महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअशुभ हो या शुभ, हितकर हो या अहितकर, सुहृदोंमें यह द्यूतक्रीड़ा प्रारम्भ होनी ही चाहिये। निःसंदेह यह भाग्यसे ही प्राप्त हुई है ॥ ५६ ॥
मयि संनिहिते द्रोणे भीष्मे त्वयि च भारत ।
अनयो दैवविहितो न कथंचिद् भविष्यति ॥ ५७ ॥
भारत! जब मैं, द्रोणाचार्य, भीष्मजी तथा तुम—ये सब लोग संनिकट रहेंगे, तब किसी प्रकार दैवविहित अन्याय नहीं होने पायेगा ॥ ५७ ॥
गच्छ त्वं रथमास्थाय हयैर्वातसमैर्जवे ।
खाण्डवप्रस्थमद्यैव समानय युधिष्ठिरम् ॥ ५८ ॥
तुम वायुके समान वेगशाली घोड़ोंद्वारा जुते हुए रथपर बैठकर अभी खाण्डवप्रस्थको जाओ और युधिष्ठिरको बुला ले आओ ॥ ५८ ॥
न वाच्यो व्यवसायो मे विदुरैतद् ब्रवीमि ते ।
दैवमेव परं मन्ये येनैतदुपपद्यते ॥ ५९ ॥
विदुर! मेरा निश्चय तुम युधिष्ठिरसे न बताना; यह बात मैं तुमसे कहे देता हूँ। मैं दैवको भी प्रबल मानता हूँ, जिसकी प्रेरणासे यह द्यूतक्रीड़ाका आरम्भ होने जा रहा है ॥
इत्युक्तो विदुरो धीमान् नेदमस्तीति चिन्तयन् ।
गाङ्गेयं महाप्राज्ञमभ्यगच्छत् सुदुःखितः ॥ ६० ॥
धृतराष्ट्रके ऐसा कहनेपर बुद्धिमान् विदुरजी यह सोचते हुए कि यह द्यूतक्रीड़ा अच्छी नहीं है, अत्यन्त दुःखी हो महाज्ञानी गंगानन्दन भीष्मजीके पास गये ॥ ६९ ॥
इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि द्यूतपर्वणि दुर्योधनसंतापे एकोनपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ४९ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत सभापर्वके अन्तर्गत द्यूतपर्वमें दुर्योधनसंतापविषयक उनचासवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४९ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ७ श्लोक मिलाकर कुल ६७ श्लोक हैं)