भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

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पृष्ठ 2049

अलं द्यूतेन गान्धारे विदुरो न प्रशंसति । न ह्यसौ सुमहाबुद्धिरहितं नो वदिष्यति ॥ ७ ॥ ‘गान्धारीनन्दन! जूएका खेल नहीं होना चाहिये, विदुर इसे अच्छा नहीं बताते हैं। महाबुद्धिमान् विदुर हमें कोई ऐसी सलाह नहीं देंगे, जिससे हमलोगोंका अहित होनेवाला हो ॥ ७ ॥ हितं हि परमं मन्ये विदुरो यत् प्रभाषते । क्रियतां पुत्र तत् सर्वमेतन्मन्ये हितं तव ॥ ८ ॥ ‘विदुर जो कहते हैं, उसीको मैं अपना सर्वोत्तम हित मानता हूँ। बेटा! तुम भी वही सब करो। मेरी समझमें तुम्हारे लिये यही हितकर है ॥ ८ ॥ देवर्षिर्वासवगुरुर्देवराजाय धीमते । यत् प्राह शास्त्रं भगवान् बृहस्पतिरुदारधीः । तद् वेद विदुरः सर्वं सरहस्यं महाकविः ॥ ९ ॥ स्थितस्तु वचने तस्य सदाहमपि पुत्रक । विदुरो वापि मेधावी कुरूणां प्रवरो मतः ॥ १० ॥ उद्धवो वा महाबुद्धिर्वृष्णीनामर्चितो नृप । तदलं पुत्र द्यूतेन द्यूते भेदो हि दृश्यते ॥ ११ ॥ ‘उदार बुद्धिवाले इन्द्रगुरु देवर्षि भगवान् बृहस्पतिने परम बुद्धिमान् देवराज इन्द्रको जिस शास्त्रका उपदेश दिया था, वह सब उसके रहस्यसहित महाज्ञानी विदुर जानते हैं। बेटा! मैं भी सदा विदुरकी बात मानता हूँ। कुरुकुलमें सबसे श्रेष्ठ और मेधावी विदुर माने गये हैं तथा वृष्णिवंशमें पूजित उद्धवको परम बुद्धिमान् बताया गया है। अतः बेटा! जूआ खेलनेसे कोई लाभ नहीं है। जूएमें वैर-विरोधकी सम्भावना दिखायी देती है ॥ ९—११ ॥ भेदे विनाशो राज्यस्य तत् पुत्र परिवर्ज्य । पित्रा मात्रा च पुत्रस्य यद् वै कार्यं परं स्मृतम् ॥ १२ ॥ ‘वैर-विरोध होनेसे राज्यका नाश हो जाता है, अतः पुत्र! जूएका आग्रह छोड़ दो। पिता-माताको चाहिये कि वे पुत्रको उत्तम कर्तव्यकी शिक्षा दें; इसीलिये मैंने ऐसा कहा है ॥ १२ ॥ प्राप्तस्त्वमसि तन्नाम पितृपैतामहं पदम् । अधीतवान् कृती शास्त्रे लालितः सततं गृहे ॥ १३ ॥ ‘बेटा! तुम अपने बाप-दादोंके पदपर प्रतिष्ठित हो, तुमने वेदोंका स्वाध्याय किया है, शास्त्रोंकी विद्वत्ता प्राप्त की है और घरमें सदा तुम्हारा लालन-पालन हुआ है ॥ १३ ॥ भ्रातृज्येष्ठः स्थितो राज्ये विन्दसे किं न शोभनम् । पृथग्जनैरलभ्यं यद् भोजनाच्छादनं परम् ॥ १४ ॥ तत् प्राप्तोऽसि महाबाहो कस्माच्छोचसि पुत्रक ।