भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 2041

अदृश्यामपि कौन्तेयश्रियं पश्यन्निवोद्यताम् ।। १६ ।। तस्मादहं विवर्णश्च दीनश्च हरिणः कृशः। शत्रुओंको बढ़ते और अपनेको हीन दशामें जाते देख तथा युधिष्ठिरकी उस अदृश्य लक्ष्मीपर भी प्रत्यक्षकी भाँति दृष्टिपात करके मैं चिन्तित हो उठा हूँ। यही कारण है कि मेरी कान्ति फीकी पड़ गयी है तथा मैं दीन, दुर्बल और सफेद हो गया हूँ ।। १६१/२ ।।

अष्टाशीतिसहस्राणि स्नातका गृहमेधिनः ।। १७ ।। त्रिंशद्दासीक एकैको यान् बिभर्ति युधिष्ठिरः। राजा युधिष्ठिर अपने घरमें बसनेवाले अट्ठासी हजार स्नातकोंका भरण-पोषण करते हैं। उनमेंसे प्रत्येककी सेवाके लिये तीस-तीस दासियाँ प्रस्तुत रहती हैं ।। १७१/२ ।।

दशान्यानि सहस्राणि नित्यं तत्रान्नमुत्तमम्। भुञ्जते रुक्मपात्रीभिर्युधिष्ठिरनिवेशने ।। १८ ।। इसके सिवा युधिष्ठिरके महलमें दस हजार अन्य ब्राह्मण प्रतिदिन सोनेकी थालियोंमें भोजन करते हैं ।। १८ ।।

कदलीमृगमोकानि कृष्णश्यामारुणानि च। काम्बोजः प्राहिणोत् तस्मै पराघ्या॑नपि कम्बलान्। काम्बोजराजाने काले, नीले और लाल रंगके कदलीमृगके चर्म तथा अनेक बहुमूल्य कम्बल युधिष्ठिरके लिये भेंटमें भेजे थे ।। १८१/२ ।।

गजयोषिद्गवाश्वस्य शतशोऽथ सहस्रशः ।। १९ ।। त्रिशतं चोष्ट्रवामीनां शतानि विचरन्त्युत। राजन्या बलिमादाय समेता हि नृपक्षये ।। २० ।। उन्हींकी भेजी हुई सैकड़ों हथिनियाँ, सहस्रों गायें और घोड़े तथा तीस-तीस हजार ऊँट और घोड़ियाँ वहाँ विचरती थीं। सभी राजालोग भेंट लेकर युधिष्ठिरके भवनमें एकत्र हुए थे ।। १९-२० ।।

पृथग्विधानि रत्नानि पार्थिवाः पृथिवीपते। आहरन् क्रतुमुख्येऽस्मिन् कुन्तीपुत्राय भूरिशः ।। २१ ।। पृथ्वीपते! उस महान् यज्ञमें भूपालगण कुन्तीपुत्र युधिष्ठिरके लिये भाँति-भाँतिके बहुत-से रत्न लाये थे ।। २१ ।।

न क्वचिद्धि मया तादृग् दृष्टपूर्वो न च श्रुतः। यादृग् धनागमो यज्ञे पाण्डुपुत्रस्य धीमतः ।। २२ ।। बुद्धिमान् पाण्डुकुमार युधिष्ठिरके यज्ञमें धनकी जैसी प्राप्ति हुई है, वैसी मैंने पहले कहीं न तो देखी है और न सुनी ही है ।। २२ ।।

अपर्यन्तं धनौघं तं दृष्ट्वा शत्रोरहं नृप। शमं नैवाभिगच्छामि चिन्तयानो विशाम्पते ।। २३ ।।