भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

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पृष्ठ 2050

स्फीतं राष्ट्रं महाबाहो पितृपैतामहं महत् ॥ १५ ॥ 'महाबाहो! तुम अपने भाइयोंमें बड़े हो, अतः राजाके पदपर स्थित हो, तुम्हें किस कल्याणमय वस्तुकी प्राप्ति नहीं होती है? दूसरे लोगोंके लिये जो अलभ्य है, वह उत्तम भोजन और वस्त्र तुम्हें प्राप्त हैं। फिर तुम क्यों शोक करते हो? महाबाहो! तुम्हारे बाप-दादोंका यह महान् राष्ट्र धन-धान्यसे सम्पन्न है ॥ १४-१५ ॥ नित्यमाज्ञापयन् भासि दिवि देवेश्वरो यथा । तस्य ते विदितप्रज्ञ शोकमूलमिदं कथम् । समुत्थितं दुःखकरं यन्मे शंसितुमर्हसि ॥ १६ ॥ 'स्वर्गमें देवराज इन्द्रकी भाँति तुम इस लोकमें सदा सबपर शासन करते हुए शोभा पाते हो। तुम्हारी उत्तम बुद्धि प्रसिद्ध है। फिर तुम्हें शोककी कारणभूत यह दुःखदायिनी चिन्ता कैसे प्राप्त हुई है? यह मुझसे बताओ' ॥ १६ ॥

दुर्योधन उवाच अश्नाम्याच्छादयामीति प्रपश्यन् पापपूरुषः । नामर्षं कुरुते यस्तु पुरुषः सोऽधमः स्मृतः ॥ १७ ॥ दुर्योधन बोला—मैं अच्छा खाता हूँ और अच्छा पहिनता हूँ, इतना ही देखते हुए जो पापी पुरुष शत्रुओंके प्रति ईर्ष्या नहीं करता, वह अधम बताया गया है ॥ १७ ॥ न मां प्रीणाति राजेन्द्र लक्ष्मीः साधारणी विभो । ज्वलितामेव कौन्तेये श्रियं दृष्ट्वा च व्यथ्ये ॥ १८ ॥ राजेन्द्र! यह साधारण लक्ष्मी मुझे प्रसन्न नहीं कर पाती। मैं तो कुन्तीनन्दन युधिष्ठिरकी उस जगमगाती हुई लक्ष्मीको देखकर व्यथित हो रहा हूँ ॥ १८ ॥ सर्वां च पृथिवीं चैव युधिष्ठिरवशानुगाम् । स्थिरोऽस्मि योऽहं जीवामि दुःखादेतद् ब्रवीमि ते ॥ १९ ॥ सारी पृथ्वी युधिष्ठिरके अधीन हो गयी है; फिर भी मैं पाषाणतुल्य हूँ, जो कि ऐसा दुःख प्राप्त होनेपर भी जीवित हूँ और आपसे बातें करता हूँ ॥ १९ ॥ आवर्जिता इवाभान्ति नीपाश्चित्रककौकुराः । कारस्करा लोहजङ्घा युधिष्ठिरनिवेशने ॥ २० ॥ नीप, चित्रक, कुकुर, कारस्कर तथा लोहजंघ आदि क्षत्रियनरेश युधिष्ठिरके घरमें सेवकोंकी भाँति सेवा करते हुए शोभा पा रहे थे ॥ २० ॥ हिमवत्सागरानूपाः सर्वे रत्नाकरास्तथा । अन्त्याः सर्वे पर्युदस्ता युधिष्ठिरनिवेशने ॥ २१ ॥ हिमालय प्रदेश तथा समुद्री द्वीपोंके रहनेवाले और रत्नोंकी खानोंके सभी अधिपति म्लेच्छजातीय नरेश युधिष्ठिरके घरमें प्रवेश करने नहीं पाते थे, उन्हें महलसे दूर ही ठहराया