महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहोगी; परंतु वह वास्तवमें जलसे परिपूर्ण थी, इसीलिये मैं भ्रमसे उसमें गिर पड़ा ॥ २९ ॥ तत्र मां प्राहसत् कृष्णः पार्थेन सह सुस्वरम् । द्रौपदी च सह स्त्रीभिर्व्यथयन्ती मनो मम ॥ ३० ॥ वहाँ श्रीकृष्ण अर्जुनके साथ मेरी ओर देखकर जोर-जोरसे हँसने लगे। स्त्रियोंसहित द्रौपदी भी मेरे हृदयमें चोट पहुँचाती हुई हँस रही थी ॥ ३० ॥ क्लिन्नवस्त्रस्य तु जले किंकरा राजनोदिताः । ददुर्वासांसि मेऽन्यानि तच्च दुःखं परं मम ॥ ३१ ॥ मेरे सब कपड़े जलमें भीग गये थे; अतः राजाकी आज्ञासे सेवकोंने मुझे दूसरे वस्त्र दिये। यह मेरे लिये बड़े दुःखकी बात हुई ॥ ३१ ॥ प्रलम्भं च शृणुष्वान्यद् वदतो मे नराधिप । अद्वारेण विनिर्गच्छन् द्वारसंस्थानरूपिणा । अभिहत्य शिलां भूयो ललाटेनास्मि विक्षतः ॥ ३२ ॥ महाराज! एक और वंचना मुझे सहनी पड़ी, जिसे बताता हूँ, सुनिये। एक जगह बिना द्वारके ही द्वारकी आकृति बनी हुई थी, मैं उसीसे निकलने लगा; अतः शिलासे टकरा गया। जिससे मेरे ललाटमें बड़े जोरकी चोट लगी ॥ ३२ ॥ तत्र मां यमजौ दूरादालोक्याभिहतं तदा । बाहुभिः परिगृह्लीतां शोचन्तौ सहितावुभौ ॥ ३३ ॥ उस समय नकुल और सहदेवने दूरसे मुझे टकराते देख निकट आकर अपने हाथोंसे मुझे पकड़ लिया और दोनों भाई साथ रहकर मेरे लिये शोक करने लगे ॥ ३३ ॥ उवाच सहदेवस्तु तत्र मां विस्मयन्निव । इदं द्वारमितो गच्छ राजन्निति पुनः पुनः ॥ ३४ ॥ वहाँ सहदेवने मुझे आश्चर्यमें डालते हुए बार-बार यह कहा—'राजन्! यह दरवाजा है, इधर चलिये' ॥ ३४ ॥ भीमसेनेन तत्रोक्तो धृतराष्ट्रात्मजेति च । सम्बोध्या प्रहसित्वा च इतो द्वारं नराधिप ॥ ३५ ॥ महाराज! वहाँ भीमसेनने मुझे 'धृतराष्ट्रपुत्र' कहकर सम्बोधित किया और हँसते हुए कहा—'राजन्! इधर दरवाजा है' ॥ ३५ ॥ नामधेयानि रत्नानां पुरस्तान्न श्रुतानि मे । यानि दृष्टानि मे तस्यां मनस्तपति तच्च मे ॥ ३६ ॥ मैंने उस सभामें जो-जो रत्न देखे हैं, उनके पहले कभी नाम नहीं सुने थे; अतः इन सब बातोंके लिये मेरे मनमें बड़ा संताप हो रहा है ॥ ३६ ॥