आपलोगोंके इस दुःखका कारण क्या है? मैं यह ठीक-ठीक जानना चाहती हूँ। उसे जानकर यदि मिटाया जा सकेगा तो मिटानेकी चेष्टा करूँगी ॥ १ ॥

ब्राह्मण उवाच

उपपन्नं सतामेतद् यद् ब्रवीषि तपोधने ।
न तु दुःखमिदं शक्यं मानुषेण व्यपोहितुम् ॥ २ ॥

ब्राह्मणने कहा— तपोधने! आप जो कुछ कह रही हैं, वह आप-जैसे सज्जनोंके अनुरूप ही है; परंतु हमारे इस दुःखको मनुष्य नहीं मिटा सकता ॥ २ ॥

समीपे नगरस्यास्य बको वसति राक्षसः ।
(इतो गव्यूतिमात्रेऽस्ति यमुनागह्वरे गुहा ।
तस्यां घोरः स वसति जिघांसुः पुरुषादकः ॥)
ईशो जनपदस्यास्य पुरस्य च महाबलः ॥ ३ ॥
पुष्टो मानुषमांसेन दुर्बुद्धिः पुरुषादकः ।
(तेनेयं पुरुषादेन भक्ष्यमाणा दुरात्मना ।
अनाथा नगरी नाथं त्रातारं नाधिगच्छति ॥)
रक्षत्यसुरराण्नित्यमिमं जनपदं बली ॥ ४ ॥
नगरं चैव देशं च रक्षोबलसमन्वितः ।
तत्कृते परचक्राच्च भूतेभ्यश्च न नो भयम् ॥ ५ ॥

इस नगरके पास ही यहाँसे दो कोसकी दूरीपर यमुनाके किनारे घने जंगलमें एक गुफा है, उसीमें एक भयंकर हिंसाप्रिय नरभक्षी राक्षस रहता है। उसका नाम है बक। वह राक्षस अत्यन्त बलवान् है। वही इस जनपद और नगरका स्वामी है। वह खोटी बुद्धिवाला मनुष्यभक्षी राक्षस मनुष्यके ही मांससे पुष्ट हुआ है। उस दुरात्मा नरभक्षी निशाचरद्वारा प्रतिदिन खायी जाती हुई यह नगरी अनाथ हो रही है। इसे कोई रक्षक या स्वामी नहीं मिल रहा है। राक्षसोचित-बलसे सम्पन्न वह शक्तिशाली असुरराज सदा इस जनपद, नगर और

देशकी रक्षा करता है। उसके कारण हमें शत्रुराज्यों तथा हिंसक प्राणियोंसे कभी भय नहीं होता ।। ३—५ ।। वेतनं तस्य विहितं शालिवाहस्य भोजनम् । महिषौ पुरुषश्चैको यस्तदादाय गच्छति ।। ६ ।। उसके लिये कर नियत किया गया है—बीस खारी अगहनीके चावलका भात, दो भैंसे और एक मनुष्य, जो वह सब सामान लेकर उसके पास जाता है ।। ६ ।। एकैकश्चापि पुरुषस्तत् प्रयच्छति भोजनम् । स वारो बहुभिर्वर्षैर्भवत्यसुकरो नरैः ।। ७ ।। प्रत्येक गृहस्थ अपनी बारी आनेपर उसे भोजन देता है। यद्यपि यह बारी बहुत वर्षोंके बाद आती है, तथापि लोगोंके लिये उसकी पूर्ति बहुत कठिन होती है ।। ७ ।। तद्विमोक्षाय ये केचिद् यतन्ति पुरुषाः क्वचित् । सपुत्रदारांस्तान् हत्वा तद् रक्षो भक्षयत्युत ।। ८ ।। जो कोई पुरुष कभी उससे छूटनेका प्रयत्न करते हैं, वह राक्षस उन्हें पुत्र और स्त्रीसहित मारकर खा जाता है ।। ८ ।। वेत्रकीयगृहे राजा नायं नयमिहास्थितः । उपायं तं न कुरुते यत्नादपि स मन्दधीः । अनामयं जनस्यास्य येन स्यादद्य शाश्वतम् ।। ९ ।। वास्तवमें जो यहाँका राजा है, वह वेत्रकीयगृह नामक स्थानमें रहता है। परंतु वह न्यायके मार्गपर नहीं चलता। वह मन्दबुद्धि राजा यत्न करके भी ऐसा कोई उपाय नहीं करता, जिससे सदाके लिये प्रजाका संकट दूर हो जाय ।। ९ ।। एतदर्हा वयं नूनं वसामो दुर्बलस्य ये । विषये नित्यवास्तव्याः कुराजानमुपाश्रिताः ।। १० ।। निश्चय ही हमलोग ऐसा ही दुःख भोगनेके योग्य हैं; क्योंकि इस दुर्बल राजाके राज्यमें निवास करते हैं, यहाँके नित्य निवासी हो गये हैं और इस दुष्ट राजाके आश्रयमें रहते हैं ।। १० ।। ब्राह्मणाः कस्य वक्तव्याः कस्य वाच्छन्दचारिणः । गुणैरेते हि वत्स्यन्ति कामगाः पक्षिणो यथा ।। ११ ।। ब्राह्मणोंको कौन आदेश दे सकता है अथवा वे किसके अधीन रह सकते हैं। ये तो इच्छानुसार विचरनेवाले पक्षियोंकी भाँति देश या राजाके गुण देखकर ही कहीं भी निवास करते हैं ।। ११ ।। राजानं प्रथमं विन्देत् ततो भार्यां ततो धनम् । त्रयस्य संचयेनास्य ज्ञातीन् पुत्रांश्च तारयेत् ।। १२ ।।

नीति कहती है, पहले अच्छे राजाको प्राप्त करे। उसके बाद पत्नीकी और फिर धनकी उपलब्धि करे। इन तीनोंके संग्रहद्वारा अपने जाति-भाइयों तथा पुत्रोंको संकटसे बचाये ।। १२ ।।

विपरीतं मया चेदं त्रयं सर्वमुपार्जितम् ।
तदिमामापदं प्राप्य भृशं तप्यामहे वयम् ।। १३ ।।
मैंने इन तीनोंका विपरीत ढंगसे उपार्जन किया है (अर्थात् दुष्ट राजाके राज्यमें निवास किया, कुराज्यमें विवाह किया और विवाहके पश्चात् धन नहीं कमाया); इसलिये इस विपत्तिमें पड़कर हमलोग भारी कष्ट पा रहे हैं ।। १३ ।।

सोऽयमस्माननुप्राप्तो वारः कुलविनाशनः ।
भोजनं पुरुषश्चैकः प्रदेयं वेतनं मया ।। १४ ।।
वही आज हमारी बारी आयी है, जो समूचे कुलका विनाश करनेवाली है। मुझे उस राक्षसको करके रूपमें नियत भोजन और एक पुरुषकी बलि देनी पड़ेगी ।। १४ ।।

न च मे विद्यते वित्तं संक्रेतुं पुरुषं क्वचित् ।
सुहृज्जनं प्रदातुं च न शक्ष्यामि कदाचन ।। १५ ।।
मेरे पास धन नहीं है, जिससे कहींसे किसी पुरुषको खरीद लाऊँ। अपने सुहृदों एवं सगे-सम्बन्धियोंको तो मैं कदापि उस राक्षसके हाथमें नहीं दे सकूँगा ।। १५ ।।

गतिं चैव न पश्यामि तस्मान्मोक्षाय रक्षसः ।
सोऽहं दुःखार्णवे मग्नो महत्यसुकरे भृशम् ।। १६ ।।
उस निशाचरसे छूटनेका कोई उपाय मुझे नहीं दिखायी देता; अतः मैं अत्यन्त दुस्तर दुःखके महासागरमें डूबा हुआ हूँ ।। १६ ।।

सहैवैतैर्गमिष्यामि बान्धवैरद्य राक्षसम् ।
ततो नः सहितान् क्षुद्रः सर्वानवोपभोक्ष्यति ।। १७ ।।
अब इन बान्धवजनोंके साथ ही मैं राक्षसके पास जाऊँगा; फिर वह नीच निशाचर एक ही साथ हम सबको खा जायगा ।। १७ ।।

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि बकवधपर्वणि कुन्तीप्रश्ने
एकोनषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः ।। १५९ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत बकवधपर्वमें कुन्तीप्रश्नविषयक एक सौ उनसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १५९ ।।
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके २ श्लोक मिलाकर कुल १९ श्लोक हैं)

१६०-

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षष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः

कुन्ती और ब्राह्मणकी बातचीत

कुन्त्युवाच

न विषादस्त्वया कार्यो भयादस्मात् कथंचन ।
उपायः परिदृष्टोऽत्र तस्मान्मोक्षाय रक्षसः ॥ १ ॥
कुन्ती बोली— ब्रह्मन्! आपको अपने ऊपर आये हुए इस भयसे किसी प्रकार विषाद नहीं करना चाहिये। इस परिस्थितिमें उस राक्षससे छूटनेका उपाय मेरी समझमें आ गया ॥ १ ॥
एकस्तव सुतो बालः कन्या चैका तपस्विनी ।
न चैतयोस्तथा पत्न्या गमनं तव रोचये ॥ २ ॥
आपके तो एक ही नन्हा-सा पुत्र और एक ही तपस्विनी कन्या है, अतः इन दोनोंका तथा आपकी पत्नीका भी वहाँ जाना मुझे अच्छा नहीं लगता ॥ २ ॥
मम पञ्च सुता ब्रह्मंस्तेषामेको गमिष्यति ।
त्वदर्थं बलिमादाय तस्य पापस्य रक्षसः ॥ ३ ॥

अध्याय (पृष्ठ 1154)

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कुन्तीद्वारा ब्राह्मण-दम्पतिको सान्त्वना


बकासुरपर भीमका प्रहार

विप्रवर! मेरे पाँच पुत्र हैं, उनमेंसे एक आपके लिये उस पापी राक्षसकी बलि-सामग्री लेकर चला जायगा ।। ३ ।।

ब्राह्मण उवाच

नाहमेतत् करिष्यामि जीवितार्थी कथंचन ।
ब्राह्मणस्यातिथेश्चैव स्वार्थं प्राणान् वियोजयन् ।। ४ ।।
ब्राह्मणने कहा— मैं अपने जीवनकी रक्षाके लिये किसी तरह ऐसा नहीं करूँगा। एक तो ब्राह्मण, दूसरे अतिथिके प्राणोंका नाश मैं अपने तुच्छ स्वार्थके लिये कराऊँ! यह कदापि सम्भव नहीं है ।। ४ ।।

न त्वेतदकुलीनासु नाधर्मिष्ठासु विद्यते ।
यद् ब्राह्मणार्थं विसृजेदात्मानमपि चात्मजम् ।। ५ ।।
ऐसा निन्दनीय कार्य नीच और अधर्मी जनतामें भी नहीं देखा जाता। उचित तो यह है कि ब्राह्मणके लिये स्वयं अपनेको और अपने पुत्रको भी निछावर कर दे ।। ५ ।।

आत्मनस्तु मया श्रेयो बोद्धव्यमिति रोचते ।
ब्रह्मवध्याऽऽत्मवध्या वा श्रेयानात्मवधो मम ।। ६ ।।
ब्रह्मवध्या परं पापं निष्कृतिर्नात्र विद्यते ।
अबुद्धिपूर्वं कृत्वापि वरमात्मवधो मम ।। ७ ।।
इसीमें मुझे अपना कल्याण समझना चाहिये तथा यही मुझे अच्छा लगता है। ब्रह्महत्या और आत्महत्यामें मुझे आत्महत्या ही श्रेष्ठ जान पड़ती है। ब्रह्महत्या बहुत बड़ा पाप है। इस जगत्में उससे छूटनेका कोई उपाय नहीं है। अनजानमें भी ब्रह्महत्या करनेकी अपेक्षा मेरी दृष्टिमें आत्महत्या कर लेना अच्छा है ।। ६-७ ।।

न त्वहं वधमाकाङ्क्षे स्वयमेवात्मनः शुभे ।
परैः कृते वधे पापं न किंचिन्मयि विद्यते ।। ८ ।।
कल्याणि! मैं स्वयं तो आत्महत्याकी इच्छा करता नहीं; परंतु यदि दूसरोंने मेरा वध कर दिया तो उसके लिये मुझे कोई पाप नहीं लगेगा ।। ८ ।।

अभिसंधिकृते तस्मिन् ब्राह्मणस्य वधे मया ।
निष्कृतिं न प्रपश्यामि नृशंसं क्षुद्रमेव च ।। ९ ।।
आगतस्य गृहं त्यागस्तथैव शरणार्थिनः ।
याचमानस्य च वधो नृशंसो गर्हितो बुधैः ।। १० ।।
यदि मैंने जान-बूझकर ब्राह्मणका वध करा दिया तो वह बड़ा ही नीच और क्रूरतापूर्ण कर्म होगा। उससे छुटकारा पानेका कोई उपाय मुझे नहीं सूझता। घरपर आये हुए तथा शरणार्थीका त्याग और अपनी रक्षाके लिये याचना करनेवालेका वध—यह विद्वानोंकी रायमें अत्यन्त क्रूर एवं निन्दित कर्म है ।। ९-१० ।।

कुर्यान्न निन्दितं कर्म न नृशंसं कथंचन । इति पूर्वे महात्मान आपद्धर्मविदो विदुः ॥ ११ ॥ श्रेयांस्तु सहदारस्य विनाशोऽद्य मम स्वयम् । ब्राह्मणस्य वधं नाहमनुमंस्ये कदाचन ॥ १२ ॥ आपद्धर्मके ज्ञाता प्राचीन महात्माओंने कहा है कि किसी प्रकार भी क्रूर एवं निन्दित कर्म नहीं करना चाहिये। अतः आज अपनी पत्नीके साथ स्वयं मेरा विनाश हो जाय, यह श्रेष्ठ है; किंतु ब्राह्मणवधकी अनुमति मैं कदापि नहीं दे सकता ॥ ११-१२ ॥

कुन्त्युवाच ममाप्येषा मतिर्ब्रह्मन् विप्रा रक्ष्या इति स्थिरा । न चाप्यनिष्टः पुत्रो मे यदि पुत्रशतं भवेत् ॥ १३ ॥ न चासौ राक्षसः शक्तो मम पुत्रविनाशने । वीर्यवान् मन्त्रसिद्धश्च तेजस्वी च सुतो मम ॥ १४ ॥ कुन्ती बोली—ब्रह्मन्! मेरा भी यह स्थिर विचार है कि ब्राह्मणोंकी रक्षा करनी चाहिये। यों तो मुझे भी अपना कोई पुत्र अप्रिय नहीं है, चाहे मेरे सौ पुत्र ही क्यों न हों। किंतु वह राक्षस मेरे पुत्रका विनाश करनेमें समर्थ नहीं है; क्योंकि मेरा पुत्र पराक्रमी, मन्त्रसिद्ध और तेजस्वी है ॥ १३-१४ ॥

राक्षसाय च तत् सर्वं प्रापयिष्यति भोजनम् । मोक्षयिष्यति चात्मानमिति मे निश्चिता मतिः ॥ १५ ॥ मेरा यह निश्चित विश्वास है कि वह सारा भोजन राक्षसके पास पहुँचा देगा और उससे अपने-आपको भी छुड़ा लेगा ॥ १५ ॥

समागताश्च वीरेण दृष्टपूर्वाश्च राक्षसाः । बलवन्तो महाकाया निहताश्चाप्यनेकंशः ॥ १६ ॥ मैंने पहले भी बहुत-से बलवान् और विशालकाय राक्षस देखे हैं, जो मेरे वीर पुत्रसे भिड़कर अपने प्राणोंसे हाथ धो बैठे हैं ॥ १६ ॥

न त्विदं केषुचिद् ब्रह्मन् व्याहर्तव्यं कथंचन । विद्यार्थिनो हि मे पुत्रान् विप्रकुर्युः कुतूहलात् ॥ १७ ॥ परंतु ब्रह्मन्! आपको किसीसे भी किसी तरह यह बात कहनी नहीं चाहिये। नहीं तो लोग मन्त्र सीखनेके लोभसे कौतूहलवश मेरे पुत्रोंको तंग करेंगे ॥ १७ ॥

गुरुणा चाननुज्ञातो ग्राहयेद् यत् सुतो मम । न स कुर्यात् तथा कार्यं विद्ययेति सतां मतम् ॥ १८ ॥ और यदि मेरा पुत्र गुरुकी आज्ञा लिये बिना अपना मन्त्र किसीको सिखा देगा तो वह सीखनेवाला मनुष्य उस मन्त्रसे वैसा कार्य नहीं कर सकेगा, जैसा मेरा पुत्र कर लेता है। इस

विषयमें साधु पुरुषोंका ऐसा ही मत है ॥ १८ ॥ एवमुक्तस्तु पृथया स विप्रो भार्यया सह । हृष्टः सम्पूजयामास तद्वाक्यममृतोपमम् ॥ १९ ॥ कुन्तीदेवीके यों कहनेपर पत्नीसहित वह ब्राह्मण बहुत प्रसन्न हुआ और उसने कुन्तीके अमृत-तुल्य जीवनदायक मधुर वचनोंकी बड़ी प्रशंसा की ॥ १९ ॥ ततः कुन्ती च विप्रश्च सहितावनिलात्मजम् । तमब्रूतां कुरुष्वेति स तथेत्यब्रवीच्च तौ ॥ २० ॥ तदनन्तर कुन्ती और ब्राह्मणने मिलकर वायु-नन्दन भीमसेनसे कहा—'तुम यह काम कर दो।' भीमसेनने उन दोनोंसे 'तथास्तु' कहा ॥ २० ॥

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि बकवधपर्वणि भीमबकवधाङ्गीकारे षष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १६० ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत बकवधपर्वमें भीमके द्वारा बकवधकी स्वीकृतिविषयक एक सौ साठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १६० ॥

१६१-

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एकषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः

भीमसेनको राक्षसके पास भेजनेके विषयमें युधिष्ठिर और कुन्तीकी बातचीत

वैशम्पायन उवाच

करिष्य इति भीमेन प्रतिज्ञातेऽथ भारत ।
आजग्मुस्ते ततः सर्वे भैक्षमादाय पाण्डवाः ॥ १ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! जब भीमसेनने यह प्रतिज्ञा कर ली कि ‘मैं इस कार्यको पूरा करूँगा’, उसी समय पूर्वोक्त सब पाण्डव भिक्षा लेकर वहाँ आये ॥ १ ॥

आकारेणैव तं ज्ञात्वा पाण्डुपुत्रो युधिष्ठिरः ।
रहः समुपविश्यैकस्ततः पप्रच्छ मातरम् ॥ २ ॥
पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरने भीमसेनकी आकृतिसे ही समझ लिया कि आज ये कुछ करनेवाले हैं; फिर उन्होंने एकान्तमें अकेले बैठकर मातासे पूछा ॥ २ ॥

युधिष्ठिर उवाच

किं चिकीर्षत्ययं कर्म भीमो भीमपराक्रमः ।
भवत्यनुमते कच्चित् स्वयं वा कर्तुमिच्छति ॥ ३ ॥
**युधिष्ठिर बोले—**माँ! ये भयंकर पराक्रमी भीमसेन कौन-सा कार्य करना चाहते हैं? वे आपकी रायसे अथवा स्वयं ही कुछ करनेको उतारू हो रहे हैं? ॥ ३ ॥

कुन्त्युवाच

ममैव वचनादेष करिष्यति परंतपः ।
ब्राह्मणार्थे महत् कृत्यं मोक्षाय नगरस्य च ॥ ४ ॥
**कुन्तीने कहा—**बेटा! शत्रुओंको संतप्त करनेवाला भीमसेन मेरी ही आज्ञासे ब्राह्मणके हितके लिये तथा सम्पूर्ण नगरको संकटसे छुड़ानेके लिये आज एक महान् कार्य करेगा ॥ ४ ॥

युधिष्ठिर उवाच

किमिदं साहसं तीक्ष्णं भवत्या दुष्करं कृतम् ।
परित्यागं हि पुत्रस्य न प्रशंसन्ति साधवः ॥ ५ ॥
**युधिष्ठिरने कहा—**माँ! आपने यह असह्य और दुष्कर साहस क्यों किया? साधु पुरुष अपने पुत्रके परित्यागको अच्छा नहीं बताते ॥ ५ ॥
कथं परसुतस्यार्थे स्वसुतं त्यक्तुमिच्छसि ।

लोकवेदविरुद्धं हि पुत्रत्यागात् कृतं त्वया ॥ ६ ॥
दूसरेके बेटेके लिये आप अपने पुत्रको क्यों त्याग देना चाहती हैं? पुत्रका त्याग करके आपने लोक और वेद दोनोंके विरुद्ध कार्य किया है ॥ ६ ॥
यस्य बाहू समाश्रित्य सुखं सर्वे शयामहे ।
राज्यं चापहृतं क्षुद्रैराजिहीर्षामहे पुनः ॥ ७ ॥
जिसके बाहुबलका भरोसा करके हम सब लोग सुखसे सोते हैं और नीच शत्रुओंने जिस राज्यको हड़प लिया है, उसको पुनः वापस लेना चाहते हैं, ॥ ७ ॥
यस्य दुर्योधनो वीर्यं चिन्तयन्नमितौजसः ।
न शेते रजनीः सर्वा दुःखान्छकुनिना सह ॥ ८ ॥
जिस अमिततेजस्वी वीरके पराक्रमका चिन्तन करके शकुनिसहित दुर्योधनको दुःखके मारे सारी रात नींद नहीं आती थी, ॥ ८ ॥
यस्य वीरस्य वीर्येण मुक्ता जतुगृहाद् वयम् ।
अन्येभ्यश्चैव पापेभ्यो निहतश्च पुरोचनः ॥ ९ ॥
जिस वीरके बलसे हमलोग लाक्षागृह तथा दूसरे-दूसरे पापपूर्ण अत्याचारोंसे बच पाये और दुष्ट पुरोचन भी मारा गया, ॥ ९ ॥
यस्य वीर्यं समाश्रित्य वसुपूर्णां वसुन्धराम् ।
इमां मन्यामहे प्राप्तां निहत्य धृतराष्ट्रजान् ॥ १० ॥
तस्य व्यवस्थितस्त्यागो बुद्धिमास्थाय कां त्वया ।
कच्चिन्नु दुःखैर्बुद्धिस्ते विलुप्ता गतचेतसः ॥ ११ ॥
जिसके बल-पराक्रमका आश्रय लेकर हमलोग धृतराष्ट्रपुत्रोंको मारकर धन-धान्यसे सम्पन्न इस (सम्पूर्ण) पृथ्वीको अपने अधिकारमें आयी हुई ही मानते हैं, उस बलवान् पुत्रके त्यागका निश्चय आपने किस बुद्धिसे किया है? क्या आप अनेक दुःखोंके कारण अपनी चेतना खो बैठी हैं? आपकी बुद्धि लुप्त हो गयी है ॥ १०-११ ॥

कुन्त्युवाच
युधिष्ठिर न संतापस्त्वया कार्यो वृकोदरे ।
न चायं बुद्धिदौर्बल्याद् व्यवसायः कृतो मया ॥ १२ ॥
**कुन्तीने कहा—**युधिष्ठिर! तुम्हें भीमसेनके लिये चिन्ता नहीं करनी चाहिये। मैंने जो यह निश्चय किया है, वह बुद्धिकी दुर्बलतासे नहीं किया है ॥ १२ ॥
इह विप्रस्य भवने वयं पुत्र सुखोषिताः ।
अज्ञाता धार्तराष्ट्राणां सत्कृता वीतमन्यवः ॥ १३ ॥
तस्य प्रतिक्रिया पार्थ मयेयं प्रसमीक्षिता ।
एतावानेव पुरुषः कृतं यस्मिन् न नश्यति ॥ १४ ॥