महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
अध्याय (पृष्ठ 2034)
अष्टचत्वारिंशोऽध्यायः
पाण्डवोंपर विजय प्राप्त करनेके लिये शकुनि और दुर्योधनकी बातचीत
शकुनिरुवाच
दुर्योधन न तेऽमर्षः कार्यः प्रति युधिष्ठिरम् ।
भागधेयानि हि स्वानि पाण्डवा भुञ्जते सदा ॥ १ ॥
विधानं विविधाकारं परं तेषां विधानतः ।
अनेकैर्भ्युपायैश्च त्वया न शकिताः पुरा ॥ २ ॥
शकुनि बोला—दुर्योधन! तुम्हें युधिष्ठिरके प्रति ईर्ष्या नहीं करनी चाहिये; क्योंकि पाण्डव सदा अपने भाग्यका ही उपभोग करते आ रहे हैं। तुमने उन्हें वशमें लानेके लिये अनेक प्रकारके उपायोंका अवलम्बन किया, परंतु उनके द्वारा तुम उन्हें अपने अधीन न कर सके ॥
आरब्धाश्च महाराज पुनः पुनररिंदम ।
विमुक्ताश्च नरव्याघ्रा भागधेयपुरस्कृताः ॥ ३ ॥
शत्रुओंका दमन करनेवाले महाराज! तुमने बार-बार पाण्डवोंपर कुचक्र चलाये, परंतु वे नरश्रेष्ठ अपने भाग्यसे उन सभी संकटोंसे छुटकारा पाते गये ॥ ३ ॥
तैर्लब्धा द्रौपदी भार्या द्रुपदश्च सुतैः सह ।
सहायः पृथिवीलाभे वासुदेवश्च वीर्यवान् ॥ ४ ॥
उन पाँचोंने पत्नीरूपमें द्रौपदीको तथा पुत्रों-सहित राजा द्रुपद एवं सम्पूर्ण पृथ्वीकी प्राप्तिमें कारण महापराक्रमी वसुदेवनन्दन श्रीकृष्णको सहायकरूपमें प्राप्त किया है ॥ ४ ॥
(अजितः सोऽपि सर्वैर्हि सदेवासुरमानुषैः ।
तत्तेजसा प्रवृद्धोऽसौ तत्र का परिदेवना ॥)
श्रीकृष्णको सब देवता, असुर और मनुष्य मिलकर भी जीत नहीं सकते। उन्हींके तेजसे राजा युधिष्ठिरकी उन्नति हुई है; इसके लिये शोक करनेकी क्या बात है?
लब्धश्चानभिभूतार्थैः पित्र्योऽंशः पृथिवीपते ।
विवृद्धस्तेजसा तेषां तत्र का परिदेवना ॥ ५ ॥
पृथिवीपते! पाण्डवोंने अपने उद्देश्यसे विचलित न होकर निरन्तर प्रयत्न करके राज्यमें अपना पैतृक अंश प्राप्त किया है और वह पैतृक सम्पत्ति आज उन्हींके तेजसे बहुत बढ़ गयी है, अतः उसके लिये चिन्ता करनेकी क्या आवश्यकता है? ॥ ५ ॥
धनंजयेन गाण्डीवमक्षय्यौ च महेषुधी । लब्धान्यस्त्राणि दिव्यानि तोषयित्वा हुताशनम् ॥ ६ ॥ तेन कार्मुकमुख्येन बाहुवीर्येण चात्मनः । कृता वशे महीपालास्तत्र का परिदेवना ॥ ७ ॥ अर्जुनने अग्निदेवको संतुष्ट करके गाण्डीव धनुष, अक्षय तरकस तथा कितने ही दिव्य अस्त्र प्राप्त किये हैं। उस श्रेष्ठ धनुषके द्वारा तथा अपनी भुजाओंके बलसे उन्होंने समस्त राजाओंको वशमें किया है, अतः इसके लिये शोककी क्या आवश्यकता है? ॥ ६-७ ॥ अग्निदाहान्मयं चापि मोक्षयित्वा स दानवम् । सभां तां कारयामास सव्यसाची परंतपः ॥ ८ ॥ सव्यसाची परंतप अर्जुनने मय दानवको आगमें जलनेसे बचाया और उसीके द्वारा उस दिव्य सभाका निर्माण कराया ॥ ८ ॥ तेन चैव मयेनोक्ताः किंकरा नाम राक्षसाः । वहन्ति तां सभां भीमास्तत्र का परिदेवना ॥ ९ ॥ यच्चासहायतां राजन्नुक्तवानसि भारत । तन्मिथ्या भ्रातरो हीमे तव सर्वे वशानुगाः ॥ १० ॥ उस मयके ही कहनेसे किंकरनामधारी भयंकर राक्षसगण उस सभाको एक स्थानसे दूसरे स्थानपर ले जाते हैं। अतः इसके लिये भी शोक-संताप क्यों किया जाय? भारत! तुमने जो अपनेको असहाय बताया है, वह मिथ्या है; क्योंकि तुम्हारे ये सब भाई तुम्हारी आज्ञाके अधीन हैं ॥ द्रोणस्तव महेष्वासः सह पुत्रेण वीर्यवान् । सूतपुत्रश्च राधेयो गौतमश्च महारथः ॥ ११ ॥ अहं च सह सोदर्यैः सौमदत्तिश्च पार्थिवः । एतैस्त्वं सहितः सर्वैर्जय कृत्स्नां वसुंधराम् ॥ १२ ॥ महान् धनुर्धर और पराक्रमी द्रोणाचार्य अपने पुत्र अश्वत्थामाके साथ तुम्हारी सहायताके लिये उद्यत हैं। राधानन्दन सूतपुत्र कर्ण, महारथी कृपाचार्य, भाइयोंसहित मैं तथा राजा भूरिश्रवा—इन सबके साथ तुम भी सारी पृथ्वीपर विजय प्राप्त करो ॥ ११-१२ ॥
दुर्योधन उवाच
त्वया च सहितो राजन्नेतैश्चान्यैर्महारथैः । एतानेव विजेष्यामि यदि त्वमनुमन्यसे ॥ १३ ॥ एतेषु विजितेष्वद्य भविष्यति मही मम । सर्वे च पृथिवीपालाः सभा सा च महाधना ॥ १४ ॥
दुर्योधनने कहा— राजन्! यदि तुम्हारी अनुमति हो, तो तुम्हारे और इन द्रोण आदि अन्य महारथियोंके साथ इन पाण्डवोंको ही युद्धमें जीत लूँ। इनके पराजित हो जाने-पर अभी यह सारी पृथ्वी, समस्त भूपाल और वह महाधन-सम्पन्न सभा भी हमारे अधीन हो जायगी ॥ १३-१४ ॥
शकुनिरुवाच
धनंजयो वासुदेवो भीमसेनो युधिष्ठिरः ।
नकुलः सहदेवश्च द्रुपदश्च सहात्मजैः ॥ १५ ॥
नैते युधि पराजेतुं शक्या देवगणैरपि ।
महारथा महेष्वासाः कृतास्त्रा युद्धदुर्मदाः ॥ १६ ॥
शकुनि बोला— राजन्! अर्जुन, श्रीकृष्ण, भीमसेन, युधिष्ठिर, नकुल, सहदेव तथा पुत्रोंसहित द्रुपद—इन्हें देवता भी युद्धमें परास्त नहीं कर सकते। ये सब-के-सब महारथी, महान् धनुर्धर, अस्त्रविद्यामें निपुण तथा युद्धमें उन्मत्त होकर लड़नेवाले हैं ॥ १५-१६ ॥
अहं तु तद् विजानामि विजेतुं येन शक्यते ।
युधिष्ठिरं स्वयं राजंस्तन्निबोध जुषस्व च ॥ १७ ॥
राजन्! मैं वह उपाय जानता हूँ, जिससे युधिष्ठिर स्वयं पराजित हो सकते हैं। तुम उसे सुनो और उसका सेवन करो ॥ १७ ॥
दुर्योधन उवाच
अप्रमादेन सुहृदामन्येषां च महात्मनाम् ।
यदि शक्या विजेतुं ते तन्ममाचक्ष्व मातुल ॥ १८ ॥
दुर्योधनने कहा— मामाजी! यदि मेरे सगे-सम्बन्धियों तथा अन्य महात्माओंकी सतत सावधानीसे किसी उपायद्वारा पाण्डवोंको जीता जा सके तो वह मुझे बताइये ॥ १८ ॥
शकुनिरुवाच
द्यूतप्रियश्च कौन्तेयो न स जानाति देवितुम् ।
समाहूतश्च राजेन्द्रो न शक्ष्यति निवर्तितुम् ॥ १९ ॥
शकुनि बोला— राजन्! कुन्तीनन्दन युधिष्ठिरको जुएका खेल बहुत प्रिय है, किंतु वे उसे खेलना नहीं जानते। यदि महाराज युधिष्ठिरको द्यूतक्रीड़ाके लिये बुलाया जाय तो वे पीछे नहीं हट सकेंगे ॥ १९ ॥
देवने कुशलश्चाहं न मेऽस्ति सदृशो भुवि ।
त्रिषु लोकेषु कौरव्य तं त्वं द्यूते समाह्वय ॥ २० ॥
मैं जूआ खेलनेमें बहुत निपुण हूँ। इस कलामें मेरी समानता करनेवाला पृथ्वीपर दूसरा कोई नहीं है। केवल यहीं नहीं, तीनों लोकोंमें मेरे-जैसा द्यूतविद्याका जानकार नहीं है। अतः
कुरुनन्दन! तुम द्यूतक्रीड़ाके लिये युधिष्ठिरको बुलाओ ।। २० ।। तस्याक्षकुशलो राजन्नादास्येऽहमसंशयम् । राज्यं श्रियं च तां दीप्तां त्वदर्थं पुरुषर्षभ ।। २१ ।। नरश्रेष्ठ! मैं पासा फेंकनेमें कुशल हूँ; अतः युधिष्ठिरके राज्य तथा देदीप्यमान राजलक्ष्मीको तुम्हारे लिये अवश्य प्राप्त कर लूँगा, इसमें संशय नहीं है ।। २१ ।। इदं तु सर्वं त्वं राज्ञे दुर्योधन निवेदय । अनुज्ञातस्तु ते पित्रा विजेष्ये तान् न संशयः ।। २२ ।। दुर्योधन! तुम ये सारी बातें पिताजीसे कहो। उनकी आज्ञा मिल जानेपर मैं निःसंदेह पाण्डवोंको जीत लूँगा ।।
दुर्योधन उवाच त्वमेव कुरुमुख्याय धृतराष्ट्राय सौबल । निवेदय यथान्यायं नाहं शक्ष्ये निवेदितुम् ।। २३ ।। **दुर्योधनने कहा—**सुबलनन्दन! आप ही कुरुकुलके प्रधान महाराज धृतराष्ट्रसे इन सब बातोंको यथोचित रूपसे कहिये। मैं स्वयं कुछ नहीं कह सकूँगा ।। २३ ।।
इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि द्यूतपर्वणि दुर्योधनसन्तापे अष्टचत्वारिंशोऽध्यायः ।। ४८ ।। इस प्रकार श्रीमहाभारत सभापर्वके अन्तर्गत द्यूतपर्वमें दुर्योधनसन्तापविषयक अड़तालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ४८ ।। (दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल २४ श्लोक हैं)
अध्याय (पृष्ठ 2038)
एकोनपञ्चाशत्तमोऽध्यायः
धृतराष्ट्रके पूछनेपर दुर्योधनका अपनी चिन्ता बताना और द्यूतके लिये धृतराष्ट्रसे अनुरोध करना एवं धृतराष्ट्रका विदुरको इन्द्रप्रस्थ जानेका आदेश
वैशम्पायन उवाच
अनुभूय तु राज्ञस्तं राजसूयं महाक्रतुम् ।
युधिष्ठिरस्य नृपतेर्गान्धारीपुत्रसंयुतः ॥ १ ॥
प्रियकृन्मतमाज्ञाय पूर्वं दुर्योधनस्य तत् ।
प्रज्ञाचक्षुषमासीनं शकुनिः सौबलस्तदा ॥ २ ॥
दुर्योधनवचः श्रुत्वा धृतराष्ट्रं जनाधिपम् ।
उपगम्य महाप्राज्ञं शकुनिर्वाक्यमब्रवीत् ॥ ३ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! गान्धारीपुत्र दुर्योधनके सहित सुबलनन्दन शकुनि राजा युधिष्ठिरके राजसूय महायज्ञका उत्सव देखकर जब लौटा, तब पहले दुर्योधनके अपने अनुकूल मतको जानकर और उसकी पूरी बातें सुनकर सिंहासनपर बैठे हुए प्रज्ञाचक्षु महाप्राज्ञ राजा धृतराष्ट्रके पास जाकर इस प्रकार बोला ॥ १—३ ॥
शकुनिरुवाच
दुर्योधनो महाराज विवर्णो हरिणः कृशः ।
दीनश्चिन्तापरश्चैव तं विद्धि मनुजाधिप ॥ ४ ॥
शकुनिने कहा—महाराज! दुर्योधनकी कान्ति फीकी पड़ती जा रही है! वह सफेद और दुर्बल हो गया है। उसकी बड़ी दयनीय दशा है। वह निरन्तर चिन्तामें डूबा रहता है। नरेश्वर! उसके मनोभावको समझिये ॥ ४ ॥
न वै परीक्षसे सम्यगसह्यं शत्रुसम्भवम् ।
ज्येष्ठपुत्रस्य हृच्छोकं किमर्थं नावबुध्यसे ॥ ५ ॥
उसे शत्रुओंकी ओरसे कोई असह्य कष्ट प्राप्त हुआ है। आप उसकी अच्छी तरह परीक्षा क्यों नहीं करते? दुर्योधन आपका ज्येष्ठ पुत्र है। उसके हृदयमें महान् शोक व्याप्त है। आप उसका पता क्यों नहीं लगाते? ॥ ५ ॥
धृतराष्ट्र उवाच
दुर्योधन कुतोमूलं भृशमार्तोऽसि पुत्रक ।
श्रोतव्यश्चेन्मया सोऽर्थो ब्रूहि मे कुरुनन्दन ॥ ६ ॥
धृतराष्ट्र दुर्योधनके पास जाकर बोले—बेटा दुर्योधन! तुम्हारे दुःखका कारण क्या है? सुना है, तुम बड़े कष्टमें हो। कुरुनन्दन! यदि मेरे सुननेयोग्य हो तो वह बात मुझे बताओ॥ ६॥
अयं त्वां शकुनिः प्राह विवर्णं हरिणं कृशम्।
चिन्तयंश्च न पश्यामि शोकस्य तव सम्भवम्॥ ७॥
यह शकुनि कहता है कि तुम्हारी कान्ति फीकी पड़ गयी है। तुम सफेद और दुबले हो गये हो; परंतु मैं बहुत सोचनेपर भी तुम्हारे शोकका कोई कारण नहीं देखता॥
ऐश्वर्यं हि महत् पुत्र त्वयि सर्वं प्रतिष्ठितम्।
भ्रातरः सुहृदश्चैव नाचरन्ति तवाप्रियम्॥ ८॥
बेटा! इस सम्पूर्ण महान् ऐश्वर्यका भार तुम्हारे ही ऊपर है। तुम्हारे भाई और सुहृद् कभी तुम्हारे प्रतिकूल आचरण नहीं करते॥ ८॥
आच्छादयसि प्रावारानश्नासि विशदौदनम्।
आजानेया वहन्त्यश्वाः केनासि हरिणः कृशः॥ ९॥
तुम बहुमूल्य वस्त्र ओढ़ते-पहनते हो, बढ़िया विशुद्ध भात खाते हो तथा अच्छी जातिके घोड़े तुम्हारी सवारीमें रहते हैं; फिर किस दुःखसे तुम सफेद और दुबले हो गये हो?॥ ९॥
शयनानि महार्हाणि योषितश्च मनोरमाः।
गुणवन्ति च वेश्मानि विहाराश्च यथासुखम्॥ १०॥
देवानाभिव ते सर्वं वाचि बद्धं न संशयः।
स दीन इव दुर्धर्ष कस्माच्छोचसि पुत्रक॥ ११॥
बहुमूल्य शय्याएँ, मनको प्रिय लगनेवाली युवतियाँ, सभी ऋतुओंमें लाभदायक भवन और इच्छानुसार सुख देनेवाले विहारस्थान—देवताओंकी भाँति ये सभी वस्तुएँ निःसंदेह तुम्हें वाणीद्वारा कहनेमात्रसे सुलभ हैं। मेरे दुर्धर्ष पुत्र! फिर तुम दीनकी भाँति क्यों शोक करते हो?॥ १०-११॥
(उपस्थितः सर्वकामैस्त्रिदिवे वासवो यथा।
विविधैरन्नपानैश्च प्रवरैः किं नु शोचसि॥
जैसे स्वर्गमें इन्द्रको सम्पूर्ण मनोवांछित भोग सुलभ हैं, उसी प्रकार समस्त अभिलषित भोग और खाने-पीनेकी विविध उत्तम वस्तुएँ तुम्हारे लिये सदा प्रस्तुत हैं। फिर तुम किसलिये शोक करते हो?
निरुक्तं निगमं छन्दः सषडङ्गार्थशास्त्रवान्।
अधीतः कृतविद्यस्त्वमष्टव्याकरणैः कृपात्॥
तुमने कृपाचार्यसे निरुक्त, निगम, छन्द, वेदके छहों अंग, अर्थशास्त्र तथा आठ प्रकारके व्याकरणशास्त्रोंका अध्ययन किया है।
हलायुधात् कृपाद् द्रोणादस्त्रविद्यामधीतवान् ।
प्रभुस्त्वं भुञ्जसे पुत्र संस्तुतः सूतमागधैः ।।
तस्य ते विदितप्रज्ञ शोकमूलमिदं कथम् ।
लोकेऽस्मिञ्ज्येष्ठभागी त्वं तन्ममाचक्ष्व पुत्रक ।।
हलायुध, कृपाचार्य तथा द्रोणाचार्यसे तुमने अस्त्रविद्या सीखी है। बेटा! तुम इस राज्यके स्वामी होकर इच्छानुसार सब वस्तुओंका उपभोग करते हो। सूत और मागध सदा तुम्हारी स्तुति करते रहते हैं। तुम्हारी बुद्धिकी प्रखरता प्रसिद्ध है। तुम इस जगत्में ज्येष्ठ पुत्रके लिये सुलभ समस्त राजोचित सुखोंके भागी हो। फिर भी तुम्हें कैसे चिन्ता हो रही है? बेटा! तुम्हारे इस शोकका कारण क्या है? यह मुझे बताओ।
वैशम्पायन उवाच
तस्य तद् वचनं श्रुत्वा मन्दः क्रोधवशानुगः ।
पितरं प्रत्युवाचेदं स्वमतिं सम्प्रकाशयन् ॥)
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**पिताका यह कथन सुनकर क्रोधके वशीभूत हुए मूढ़ दुर्योधनने उन्हें अपना विचार बताते हुए इस प्रकार उत्तर दिया।
दुर्योधन उवाच
अश्नाम्याच्छादये चाहं यथा कुपुरुषस्तथा ।
अमर्षं धारये चोग्रं निनीषुः कालपर्ययम् ।। १२ ।।
**दुर्योधन बोला—**पिताजी! मैं अच्छा खाता-पहनता तो हूँ, परंतु कायरोंकी भाँति। मैं समयके परिवर्तनकी प्रतीक्षामें रहकर अपने हृदयमें भारी ईर्ष्या धारण करता हूँ ।। १२ ।।
अमर्षणः स्वाः प्रकृतीरभिभूय परं स्थितः ।
क्लेशान् मुमुक्षुः परजान् स वै पुरुष उच्यते ।। १३ ।।
जो शत्रुओंके प्रति अमर्ष रख उन्हें पराजित करके विश्राम लेता है और अपनी प्रजाको शत्रुजनित क्लेशसे छुड़ानेकी इच्छा करता है, वही पुरुष कहलाता है ।। १३ ।।
संतोषो वै श्रियं हन्ति ह्याभिमानं च भारत ।
अनुक्रोशभये चोभे यैर्वृतो नाश्नुते महत् ।। १४ ।।
भारत! संतोष लक्ष्मी और अभिमानका नाश कर देता है। दया और भय—ये दोनों भी वैसे ही हैं। इन (संतोषादि)-से युक्त मनुष्य कभी ऊँचा पद नहीं पा सकता ।।
न मां प्रीणाति मद्भुक्तं श्रियं दृष्ट्वा युधिष्ठिरे ।
अति ज्वलन्तीं कौन्तेये विवर्णकरणीं मम ।। १५ ।।
कुन्तीनन्दन युधिष्ठिरकी वह अत्यन्त प्रकाशमान राजलक्ष्मी देखकर मुझे भोजन अच्छा नहीं लगता। वही मेरी कान्तिको नष्ट करनेवाली है ।। १५ ।।
सपत्नानृध्यतोऽऽत्मानं हीयमानं निशम्य च।
अदृश्यामपि कौन्तेयश्रियं पश्यन्निवोद्यताम् ।। १६ ।। तस्मादहं विवर्णश्च दीनश्च हरिणः कृशः। शत्रुओंको बढ़ते और अपनेको हीन दशामें जाते देख तथा युधिष्ठिरकी उस अदृश्य लक्ष्मीपर भी प्रत्यक्षकी भाँति दृष्टिपात करके मैं चिन्तित हो उठा हूँ। यही कारण है कि मेरी कान्ति फीकी पड़ गयी है तथा मैं दीन, दुर्बल और सफेद हो गया हूँ ।। १६१/२ ।।
अष्टाशीतिसहस्राणि स्नातका गृहमेधिनः ।। १७ ।। त्रिंशद्दासीक एकैको यान् बिभर्ति युधिष्ठिरः। राजा युधिष्ठिर अपने घरमें बसनेवाले अट्ठासी हजार स्नातकोंका भरण-पोषण करते हैं। उनमेंसे प्रत्येककी सेवाके लिये तीस-तीस दासियाँ प्रस्तुत रहती हैं ।। १७१/२ ।।
दशान्यानि सहस्राणि नित्यं तत्रान्नमुत्तमम्। भुञ्जते रुक्मपात्रीभिर्युधिष्ठिरनिवेशने ।। १८ ।। इसके सिवा युधिष्ठिरके महलमें दस हजार अन्य ब्राह्मण प्रतिदिन सोनेकी थालियोंमें भोजन करते हैं ।। १८ ।।
कदलीमृगमोकानि कृष्णश्यामारुणानि च। काम्बोजः प्राहिणोत् तस्मै पराघ्या॑नपि कम्बलान्। काम्बोजराजाने काले, नीले और लाल रंगके कदलीमृगके चर्म तथा अनेक बहुमूल्य कम्बल युधिष्ठिरके लिये भेंटमें भेजे थे ।। १८१/२ ।।
गजयोषिद्गवाश्वस्य शतशोऽथ सहस्रशः ।। १९ ।। त्रिशतं चोष्ट्रवामीनां शतानि विचरन्त्युत। राजन्या बलिमादाय समेता हि नृपक्षये ।। २० ।। उन्हींकी भेजी हुई सैकड़ों हथिनियाँ, सहस्रों गायें और घोड़े तथा तीस-तीस हजार ऊँट और घोड़ियाँ वहाँ विचरती थीं। सभी राजालोग भेंट लेकर युधिष्ठिरके भवनमें एकत्र हुए थे ।। १९-२० ।।
पृथग्विधानि रत्नानि पार्थिवाः पृथिवीपते। आहरन् क्रतुमुख्येऽस्मिन् कुन्तीपुत्राय भूरिशः ।। २१ ।। पृथ्वीपते! उस महान् यज्ञमें भूपालगण कुन्तीपुत्र युधिष्ठिरके लिये भाँति-भाँतिके बहुत-से रत्न लाये थे ।। २१ ।।
न क्वचिद्धि मया तादृग् दृष्टपूर्वो न च श्रुतः। यादृग् धनागमो यज्ञे पाण्डुपुत्रस्य धीमतः ।। २२ ।। बुद्धिमान् पाण्डुकुमार युधिष्ठिरके यज्ञमें धनकी जैसी प्राप्ति हुई है, वैसी मैंने पहले कहीं न तो देखी है और न सुनी ही है ।। २२ ।।
अपर्यन्तं धनौघं तं दृष्ट्वा शत्रोरहं नृप। शमं नैवाभिगच्छामि चिन्तयानो विशाम्पते ।। २३ ।।
महाराज! शत्रु की वह अनन्त धनराशि देखकर मैं चिन्तित हो रहा हूँ; मुझे चैन नहीं मिलता ॥ २३ ॥
ब्राह्मणा वाटधानाश्च गोमन्तः शतसङ्घशः ।
त्रिखर्वं बलिमादाय द्वारि तिष्ठन्ति वारिताः ॥ २४ ॥
ब्राह्मणलोग तथा हरी-भरी खेती उपजाकर जीवन-निर्वाह करनेवाले और बहुत-से गाय-बैल रखनेवाले वैश्य सैकड़ों दलोंमें इकट्ठे होकर तीन खर्व भेंट लेकर राजाके द्वारपर रोके हुए खड़े थे ॥ २४ ॥
कमण्डलूनुपादाय जातरूपमयाञ्छुभान् ।
एतद् धनं समादाय प्रवेशं लेभिरे न च ॥ २५ ॥
वे सब लोग सोनेके सुन्दर कलश और इतना धन लेकर आये थे, तो भी वे सभी राजद्वारमें प्रवेश नहीं कर पाते थे अर्थात् उनमेंसे कोई-कोई ही प्रवेश कर पाते थे ॥
यथैव मधु शक्राय धारयन्त्यमरस्त्रियः ।
तदस्मै कांस्यमाहार्षीद् वारुणं कलशोदधिः ॥ २६ ॥
देवांगनाएँ इन्द्रके लिये कलशोंमें जैसा मधु लिये रहती हैं, वैसा ही वरुणदेवताका दिया हुआ और काँसके पात्रमें रखा हुआ मधु समुद्रने युधिष्ठिरके लिये उपहारमें भेजा था ॥ २६ ॥
शैक्यं रुक्मसहस्रस्य बहुरत्नविभूषितम् ।
शङ्खप्रवरमादाय वासुदेवोऽभिषिक्तवान् ॥ २७ ॥
वहाँ छींकेपर रखकर लाया हुआ एक हजार स्वर्ण-मुद्राओंका बना हुआ कलश रखा था, जिसमें अनेक प्रकारके रत्न जड़े हुए थे। उस पात्रमें स्थित समुद्रजलको उत्तम शंखमें लेकर श्रीकृष्णने युधिष्ठिरका अभिषेक किया था ॥ २७ ॥
दृष्ट्वा च मम तत् सर्वं ज्वररूपमिवाभवत् ।
गृहीत्वा तत् तु गच्छन्ति समुद्रौ पूर्वदक्षिणौ ॥ २८ ॥
तथैव पश्चिमं यान्ति गृहीत्वा भरतर्षभ ।
उत्तरं तु न गच्छन्ति विना तात पतत्रिणः ॥ २९ ॥
तत्र गत्वार्जुनो दण्डमाजहारामितं धनम् ।
तात! वह सब देखकर मुझे ज्वर-सा आ गया। भरतश्रेष्ठ! वैसे ही सुवर्णकलशोंको लेकर पाण्डवलोग जल लानेके लिये पूर्व, दक्षिण, पश्चिम समुद्रतक तो जाया करते थे, किंतु सुना जाता है कि उत्तर समुद्रके समीप, जहाँ पक्षियोंके सिवा मनुष्य नहीं जा सकते, वहाँ भी जाकर अर्जुन अपार धन करके रूपमें वसूल कर लाये ॥
इदं चाद्भुतमासीत् तन्मे निगदतः शृणु ॥ ३० ॥
युधिष्ठिरके राजसूययज्ञमें एक यह अद्भुत बात और भी हुई थी, वह मैं बताता हूँ; सुनिये ॥ ३० ॥
पूर्णे शतसहस्रे तु विप्राणां परिविष्यताम् । स्थापिता तत्र संज्ञाभूच्छङ्खो ध्मायति नित्यशः ॥ ३१ ॥ जब एक लाख ब्राह्मणोंको रसोई परोस दी जाती, तब उसके लिये एक संकेत नियत किया गया था; प्रतिदिन लाखकी संख्या पूरी होते ही बड़े जोरसे शंख बजाया जाता था ॥ ३१ ॥
मुहुर्मुहुः प्रणदतस्तस्य शङ्खस्य भारत । अनिशं शब्दमश्रौषं ततो रोमाणि मेऽहृषन् ॥ ३२ ॥ भारत! ऐसा शंख वहाँ बार-बार बजता था और मैं निरन्तर उस शंख-ध्वनिको सुना करता था; इससे मेरे शरीरमें रोमांच हो आता था ॥ ३२ ॥
पार्थिवैर्बहुभिः कीर्णमुपस्थानं दिदृक्षुभिः । अशोभत महाराज नक्षत्रैर्दौरिवामला ॥ ३३ ॥ महाराज! वहाँ यज्ञ देखनेके लिये आये हुए बहुत-से राजाओंद्धारा भरी हुई यज्ञमण्डपकी बैठक ताराओंसे व्याप्त हुए निर्मल आकाशकी भाँति शोभा पाती थी ॥ ३३ ॥
सर्वरत्नान्युपादाय पार्थिवा वै जनेश्वर । यज्ञे तस्य महाराज पाण्डुपुत्रस्य धीमतः ॥ ३४ ॥ जनेश्वर! बुद्धिमान् पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरके उस यज्ञमें भूपालगण सब रत्नोंकी भेंट लेकर आये थे ॥ ३४ ॥
वैश्या इव महीपाला द्विजातिपरिवेषकाः । न सा श्रीर्देवराजस्य यमस्य वरुणस्य च । गुह्यकाधिपतेर्वापि या श्री राजन् युधिष्ठिरे ॥ ३५ ॥ राजालोग वैश्योंकी भाँति ब्राह्मणोंको भोजन परोसते थे। राजा युधिष्ठिरके पास जो लक्ष्मी है, वह देवराज इन्द्र, यम, वरुण अथवा यक्षराज कुबेरके पास भी नहीं होगी ॥ ३५ ॥
तां दृष्ट्वा पाण्डुपुत्रस्य श्रियं परमिकामहम् । शान्तिं न परिगच्छामि दह्यमानेन चेतसा ॥ ३६ ॥ पाण्डुपुत्र युधिष्ठिरकी उस उत्कृष्ट लक्ष्मीको देखकर मेरे हृदयमें जलन पैदा हो गयी है; अतः मुझे क्षणभर भी शान्ति नहीं मिलती ॥ ३६ ॥
(अप्राप्य पाण्डवैश्वर्यं शमो मम न विद्यते । अवाप्स्ये वा रणं बाणैः शयिष्ये वा हतः परैः ॥ एतादृशस्य मे किं नु जीवितेन परंतप । वर्धन्ते पाण्डवा राजन् वयं हि स्थितवृद्धयः ॥)
पाण्डवोंका ऐश्वर्य यदि मुझे नहीं प्राप्त हुआ तो मेरे मनको शान्ति नहीं मिलेगी। या तो मैं बाणोंद्वारा रण-भूमिमें उपस्थित होकर शत्रुओंकी सम्पत्तिपर अधिकार प्राप्त करूँगा या शत्रुओंद्वारा मारा जाकर संग्राममें सदाके लिये सो जाऊँगा। परंतप! ऐसी स्थितिमें मेरे इस जीवनसे क्या लाभ? पाण्डव दिनों-दिन बढ़ रहे हैं और हमारी उन्नति रुक गयी है।
शकुनिरुवाच
यामेतामतुलां लक्ष्मीं दृष्टवानसि पाण्डवे ।
तस्याः प्राप्तावुपायं मे शृणु सत्यपराक्रम ॥ ३७ ॥
**शकुनिने दुर्योधनसे पुनः कहा—**सत्यपराक्रमी दुर्योधन! तुमने पाण्डुपुत्र युधिष्ठिरके यहाँ जो अनुपम लक्ष्मी देखी है, उसकी प्राप्तिका उपाय मुझसे सुनो ॥ ३७ ॥
अहमक्षेष्वभिज्ञातः पृथिव्यामपि भारत ।
हृदयज्ञः पणज्ञश्च विशेषज्ञश्च देवने ॥ ३८ ॥
भारत! मैं इस भूमण्डलमें द्यूतविद्याका विशेष जानकार हूँ, द्यूतक्रीड़ाका मर्म जानता हूँ; दाव लगानेका भी मुझे ज्ञान है तथा पासे फेंकनेकी कलाका भी मैं विशेषज्ञ हूँ ॥
द्यूतप्रियश्च कौन्तेयो न च जानाति देवितुम् ।
कुन्तीनन्दन युधिष्ठिरको जुआ खेलना बहुत प्रिय है, परंतु वे उसे खेलना जानते नहीं हैं ॥ ३८ १/२ ॥
आहूतश्चैष्यति व्यक्तं द्यूतादपि रणादपि ॥ ३९ ॥
द्यूत अथवा युद्ध किसी भी उद्देश्यसे यदि उन्हें बुलाया जाय, तो वे अवश्य पधारेंगे ॥ ३९ ॥
नियतं तं विजेष्यामि कृत्वा तु कपटं विभो ।
आनयामि समृद्धिं तां दिव्यां चोपाह्वयस्व तम् ॥ ४० ॥
प्रभो! मैं छल करके युधिष्ठिरको निश्चय ही जीत लूँगा और उनकी उस दिव्य समृद्धिको यहाँ मँगा लूँगा; अतः तुम उन्हें बुलाओ ॥ ४० ॥
वैशम्पायन उवाच
एवमुक्तः शकुनिना राजा दुर्योधनस्ततः ।
धृतराष्ट्रमिदं वाक्यमपदान्तरमब्रवीत् ॥ ४१ ॥
अयमुत्सहते राजञ्छ्रियमाहर्तुमक्षवित् ।
द्यूतेन पाण्डुपुत्रस्य तदनुज्ञातुमर्हसि ॥ ४२ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! शकुनिके ऐसा कहनेपर राजा दुर्योधनने तुरंत ही धृतराष्ट्रसे इस प्रकार कहा—'राजन्! ये अक्षविद्याका मर्म जाननेवाले हैं और जूएके द्वारा पाण्डुपुत्र युधिष्ठिरकी राजलक्ष्मीका अपहरण कर लेनेका उत्साह रखते हैं; अतः इसके लिये इन्हें आज्ञा दीजिये' ॥ ४१-४२ ॥
धृतराष्ट्र उवाच
क्षत्ता मन्त्री महाप्राज्ञः स्थितो यस्यास्मि शासने ।
तेन संगम्य वेत्स्यामि कार्यस्यास्य विनिश्चयम् ॥ ४३ ॥
धृतराष्ट्र बोले—महाबुद्धिमान् विदुर मेरे मन्त्री हैं, जिनके आदेशके अनुसार मैं चलता हूँ। उनसे मिलकर विचार करनेके पश्चात् मैं यह समझ सकूँगा कि इस कार्यके सम्बन्धमें क्या निश्चय किया जाय? ॥ ४३ ॥
स हि धर्मं पुरस्कृत्य दीर्घदर्शी परं हितम् ।
उभयोः पक्षयोर्युक्तं वक्ष्यत्यर्थविनिश्चयम् ॥ ४४ ॥
विदुर दूरदर्शी हैं, वे धर्मको सामने रखकर दोनों पक्षोंके लिये उचित और परम हितकी बात सोचकर उसके अनुकूल ही कार्यका निश्चय बतायेंगे ॥ ४४ ॥
दुर्योधन उवाच
निवर्तयिष्यति त्वासौ यदि क्षत्ता समेष्यति ।
निवृत्ते त्वयि राजेन्द्र मरिष्येऽहमसंशयम् ॥ ४५ ॥
दुर्योधनने कहा—विदुरजी जब आपसे मिलेंगे, तब अवश्य ही आपको इस कार्यसे निवृत्त कर देंगे। राजेन्द्र! यदि आपने इस कार्यसे मुँह मोड़ लिया तो मैं निःसंदेह प्राण त्याग दूँगा ॥ ४५ ॥
स त्वं मयि मृते राजन् विदुरेण सुखी भव ।
भोक्ष्यसे पृथिवीं कृत्स्नां किं मया त्वं करिष्यसि ॥ ४६ ॥
राजन्! मेरी मृत्यु हो जानेपर आप विदुरके साथ सुखसे रहियेगा और सारी पृथ्वीका राज्य भोगियेगा। मेरे जीवित रहनेसे आप क्या प्रयोजन सिद्ध करेंगे? ॥ ४६ ॥
वैशम्पायन उवाच
आर्तवाक्यं तु तत् तस्य प्रणयोक्तं निशम्य सः ।
धृतराष्ट्रोऽब्रवीत् प्रेष्यान् दुर्योधनमते स्थितः ॥ ४७ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! अपने पुत्रका यह प्रेमपूर्ण आर्त वचन सुनकर राजा धृतराष्ट्र दुर्योधनके मतमें आ गये और सेवकोंसे इस प्रकार बोले— ॥ ४७ ॥
स्थूणासहस्रैर्बृहतीं शतद्वारां सभां मम ।
मनोरमां दर्शनीयामाशु कुर्वन्तु शिल्पिनः ॥ ४८ ॥
‘बहुत-से शिल्पी लगकर एक परम सुन्दर दर्शनीय एवं विशाल सभाभवनका शीघ्र निर्माण करें। उसमें सौ दरवाजे हों और एक हजार खंभे लगे हुए हों ॥ ४८ ॥
ततः संस्तीर्य रत्नैस्तां तक्षण आनाय्य सर्वशः ।
सुकृतां सुप्रवेशां च निवेदयत मे शनैः ॥ ४९ ॥
'फिर सब देशोंसे बढ़ई बुलाकर उस सभाभवनके खंभों और दीवारोंमें रत्न जड़वा दिये जायँ। इस प्रकार वह सुन्दर एवं सुसज्जित सभाभवन जब सुखपूर्वक प्रवेशके योग्य हो जाय, तब धीरे-से मेरे पास आकर इसकी सूचना दो' ॥ ४९ ॥ दुर्योधनस्य शान्त्यर्थमिति निश्चित्य भूमिपः । धृतराष्ट्रो महाराज प्राहिणोद् विदुराय वै ॥ ५० ॥ महाराज! दुर्योधनकी शान्तिके लिये ऐसा निश्चय करके राजा धृतराष्ट्रने विदुरके पास दूत भेजा ॥ ५० ॥ अपृष्ट्वा विदुरं स्वस्य नासीत् कश्चिद् विनिश्चयः । द्यूते दोषांश्च जानन् स पुत्रस्नेहादकृष्यत ॥ ५१ ॥ विदुरसे पूछे बिना उनका कोई भी निश्चय नहीं होता था। जूएके दोषोंको जानते हुए भी वे पुत्रस्नेहसे उसकी ओर आकृष्ट हो गये थे ॥ ५१ ॥ तच्छ्रुत्वा विदुरो धीमान् कलिद्वारमुपस्थितम् । विनाशमुखमुत्पन्नं धृतराष्ट्रमुपाद्रवत् ॥ ५२ ॥ बुद्धिमान् विदुर कलहके द्वाररूप जूएका अवसर उपस्थित हुआ सुनकर और विनाशका मुख प्रकट हुआ जान धृतराष्ट्रके पास दौड़े आये ॥ ५२ ॥ सोऽभिगम्य महात्मानं भ्राता भ्रातरमग्रजम् । मूर्ध्ना प्रणम्य चरणाविदं वचनमब्रवीत् ॥ ५३ ॥ विदुरने अपने श्रेष्ठ भ्राता महामना धृतराष्ट्रके पास जाकर उनके चरणोंमें मस्तक रखकर प्रणाम किया और इस प्रकार कहा ॥ ५३ ॥
विदुर उवाच
नाभिनन्दामि ते राजन् व्यवसायमिमं प्रभो । पुत्रैर्भेदो यथा न स्याद् द्यूतहेतोस्तथा कुरु ॥ ५४ ॥ **विदुर बोले—**राजन्! मैं आपके इस निश्चयको पसंद नहीं करता। प्रभो! आप ऐसा प्रयत्न कीजिये, जिससे जूएके लिये आपके और पाण्डुके पुत्रोंमें भेदभाव न हो ॥ ५४ ॥
धृतराष्ट्र उवाच
क्षत्तः पुत्रेषु पुत्रैर्मे कलहो न भविष्यति । यदि देवाः प्रसादं नः करिष्यन्ति न संशयः ॥ ५५ ॥ **धृतराष्ट्रने कहा—**विदुर! यदि हमलोगोंपर देवताओंकी कृपा होगी तो मेरे पुत्रोंका पाण्डुपुत्रोंके साथ निःसंदेह कलह न होगा ॥ ५५ ॥ अशुभं वा शुभं वापि हितं वा यदि वाहितम् । प्रवर्त्ततां सुहृद्द्यूतं दिष्टमेतन्न संशयः ॥ ५६ ॥
अशुभ हो या शुभ, हितकर हो या अहितकर, सुहृदोंमें यह द्यूतक्रीड़ा प्रारम्भ होनी ही चाहिये। निःसंदेह यह भाग्यसे ही प्राप्त हुई है ॥ ५६ ॥
मयि संनिहिते द्रोणे भीष्मे त्वयि च भारत ।
अनयो दैवविहितो न कथंचिद् भविष्यति ॥ ५७ ॥
भारत! जब मैं, द्रोणाचार्य, भीष्मजी तथा तुम—ये सब लोग संनिकट रहेंगे, तब किसी प्रकार दैवविहित अन्याय नहीं होने पायेगा ॥ ५७ ॥
गच्छ त्वं रथमास्थाय हयैर्वातसमैर्जवे ।
खाण्डवप्रस्थमद्यैव समानय युधिष्ठिरम् ॥ ५८ ॥
तुम वायुके समान वेगशाली घोड़ोंद्वारा जुते हुए रथपर बैठकर अभी खाण्डवप्रस्थको जाओ और युधिष्ठिरको बुला ले आओ ॥ ५८ ॥
न वाच्यो व्यवसायो मे विदुरैतद् ब्रवीमि ते ।
दैवमेव परं मन्ये येनैतदुपपद्यते ॥ ५९ ॥
विदुर! मेरा निश्चय तुम युधिष्ठिरसे न बताना; यह बात मैं तुमसे कहे देता हूँ। मैं दैवको भी प्रबल मानता हूँ, जिसकी प्रेरणासे यह द्यूतक्रीड़ाका आरम्भ होने जा रहा है ॥
इत्युक्तो विदुरो धीमान् नेदमस्तीति चिन्तयन् ।
गाङ्गेयं महाप्राज्ञमभ्यगच्छत् सुदुःखितः ॥ ६० ॥
धृतराष्ट्रके ऐसा कहनेपर बुद्धिमान् विदुरजी यह सोचते हुए कि यह द्यूतक्रीड़ा अच्छी नहीं है, अत्यन्त दुःखी हो महाज्ञानी गंगानन्दन भीष्मजीके पास गये ॥ ६९ ॥
इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि द्यूतपर्वणि दुर्योधनसंतापे एकोनपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ४९ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत सभापर्वके अन्तर्गत द्यूतपर्वमें दुर्योधनसंतापविषयक उनचासवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४९ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ७ श्लोक मिलाकर कुल ६७ श्लोक हैं)
अध्याय (पृष्ठ 2048)
पञ्चाशत्तमोऽध्यायः
दुर्योधनका धृतराष्ट्रको अपने दुःख और चिन्ताका कारण बताना
जनमेजय उवाच
कथं समभवद् द्यूतं भ्रातॄणां तन्महात्ययम् ।
यत्र तद् व्यसनं प्राप्तं पाण्डवैर्मे पितामहैः ॥ १ ॥
जनमेजयेने पूछा— मुने! भाइयोंमें वह महाविनाशकारी द्यूत किस प्रकार आरम्भ हुआ; जिसमें मेरे पितामह पाण्डवोंको उस महान् संकटका सामना करना पड़ा? ॥ १ ॥
के च तत्र सभास्तारा राजानो ब्रह्मवित्तम ।
के चैनमन्वमोदन्त के चैनं प्रत्यषेधयन् ॥ २ ॥
ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ महर्षे! वहाँ कौन-कौन-से राजा सभासद् थे? किसने द्यूतक्रीड़ाका अनुमोदन किया और किसने निषेध? ॥ २ ॥
विस्तरेणैतदिच्छामि कथ्यमानं त्वया द्विज ।
मूलं ह्येतद् विनाशस्य पृथिव्या द्विजसत्तम ॥ ३ ॥
ब्रह्मन्! मैं इस प्रसंगको आपके मुखसे विस्तारपूर्वक सुनना चाहता हूँ। विप्रवर! यह द्यूत ही समस्त भूमण्डलके विनाशका मुख्य कारण है ॥ ३ ॥
सौतिरुवाच
एवमुक्तस्ततो राज्ञा व्यासशिष्यः प्रतापवान् ।
आचचक्षेऽथ यद् वृत्तं तत् सर्वं वेदतत्त्ववित् ॥ ४ ॥
सौति कहते हैं— राजाके इस प्रकार पूछनेपर व्यासजीके प्रतापी शिष्य वेदतत्त्वज्ञ वैशम्पायनजी वह सब प्रसंग सुनाने लगे ॥ ४ ॥
वैशम्पायन उवाच
शृणु मे विस्तरेणेमां कथां भारतसत्तम ।
भूय एव महाराज यदि ते श्रवणे मतिः ॥ ५ ॥
वैशम्पायनजीने कहा— भरतवंशशिरोमणे! महाराज जनमेजय! यदि तुम्हारा मन यह सब सुननेमें लगता है तो पुनः विस्तारके साथ इस कथाको सुनो ॥ ५ ॥
विदुरस्य मतिं ज्ञात्वा धृतराष्ट्रोऽम्बिकासुतः ।
दुर्योधनमिदं वाक्यमुवाच विजने पुनः ॥ ६ ॥
विदुरका विचार जानकर अम्बिकानन्दन राजा धृतराष्ट्रने एकान्तमें दुर्योधनसे पुनः इस प्रकार कहा— ॥ ६ ॥
अलं द्यूतेन गान्धारे विदुरो न प्रशंसति । न ह्यसौ सुमहाबुद्धिरहितं नो वदिष्यति ॥ ७ ॥ ‘गान्धारीनन्दन! जूएका खेल नहीं होना चाहिये, विदुर इसे अच्छा नहीं बताते हैं। महाबुद्धिमान् विदुर हमें कोई ऐसी सलाह नहीं देंगे, जिससे हमलोगोंका अहित होनेवाला हो ॥ ७ ॥ हितं हि परमं मन्ये विदुरो यत् प्रभाषते । क्रियतां पुत्र तत् सर्वमेतन्मन्ये हितं तव ॥ ८ ॥ ‘विदुर जो कहते हैं, उसीको मैं अपना सर्वोत्तम हित मानता हूँ। बेटा! तुम भी वही सब करो। मेरी समझमें तुम्हारे लिये यही हितकर है ॥ ८ ॥ देवर्षिर्वासवगुरुर्देवराजाय धीमते । यत् प्राह शास्त्रं भगवान् बृहस्पतिरुदारधीः । तद् वेद विदुरः सर्वं सरहस्यं महाकविः ॥ ९ ॥ स्थितस्तु वचने तस्य सदाहमपि पुत्रक । विदुरो वापि मेधावी कुरूणां प्रवरो मतः ॥ १० ॥ उद्धवो वा महाबुद्धिर्वृष्णीनामर्चितो नृप । तदलं पुत्र द्यूतेन द्यूते भेदो हि दृश्यते ॥ ११ ॥ ‘उदार बुद्धिवाले इन्द्रगुरु देवर्षि भगवान् बृहस्पतिने परम बुद्धिमान् देवराज इन्द्रको जिस शास्त्रका उपदेश दिया था, वह सब उसके रहस्यसहित महाज्ञानी विदुर जानते हैं। बेटा! मैं भी सदा विदुरकी बात मानता हूँ। कुरुकुलमें सबसे श्रेष्ठ और मेधावी विदुर माने गये हैं तथा वृष्णिवंशमें पूजित उद्धवको परम बुद्धिमान् बताया गया है। अतः बेटा! जूआ खेलनेसे कोई लाभ नहीं है। जूएमें वैर-विरोधकी सम्भावना दिखायी देती है ॥ ९—११ ॥ भेदे विनाशो राज्यस्य तत् पुत्र परिवर्ज्य । पित्रा मात्रा च पुत्रस्य यद् वै कार्यं परं स्मृतम् ॥ १२ ॥ ‘वैर-विरोध होनेसे राज्यका नाश हो जाता है, अतः पुत्र! जूएका आग्रह छोड़ दो। पिता-माताको चाहिये कि वे पुत्रको उत्तम कर्तव्यकी शिक्षा दें; इसीलिये मैंने ऐसा कहा है ॥ १२ ॥ प्राप्तस्त्वमसि तन्नाम पितृपैतामहं पदम् । अधीतवान् कृती शास्त्रे लालितः सततं गृहे ॥ १३ ॥ ‘बेटा! तुम अपने बाप-दादोंके पदपर प्रतिष्ठित हो, तुमने वेदोंका स्वाध्याय किया है, शास्त्रोंकी विद्वत्ता प्राप्त की है और घरमें सदा तुम्हारा लालन-पालन हुआ है ॥ १३ ॥ भ्रातृज्येष्ठः स्थितो राज्ये विन्दसे किं न शोभनम् । पृथग्जनैरलभ्यं यद् भोजनाच्छादनं परम् ॥ १४ ॥ तत् प्राप्तोऽसि महाबाहो कस्माच्छोचसि पुत्रक ।
स्फीतं राष्ट्रं महाबाहो पितृपैतामहं महत् ॥ १५ ॥ 'महाबाहो! तुम अपने भाइयोंमें बड़े हो, अतः राजाके पदपर स्थित हो, तुम्हें किस कल्याणमय वस्तुकी प्राप्ति नहीं होती है? दूसरे लोगोंके लिये जो अलभ्य है, वह उत्तम भोजन और वस्त्र तुम्हें प्राप्त हैं। फिर तुम क्यों शोक करते हो? महाबाहो! तुम्हारे बाप-दादोंका यह महान् राष्ट्र धन-धान्यसे सम्पन्न है ॥ १४-१५ ॥ नित्यमाज्ञापयन् भासि दिवि देवेश्वरो यथा । तस्य ते विदितप्रज्ञ शोकमूलमिदं कथम् । समुत्थितं दुःखकरं यन्मे शंसितुमर्हसि ॥ १६ ॥ 'स्वर्गमें देवराज इन्द्रकी भाँति तुम इस लोकमें सदा सबपर शासन करते हुए शोभा पाते हो। तुम्हारी उत्तम बुद्धि प्रसिद्ध है। फिर तुम्हें शोककी कारणभूत यह दुःखदायिनी चिन्ता कैसे प्राप्त हुई है? यह मुझसे बताओ' ॥ १६ ॥
दुर्योधन उवाच अश्नाम्याच्छादयामीति प्रपश्यन् पापपूरुषः । नामर्षं कुरुते यस्तु पुरुषः सोऽधमः स्मृतः ॥ १७ ॥ दुर्योधन बोला—मैं अच्छा खाता हूँ और अच्छा पहिनता हूँ, इतना ही देखते हुए जो पापी पुरुष शत्रुओंके प्रति ईर्ष्या नहीं करता, वह अधम बताया गया है ॥ १७ ॥ न मां प्रीणाति राजेन्द्र लक्ष्मीः साधारणी विभो । ज्वलितामेव कौन्तेये श्रियं दृष्ट्वा च व्यथ्ये ॥ १८ ॥ राजेन्द्र! यह साधारण लक्ष्मी मुझे प्रसन्न नहीं कर पाती। मैं तो कुन्तीनन्दन युधिष्ठिरकी उस जगमगाती हुई लक्ष्मीको देखकर व्यथित हो रहा हूँ ॥ १८ ॥ सर्वां च पृथिवीं चैव युधिष्ठिरवशानुगाम् । स्थिरोऽस्मि योऽहं जीवामि दुःखादेतद् ब्रवीमि ते ॥ १९ ॥ सारी पृथ्वी युधिष्ठिरके अधीन हो गयी है; फिर भी मैं पाषाणतुल्य हूँ, जो कि ऐसा दुःख प्राप्त होनेपर भी जीवित हूँ और आपसे बातें करता हूँ ॥ १९ ॥ आवर्जिता इवाभान्ति नीपाश्चित्रककौकुराः । कारस्करा लोहजङ्घा युधिष्ठिरनिवेशने ॥ २० ॥ नीप, चित्रक, कुकुर, कारस्कर तथा लोहजंघ आदि क्षत्रियनरेश युधिष्ठिरके घरमें सेवकोंकी भाँति सेवा करते हुए शोभा पा रहे थे ॥ २० ॥ हिमवत्सागरानूपाः सर्वे रत्नाकरास्तथा । अन्त्याः सर्वे पर्युदस्ता युधिष्ठिरनिवेशने ॥ २१ ॥ हिमालय प्रदेश तथा समुद्री द्वीपोंके रहनेवाले और रत्नोंकी खानोंके सभी अधिपति म्लेच्छजातीय नरेश युधिष्ठिरके घरमें प्रवेश करने नहीं पाते थे, उन्हें महलसे दूर ही ठहराया
गया था ।। २१ ।।
ज्येष्ठोऽयमिति मां मत्वा श्रेष्ठश्चेति विशाम्पते ।
युधिष्ठिरेण सत्कृत्य युक्तो रत्नपरिग्रहे ।। २२ ।।
महाराज! मुझे अन्य सब भाइयोंसे ज्येष्ठ और श्रेष्ठ मानकर युधिष्ठिरने सत्कारपूर्वक रत्नोंकी भेंट लेनेके कामपर नियुक्त कर दिया था ।। २२ ।।
उपस्थितानां रत्नानां श्रेष्ठानामर्घहारिणाम् ।
नादृश्यत परः पारो नापरस्तत्र भारत ।। २३ ।।
भारत! वहाँ भेंट लाये हुए नरेशोंके द्वारा उपस्थित श्रेष्ठ और बहुमूल्य रत्नोंकी जो राशि एकत्र हुई थी, उसका आरपार दिखायी नहीं देता था ।। २३ ।।
न मे हस्तः समभवद् वसु तत् प्रतिगृह्णतः ।
अतिष्ठन्त मयि श्रान्ते गृह्य दूराहृतं वसु ।। २४ ।।
उस रत्नराशिको ग्रहण करते-करते जब मेरा हाथ थक गया, तब मेरे थक जानेपर राजालोग रत्नराशि लिये बहुत दूरतक खड़े दिखायी देने लगते थे ।। २४ ।।
कृतां विन्दुसरोरत्नैर्मयेन स्फाटिकच्छदाम् ।
अपश्यं नलिनीं पूर्णामुदकस्येव भारत ।। २५ ।।
वस्त्रमुत्कर्षति मयि प्राहसत् स वृकोदरः ।
शत्रोर्ऋद्धिविशेषेण विमूढं रत्नवर्जितम् ।। २६ ।।
भारत! बिन्दु-सरोवरसे लाये हुए रत्नोंद्वारा मयासुरने एक कृत्रिम पुष्करिणीका निर्माण किया था, जो स्फटिकमणिकी शिलाओंसे आच्छादित है। वह मुझे जलसे भरी हुई-सी दिखायी दी। भारत! जब मैं उसमें उतरनेके लिये वस्त्र उठाने लगा, तब भीमसेन ठहाकर हँस पड़े। शत्रु की विशिष्ट समृद्धिसे मैं मूढ़-सा हो रहा था और रत्नोंसे रहित तो था ही ।। २५-२६ ।।
तत्र स्म यदि शक्तः स्यां पातयेऽहं वृकोदरम् ।
यदि कुर्यां समारम्भं भीमं हन्तुं नराधिप ।। २७ ।।
शिशुपाल इवास्माकं गतिः स्यान्नात्र संशयः ।
सपत्नेनावहासो मे स मां दहति भारत ।। २८ ।।
उस समय वहाँ यदि मैं समर्थ होता तो भीमसेनको वहीं मार गिराता। राजन्! यदि मैं भीमसेनको मारनेका उद्योग करता तो मेरी भी शिशुपालकी-सी ही दशा हो जाती; इसमें संशय नहीं है। भारत! शत्रुके द्वारा किया हुआ उपहास मुझे दग्ध किये देता है ।। २७-२८ ।।
पुनश्च तादृशीमेव वापीं जलजशालिनीम् ।
मत्वा शिलासमां तोये पतितोऽस्मि नराधिप ।। २९ ।।
नरेश्वर! मैंने पुनः एक वैसी ही बावलीको देखकर, जो कमलोंसे सुशोभित हो रही थी, समझा कि यह भी पहली पुष्करिणीकी भाँति स्फटिकशिलासे पाटकर बराबर कर दी गयी
होगी; परंतु वह वास्तवमें जलसे परिपूर्ण थी, इसीलिये मैं भ्रमसे उसमें गिर पड़ा ॥ २९ ॥ तत्र मां प्राहसत् कृष्णः पार्थेन सह सुस्वरम् । द्रौपदी च सह स्त्रीभिर्व्यथयन्ती मनो मम ॥ ३० ॥ वहाँ श्रीकृष्ण अर्जुनके साथ मेरी ओर देखकर जोर-जोरसे हँसने लगे। स्त्रियोंसहित द्रौपदी भी मेरे हृदयमें चोट पहुँचाती हुई हँस रही थी ॥ ३० ॥ क्लिन्नवस्त्रस्य तु जले किंकरा राजनोदिताः । ददुर्वासांसि मेऽन्यानि तच्च दुःखं परं मम ॥ ३१ ॥ मेरे सब कपड़े जलमें भीग गये थे; अतः राजाकी आज्ञासे सेवकोंने मुझे दूसरे वस्त्र दिये। यह मेरे लिये बड़े दुःखकी बात हुई ॥ ३१ ॥ प्रलम्भं च शृणुष्वान्यद् वदतो मे नराधिप । अद्वारेण विनिर्गच्छन् द्वारसंस्थानरूपिणा । अभिहत्य शिलां भूयो ललाटेनास्मि विक्षतः ॥ ३२ ॥ महाराज! एक और वंचना मुझे सहनी पड़ी, जिसे बताता हूँ, सुनिये। एक जगह बिना द्वारके ही द्वारकी आकृति बनी हुई थी, मैं उसीसे निकलने लगा; अतः शिलासे टकरा गया। जिससे मेरे ललाटमें बड़े जोरकी चोट लगी ॥ ३२ ॥ तत्र मां यमजौ दूरादालोक्याभिहतं तदा । बाहुभिः परिगृह्लीतां शोचन्तौ सहितावुभौ ॥ ३३ ॥ उस समय नकुल और सहदेवने दूरसे मुझे टकराते देख निकट आकर अपने हाथोंसे मुझे पकड़ लिया और दोनों भाई साथ रहकर मेरे लिये शोक करने लगे ॥ ३३ ॥ उवाच सहदेवस्तु तत्र मां विस्मयन्निव । इदं द्वारमितो गच्छ राजन्निति पुनः पुनः ॥ ३४ ॥ वहाँ सहदेवने मुझे आश्चर्यमें डालते हुए बार-बार यह कहा—'राजन्! यह दरवाजा है, इधर चलिये' ॥ ३४ ॥ भीमसेनेन तत्रोक्तो धृतराष्ट्रात्मजेति च । सम्बोध्या प्रहसित्वा च इतो द्वारं नराधिप ॥ ३५ ॥ महाराज! वहाँ भीमसेनने मुझे 'धृतराष्ट्रपुत्र' कहकर सम्बोधित किया और हँसते हुए कहा—'राजन्! इधर दरवाजा है' ॥ ३५ ॥ नामधेयानि रत्नानां पुरस्तान्न श्रुतानि मे । यानि दृष्टानि मे तस्यां मनस्तपति तच्च मे ॥ ३६ ॥ मैंने उस सभामें जो-जो रत्न देखे हैं, उनके पहले कभी नाम नहीं सुने थे; अतः इन सब बातोंके लिये मेरे मनमें बड़ा संताप हो रहा है ॥ ३६ ॥
इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि द्यूतपर्वणि दुर्योधनसंतापे पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५० ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत सभापर्वके अन्तर्गत द्यूतपर्वमें दुर्योधनसंतापविषयक पचासवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५० ॥