महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपञ्चाशत्तमोऽध्यायः
दुर्योधनका धृतराष्ट्रको अपने दुःख और चिन्ताका कारण बताना
जनमेजय उवाच
कथं समभवद् द्यूतं भ्रातॄणां तन्महात्ययम् ।
यत्र तद् व्यसनं प्राप्तं पाण्डवैर्मे पितामहैः ॥ १ ॥
जनमेजयेने पूछा— मुने! भाइयोंमें वह महाविनाशकारी द्यूत किस प्रकार आरम्भ हुआ; जिसमें मेरे पितामह पाण्डवोंको उस महान् संकटका सामना करना पड़ा? ॥ १ ॥
के च तत्र सभास्तारा राजानो ब्रह्मवित्तम ।
के चैनमन्वमोदन्त के चैनं प्रत्यषेधयन् ॥ २ ॥
ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ महर्षे! वहाँ कौन-कौन-से राजा सभासद् थे? किसने द्यूतक्रीड़ाका अनुमोदन किया और किसने निषेध? ॥ २ ॥
विस्तरेणैतदिच्छामि कथ्यमानं त्वया द्विज ।
मूलं ह्येतद् विनाशस्य पृथिव्या द्विजसत्तम ॥ ३ ॥
ब्रह्मन्! मैं इस प्रसंगको आपके मुखसे विस्तारपूर्वक सुनना चाहता हूँ। विप्रवर! यह द्यूत ही समस्त भूमण्डलके विनाशका मुख्य कारण है ॥ ३ ॥
सौतिरुवाच
एवमुक्तस्ततो राज्ञा व्यासशिष्यः प्रतापवान् ।
आचचक्षेऽथ यद् वृत्तं तत् सर्वं वेदतत्त्ववित् ॥ ४ ॥
सौति कहते हैं— राजाके इस प्रकार पूछनेपर व्यासजीके प्रतापी शिष्य वेदतत्त्वज्ञ वैशम्पायनजी वह सब प्रसंग सुनाने लगे ॥ ४ ॥
वैशम्पायन उवाच
शृणु मे विस्तरेणेमां कथां भारतसत्तम ।
भूय एव महाराज यदि ते श्रवणे मतिः ॥ ५ ॥
वैशम्पायनजीने कहा— भरतवंशशिरोमणे! महाराज जनमेजय! यदि तुम्हारा मन यह सब सुननेमें लगता है तो पुनः विस्तारके साथ इस कथाको सुनो ॥ ५ ॥
विदुरस्य मतिं ज्ञात्वा धृतराष्ट्रोऽम्बिकासुतः ।
दुर्योधनमिदं वाक्यमुवाच विजने पुनः ॥ ६ ॥
विदुरका विचार जानकर अम्बिकानन्दन राजा धृतराष्ट्रने एकान्तमें दुर्योधनसे पुनः इस प्रकार कहा— ॥ ६ ॥