भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

पृष्ठ 1528, कुल 2256 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1528

शास्त्रतः प्रतिविन्ध्यं तमूचुर्विप्रा युधिष्ठिरम्। परप्रहरणज्ञाने प्रतिविन्ध्यो भवत्वयम्॥ ८१॥ ब्राह्मणोंने युधिष्ठिरसे उनके पुत्रका नाम शास्त्रके अनुसार प्रतिविन्ध्य बताया। उनका उद्देश्य यह था कि यह प्रहारजनित वेदनाके ज्ञानमें विन्ध्यपर्वतके समान हो। (इसे शत्रुओंके प्रहारसे तनिक भी पीड़ा न हो)॥ ८१॥ सुते सोमसहस्रे तु सोमार्कसमतेजसम्। सुतसोमं महेष्वासं सुषुवे भीमसेनतः॥ ८२॥ भीमसेनके सहस्र सोमयाग करनेके पश्चात् द्रौपदीने उनसे सोम और सूर्यके समान तेजस्वी महान् धनुर्धर पुत्रको उत्पन्न किया था, इसलिये उसका नाम सुतसोम रखा गया॥ ८२॥ श्रुतं कर्म महत् कृत्वा निवृत्तेन किरीटिना। जातः पुत्रस्तथेत्येवं श्रुतकर्मा ततोऽभवत्॥ ८३॥ किरीटधारी अर्जुनने महान् एवं विख्यात कर्म करनेके पश्चात् लौटकर द्रौपदीसे पुत्र उत्पन्न किया था, इसलिये उनके पुत्रका नाम श्रुतकर्मा हुआ॥ ८३॥ शतानीकस्य राजर्षेः कौरव्यस्य महात्मनः। चक्रे पुत्रं सनामानं नकुलः कीर्तिवर्धनम्॥ ८४॥ कौरवकुलके महामना राजर्षि शतानीकके नामपर नकुलने अपने कीर्तिवर्धक पुत्रका नाम शतानीक रख दिया॥ ८४॥ ततस्त्वजीजनत् कृष्णा नक्षत्रे वह्निदैवते। सहदेवात् सुतं तस्माच्छ्रुतसेनेति यं विदुः॥ ८५॥ तदनन्तर कृष्णाने सहदेवसे अग्निदेवतासम्बन्धी कृत्तिका नक्षत्रमें एक पुत्र उत्पन्न किया, इसलिये उसका नाम श्रुतसेन रखा गया (श्रुतसेन अग्निका ही नामान्तर है)॥ ८५॥ एकवर्षान्तरास्त्वेते द्रौपदेया यशस्विनः। अन्वजायन्त राजेन्द्र परस्परहितैषिणः॥ ८६॥ राजेन्द्र! ये यशस्वी द्रौपदीकुमार एक-एक वर्षके अन्तरसे उत्पन्न हुए थे और एक-दूसरेका हित चाहनेवाले थे॥ ८६॥ जातकर्मण्यानुपूर्व्याच्चूड़ोपनयनानि च। चकार विधिवद् धौम्यस्तेषां भरतसत्तम॥ ८७॥ भरतश्रेष्ठ! पुरोहित धौम्यने क्रमशः उन सभी बालकोंके जातकर्म, चूड़ाकरण और उपनयन आदि संस्कार विधिपूर्वक सम्पन्न किये॥ ८७॥ कृत्वा च वेदाध्ययनं ततः सुचरितव्रताः। जगृहुः सर्वमिष्वस्त्रमर्जुनाद् दिव्यमानुषम्॥ ८८॥