महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
(हरणाहरणपर्व)
(हरणाहरणपर्व)
विंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः
द्वारकामें अर्जुन और सुभद्राका विवाह, अर्जुनके इन्द्रप्रस्थ पहुँचनेपर श्रीकृष्ण आदिका दहेज लेकर वहाँ जाना, द्रौपदीके पुत्र एवं अभिमन्युके जन्म, संस्कार और शिक्षा
वैशम्पायन उवाच
उक्तवन्तो यथा वीर्यमसकृत् सर्ववृष्णयः ।
ततोऽब्रवीद् वासुदेवो वाक्यं धर्मार्थसंयुक्तम् ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! उस समय सभी वृष्णिवंशियोंने अपने-अपने पराक्रमके अनुसार अर्जुनसे बदला लेनेकी बात बार-बार दोहरायी। तब भगवान् वासुदेव यह धर्म और अर्थसे युक्त वचन बोले— ॥ १ ॥
नावमानं कुलस्यास्य गुडाकेशः प्रयुक्तवान् ।
सम्मानोऽभ्यधिकस्तेन प्रयुक्तोऽयं न संशयः ॥ २ ॥
‘निद्राविजयी अर्जुनने इस कुलका अपमान नहीं किया है। अपितु ऐसा करके उन्होंने इस कुलके प्रति अधिक सम्मानका भाव ही प्रकट किया है, इसमें संशय नहीं है ॥ २ ॥
अर्थलुब्धान् न वः पार्थो मन्यते सात्वतान् सदा । स्वयंवरमनाधृष्यं मन्यते चापि पाण्डवः ॥ ३ ॥ ‘पाण्डुपुत्र अर्जुन यह जानते हैं कि सात्वतवंशके लोग सदासे ही धनके लोभी नहीं हैं, अतः धन देकर कन्या नहीं ली जा सकती। साथ ही पाण्डुपुत्र अर्जुनको यह भी मालूम है कि स्वयंवरमें कन्याके मिल जानेका पूर्ण निश्चय नहीं रहता, अतः वह भी अग्राह्य ही है ॥ ३ ॥
प्रदानमपि कन्यायाः पशुवत् कोऽनुमन्यते । विक्रयं चाप्यपत्यस्य कः कुर्यात् पुरुषो भुवि ॥ ४ ॥ ‘भला, कौन ऐसा वीर पुरुष होगा, जो पशुकी तरह पराक्रमशून्य होकर कन्यादानकी प्रतीक्षा में बैठा रहेगा एवं इस पृथ्वीपर कौन ऐसा अधम पुरुष होगा, जो धन लेकर अपनी संतानको बेचेगा ॥ ४ ॥
एतान् दोषांस्तु कौन्तेयो दृष्टवानिति मे मतिः । अतः प्रसह्य हृतवान् कन्यां धर्मेण पाण्डवः ॥ ५ ॥ ‘मेरा विश्वास है कि कुन्तीकुमारने इन सभी दोषोंकी ओर दृष्टिपात किया है; इसीलिये उन्होंने क्षत्रिय-धर्मके अनुसार बलपूर्वक कन्याका अपहरण किया है ॥ ५ ॥
उचितश्चैव सम्बन्धः सुभद्रां च यशस्विनीम् । एष चापीदृशः पार्थः प्रसह्य हृतवानिति ॥ ६ ॥ ‘मेरी समझमें यह सम्बन्ध बहुत उचित है। सुभद्रा यशस्विनी है और ये कुन्तीपुत्र अर्जुन भी ऐसे ही यशस्वी हैं; अतः इन्होंने सुभद्राका बलपूर्वक हरण किया है ॥ ६ ॥
भरतस्यान्वये जातं शान्तनोश्च यशस्विनः । कुन्तिभोजात्मजापुत्रं को बुभूषेत नार्जुनम् ॥ ७ ॥ ‘महाराज भरत तथा महायशस्वी शान्तनुके कुलमें जिनका जन्म हुआ है, जो कुन्तिभोजकुमारी कुन्तीके पुत्र हैं, ऐसे वीरवर अर्जुनको कौन अपना सम्बन्धी बनाना न चाहेगा? ॥ ७ ॥
न च पश्यामि यः पार्थं विजयेत रणे बलात् । वर्जयित्वा विरूपाक्षं भगनेत्रहरं हरम् ॥ ८ ॥ अपि सर्वेषु लोकेषु सेन्द्ररुद्रेषु मारिष । ‘आर्य! इन्द्रलोक एवं रुद्रलोकसहित सम्पूर्ण लोकोंमें भगदेवताके नेत्रोंका नाश करनेवाले विकराल नेत्रोंवाले भगवान् रुद्रको छोड़कर दूसरे किसीको मैं ऐसा नहीं देखता, जो संग्राममें बलपूर्वक पार्थको परास्त कर सके ॥ ८ १/२ ॥
स च नाम रथस्तादृङ्मदीयास्ते च वाजिनः ॥ ९ ॥
योद्धा पार्थश्च शीघ्रास्त्रः को नु तेन समो भवेत् ।
तमभिद्रुत्य सान्त्वेन परमेण धनंजयम् ।। १० ।।
न्यवर्तयत संहृष्टा ममैषा परमा मतिः ।
‘इस समय अर्जुनके पास मेरा सुप्रसिद्ध रथ है, मेरे ही अद्भुत घोड़े हैं और स्वयं अर्जुन शीघ्रता-पूर्वक अस्त्र-शस्त्र चलानेवाले योद्धा हैं। ऐसी दशामें अर्जुनकी समानता कौन कर सकता है? आपलोग प्रसन्नताके साथ दौड़े जाइये और बड़ी सान्त्वनासे धनंजयको लौटा लाइये। मेरी तो यही परम सम्मति है ।। ९-१० १/२ ।।
यदि निर्जित्य वः पार्थो बलाद् गच्छेत् स्वकं पुरम् ।। ११ ।।
प्रणश्येद् वो यशः सद्यो न तु सान्त्वे पराजयः ।
‘यदि अर्जुन आपलोगोंको बलपूर्वक हराकर अपने नगरमें चले गये, तब तो आपलोगोंका सारा यश तत्काल ही नष्ट हो जायगा और सान्त्वनापूर्वक उन्हें ले आनेमें अपनी पराजय नहीं है’ ।। ११ १/२ ।।
तच्छ्रुत्वा वासुदेवस्य तथा चक्रुर्जनाधिप ।। १२ ।।
जनमेजय! वासुदेवका यह वचन सुनकर यादवोंने वैसा ही किया ।। १२ ।।
निवृत्तश्चार्जुनस्तत्र विवाहं कृतवान् प्रभुः ।
उषित्वा तत्र कौन्तेयः संवत्सरपराः क्षपाः ।। १३ ।।
शक्तिशाली अर्जुन द्वारकामें लौट आये। वहाँ उन्होंने सुभद्रासे विवाह किया और एक सालसे कुछ अधिक दिनतक वे वहीं रहे ।। १३ ।।
विहृत्य च यथाकामं पूजितो वृष्णिनन्दनैः ।
पुष्करे तु ततः शेषं कालं वर्तितवान् प्रभुः ।। १४ ।।
द्वारकामें इच्छानुसार विहार करके वृष्णिवंशियोंद्वारा पूजित होकर अर्जुन वहाँसे पुष्करतीर्थमें चले गये और वनवासका शेष समय वहीं व्यतीत किया ।। १४ ।।
पूर्गे तु द्वादशे वर्षे खाण्डवप्रस्थमागतः ।
(ववन्दे धौम्यमासाद्य मातरं च धनंजयः ।।
बारहवाँ वर्ष पूर्ण होनेपर वे खाण्डवप्रस्थमें आये। उन्होंने धौम्यजीके पास जाकर उनको तथा माता कुन्तीको प्रणाम किया।
स्पृष्ट्वा च चरणौ राज्ञो भीमस्य च धनंजयः ।
यमाभ्यां वन्दितो हृष्टः सस्वजे तौ ननन्द च ।।)
अभिगम्य च राजानं नियमेन समाहितः ।। १५ ।।
अभ्यर्च्य ब्राह्मणान् पार्थो द्रौपदीमभिजग्मिवान् ।
इसके बाद राजा युधिष्ठिर और भीमके चरण छुये। तदनन्तर नकुल और सहदेवने आकर अर्जुनको प्रणाम किया। अर्जुनने भी हर्षमें भरकर उन दोनोंको हृदयसे लगा लिया और उनसे मिलकर बड़ी प्रसन्नताका अनुभव किया। फिर वहाँ राजासे मिलकर नियमपूर्वक एकाग्रचित्त हो उन्होंने ब्राह्मणोंका पूजन किया। तत्पश्चात् वे द्रौपदीके समीप गये ।। १५ ।।
तं द्रौपदी प्रत्युवाच प्रणयात् कुरुनन्दनम् ॥ १६ ॥
तत्रैव गच्छ कौन्तेय यत्र सा सात्वतात्मजा ।
सुबद्धस्यापि भारस्य पूर्वबन्धः श्लथायते ॥ १७ ॥
द्रौपदीने प्रणयकोपवश कुरुनन्दन अर्जुनसे कहा—‘कुन्तीकुमार! यहाँ क्यों आये हो, वहीं जाओ, जहाँ वह सात्वतवंशकी कन्या सुभद्रा है। सच है, बोझको कितना ही कसकर बाँधा गया हो, जब उसे दूसरी बार बाँधते हैं, तब पहला बन्धन ढीला पड़ जाता है (यही हालत मेरे प्रति तुम्हारे प्रेमबन्धनकी है) ।। १६-१७ ।।
तथा बहुविधं कृष्णां विलपन्तीं धनंजयः ।
सान्त्वयामास भूयश्च क्षमयामास चासकृत् ॥ १८ ॥
इस तरह नाना प्रकारकी बातें कहकर कृष्णा विलाप करने लगी। तब धनंजयने उसे पूर्ण सान्त्वना दी और अपने अपराधके लिये उससे बार-बार क्षमा माँगी ॥ १८ ॥
सुभद्रां त्वरमाणश्च रक्तकौशेयवासिनीम् ।
पार्थः प्रस्थापयामास कृत्वा गोपालिकावपुः ॥ १९ ॥
इसके बाद अर्जुनने लाल रेशमी साड़ी पहनकर आयी हुई अनिन्द्यसुन्दरी सुभद्राका ग्वालिनका-सा वेश बनाकर उसे बड़ी उतावलीके साथ महलमें भेजा ।। १९ ।।
साधिकं तेन रूपेण शोभमाना यशस्विनी ।
भवनं श्रेष्ठमासाद्य वीरपत्नी वराङ्गना ॥ २० ॥
ववन्दे पृथुताम्राक्षी पृथां भद्रा यशस्विनी ।
तां कुन्ती चारुसर्वाङ्गीमुपाजिघ्रत मूर्धनि ॥ २१ ॥
वीरपत्नी, वरांगना एवं यशस्विनी सुभद्रा उस वेशमें और अधिक शोभा पाने लगी। उसकी आँखें विशाल और कुछ-कुछ लाल थीं। उस यशस्विनीने सुन्दर राजभवनके भीतर जाकर राजमाता कुन्तीके चरणोंमें प्रणाम किया। कुन्ती उस सर्वांगसुन्दरी पुत्र-वधूको हृदयसे लगाकर उसका मस्तक सूँघने लगी ।। २०-२१ ।।
अध्याय (पृष्ठ 1519)
सुभद्राका कुन्ती और द्रौपदीकी सेवामें उपस्थित होना
प्रीत्या परमया युक्ता आशीर्भिर्युञ्जतातुलाम् ।
ततोऽभिगम्य त्वरिता पूर्णेन्दुसदृशानना ॥ २२ ॥
ववन्दे द्रौपदीं भद्रा प्रेष्याहमिति चाब्रवीत् ।
और उसने बड़ी प्रसन्नताके साथ उस अनुपम वधूको अनेक आशीर्वाद दिये। तदनन्तर पूर्ण चन्द्रमाके सदृश मनोहर मुखवाली सुभद्राने तुरंत जाकर महारानी द्रौपदीके चरण छुए और कहा—'देवि! मैं आपकी दासी हूँ' ॥ २२ १/२ ॥
प्रत्युत्थाय तदा कृष्णा स्वसारं माधवस्य च ॥ २३ ॥
परिष्वज्यावदत् प्रीत्या निःसपत्नोऽस्तु ते पतिः ।
तथैव मुदिता भद्रा तामुवाचैवमस्त्विति ॥ २४ ॥
उस समय द्रौपदी तुरंत उठकर खड़ी हो गयी और श्रीकृष्णकी बहिन सुभद्राको हृदयसे लगाकर बड़ी प्रसन्नतासे बोली—'बहिन! तुम्हारे पति शत्रुरहित हों।' सुभद्राने भी आनन्दमग्न होकर कहा—'बहिन! ऐसा ही हो' ॥ २३-२४ ॥
ततस्ते हृष्टमनसः पाण्डवेया महारथाः ।
कुन्ती च परमप्रीता बभूव जनमेजय ॥ २५ ॥
श्रुत्वा तु पुण्डरीकाक्षः सम्प्राप्तं स्वं पुरोत्तमम् ।
अर्जुनं पाण्डवश्रेष्ठमिन्द्रप्रस्थगतं तदा ॥ २६ ॥
आजगाम विशुद्धात्मा सह रामेण केशवः ।
वृष्ण्यन्धकमहामात्रैः सह वीरैर्महारथैः ॥ २७ ॥
जनमेजय! तत्पश्चात् महारथी पाण्डव मन-ही-मन हर्षविभोर हो उठे और कुन्तीदेवी भी बहुत प्रसन्न हुईं। कमलनयन भगवान् श्रीकृष्णने जब यह सुना कि पाण्डवश्रेष्ठ अर्जुन अपने उत्तम नगर इन्द्रप्रस्थ पहुँच गये हैं, तब वे शुद्धात्मा श्रीकृष्ण एवं बलराम तथा वृष्णि और अन्धकवंशके प्रधान-प्रधान वीर महारथियोंके साथ वहाँ आये।। २५-२७।।
भ्रातृभिश्च कुमारैश्च योधैश्च बहुभिर्वृतः। सैन्येन महता शौरिरभिगुप्तः परंतपः।। २८ ।।
शत्रुओंको संताप देनेवाले श्रीकृष्ण भाइयों, पुत्रों और बहुतेरे योद्धाओंके साथ घिरे हुए तथा विशाल सेनासे सुरक्षित होकर इन्द्रप्रस्थमें पधारे।। २८ ।।
तत्र दानपतिर्धीमानाजगाम महायशाः। अक्रूरो वृष्णिवीराणां सेनापतिररिंदमः।। २९ ।।
उस समय वहाँ वृष्णिवीरोंके सेनापति शत्रुदमन महायशस्वी और परम बुद्धिमान् दानपति अक्रूरजी भी आये थे ।। २९ ।।
अनाधृष्टिर्महातेजा उद्धवश्च महायशाः। साक्षाद् बृहस्पतेः शिष्यो महाबुद्धिर्महामनाः।। ३० ।।
इनके सिवा महातेजस्वी अनाधृष्टि तथा साक्षात् बृहस्पतिके शिष्य परम बुद्धिमान् महामनस्वी एवं परम यशस्वी उद्धव भी आये थे ।। ३० ।।
सत्यकः सात्यकिश्चैव कृतवर्मा च सात्वतः। प्रद्युम्नश्चैव साम्बश्च निशठः शङ्कुरेव च।। ३१ ।। चारुदेष्णश्च विक्रान्तो झिल्ली विपृथुरेव च। सारणश्च महाबाहुर्गदश्च विदुषां वरः।। ३२ ।। एते चान्ये च बहवो वृष्णिभोजान्धकास्तथा। आजग्मुः खाण्डवप्रस्थमादाय हरणं बहु ।। ३३ ।।
सत्यक, सात्यकि, सात्वतवंशी कृतवर्मा, प्रद्युम्न, साम्ब, निशठ, शंकु, पराक्रमी चारुदेष्ण, झिल्ली, विपृथु, महाबाहु सारण तथा विद्वानोंमें श्रेष्ठ गद—ये तथा और दूसरे भी बहुत-से वृष्णि, भोज और अन्धकवंशके लोग दहेजकी बहुत-सी सामग्री लेकर खाण्डवप्रस्थमें आये थे ।। ३१-३३ ।।
ततो युधिष्ठिरो राजा श्रुत्वा माधवमागतम्। प्रतिग्रहार्थं कृष्णस्य यमौ प्रास्थापयत् तदा ।। ३४ ।।
महाराज युधिष्ठिरने भगवान् श्रीकृष्णका आगमन सुनकर उन्हें आदरपूर्वक लिवा लानेके लिये नकुल और सहदेवको भेजा ।। ३४ ।।
ताभ्यां प्रतिगृहीतं तु वृष्णिचक्रं महर्द्धिमत्। विवेश खाण्डवप्रस्थं पताकाध्वजशोभितम् ।। ३५ ।।
उन दोनोंके द्वारा स्वागतपूर्वक लाये हुए वृष्णि-वंशियोंके उस परम समृद्धिशाली समुदायने खाण्डवप्रस्थमें प्रवेश किया। उस समय ध्वजा-पताकाओंसे सजाया हुआ वह नगर सुशोभित हो रहा था ।। ३५ ।।
संमृष्टसिक्तपन्थानं पुष्पप्रकरशोभितम् । चन्दनस्य रसैः शीतैः पुण्यगन्धैर्निषेवितम् ।। ३६ ।। नगरकी सड़कें झाड़-बुहारकर साफ की गयी थीं। उनके ऊपर जलका छिड़काव किया गया था। स्थान-स्थानपर फूलोंके गजरोंसे नगरकी सजावट की गयी थी। शीतल चन्दन, रस तथा अन्य पवित्र सुगन्धित पदार्थोंकी सुवास सब ओर छा रही थी ।। ३६ ।।
दह्यतागुरुणा चैव देशे देशे सुगन्धिना । हृष्टपुष्टजनाकीर्णं वणिग्भिरुपशोभितम् ।। ३७ ।। जगह-जगह जलते हुए अगुरुकी सुगन्ध फैल रही थी, सारा नगर हृष्ट-पुष्ट मनुष्योंसे भरा था। कितने ही व्यापारी उसकी शोभा बढ़ा रहे थे ।। ३७ ।।
प्रतिपेदे महाबाहुः सह रामेण केशवः । वृष्ण्यन्धकैस्तथा भोजैः समेतः पुरुषोत्तमः ।। ३८ ।। महाबाहु पुरुषोत्तम श्रीकृष्णने बलरामजी तथा वृष्णि, अन्धक एवं भोजवंशी वीरोंके साथ नगरमें प्रवेश किया ।। ३८ ।।
सम्पूज्यमानः पौरैश्च ब्राह्मणैश्च सहस्रशः । विवेश भवनं राज्ञः पुरन्दरगृहोपमम् ।। ३९ ।। पुरवासी मनुष्यों तथा सहस्रों ब्राह्मणोंद्वारा सम्मानित हो उन्होंने राजभवनके भीतर प्रवेश किया। वह घर इन्द्रभवनकी शोभाको भी तिरस्कृत कर रहा था ।। ३९ ।।
युधिष्ठिरस्तु रामेण समागच्छद् यथाविधि । मूर्ध्नि केशवमाघ्राय बाहुभ्यां परिषस्वजे ।। ४० ।। युधिष्ठिरजी बलरामजीके साथ विधिपूर्वक मिले और श्रीकृष्णका मस्तक सूँघकर उन्हें दोनों भुजाओंमें कस लिया ।। ४० ।।
तं प्रीयमाणो गोविन्दो विनयेनाभिपूजयन् । भीमं च पुरुषव्याघ्रं विधिवत् प्रत्यपूजयत् ।। ४१ ।। भगवान् श्रीकृष्णने प्रसन्न होकर विनीतभावसे युधिष्ठिरका सम्मान किया। नरश्रेष्ठ भीमसेनका भी उन्होंने विधिवत् पूजन किया ।। ४१ ।।
तांश्च वृष्ण्यन्धकश्रेष्ठान् कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः । प्रतिजग्राह सत्कारैर्यथाविधि यथागतम् ।। ४२ ।। कुन्तीनन्दन युधिष्ठिरने वृष्णि और अन्धकवंशके श्रेष्ठ पुरुषोंका विधिपूर्वक यथायोग्य स्वागत-सत्कार किया ।। ४२ ।।
गुरुवत् पूजयामास कांश्चित् कांश्चिद् वयस्यवत् ।
कांश्चिदभ्यवदत् प्रेम्णा कैश्चिदप्यभिवादितः ॥ ४३ ॥ कुछ लोगोंका उन्होंने गुरुकी भाँति पूजन किया, कितनोंको समवयस्क मित्रोंकी भाँति गलेसे लगाया, कुछ लोगोंसे प्रेमपूर्वक वार्तालाप किया और कुछ लोगोंने उन्हींको प्रणाम किया ॥ ४३ ॥
तेषां ददौ हृषीकेशो जन्यार्थे धनमुत्तमम् । हरणं वै सुभद्राया ज्ञातिदेयं महायशाः ॥ ४४ ॥ महायशस्वी भगवान् श्रीकृष्णने वधू तथा वरपक्षके लोगोंके लिये उत्तम धन अर्पित किया। वरके कुटुम्बीजनोंको देनेयोग्य दहेज पहले नहीं दिया गया था, उसीकी पूर्ति उन्होंने इस समय की ॥ ४४ ॥
रथानां काञ्चनाङ्गानां किङ्किणीजालमालिनाम् । चतुर्युजामुपेतानां सूतैः कुशलशिक्षितैः ॥ ४५ ॥ सहस्रं प्रददौ कृष्णो गवामयुतमेव च । श्रीमान् माथुरदेश्यानां दोग्ध्रीणां पुण्यवर्चसाम् ॥ ४६ ॥ किंकिणी और झालरोंसे सुशोभित सुवर्णखचित एक हजार रथ जिनमेंसे प्रत्येकमें चार-चार घोड़े जुते हुए थे और प्रत्येकमें पूर्ण शिक्षित चतुर सारथि बैठा हुआ था, श्रीमान् कृष्णने समर्पित किये तथा मथुरामण्डलकी पवित्र तेजवाली दस हजार दुधारू गौएँ दीं ॥ ४५-४६ ॥
वडवानां च शुद्धानां चन्द्रांशुसमवर्चसाम् । ददौ जनार्दनः प्रीत्या सहस्रं हेमभूषितम् ॥ ४७ ॥ चन्द्रमाके समान श्वेत कान्तिवाली विशुद्ध जातिकी एक हजार सुवर्णभूषित घोड़ियाँ भी जनार्दनने प्रेमपूर्वक भेंट कीं ॥ ४७ ॥
तथैवाश्वतरीणां च दान्तानां वातरंहसाम् । शतान्यञ्जनकेशीनां श्वेतानां पञ्च पञ्च च ॥ ४८ ॥ इसी प्रकार पाँच सौ काले अयालवाली और पाँच सौ सफेद रंगवाली खच्चरियाँ समर्पित कीं, जो सभी वशमें की हुई तथा वायुके समान वेगवाली थीं ॥ ४८ ॥
स्नानपानोत्सवे चैव प्रयुक्तं वयसान्वितम् । स्त्रीणां सहस्रं गौरीणां सुवेषाणां सुवर्चसाम् ॥ ४९ ॥ सुवर्णशतकण्ठीनामरोमाणां स्वलंकृताम् । परिचर्यासु दक्षाणां प्रददौ पुष्करेक्षणः ॥ ५० ॥ स्नान, पान और उत्सवमें जिनका उपयोग किया गया था, जो वयःप्राप्त थीं, जिनके वेष सुन्दर और कान्ति मनोहर थी, जिन्होंने सोनेके सौ-सौ मणियोंकी कण्ठियाँ पहन रखी थीं, जिनके शरीरमें रोमावलियाँ नहीं प्रकट हुई थीं, जो वस्त्राभूषणोंसे अलंकृत तथा सेवाके
काममें पूर्ण दक्ष थीं, ऐसी एक हजार गौरवर्णा कन्याएँ भी कमलनयन भगवान् श्रीकृष्णने भेंट कीं ॥ ४९-५० ॥
पृष्ठ्यानामपि चाश्वानां बाह्लिकानां जनार्दनः ।
ददौ शतसहस्राख्यं कन्याधनमनुत्तमम् ॥ ५१ ॥
जनार्दनने उत्तम दहेजके रूपमें बाह्लीकदेशके एक लाख घोड़े दिये, जो पीठपर सवारी ढोनेवाले थे ॥ ५१ ॥
कृताकृतस्य मुख्यस्य कनकस्याग्निवर्चसः ।
मनुष्यभारान् दाशार्हो ददौ दश जनार्दनः ॥ ५२ ॥
दाशार्हवंशके रत्न भगवान् श्रीकृष्णने अग्निके समान देदीप्यमान कृत्रिम सुवर्ण (मोहर) और अकृत्रिम विशुद्ध सुवर्णके (डले) दस भार उपहारमें दिये ॥ ५२ ॥
गजानां तु प्रभिन्नानां त्रिधा प्रस्रवतां मदम् ।
गिरिकूटनिकाशानां समरेष्वनिवर्तिनाम् ॥ ५३ ॥
क्लृप्तानां पटुघण्टानां चारूणां हेममालिनाम् ।
हस्त्यारोहैरुपैतानां सहस्रं साहसप्रियः ॥ ५४ ॥
रामः पाणिग्रहणिकं ददौ पार्थाय लाङ्गली ।
प्रीयमाणो हलधरः सम्बन्धं प्रतिमानयन् ॥ ५५ ॥
जिन्हें साहसका काम प्रिय है और जो हाथमें हल धारण करते हैं, उन बलरामने प्रसन्न होकर इस नूतन सम्बन्धका आदर करते हुए अर्जुनको पाणिग्रहणके दहेजके रूपमें एक हजार मतवाले हाथी भेंट किये, जो तीन अंगोंसे मदकी धारा बहानेवाले थे। वे हाथी युद्धमें कभी पीछे नहीं हटते थे और देखनेमें पर्वतशिखरके समान जान पड़ते थे। उनके मस्तकोंपर सुन्दर वेषरचना की गयी थी। उन सबके पार्श्वभागमें मजबूत घण्टे लटक रहे थे तथा गलेमें सोनेके हार शोभा दे रहे थे। वे सभी हाथी बड़े सुन्दर लगते थे और उन सबके साथ महावत थे ॥ ५३—५५ ॥
स महाधनरत्नौघो वस्त्रकम्बलफेनवान् ।
महागजमहाग्राहः पताकाशैवलाकुलः ॥ ५६ ॥
पाण्डुसागरमाविद्धः प्रविवेश महाधनः ।
पूर्णमापूरयंस्तेषां द्विषच्छोकावहोऽभवत् ॥ ५७ ॥
जैसे नदियोंके जलका महान् प्रवाह समुद्रमें मिलता है, उसी प्रकार वह महान् धन और रत्नोंका भारी प्रवाह, जिसमें वस्त्र और कम्बल फेनके समान जान पड़ते थे, बड़े-बड़े हाथी महान् ग्राहोंका भ्रम उत्पन्न करते थे और जहाँ ध्वजा-पताकाएँ सेवारका काम कर रही थीं, पाण्डवरूपी महासागरमें जा मिला। यद्यपि पाण्डव-समुद्र पहलेसे ही परिपूर्ण था तथापि इस महान् धनप्रवाहने उसे और भी पूर्णतर बना दिया। यही कारण था कि वह पाण्डव-महासागर शत्रुओंके लिये शोकदायक प्रतीत होने लगा ॥ ५६-५७ ॥
प्रतिजग्राह तत् सर्वं धर्मराजो युधिष्ठिरः । पूजयामास तांश्चैव वृष्ण्यन्धकमहारथान् ॥ ५८ ॥ धर्मराज युधिष्ठिरने वह सारा धन ग्रहण किया और वृष्णि तथा अन्धकवंशके उन सभी महारथियोंका भलीभाँति आदर-सत्कार किया ॥ ५८ ॥
ते समेता महात्मानः कुरुवृष्ण्यन्धकोत्तमाः । विजहुरमरावासे नराः सुकृतिनो यथा ॥ ५९ ॥ जैसे पुण्यात्मा मनुष्य देवलोकमें सुख भोगते हैं, उसी प्रकार कुरु, वृष्णि और अन्धकवंशके वे श्रेष्ठ महात्मा पुरुष एकत्र होकर इच्छानुसार विहार करने लगे ॥ ५९ ॥
तत्र तत्र महानादैरूत्कृष्टतलनादितैः । यथायोगं यथाप्रीति विजहुः कुरुवृष्णयः ॥ ६० ॥ वे कौरव और वृष्णिवंशके वीर जहाँ-तहाँ वीणाकी उत्तम ध्वनिके साथ गाते-बजाते और संगीतका आनन्द लेते हुए यथावसर अपनी-अपनी रुचिके अनुसार विहार करने लगे ॥ ६० ॥
एवमुत्तमवीर्यास्ते विहृत्य दिवसान् बहून् । पूजिताः कुरुभिर्जग्मुः पुनर्द्वारवतीं प्रति ॥ ६१ ॥ इस प्रकार वे उत्तम पराक्रमी यदुवंशी बहुत दिनोंतक इन्द्रप्रस्थमें विहार करते हुए कौरवोंसे सम्मानित हो फिर द्वारका चले गये ॥ ६१ ॥
रामं पुरस्कृत्य ययुर्वृष्ण्यन्धकमहारथाः । रत्नान्यादाय शुभ्राणि दत्तानि कुरुसत्तमैः ॥ ६२ ॥ वृष्णि और अन्धकवंशके महारथी कुरुप्रवर पाण्डवोंके दिये हुए उज्ज्वल रत्नोंकी भेंट ले बलरामजीको आगे करके चले गये ॥ ६२ ॥
वासुदेवस्तु पार्थेन तत्रैव सह भारत । उवास नगरे रम्ये शक्रप्रस्थे महात्मना ॥ ६३ ॥ जनमेजय! परंतु भगवान् वासुदेव महात्मा अर्जुनके साथ रमणीय इन्द्रप्रस्थमें ही ठहर गये ॥ ६३ ॥
व्यचरद् यमुनातीरे मृगयां स महायशाः । मृगान् विध्यन् वराहांश्च रेमे सार्धं किरीटिना ॥ ६४ ॥ महायशस्वी श्रीकृष्ण अर्जुनके साथ शिकार खेलते और जंगली वराहों तथा हिंस्र पशुओंका वध करते हुए यमुनाजीके तटपर विचरते थे। इस प्रकार वे किरीटधारी अर्जुनके साथ विहार करते थे ॥ ६४ ॥
ततः सुभद्रा सौभद्रं केशवस्य प्रिया स्वसा । जयन्तमिव पौलोमी ख्यातिमन्तमजीजनत् ॥ ६५ ॥
तदनन्तर कुछ कालके पश्चात् श्रीकृष्णकी प्यारी बहिन सुभद्राने यशस्वी सौभद्रको जन्म दिया; ठीक वैसे ही, जैसे शचीने जयन्तको उत्पन्न किया था ।। ६५ ।।
दीर्घबाहुं महोरस्कं वृषभाक्षमरिंदमम् ।
सुभद्रा सुषुवे वीरमभिमन्युं नरर्षभम् ।। ६६ ।।
सुभद्राने वीरवर नरश्रेष्ठ अभिमन्युको उत्पन्न किया, जिसकी बड़ी-बड़ी बाँहें, विशाल वक्षःस्थल और बैलोंके समान विशाल नेत्र थे। वह शत्रुओंका दमन करनेवाला था ।। ६६ ।।
अभिश्च मन्युमांश्चैव ततस्तमरिमर्दनम् ।
अभिमन्युमिति प्राहुराजुर्निं पुरुषर्षभम् ।। ६७ ।।
वह अभि (निर्भय) एवं मन्युमान् (क्रुद्ध होकर लड़नेवाला) था, इसीलिये पुरुषोत्तम अर्जुनकुमारको ‘अभिमन्यु’ कहते हैं ।। ६७ ।।
स सात्वत्यामतिरथः सम्बभूव धनंजयात् ।
मखे निर्मथनेनेव शमीगर्भाद्धुताशनः ।। ६८ ।।
जैसे यज्ञमें मन्थन करनेपर शमीके गर्भसे उत्पन्न अश्वत्थसे अग्नि प्रकट होती है, उसी प्रकार अर्जुनके द्वारा सुभद्राके गर्भसे उस अतिरथी वीरका प्रादुर्भाव हुआ था ।। ६८ ।।
यस्मिञ्जाते महातेजाः कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः ।
अयुतं गा द्विजातिभ्यः प्रादान्निष्कांश्च भारत ।। ६९ ।।
भारत! उसके जन्म लेनेपर महातेजस्वी कुन्तीपुत्र युधिष्ठिरने ब्राह्मणोंको दस हजार गौएँ तथा बहुत-सी स्वर्णमुद्राएँ दानमें दीं ।। ६९ ।।
दयितो वासुदेवस्य बाल्यात् प्रभृति चाभवत् ।
पितृणामिव सर्वेषां प्रजानामिव चन्द्रमाः ।। ७० ।।
जैसे समस्त पितरों और प्रजाओंको चन्द्रमा प्रिय लगते हैं, उसी प्रकार अभिमन्यु बचपनसे ही भगवान् श्रीकृष्णका अत्यन्त प्रिय हो गया था ।। ७० ।।
जन्मप्रभृति कृष्णश्च चक्रे तस्य क्रियाः शुभाः ।
स चापि ववृधे बालः शुक्लपक्षे यथा शशी ।। ७१ ।।
श्रीकृष्णने जन्मसे ही उसके लालन-पालनकी सुन्दर व्यवस्थाएँ की थीं। बालक अभिमन्यु शुक्लपक्षके चन्द्रमाकी भाँति दिनोंदिन बढ़ने लगा ।। ७१ ।।
चतुष्पादं दशविधं धनुर्वेदमरिंदमः ।
अर्जुनाद् वेद वेदज्ञः सकलं दिव्यमानुषम् ।। ७२ ।।
उस शत्रुदमन बालकने वेदोंका ज्ञान प्राप्त करके अपने पिता अर्जुनसे चार पदों³, और दशविध³ अंगोंसे युक्त दिव्य एवं मानुष³ सब प्रकारके धनुर्वेदका ज्ञान प्राप्त कर लिया ।। ७२ ।।
विज्ञानेष्वपि चास्त्राणां सौष्ठवे च महाबलः ।
क्रियास्वपि च सर्वासु विशेषानभ्यशिक्षयत् ॥ ७३ ॥ अस्त्रोंके विज्ञान, सौष्ठव (प्रयोगपटुता) तथा सम्पूर्ण क्रियाओंमें भी महाबली अर्जुनने उसे विशेष शिक्षा दी थी ॥ ७३ ॥ आगमे च प्रयोगे च चक्रे तुल्यमिवात्मना । तुतोष पुत्रं सौभद्रं प्रेक्षमाणो धनंजयः ॥ ७४ ॥ धनंजयने अभिमन्युको (अस्त्र-शस्त्रोंके) आगम और प्रयोगमें अपने समान बना दिया था। वे सुभद्राकुमारको देखकर बहुत संतुष्ट रहते थे ॥ ७४ ॥ सर्वसंहननोपेतं सर्वलक्षणलक्षितम् । दुर्धर्षमृषभस्कन्धं व्यात्ताननमिवोरगम् ॥ ७५ ॥ वह दूसरोंको तिरस्कृत करनेवाले समस्त सद्गुणोंसे सम्पन्न, सभी उत्तम लक्षणोंसे सुशोभित एवं दुर्धर्ष था। उसके कंधे वृषभके समान हृष्ट-पुष्ट थे तथा मुँह बाये हुए सर्पकी भाँति वह शत्रुओंको भयानक प्रतीत होता था ॥ ७५ ॥ सिंहदर्पं महेष्वासं मत्तमातङ्गविक्रमम् । मेघदुन्दुभिनिर्घोषं पूर्णचन्द्रनिभाननम् ॥ ७६ ॥ उसमें सिंहके समान गर्व तथा मतवाले गजराजकी भाँति पराक्रम था। वह महाधनुर्धर वीर अपने गम्भीर स्वरसे मेघ और दुन्दुभिकी ध्वनिको लजा देता था। उसका मुख पूर्ण चन्द्रमाके समान मनमें आह्लाद उत्पन्न करता था ॥ ७६ ॥ कृष्णस्य सदृशं शौर्ये वीर्ये रूपे तथाऽऽकृतौ । ददर्श पुत्रं बीभत्सुर्मघवानिव तं यथा ॥ ७७ ॥ वह शूरता, पराक्रम, रूप तथा आकृति—सभी बातोंमें श्रीकृष्णके समान ही जान पड़ता था। अर्जुन अपने उस पुत्रको वैसी ही प्रसन्नतासे देखते थे, जैसे इन्द्र उन्हें देखा करते थे ॥ ७७ ॥ पाञ्चाल्यपि तु पञ्चभ्यः पतिभ्यः शुभलक्षणा । लेभे पञ्च सुतान् वीराञ्श्रेष्ठान् पञ्चाचलानिव ॥ ७८ ॥ शुभलक्षणा पांचालीने भी अपने पाँचों पतियोंसे पाँच श्रेष्ठ पुत्रोंको प्राप्त किया। वे सब-के-सब वीर और पर्वतके समान अविचल थे ॥ ७८ ॥ युधिष्ठिरात् प्रतिविन्ध्यं सुतसोमं वृकोदरात् । अर्जुनाच्छुतकम्माणं शतानीकं च नाकुलिम् ॥ ७९ ॥ सहदेवाच्छुतसेनमेतान् पञ्च महारथान् । पाञ्चाली सुषुवे वीरानादित्यानदितिर्यथा ॥ ८० ॥ युधिष्ठिरसे प्रतिविन्ध्य, भीमसेनसे सुतसोम, अर्जुनसे श्रुतकर्मा, नकुलसे शतानीक और सहदेवसे श्रुतसेन उत्पन्न हुए थे। इन पाँच वीर महारथी पुत्रोंको पांचाली (द्रौपदी)-ने उसी प्रकार जन्म दिया, जैसे अदितिने बारह आदित्योंको ॥ ७९-८० ॥
शास्त्रतः प्रतिविन्ध्यं तमूचुर्विप्रा युधिष्ठिरम्। परप्रहरणज्ञाने प्रतिविन्ध्यो भवत्वयम्॥ ८१॥ ब्राह्मणोंने युधिष्ठिरसे उनके पुत्रका नाम शास्त्रके अनुसार प्रतिविन्ध्य बताया। उनका उद्देश्य यह था कि यह प्रहारजनित वेदनाके ज्ञानमें विन्ध्यपर्वतके समान हो। (इसे शत्रुओंके प्रहारसे तनिक भी पीड़ा न हो)॥ ८१॥ सुते सोमसहस्रे तु सोमार्कसमतेजसम्। सुतसोमं महेष्वासं सुषुवे भीमसेनतः॥ ८२॥ भीमसेनके सहस्र सोमयाग करनेके पश्चात् द्रौपदीने उनसे सोम और सूर्यके समान तेजस्वी महान् धनुर्धर पुत्रको उत्पन्न किया था, इसलिये उसका नाम सुतसोम रखा गया॥ ८२॥ श्रुतं कर्म महत् कृत्वा निवृत्तेन किरीटिना। जातः पुत्रस्तथेत्येवं श्रुतकर्मा ततोऽभवत्॥ ८३॥ किरीटधारी अर्जुनने महान् एवं विख्यात कर्म करनेके पश्चात् लौटकर द्रौपदीसे पुत्र उत्पन्न किया था, इसलिये उनके पुत्रका नाम श्रुतकर्मा हुआ॥ ८३॥ शतानीकस्य राजर्षेः कौरव्यस्य महात्मनः। चक्रे पुत्रं सनामानं नकुलः कीर्तिवर्धनम्॥ ८४॥ कौरवकुलके महामना राजर्षि शतानीकके नामपर नकुलने अपने कीर्तिवर्धक पुत्रका नाम शतानीक रख दिया॥ ८४॥ ततस्त्वजीजनत् कृष्णा नक्षत्रे वह्निदैवते। सहदेवात् सुतं तस्माच्छ्रुतसेनेति यं विदुः॥ ८५॥ तदनन्तर कृष्णाने सहदेवसे अग्निदेवतासम्बन्धी कृत्तिका नक्षत्रमें एक पुत्र उत्पन्न किया, इसलिये उसका नाम श्रुतसेन रखा गया (श्रुतसेन अग्निका ही नामान्तर है)॥ ८५॥ एकवर्षान्तरास्त्वेते द्रौपदेया यशस्विनः। अन्वजायन्त राजेन्द्र परस्परहितैषिणः॥ ८६॥ राजेन्द्र! ये यशस्वी द्रौपदीकुमार एक-एक वर्षके अन्तरसे उत्पन्न हुए थे और एक-दूसरेका हित चाहनेवाले थे॥ ८६॥ जातकर्मण्यानुपूर्व्याच्चूड़ोपनयनानि च। चकार विधिवद् धौम्यस्तेषां भरतसत्तम॥ ८७॥ भरतश्रेष्ठ! पुरोहित धौम्यने क्रमशः उन सभी बालकोंके जातकर्म, चूड़ाकरण और उपनयन आदि संस्कार विधिपूर्वक सम्पन्न किये॥ ८७॥ कृत्वा च वेदाध्ययनं ततः सुचरितव्रताः। जगृहुः सर्वमिष्वस्त्रमर्जुनाद् दिव्यमानुषम्॥ ८८॥
पूर्णरूपसे ब्रह्मचर्य व्रतका पालन करनेवाले उन बालकोंने धौम्य मुनिसे वेदाध्ययन करनेके पश्चात् अर्जुनसे सम्पूर्ण दिव्य एवं मानुष धनुर्वेदका ज्ञान प्राप्त किया ॥ ८८ ॥
दिव्यगर्भोपमैः पुत्रैर्व्यूढोरस्कैर्महारथैः ।
अन्वितो राजशार्दूल पाण्डवा मुदमाप्नुवन् ॥ ८९ ॥
राजेश्वर! देवपुत्रोंके समान चौड़ी छातीवाले महारथी पुत्रोंसे संयुक्त हो पाण्डव बड़े प्रसन्न हुए ॥ ८९ ॥
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि हरणाहरणपर्वणि विंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २२० ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत हरणाहरणपर्वमें दो सौ बीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २२० ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके १ १/२ श्लोक मिलाकर कुल ९० १/२ श्लोक हैं)
१. धनुर्वेदमें निम्नांकित चार पाद बताये गये हैं—मन्त्रमुक्त, पाणिमुक्त, मुक्तामुक्त और अमुक्त। जैसा कि वचन है—
मन्त्रमुक्तं पाणिमुक्तं मुक्तामुक्तं तथैव च । अमुक्तं च धनुर्वेदे चतुष्पाच्छस्त्रमीरितम् ।।
जिसका मन्त्रद्वारा केवल प्रयोग होता है, उपसंहार नहीं, उसे मन्त्रमुक्त कहते हैं। जिसे हाथमें लेकर धनुषद्वारा छोड़ा जाय, वह बाण आदि पाणिमुक्त कहा गया है। जिसके प्रयोग और उपसंहार दोनों हों, वह मुक्तामुक्त है। जो वस्तुतः छोड़ा नहीं जाता, जैसे मन्त्रद्वारा साधित (ध्वजा आदि) है, जिसको देखनेमात्रसे शत्रु भाग जाते हैं, वह अमुक्त कहलाता है। ये अथवा सूत्र, शिक्षा, प्रयोग तथा रहस्य—ये ही धनुर्वेदके चार पाद हैं।
२. आदान, संधान, मोक्षण, निवर्तन, स्थान, मुष्टि, प्रयोग, प्रायश्चित्त, मण्डल तथा रहस्य—धनुर्वेदके ये दस अंग हैं। यथा—
आदानमथ संधानं मोक्षणं विनिवर्तनम् । स्थानं मुष्टिः प्रयोगश्च प्रायश्चित्तानि मण्डलम् ।।
रहस्यं चेति दशधा धनुर्वेदाङ्गमिश्यते ।
‘तरकससे बाणको निकालना आदान है। उसे धनुषकी प्रत्यंचापर रखना संधान है, लक्ष्यपर छोड़ना मोक्षण कहा गया है। यदि बाण छोड़ देनेके बाद यह मालूम हो जाय कि हमारा विपक्षी निर्बल या शस्त्रहीन है, तो वीर पुरुष मन्त्रशक्तिसे उस बाणको लौटा लेते हैं। इस प्रकार छोड़े हुए अस्त्रको लौटा लेना विनिवर्तन कहलाता है। धनुष या उसकी प्रत्यंचाके धारण अथवा शरसंधानकालमें धनुष और प्रत्यंचाके मध्यदेशको स्थान कहा गया है। तीन या चार अंगुलियोंका सहयोग ही मुष्टि है। तर्जनी और मध्यमा अंगुलिके अथवा मध्यमा और अंगुष्ठके मध्यसे बाणका संधान करना प्रयोग कहलाता है। स्वतः या दूसरेसे प्राप्त होनेवाले ज्याघात (प्रत्यंचाके आघात) और बाणके आघातको रोकनेके लिये जो दस्तानों आदिका प्रयोग किया जाता है, उसका नाम प्रायश्चित्त है। चक्राकार घूमते हुए रथके साथ-साथ घूमनेवाले लक्ष्यका वेध मण्डल कहलाता है। शब्दके आधारपर लक्ष्य बींधना अथवा एक ही समय अनेक लक्ष्योंको बींध डालना, ये सब रहस्यके अन्तर्गत हैं।’
३. ब्रह्मास्त्र आदिको दिव्य और खड्ग आदिको मानुष कहा गया है।
(खाण्डवदाहपर्व)
(खाण्डवदाहपर्व)
एकविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः
युधिष्ठिरके राज्यकी विशेषता, कृष्ण और अर्जुनका खाण्डववनमें जाना तथा उन दोनोंके पास ब्राह्मणवेशधारी अग्निदेवका आगमन
वैशम्पायन उवाच
इन्द्रप्रस्थे वसन्तस्ते जघ्नुरन्यान् नराधिपान्।
शासनाद् धृतराष्ट्रस्य राज्ञः शान्तनवस्य च॥ १॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! राजा धृतराष्ट्र तथा शान्तनुनन्दन भीष्मकी आज्ञासे इन्द्रप्रस्थमें रहते हुए पाण्डवोंने अन्य बहुत-से राजाओंको, जो उनके शत्रु थे, मार दिया॥ १॥
आश्रित्य धर्मराजानं सर्वलोकोऽवसत् सुखम्।
पुण्यलक्षणकर्माणं स्वदेहमिव देहिनः॥ २॥
धर्मराज युधिष्ठिरका आसरा लेकर सब लोग सुखसे रहने लगे, जैसे जीवात्मा पुण्यकर्मोंके फलस्वरूप अपने उत्तम शरीरको पाकर सुखसे रहता है॥ २॥
स समं धर्मकामार्थान् सिषेवे भरतर्षभ।
त्रीनिवात्मसमान् बन्धून् नीतिमानिव मानयन्॥ ३॥
भरतश्रेष्ठ! महाराज युधिष्ठिर नीतिज्ञ पुरुषकी भाँति धर्म, अर्थ और काम इन तीनोंको आत्माके समान प्रिय बन्धु मानते हुए न्याय और समतापूर्वक इनका सेवन करते थे॥ ३॥
तेषां समविभक्तानां क्षितौ देहवतामिव।
बभौ धर्मार्थकामानां चतुर्थ इव पार्थिवः॥ ४॥
इस प्रकार तुल्यरूपसे बँटे हुए धर्म, अर्थ और काम तीनों पुरुषार्थ भूतलपर मानो मूर्तिमान् होकर प्रकट हो रहे थे और राजा युधिष्ठिर चौथे पुरुषार्थ मोक्षकी भाँति सुशोभित होते थे॥ ४॥
अध्येतारं परं वेदान् प्रयोक्तारं महाध्वरे।
रक्षितारं शुभाँल्लोकान् लेभिरे तं जनाधिपम्॥ ५॥
प्रजाने महाराज युधिष्ठिरके रूपमें ऐसा राजा पाया था, जो परम ब्रह्म परमात्माका चिन्तन करनेवाला, बड़े-बड़े यज्ञोंमें वेदोंका उपयोग करनेवाला और शुभ लोकोंके संरक्षणमें तत्पर रहनेवाला था ॥ ५ ॥ अधिष्ठानवती लक्ष्मीः परायणवती मतिः । वर्धमानोऽखिलो धर्मस्तेनासीत् पृथिवीक्षिताम् ॥ ६ ॥ राजा युधिष्ठिरके द्वारा दूसरे राजाओंकी चंचल लक्ष्मी भी स्थिर हो गयी, बुद्धि उत्तम निष्ठावाली हो गयी और सम्पूर्ण धर्मकी दिनोंदिन वृद्धि होने लगी ॥ ६ ॥ भ्रातृभिः सहितो राजा चतुर्भिरधिकं बभौ । प्रयुज्यमानैर्विततो वेदैरेव महाध्वरः ॥ ७ ॥ जैसे यथावसर उपयोगमें लाये जानेवाले चारों वेदोंके द्वारा विस्तारपूर्वक आरम्भ किया हुआ महायज्ञ शोभा पाता है, उसी प्रकार अपनी आज्ञाके अधीन रहनेवाले चारों भाइयोंके साथ राजा युधिष्ठिर अत्यन्त सुशोभित होते थे ॥ ७ ॥ तं तु धौम्यादयो विप्राः परिवार्योपतस्थिरे । बृहस्पतिसमा मुख्याः प्रजापतिमिवामराः ॥ ८ ॥ जैसे बृहस्पति-सदृश मुख्य-मुख्य देवता प्रजापतिकी सेवामें उपस्थित होते हैं, उसी प्रकार धौम्य आदि ब्राह्मण राजा युधिष्ठिरको सब ओरसे घेरकर बैठते थे ॥ ८ ॥ धर्मराजे ह्यतिप्रीत्या पूर्णचन्द्र इवामले । प्रजानां रेमिरे तुल्यं नेत्राणि हृदयानि च ॥ ९ ॥ निर्मल एवं पूर्ण चन्द्रमाके समान आनन्दप्रद राजा युधिष्ठिरके प्रति अत्यन्त प्रीति होनेके कारण उन्हें देखकर प्रजाके नेत्र और मन एक साथ प्रफुल्लित हो उठते थे ॥ ९ ॥ न तु केवलदैवेन प्रजा भावेन रेमिरे । यद् बभूव मनःकान्तं कर्मणा स चकार तत् ॥ १० ॥ प्रजा केवल उनके पालनरूप राजोचित कर्मसे ही संतुष्ट नहीं थी, वह उनके प्रति श्रद्धा और भक्तिभाव रखनेके कारण भी सदा आनन्दित रहती थी। राजाके प्रति प्रजाकी भक्ति इसलिये थी कि प्रजाके मनको जो प्रिय लगता था, राजा युधिष्ठिर उसीको क्रियाद्वारा पूर्ण करते थे ॥ १० ॥ न ह्ययुक्तं न चासत्यं नासह्यं न च वाप्रियम् । भाषितं चारुभाषस्य जज्ञे पार्थस्य धीमतः ॥ ११ ॥ सदा मीठी बातें करनेवाले बुद्धिमान् कुन्तीनन्दन राजा युधिष्ठिरके मुखसे कभी कोई अनुचित, असत्य, असह्य और अप्रिय बात नहीं निकलती थी ॥ ११ ॥ स हि सर्वस्य लोकस्य हितमात्मन एव च । चिकीर्षन् सुमहातेजा रेमे भरतसत्तम ॥ १२ ॥
भरतश्रेष्ठ! महातेजस्वी राजा युधिष्ठिर सब लोगोंका और अपना भी हित करनेकी चेष्टामें लगे रहकर सदा प्रसन्नतापूर्वक समय बिताते थे ॥ १२ ॥
तथा तु मुदिताः सर्वे पाण्डवा विगतज्वराः । अवसन् पृथिवीपालांस्तापयन्तः स्वतेजसा ॥ १३ ॥
इस प्रकार सभी पाण्डव अपने तेजसे दूसरे नरेशोंको संतप्त करते हुए निश्चिन्त तथा आनन्दमग्न होकर वहाँ निवास करते थे ॥ १३ ॥
ततः कतिपयाहस्य बीभत्सुः कृष्णमब्रवीत् । उष्णानि कृष्ण वर्तन्ते गच्छावो यमुनां प्रति ॥ १४ ॥
तदनन्तर कुछ दिनोंके बाद अर्जुनने श्रीकृष्णसे कहा—'कृष्ण! बड़ी गरमी पड़ रही है। चलिये, यमुनाजीमें स्नानके लिये चलें ॥ १४ ॥
सुहृज्जनवृतौ तत्र विहृत्य मधुसूदन । सायाह्ने पुनरेष्यावो रोचतां ते जनार्दन ॥ १५ ॥
'मधुसूदन! मित्रोंके साथ वहाँ जलविहार करके हमलोग शामतक फिर लौट आयेंगे। जनार्दन! यदि आपकी रुचि हो, तो चलें' ॥ १५ ॥
वासुदेव उवाच
कुन्तीमातर्ममाप्येतद् रोचते यद् वयं जले । सुहृज्जनवृताः पार्थ विहरेम यथासुखम् ॥ १६ ॥
वासुदेव बोले—कुन्तीनन्दन! मेरी भी ऐसी ही इच्छा हो रही है कि हमलोग सुहृदोंके साथ वहाँ चलकर सुखपूर्वक जलविहार करें ॥ १६ ॥
वैशम्पायन उवाच
आमन्त्र्य तौ धर्मराजमनुज्ञाप्य च भारत । जग्मतुः पार्थगोविन्दौ सुहृज्जनवृतौ ततः ॥ १७ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—भारत! यह सलाह करके युधिष्ठिरकी आज्ञा ले अर्जुन और श्रीकृष्ण सुहृदोंके साथ वहाँ गये ॥ १७ ॥
विहारदेशं सम्प्राप्य नानाद्रुममनुत्तमम् । गृहैरुच्चावचैर्युक्तं पुरन्दरपुरोपमम् ॥ १८ ॥ भक्ष्यैर्भोज्यैश्च पेयैश्च रसवद्भिर्महाधनैः । माल्यैश्च विविधैर्गन्धैर्युक्तं वार्ष्णेयपार्थयोः ॥ १९ ॥ विवेशान्तःपुरं तूर्णं रत्नैरुच्चावचैः शुभैः । यथोपजोषं सर्वश्च जनश्चिक्रीड भारत ॥ २० ॥
यमुनाके तटपर जहाँ विहारस्थान था, वहाँ पहुँचकर श्रीकृष्ण और अर्जुनके रनिवासकी स्त्रियाँ नाना प्रकारके सुन्दर रत्नोंके साथ क्रीड़ाभवनके भीतर चली गयीं। वह
उत्तम विहारभूमि नाना प्रकारके वृक्षोंसे सुशोभित थी। वहाँ बने हुए अनेक छोटे-बड़े भवनोंके कारण वह स्थान इन्द्रपुरीके समान सुशोभित होता था। अन्तःपुरकी स्त्रियोंके साथ अनेक प्रकारके भक्ष्य, भोज्य, बहुमूल्य सरस पेय, भाँति-भाँतिके पुष्पहार और सुगन्धित द्रव्य भी थे। भारत! वहाँ जाकर सब लोग अपनी-अपनी रुचिके अनुसार जलक्रीड़ा करने लगे ॥ १८-२० ॥
स्त्रियश्च विपुलश्रोण्यश्चारूपीनपयोधराः ।
मदस्खलितगामिन्यश्चिक्रीडुर्वामलोचनाः ॥ २१ ॥
विशाल नितम्बों और मनोहर पीन उरोजोंवाली वामलोचना वनिताएँ भी यौवनके मदके कारण डगमगाती चालसे चलकर इच्छानुसार क्रीड़ाएँ करने लगीं ॥ २१ ॥
वने काश्चिज्जले काश्चित् काश्चिद् वेश्मसु चाङ्गनाः ।
यथायोग्यं यथाप्रीति चिक्रीडुः पार्थकृष्णयोः ॥ २२ ॥
वे स्त्रियाँ श्रीकृष्ण और अर्जुनकी रुचिके अनुसार कुछ वनमें, कुछ जलमें और कुछ घरोंमें यथोचितरूपसे क्रीड़ा करने लगीं ॥ २२ ॥
द्रौपदी च सुभद्रा च वासांस्याभरणानि च ।
प्रायच्छतां महाराज ते तु तस्मिन् मदोत्कटे ॥ २३ ॥
महाराज! उस समय यौवनमदसे युक्त द्रौपदी और सुभद्राने बहुत-से वस्त्र और आभूषण बाँटे ॥ २३ ॥
काश्चित् प्रहृष्टा ननृतुश्चक्रुशुश्च तथापराः ।
जहसुश्च परा नार्यो जगुश्चान्या वरस्त्रियः ॥ २४ ॥
वहाँ कुछ श्रेष्ठ स्त्रियाँ हर्षोल्लासमें भरकर नृत्य करने लगीं। कुछ जोर-जोरसे कोलाहल करने लगीं। अन्य बहुत-सी स्त्रियाँ ठठाकर हँसने लगीं तथा कुछ सुन्दरी स्त्रियाँ गीत गाने लगीं ॥ २४ ॥
रुरुधुश्चापरास्तत्र प्रजघ्नुश्च परस्परम् ।
मन्त्रयामासुरन्याश्च रहस्यानि परस्परम् ॥ २५ ॥
कुछ एक-दूसरीको पकड़कर रोकने और मृदु प्रहार करने लगीं तथा कुछ दूसरी स्त्रियाँ एकान्तमें बैठकर आपसमें कुछ गुप्त बातें करने लगीं ॥ २५ ॥
वेणुवीणामृदङ्गानां मनोज्ञानां च सर्वशः ।
शब्देन पूर्यते हर्म्यं तद् वनं सुमहर्द्धिमत् ॥ २६ ॥
वहाँका राजभवन और महान् समृद्धिशाली वन वीणा, वेणु और मृदंग आदि मनोहर वाद्योंकी सुमधुर ध्वनिसे सब ओर गूँजने लगा ॥ २६ ॥
तस्मिंस्तदा वर्तमाने कुरुदाशार्हनन्दनौ ।
समीपं जग्मतुः कंचिद्देशं सुमनोहरम् ॥ २७ ॥
इस प्रकार जब वहाँ क्रीड़ा-विहारका आनन्दमय उत्सव चल रहा था, उसी समय श्रीकृष्ण और अर्जुन पासके ही किसी अत्यन्त मनोहर प्रदेशमें गये ।। २७ ।। तत्र गत्वा महात्मानौ कृष्णौ परपुरंजयौ । महार्हासनयो राजंस्ततस्तौ संनिषीदतुः ।। २८ ।। तत्र पूर्वव्यतीतानि विक्रान्तानीतराणि च । बहूनि कथयित्वा तौ रेमाते पार्थमाधवौ ।। २९ ।। राजन्! वहाँ जाकर शत्रुओंकी राजधानीको जीतनेवाले वे दोनों महात्मा श्रीकृष्ण और अर्जुन दो बहुमूल्य सिंहासनोंपर बैठे और पहले किये हुए पराक्रमों तथा अन्य बहुत-सी बातोंकी चर्चा करके आमोद-प्रमोद करने लगे ।। २८-२९ ।। तत्रोपविष्टौ मुदितौ नाकपृष्ठेऽश्विनाविव । अभ्यागच्छत् तदा विप्रो वासुदेवधनंजयौ ।। ३० ।। वहाँ प्रसन्नतापूर्वक बैठे हुए धनंजय और वासुदेव स्वर्गलोकमें स्थित अश्विनीकुमारोंकी भाँति सुशोभित हो रहे थे। उसी समय उन दोनोंके पास एक ब्राह्मणदेवता आये ।। ३० ।। बृहच्छालप्रतीकाशः प्रतप्तकनकप्रभः । हरिपिङ्गोऽज्ज्वलश्मश्रुः प्रमाणायामतः समः ।। ३१ ।। वे विशाल शालवृक्षके समान ऊँचे थे। उनकी कान्ति तपाये हुए सुवर्णके समान थी। उनके सारे अंग नीले और पीले रंगके थे, दाढ़ी-मूँछें अग्निज्वालाके समान पीतवर्णकी थीं तथा ऊँचाईके अनुसार ही उनकी मोटाई थी ।। ३१ ।। तरुणादित्यसंकाशश्चीरवासा जटाधरः । पद्मपत्राननः पिङ्गस्तेजसा प्रज्वलन्निव ।। ३२ ।। वे प्रातःकालिक सूर्यके समान तेजस्वी जान पड़ते थे। वे चीरवस्त्र पहने और मस्तकपर जटा धारण किये हुए थे। उनका मुख कमलदलके समान शोभा पा रहा था। उनकी प्रभा पिंगलवर्णकी थी और वे अपने तेजसे मानो प्रज्वलित हो रहे थे ।। ३२ ।। उपसृष्टं तु तं कृष्णौ भ्राजमानं द्विजोत्तमम् । अर्जुनो वासुदेवश्च तूर्णमुत्पत्य तस्थतुः ।। ३३ ।। वे तेजस्वी द्विजश्रेष्ठ जब निकट आ गये, तब अर्जुन और भगवान् श्रीकृष्ण तुरंत ही आसनसे उठकर खड़े हो गये ।। ३३ ।।