महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगया था ।। २१ ।।
ज्येष्ठोऽयमिति मां मत्वा श्रेष्ठश्चेति विशाम्पते ।
युधिष्ठिरेण सत्कृत्य युक्तो रत्नपरिग्रहे ।। २२ ।।
महाराज! मुझे अन्य सब भाइयोंसे ज्येष्ठ और श्रेष्ठ मानकर युधिष्ठिरने सत्कारपूर्वक रत्नोंकी भेंट लेनेके कामपर नियुक्त कर दिया था ।। २२ ।।
उपस्थितानां रत्नानां श्रेष्ठानामर्घहारिणाम् ।
नादृश्यत परः पारो नापरस्तत्र भारत ।। २३ ।।
भारत! वहाँ भेंट लाये हुए नरेशोंके द्वारा उपस्थित श्रेष्ठ और बहुमूल्य रत्नोंकी जो राशि एकत्र हुई थी, उसका आरपार दिखायी नहीं देता था ।। २३ ।।
न मे हस्तः समभवद् वसु तत् प्रतिगृह्णतः ।
अतिष्ठन्त मयि श्रान्ते गृह्य दूराहृतं वसु ।। २४ ।।
उस रत्नराशिको ग्रहण करते-करते जब मेरा हाथ थक गया, तब मेरे थक जानेपर राजालोग रत्नराशि लिये बहुत दूरतक खड़े दिखायी देने लगते थे ।। २४ ।।
कृतां विन्दुसरोरत्नैर्मयेन स्फाटिकच्छदाम् ।
अपश्यं नलिनीं पूर्णामुदकस्येव भारत ।। २५ ।।
वस्त्रमुत्कर्षति मयि प्राहसत् स वृकोदरः ।
शत्रोर्ऋद्धिविशेषेण विमूढं रत्नवर्जितम् ।। २६ ।।
भारत! बिन्दु-सरोवरसे लाये हुए रत्नोंद्वारा मयासुरने एक कृत्रिम पुष्करिणीका निर्माण किया था, जो स्फटिकमणिकी शिलाओंसे आच्छादित है। वह मुझे जलसे भरी हुई-सी दिखायी दी। भारत! जब मैं उसमें उतरनेके लिये वस्त्र उठाने लगा, तब भीमसेन ठहाकर हँस पड़े। शत्रु की विशिष्ट समृद्धिसे मैं मूढ़-सा हो रहा था और रत्नोंसे रहित तो था ही ।। २५-२६ ।।
तत्र स्म यदि शक्तः स्यां पातयेऽहं वृकोदरम् ।
यदि कुर्यां समारम्भं भीमं हन्तुं नराधिप ।। २७ ।।
शिशुपाल इवास्माकं गतिः स्यान्नात्र संशयः ।
सपत्नेनावहासो मे स मां दहति भारत ।। २८ ।।
उस समय वहाँ यदि मैं समर्थ होता तो भीमसेनको वहीं मार गिराता। राजन्! यदि मैं भीमसेनको मारनेका उद्योग करता तो मेरी भी शिशुपालकी-सी ही दशा हो जाती; इसमें संशय नहीं है। भारत! शत्रुके द्वारा किया हुआ उपहास मुझे दग्ध किये देता है ।। २७-२८ ।।
पुनश्च तादृशीमेव वापीं जलजशालिनीम् ।
मत्वा शिलासमां तोये पतितोऽस्मि नराधिप ।। २९ ।।
नरेश्वर! मैंने पुनः एक वैसी ही बावलीको देखकर, जो कमलोंसे सुशोभित हो रही थी, समझा कि यह भी पहली पुष्करिणीकी भाँति स्फटिकशिलासे पाटकर बराबर कर दी गयी