भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

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पृष्ठ 2043

पूर्णे शतसहस्रे तु विप्राणां परिविष्यताम् । स्थापिता तत्र संज्ञाभूच्छङ्खो ध्मायति नित्यशः ॥ ३१ ॥ जब एक लाख ब्राह्मणोंको रसोई परोस दी जाती, तब उसके लिये एक संकेत नियत किया गया था; प्रतिदिन लाखकी संख्या पूरी होते ही बड़े जोरसे शंख बजाया जाता था ॥ ३१ ॥

मुहुर्मुहुः प्रणदतस्तस्य शङ्खस्य भारत । अनिशं शब्दमश्रौषं ततो रोमाणि मेऽहृषन् ॥ ३२ ॥ भारत! ऐसा शंख वहाँ बार-बार बजता था और मैं निरन्तर उस शंख-ध्वनिको सुना करता था; इससे मेरे शरीरमें रोमांच हो आता था ॥ ३२ ॥

पार्थिवैर्बहुभिः कीर्णमुपस्थानं दिदृक्षुभिः । अशोभत महाराज नक्षत्रैर्दौरिवामला ॥ ३३ ॥ महाराज! वहाँ यज्ञ देखनेके लिये आये हुए बहुत-से राजाओंद्धारा भरी हुई यज्ञमण्डपकी बैठक ताराओंसे व्याप्त हुए निर्मल आकाशकी भाँति शोभा पाती थी ॥ ३३ ॥

सर्वरत्नान्युपादाय पार्थिवा वै जनेश्वर । यज्ञे तस्य महाराज पाण्डुपुत्रस्य धीमतः ॥ ३४ ॥ जनेश्वर! बुद्धिमान् पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरके उस यज्ञमें भूपालगण सब रत्नोंकी भेंट लेकर आये थे ॥ ३४ ॥

वैश्या इव महीपाला द्विजातिपरिवेषकाः । न सा श्रीर्देवराजस्य यमस्य वरुणस्य च । गुह्यकाधिपतेर्वापि या श्री राजन् युधिष्ठिरे ॥ ३५ ॥ राजालोग वैश्योंकी भाँति ब्राह्मणोंको भोजन परोसते थे। राजा युधिष्ठिरके पास जो लक्ष्मी है, वह देवराज इन्द्र, यम, वरुण अथवा यक्षराज कुबेरके पास भी नहीं होगी ॥ ३५ ॥

तां दृष्ट्वा पाण्डुपुत्रस्य श्रियं परमिकामहम् । शान्तिं न परिगच्छामि दह्यमानेन चेतसा ॥ ३६ ॥ पाण्डुपुत्र युधिष्ठिरकी उस उत्कृष्ट लक्ष्मीको देखकर मेरे हृदयमें जलन पैदा हो गयी है; अतः मुझे क्षणभर भी शान्ति नहीं मिलती ॥ ३६ ॥

(अप्राप्य पाण्डवैश्वर्यं शमो मम न विद्यते । अवाप्स्ये वा रणं बाणैः शयिष्ये वा हतः परैः ॥ एतादृशस्य मे किं नु जीवितेन परंतप । वर्धन्ते पाण्डवा राजन् वयं हि स्थितवृद्धयः ॥)