महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
१७५-
पञ्चसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः
शक्तिके शापसे कल्माषपादका राक्षस होना, विश्वामित्रकी प्रेरणासे राक्षसद्वारा वसिष्ठके पुत्रोंका भक्षण और वसिष्ठका शोक
गन्धर्व उवाच
कल्माषपाद इत्येवं लोके राजा बभूव ह ।
इक्ष्वाकुवंशजः पार्थ तेजसासदृशो भुवि ॥ १ ॥
गन्धर्व कहता है—अर्जुन! इक्ष्वाकुवंशमें एक राजा हुए, जो लोकमें कल्माषपादके नामसे प्रसिद्ध थे। इस पृथ्वीपर वे एक असाधारण तेजस्वी राजा थे ॥ १ ॥
स कदाचिद् वनं राजा मृगयां निर्ययौ पुरात् ।
मृगान् विध्यन् वराहांश्च चचार रिपुमर्दनः ॥ २ ॥
एक दिन वे नगरसे निकलकर वनमें हिंसक पशुओंको मारनेके लिये गये। वहाँ वे रिपुमर्दन नरेश वराहों और अन्य हिंसक पशुओंको मारते हुए इधर-उधर विचरने लगे ॥ २ ॥
तस्मिन् वने महाघोरे खड्गांश्च बहुशोऽहनत् ।
हत्वा च सुचिरं श्रान्तो राजा निववृते ततः ॥ ३ ॥
उस महाभयानक वनमें उन्होंने बहुत-से गैंडे भी मारे। बहुत देरतक हिंस्र पशुओंको मारकर जब राजा थक गये, तब वहाँसे नगरकी ओर लौटे ॥ ३ ॥
अकामयत् तं याज्यार्थे विश्वामित्रः प्रतापवान् ।
स तु राजा महात्मानं वासिष्ठमृषिसत्तमम् ॥ ४ ॥
तृषार्तश्च क्षुधार्तश्च एकायनगतः पथि ।
अपश्यदजितः संख्ये मुनिं प्रतिमुखागतम् ॥ ५ ॥
प्रतापी विश्वामित्र उन्हें अपना यजमान बनाना चाहते थे। राजा कल्माषपाद युद्धमें कभी पराजित नहीं होते थे। उस दिन वे भूख-प्याससे पीड़ित थे और ऐसे तंग रास्तेपर आ पहुँचे थे, जहाँ एक ही आदमी आ-जा सकता था। वहाँ आनेपर उन्होंने देखा, सामनेकी ओरसे मुनिश्रेष्ठ महामना वसिष्ठकुमार आ रहे हैं ॥ ४-५ ॥
शक्तिं नाम महाभागं वसिष्ठकुलवर्धनम् ।
ज्येष्ठं पुत्रं पुत्रशताद् वसिष्ठस्य महात्मनः ॥ ६ ॥
वे वसिष्ठजीके वंशकी वृद्धि करनेवाले महाभाग शक्ति थे। महात्मा वसिष्ठजीके सौ पुत्रोंमें सबसे बड़े वे ही थे ॥ ६ ॥
अपगच्छ पथोऽस्माकमित्येवं पार्थिवोऽब्रवीत् । तथा ऋषिरुवाचैनं सान्त्वयञ्श्लक्ष्णया गिरा ॥ ७ ॥ उन्हें देखकर राजाने कहा—'हमारे रास्तेसे हट जाओ।' तब शक्ति मुनिने मधुर वाणीमें उन्हें समझाते हुए कहा— ॥ ७ ॥
मम पन्था महाराज धर्म एष सनातनः । राज्ञा सर्वेषु धर्मेषु देयः पन्था द्विजातये ॥ ८ ॥ 'महाराज! मार्ग तो मुझे ही मिलना चाहिये। यही सनातन धर्म है। सभी धर्मोंमें राजाके लिये यही उचित है कि ब्राह्मणको मार्ग दे' ॥ ८ ॥
एवं परस्परं तौ तु पथोऽर्थं वाक्यमूचतुः । अपसर्पापसर्पेति वागुत्तरमकुर्वताम् ॥ ९ ॥ इस प्रकार वे दोनों आपसमें रास्तेके लिये वाग्युद्ध करने लगे। एक कहता, 'तुम हटो' तो दूसरा कहता, 'नहीं, तुम हटो।' इस प्रकार वे उत्तर-प्रत्युत्तर करने लगे ॥ ९ ॥
ऋषिस्तु नापचक्राम तस्मिन् धर्मपथे स्थितः । नापि राजा मुनेर्मानात् क्रोधाच्चाथ जगाम ह ॥ १० ॥ अमुञ्चन्तं तु पन्थानं तमृषिं नृपसत्तमः । जघान कशया मोहात् तदा राक्षससन्मुनिम् ॥ ११ ॥ ऋषि तो धर्मके मार्गमें स्थित थे, अतः वे रास्ता छोड़कर नहीं हटे। उधर राजा भी मान और क्रोधके वशीभूत हो मुनिके मार्गसे इधर-उधर नहीं हट सके। राजाओंमें श्रेष्ठ कल्माषपादने मार्ग न छोड़नेवाले शक्ति मुनिके ऊपर मोह-वश राक्षसकी भाँति कोड़ेसे आघात किया ॥ १०-११ ॥
कशाप्रहाराभिहतस्ततः स मुनिसत्तमः । तं शशाप नृपश्रेष्ठं वासिष्ठः क्रोधमूर्च्छितः ॥ १२ ॥ कोड़ेकी चोट खाकर मुनिश्रेष्ठ शक्तिने क्रोधसे मूर्च्छित हो उन उत्तम नरेशको शाप दे दिया ॥ १२ ॥
हंसि राक्षसवद् यस्माद् राजापसद तापसम् । तस्मात् त्वमद्यप्रभृति पुरुषादो भविष्यसि ॥ १३ ॥ मनुष्यपिशिते सक्तश्चरिष्यसि महीमिमाम् । गच्छ राजाधमेत्युक्तः शक्तिना वीर्यशक्तिना ॥ १४ ॥ तपस्याकी प्रबल शक्तिसे सम्पन्न शक्तिमुनिने कहा—'राजाओंमें नीच कल्माषपाद! तू एक तपस्वी ब्राह्मणको राक्षसकी भाँति मार रहा है, इसलिये आजसे नरभक्षी राक्षस हो जायगा तथा अबसे तू मनुष्योंके मांसमें आसक्त होकर इस पृथ्वीपर विचरता रहेगा। नृपाधम! जा यहाँसे' ॥ १३-१४ ॥
ततो याज्यनिमित्ते तु विश्वामित्रवसिष्ठयोः । वैरमासीत् तदा तं तु विश्वामित्रोऽन्वपद्यत ॥ १५ ॥ उन्हीं दिनों यजमानके लिये विश्वामित्र और वसिष्ठमें वैर चल रहा था। उस समय विश्वामित्र राजा कल्माषपादके पास आये ॥ १५ ॥
तयोर्विवदतोरेवं समीपमुपचक्रमे । ऋषिरुग्रतपाः पार्थ विश्वामित्रः प्रतापवान् ॥ १६ ॥ अर्जुन! जब राजा तथा ऋषिपुत्र दोनों इस प्रकार विवाद कर रहे थे, उग्रतपस्वी प्रतापी विश्वामित्र मुनि उनके निकट चले गये ॥ १६ ॥
ततः स बुबुधे पश्चात् तमृषिं नृपसत्तमः । ऋषेः पुत्रं वसिष्ठस्य वसिष्ठमिव तेजसा ॥ १७ ॥ तदनन्तर नृपश्रेष्ठ कल्माषपादने वसिष्ठके समान तेजस्वी वसिष्ठ मुनिके पुत्र उन महर्षि शक्तिको पहचाना ॥ १७ ॥
अन्तर्धाय तदाऽऽत्मानं विश्वामित्रोऽपि भारत । तावुभावतिचक्राम चिकीर्षन्नात्मनः प्रियम् ॥ १८ ॥ भारत! तब विश्वामित्रजीने भी अपनेको अदृश्य करके अपना प्रिय करनेकी इच्छासे राजा और शक्ति दोनोंको चकमा दिया ॥ १८ ॥
स तु शप्तस्तदा तेन शक्तिना वै नृपोत्तमः । जगाम शरणं शक्तिं प्रसादयितुमर्हयन् ॥ १९ ॥ जब शक्तिने शाप दे दिया, तब नृपतिशिरोमणि कल्माषपाद उनकी स्तुति करते हुए उन्हें प्रसन्न करनेके लिये उनके शरण होने चले ॥ १९ ॥
तस्य भावं विदित्वा स नृपतेः कुरुसत्तम । विश्वामित्रस्ततो रक्ष आदिशेद् नृपं प्रति ॥ २० ॥ कुरुश्रेष्ठ! राजाके मनोभावको समझकर उक्त विश्वामित्रजीने एक राक्षसको राजाके भीतर प्रवेश करनेके लिये आज्ञा दी ॥ २० ॥
शापात् तस्य तु विप्रर्षेर्विश्वामित्रस्य चाज्ञया । राक्षसः किंकरो नाम विवेश नृपतिं तदा ॥ २१ ॥ ब्रह्मर्षि शक्तिके शाप तथा विश्वामित्रजीकी आज्ञासे किंकर नामक राक्षसने तब राजाके भीतर प्रवेश किया ॥ २१ ॥
रक्षसा तं गृहीतं तु विदित्वा मुनिसत्तमः । विश्वामित्रोऽप्यपाक्रामत् तस्माद् देशादरिंदम ॥ २२ ॥ शत्रुसूदन! राक्षसने राजाको आविष्ट कर लिया है, यह जानकर मुनिवर विश्वामित्रजी भी उस स्थानसे चले गये ॥ २२ ॥
ततः स नृपतिस्तेन रक्षसान्तर्गतेन वै । बलवत् पीडितः पार्थ नान्यबुध्यत किंचन ॥ २३ ॥ कुन्तीनन्दन! भीतर घुसे हुए राक्षससे अत्यन्त पीड़ित हो उन नरेशको किसी भी बातकी सुध-बुध न रही ॥ २३ ॥
ददर्शार्थ द्विजः कश्चिद् राजानं प्रस्थितं वनम् । अयाचत क्षुधापन्नः समांसं भोजनं तदा ॥ २४ ॥ एक दिन किसी ब्राह्मणने (राक्षससे आविष्ट) राजाको वनकी ओर जाते देखा और भूखसे अत्यन्त पीड़ित होनेके कारण उनसे मांससहित भोजन माँगा ॥ २४ ॥
तमुवाचाथ राजर्षिर्द्विजं मित्रसहस्तदा । आस्स्व ब्रह्मंस्त्वमत्रैव मुहूर्तं प्रतिपालयन् ॥ २५ ॥ तब राजर्षि मित्रसह (कल्माषपाद)-ने उस द्विजसे कहा—'ब्रह्मन्! आप यहीं बैठिये और दो घड़ीतक प्रतीक्षा कीजिये ॥ २५ ॥
निवृत्तः प्रतिदास्यामि भोजनं ते यथेप्सितम् । इत्युक्त्वा प्रययौ राजा तस्थौ च द्विजसत्तमः ॥ २६ ॥ 'मैं वनसे लौटनेपर आपको यथेष्ट भोजन दूँगा।' यह कहकर राजा चले गये और वह ब्राह्मण (वहाँ) ठहर गया ॥ २६ ॥
ततो राजा परिक्रम्य यथाकामं यथासुखम् ।
निवृत्तोऽन्तःपुरं पार्थ प्रविवेश महामनाः ॥ २७ ॥ पार्थ! तत्पश्चात् महामना राजा मित्रसह इच्छानुसार मौजसे घूम-फिरकर जब लौटे, तब अन्तःपुरमें चले गये ॥ २७ ॥
ततोऽर्धरात्र उत्थाय सूदमानाय्य सत्वरम् । उवाच राजा संस्मृत्य ब्राह्मणस्य प्रतिश्रुतम् ॥ २८ ॥ गच्छामुष्मिन् वनोद्देशे ब्राह्मणो मां प्रतीक्षते । अन्नार्थी तं त्वमन्नेन समांसेनोपपादय ॥ २९ ॥ वहाँ आधी रातके समय उन्हें ब्राह्मणको भोजन देनेकी प्रतिज्ञाका स्मरण हुआ। फिर तो वे उठ बैठे और तुरंत रसोइयेको बुलाकर बोले—‘जाओ, वनके अमुक प्रदेशमें एक ब्राह्मण भोजनके लिये मेरी प्रतीक्षा करता है। उसे तुम मांसयुक्त भोजनसे तृप्त करो’ ॥ २८-२९ ॥
गन्धर्व उवाच
एवमुक्तस्ततः सूदः सोऽनासाद्यामिषं क्वचित् । निवेदयामास तदा तस्मै राज्ञे व्यथान्वितः ॥ ३० ॥ **गन्धर्व कहता है—**उनके यों कहनेपर रसोइयेने मांसके लिये खोज की; परंतु जब कहीं भी मांस नहीं मिला, तब उसने दुःखी होकर राजाको इस बातकी सूचना दी ॥ ३० ॥
राजा तु रक्षसाऽऽविष्टः सूदमाह गतव्यथः । अप्येनं नरमांसेन भोजयेति पुनः पुनः ॥ ३१ ॥ राजापर राक्षसका आवेश था, अतः उन्होंने रसोइयेसे निश्चिन्त होकर कहा—‘उस ब्राह्मणको मनुष्यका मांस ही खिला दो’ यह बात उन्होंने बार-बार दुहरायी ॥ ३१ ॥
तथेत्युक्त्वा ततः सूदः संस्थानं वध्यघातिनाम् । गत्वाऽऽजहार त्वरितो नरमांसमपेतभीः ॥ ३२ ॥ तब रसोइया ‘तथास्तु’ कहकर वध्यभूमिमें जल्लादोंके घर गया और (उनसे) निर्भय होकर तुरंत ही मनुष्यका मांस ले आया ॥ ३२ ॥
एतत् संस्कृत्य विधिवदन्नोपहितमाशु वै । तस्मै प्रादाद् ब्राह्मणाय क्षुधिताय तपस्विने ॥ ३३ ॥ फिर उसीको तुरंत विधिपूर्वक राँधकर अन्नके साथ उसे उस तपस्वी एवं भूखे ब्राह्मणको दे दिया ॥ ३३ ॥
स सिद्धचक्षुषा दृष्ट्वा तदन्नं द्विजसत्तमः । अभोज्यमिदमित्याह क्रोधपर्याकुलेक्षणः ॥ ३४ ॥ तब उस श्रेष्ठ ब्राह्मणने तपःसिद्ध दृष्टिसे उस अन्नको देखा और ‘यह खानेयोग्य नहीं है’ यों समझकर क्रोधपूर्ण नेत्रोंसे देखते हुए कहा ॥ ३४ ॥
ब्राह्मण उवाच
यस्मादभोज्यमन्नं मे ददाति स नृपाधमः । तस्मात् तस्यैव मूढस्य भविष्यत्यत्र लोलुपा ॥ ३५ ॥ ब्राह्मणने कहा— वह नीच राजा मुझे न खाने-योग्य अन्न दे रहा है, अतः उसी मूर्खकी जिह्वा ऐसे अन्नके लिये लालायित रहेगी ॥ ३५ ॥
सक्तो मानुषमांसेषु यथोक्तः शक्तिना तथा । उद्वेजनीयो भूतानां चरिष्यति महीमिमाम् ॥ ३६ ॥ जैसा कि शक्ति मुनिने कहा है, वह मनुष्योंके मांसमें आसक्त हो समस्त प्राणियोंका उद्वेगपात्र बनकर इस पृथ्वीपर विचरेगा ॥ ३६ ॥
द्विरनुव्याहृते राज्ञः स शापो बलवानभूत् । रक्षोबलसमाविष्टो विसंज्ञश्चाभवन्नृपः ॥ ३७ ॥ दो बार इस तरहकी बात कही जानेके कारण राजाका शाप प्रबल हो गया। उसके साथ उनमें राक्षसके बलका समावेश हो जानेके कारण राजाकी विवेकशक्ति सर्वथा लुप्त हो गयी ॥ ३७ ॥
ततः स नृपतिश्रेष्ठो रक्षसापहृतेन्द्रियः । उवाच शक्तिं तं दृष्ट्वा न चिरादिव भारत ॥ ३८ ॥ भारत! राक्षसने राजाके मन और इन्द्रियोंको काबूमें कर लिया था, अतः उन नृपश्रेष्ठने कुछ ही दिनों बाद उक्त शक्ति मुनिको अपने सामने देखकर कहा— ॥ ३८ ॥
यस्मादसद्दशः शापः प्रयुक्तोऽयं मयि त्वया । तस्मात् त्वत्तः प्रवर्तिष्ये खादितुं पुरुषानहम् ॥ ३९ ॥ ‘चूँकि तुमने मुझे यह सर्वथा अयोग्य शाप दिया है, अतः अब मैं तुम्हींसे मनुष्योंका भक्षण आरम्भ करूँगा’ ॥ ३९ ॥
एवमुक्त्वा ततः सद्यस्तं प्राणैर्विप्रयुज्य च । शक्तिनं भक्षयामास व्याघ्रः पशुमिवेप्सितम् ॥ ४० ॥ यों कहकर राजाने तत्काल ही शक्तिके प्राण ले लिये और जैसे बाघ अपनी रुचिके अनुकूल पशुको चबा जाता है, उसी प्रकार वे भी शक्तिको खा गये ॥ ४० ॥
शक्तिनं तु मृतं दृष्ट्वा विश्वामित्रः पुनः पुनः । वसिष्ठस्यैव पुत्रेषु तद् रक्षः संदिदेश ह ॥ ४१ ॥ शक्तिको मारा गया देख विश्वामित्र बार-बार वसिष्ठके पुत्रोंपर ही आक्रमण करनेके लिये उस राक्षसको प्रेरित करते थे ॥ ४१ ॥
स ताञ्छक्त्यवरान् पुत्रान् वसिष्ठस्य महात्मनः । भक्षयामास संक्रुद्धः सिंहः क्षुद्रमृगानिव ॥ ४२ ॥
जैसे क्रोधमें भरा हुआ सिंह छोटे मृगोंको खा जाता है, उसी प्रकार उन (राक्षसभावापन्न) नरेशने महात्मा वसिष्ठके उन सब पुत्रोंको भी, जो शक्तिसे छोटे थे, (मारकर) खा लिया॥ ४२ ॥
वसिष्ठो घातिताञ्छ्रुत्वा विश्वामित्रेण तान् सुतान् ।
धारयामास तं शोकं महाद्रिरिव मेदिनीम् ॥ ४३ ॥
वसिष्ठने यह सुनकर भी कि विश्वामित्रने मेरे पुत्रोंको मरवा डाला है, अपने शोकके वेगको उसी प्रकार धारण कर लिया, जैसे महान् पर्वत सुमेरु इस पृथ्वीको ॥ ४३ ॥
चक्रे चात्मविनाशाय बुद्धिं स मुनिसत्तमः ।
न त्वेव कौशिकोच्छेदं मेने मतिमतां वरः ॥ ४४ ॥
उस समय (अपनी पुत्रवधुओंके दुःखसे दुःखित हो) वसिष्ठने अपने शरीरको त्याग देनेका विचार कर लिया; परंतु विश्वामित्रका मूलोच्छेद करनेकी बात बुद्धि-मानोंमें श्रेष्ठ मुनिवर वसिष्ठके मनमें ही नहीं आयी ॥ ४४ ॥
स मेरुकूटादात्मानं मुमोच भगवानृषिः ।
गिरेस्तस्य शिलायां तु तूलराशाविवापतत् ॥ ४५ ॥
महर्षि भगवान् वसिष्ठने मेरुपर्वतके शिखरसे अपने-आपको उसी पर्वतकी शिलापर गिराया; परंतु उन्हें ऐसा जान पड़ा मानो वे रूईके ढेरपर गिरे हों ॥ ४५ ॥
न ममार च पातेन स यदा तेन पाण्डव ।
तदाग्निमिद्धं भगवान् संविवेश महावने ॥ ४६ ॥
पाण्डुनन्दन! जब (इस प्रकार) गिरनेसे भी वे नहीं मरे, तब वे भगवान् वसिष्ठ महान् वनके भीतर धधकते हुए दावानलमें घुस गये ॥ ४६ ॥
तं तदा सुसमिद्धोऽपि न ददाह हुताशनः ।
दीप्यमानोऽप्यमित्रघ्न शीतोऽग्निरभवत् ततः ॥ ४७ ॥
यद्यपि उस समय अग्नि प्रचण्ड वेगसे प्रज्वलित हो रही थी, तो भी उन्हें जला न सकी। शत्रुसूदन अर्जुन! उनके प्रभावसे वह दहकती हुई आग भी उनके लिये शीतल हो गयी ॥ ४७ ॥
स समुद्रमभिप्रेक्ष्य शोकाविष्टो महामुनिः ।
बद्ध्वा कण्ठे शिलां गुर्वी निपपात तदम्भसि ॥ ४८ ॥
तब शोकके आवेशसे युक्त महामुनि वसिष्ठने सामने समुद्र देखकर अपने कण्ठमें बड़ी भारी शिला बाँध ली और तत्काल जलमें कूद पड़े ॥ ४८ ॥
स समुद्रोर्मिवेगेन स्थले न्यस्तो महामुनिः ।
न ममार यदा विप्रः कथंचित् संशितव्रतः ।
जगाम स ततः खिन्नः पुनरेवाश्रमं प्रति ॥ ४९ ॥
परंतु समुद्रकी लहरोंके वेगने उन महामुनिको किनारे लाकर डाल दिया। कठोर व्रतका पालन करनेवाले ब्रह्मर्षि वसिष्ठ जब किसी प्रकार न मर सके, तब खिन्न होकर अपने आश्रमपर ही लौट पड़े ।। ४९ ।।
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि चैत्ररथपर्वणि वासिष्ठे वसिष्ठशोके
पञ्चसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः ।। १७५ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत चैत्ररथपर्वमें वसिष्ठचरित्रके प्रसंगमें वसिष्ठशोकविषयक एक सौ पचहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १७५ ।।
१७६-
षट्सप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः
कल्माषपादका शापसे उद्धार और वसिष्ठजीके द्वारा उन्हें अश्मक नामक पुत्रकी प्राप्ति
गन्धर्व उवाच
ततो दृष्ट्वाऽऽश्रमपदं रहितं तैः सुतैर्मुनिः ।
निर्जगाम सुदुःखार्तः पुनरप्याश्रमात् ततः ॥ १ ॥
**गन्धर्व कहता है—**अर्जुन! तदनन्तर मुनिवर वसिष्ठ आश्रमको अपने पुत्रोंसे सूना देख अत्यन्त दुःखसे पीड़ित हो गये और पुनः आश्रम छोड़कर चल दिये ॥ १ ॥
सोऽपश्यत् सरितं पूर्णां प्रावृट्काले नवाम्भसा ।
वृक्षान् बहुविधान् पार्थ हरन्तीं तीरजान् बहून् ॥ २ ॥
कुन्तीनन्दन! वर्षाका समय था; उन्होंने देखा, एक नदी नूतन जलसे लबालब भरी है और तटवर्ती बहुत-से वृक्षोंको (अपने जलकी धारामें) बहाये लिये जाती है ॥ २ ॥
अथ चिन्तां समापेदे पुनः कौरवनन्दन ।
अम्भस्यस्या निमज्जेयमिति दुःखसमन्वितः ॥ ३ ॥
कौरवनन्दन! (उसे देखकर) दुःखसे युक्त वसिष्ठजीके मनमें फिर यह विचार आया कि मैं इसी नदीके जलमें डूब जाऊँ ॥ ३ ॥
ततः पाशैस्तदाऽऽत्मानं गाढं बद्ध्वा महामुनिः ।
तस्या जले महानद्या निममज्ज सुदुःखितः ॥ ४ ॥
तब अत्यन्त दुःखी हुए महामुनि वसिष्ठ अपने शरीरको पाशोंद्वारा अच्छी तरह बाँधकर उस महानदीके जलमें कूद पड़े ॥ ४ ॥
अथ छित्त्वा नदी पाशांस्तस्यारिबलसूदन ।
स्थलस्थं तमृषिं कृत्वा विपाशं समवासृजत् ॥ ५ ॥
शत्रुसेनाका संहार करनेवाले अर्जुन! उस नदीने वसिष्ठजीके बन्धन काटकर उन्हें स्थलमें पहुँचा दिया और उन्हें विपाश (बन्धनरहित) करके छोड़ दिया ॥ ५ ॥
उत्ततार ततः पाशैर्विमुक्तः स महानृषिः ।
विपाशेति च नामास्या नद्याश्चक्रे महानृषिः ॥ ६ ॥
तब पाशमुक्त हो महर्षि जलसे निकल आये और उन्होंने उस नदीका नाम ‘विपाशा’ (व्यास) रख दिया ॥ ६ ॥
शोकबुद्धिं तदा चक्रे न चैकत्र व्यतिष्ठत ।
सोऽगच्छत् पर्वतांश्चैव सरितश्च सरांसि च ॥ ७ ॥
उस समय (पुत्रवधुओंके संतोषके लिये) उन्होंने शोकबुद्धि कर ली थी, इसलिये वे किसी एक स्थानमें नहीं ठहरते थे; पर्वतों, नदियों और सरोवरोंके तटपर चक्कर लगाते रहते थे ॥ ७ ॥
दृष्ट्वा स पुनरेवर्षिर्नदीं हैमवतीं तदा ।
चण्डग्राहवतीं भीमां तस्याः स्रोतस्यपातयत् ॥ ८ ॥
(इस तरह घूमते-घूमते) महर्षिने पुनः हिमालय पर्वतसे निकली हुई एक भयंकर नदीको देखा, जिसमें बड़े प्रचण्ड ग्राह रहते थे। उन्होंने फिर उसीकी प्रखर धारामें अपने-आपको डाल दिया ॥ ८ ॥
सा तमग्निसमं विप्रमनुचिन्त्य सरिद्वरा ।
शतधा विद्रुता यस्माच्छतद्रुरिति विश्रुता ॥ ९ ॥
वह श्रेष्ठ नदी ब्रह्मर्षि वसिष्ठको अग्निके समान तेजस्वी जान सैकड़ों धाराओंमें फूटकर इधर-उधर भाग चली। इसीलिये वह 'शतद्रू' नामसे विख्यात हुई ॥ ९ ॥
ततः स्थलगतं दृष्ट्वा तत्राप्यात्मानमात्मना ।
मर्तुं न शक्यमित्युक्त्वा पुनरेवाश्रमं ययौ ॥ १० ॥
वहाँ भी अपनेको स्वयं ही स्थलमें पड़ा देख 'मैं मर नहीं सकता' यों कहकर वे फिर अपने आश्रमपर ही चले गये ॥ १० ॥
स गत्वा विविधाञ्छैलान् देशान् बहुविधांस्तथा ।
अदृश्यन्त्याख्यया वध्वाथाश्रमेऽनुसृतोऽभवत् ॥ ११ ॥
इस तरह नाना प्रकारके पर्वतों और बहुसंख्यक देशोंमें भ्रमण करके वे पुनः जब अपने आश्रमके समीप आये, उस समय उनकी पुत्रवधू अदृश्यन्ती उनके पीछे हो ली ॥ ११ ॥
अथ शुश्राव संगतया वेदाध्ययननिःस्वनम् ।
पृष्ठतः परिपूर्णार्थं षड्भिरङ्गैरलंकृतम् ॥ १२ ॥
मुनिको पीछेकी ओरसे संगतिपूर्वक छहों अंगोंसे अलंकृत तथा स्फुट अर्थोंसे युक्त वेदमन्त्रोंके अध्ययनका शब्द सुन पड़ा ॥ १२ ॥
अनुव्रजति को न्वेष मामित्येवाथ सोऽब्रवीत् ।
अहमित्यदृश्यन्तीमं सा स्नुषा प्रत्यभाषत ।
शक्तेर्भार्या महाभाग तपोयुक्ता तपस्विनी ॥ १३ ॥
तब उन्होंने पूछा—'मेरे पीछे-पीछे कौन आ रहा है?' उक्त पुत्रवधूने उत्तर दिया, 'महाभाग! मैं तपमें ही संलग्न रहनेवाली महर्षि शक्तिकी अनाथ पत्नी अदृश्यन्ती हूँ' ॥ १३ ॥
वसिष्ठ उवाच
पुत्रि कस्यैष साङ्गस्य वेदस्याध्ययनस्वनः ।
पुरा साङ्गस्य वेदस्य शक्तेरिव मया श्रुतः ॥ १४ ॥
वसिष्ठजीने पूछा— बेटी! पहले शक्तिके मुँहसे मैं अंगोंसहित वेदका जैसा पाठ सुना करता था, ठीक उसी प्रकार यह किसके द्वारा किये हुए सांग वेदके अध्ययनकी ध्वनि मेरे कानोंमें आ रही है? ॥ १४ ॥
अदृश्यन्त्युवाच
अयं कुक्षौ समुत्पन्नः शक्तेर्गर्भः सुतस्य ते ।
समा द्वादश तस्येह वेदानभ्यस्यतो मुने ॥ १५ ॥
अदृश्यन्ती बोली— भगवन्! यह मेरे उदरमें उत्पन्न हुआ आपके पुत्र शक्तिका बालक है। मुने! उसे मेरे गर्भमें ही वेदाभ्यास करते बारह वर्ष हो गये हैं ॥ १५ ॥
गन्धर्व उवाच
एवमुक्तस्तया हृष्टो वसिष्ठः श्रेष्ठभागृषिः ।
अस्ति संतानमित्युक्त्वा मृत्योः पार्थ न्यवर्तत ॥ १६ ॥
गन्धर्व कहता है— अर्जुन! अदृश्यन्तीके यों कहनेपर भगवान् पुरुषोत्तमका भजन करनेवाले महर्षि वसिष्ठ बड़े प्रसन्न हुए और 'मेरी वंशपरम्पराका लोप नहीं हुआ है,' यों कहकर मरनेके संकल्पसे विरत हो गये ॥ १६ ॥
ततः प्रतिनिवृत्तः स तया वध्वा सहानघ । कल्माषपादमासीनं ददर्श विजने वने ॥ १७ ॥ अनघ! तब वे अपनी पुत्रवधूके साथ आश्रमकी ओर लौटने लगे। इतनेमें ही मुनिने निर्जन वनमें बैठे हुए राजा कल्माषपादको देखा ॥ १७ ॥ स तु दृष्ट्वैव तं राजा क्रुद्ध उत्थाय भारत । आविष्टो रक्षसोग्रेण इयेषात्तुं तदा मुनिम् ॥ १८ ॥ भारत! भयानक राक्षससे आविष्ट हुए राजा कल्माषपाद मुनिको देखते ही क्रोधमें भरकर उठे और उसी समय उन्हें खा जानेकी इच्छा करने लगे ॥ १८ ॥ अदृश्यन्ती तु तं दृष्ट्वा क्रूरकर्माणमग्रतः । भयसंविग्नया वाचा वसिष्ठमिदमब्रवीत् ॥ १९ ॥ उस क्रूरकर्मी राक्षसको सामने देख अदृश्यन्तीने भयाकुल वाणीमें वसिष्ठजीसे यह कहा — ॥ १९ ॥ असौ मृत्युरिवोग्रेण दण्डेन भगवन्नितः । प्रगृहीतेन काष्ठेन राक्षसोऽभ्येति दारुणः ॥ २० ॥ 'भगवन्! वह भयंकर राक्षस एक बहुत बड़ा काठ लेकर इधर ही आ रहा है, मानो साक्षात् यमराज भयानक दण्ड लिये आ रहे हों ॥ २० ॥ तं निवारयितुं शक्तो नान्योऽस्ति भुवि कश्चन । त्वदृतेऽद्य महाभाग सर्ववेदविदां वर ॥ २१ ॥ 'महाभाग! आप सम्पूर्ण वेदवेत्ताओंमें श्रेष्ठ हैं। (इस समय) इस भूतलपर आपके सिवा दूसरा कोई नहीं है, जो उस राक्षसका वेग रोक सके ॥ २१ ॥ पाहि मां भगवन् पापादस्माद् दारुणदर्शनात् । राक्षसोऽयमिहात्तुं वै नूनमावां समीहते ॥ २२ ॥ 'भगवन्! देखनेमें अत्यन्त भयंकर इस पापीसे मेरी रक्षा कीजिये। निश्चय ही यह राक्षस यहाँ हम दोनोंको खा जानेकी घातमें लगा है' ॥ २२ ॥ वसिष्ठ उवाच मा भैः पुत्रि न भेतव्यं राक्षसात् तु कथंचन । नैतद् रक्षो भयं यस्मात् पश्यसि त्वमुपस्थितम् ॥ २३ ॥ वसिष्ठजीने कहा—बेटी! भयभीत न हो। इस राक्षससे तो किसी प्रकार न डरो। जिससे तुम्हें भय उपस्थित दिखायी देता है, यह वास्तवमें राक्षस नहीं है ॥ २३ ॥ राजा कल्माषपादोऽयं वीर्यवान् प्रथितो भुवि । स एषोऽस्मिन् वनोद्देशे निवसत्यतिभीषणः ॥ २४ ॥
ये भूमण्डलमें विख्यात पराक्रमी राजा कल्माषपाद हैं। ये ही इस वनमें अत्यन्त भीषण रूप धारण करके रहते हैं ।। २४ ।।
गन्धर्व उवाच
तमापतन्तं सम्प्रेक्ष्य वसिष्ठो भगवानृषिः ।
वारयामास तेजस्वी हुंकारेणैव भारत ।। २५ ।।
गन्धर्व कहता है— भारत! उस राक्षसको आते देख तेजस्वी भगवान् वसिष्ठ मुनिने हुंकारमात्रसे ही रोक दिया ।। २५ ।।
मन्त्रपूतेन च पुनः स तमभ्युक्ष्य वारिणा ।
मोक्षयामास वै शापात् तस्माद् योगान्नराधिपम् ।। २६ ।।
और मन्त्रपूत जलसे उसके छींटे देकर अपने योगके प्रभावसे राजाको उस शापसे मुक्त कर दिया ।। २६ ।।
स हि द्वादश वर्षाणि वासिष्ठस्यैव तेजसा ।
ग्रस्त आसीद् ग्रहेणेव पर्वकाले दिवाकरः ।। २७ ।।
जैसे पर्वकालमें सूर्य राहुद्वारा ग्रस्त हो जाता है, उसी प्रकार राजा कल्माषपाद बारह वर्षोंतक वसिष्ठजीके पुत्र शक्तिके ही तेज (शापके प्रभाव)-से ग्रस्त रहे ।। २७ ।।
रक्षसा विप्रमुक्तोऽथ स नृपस्तद् वनं महत् ।
तेजसा रञ्जयामास संध्याभ्रमिव भास्करः ॥ २८ ॥
उस (मन्त्रपूत जलके प्रभावसे) राक्षसने भी राजाको छोड़ दिया। फिर तो भगवान् भास्कर जैसे संध्याकालीन बादलोंको अपनी (अरुण) किरणोंसे रँग देते हैं, उसी प्रकार राजाने अपने (सहज) तेजसे उस महान् वनको अनुरंजित कर दिया ॥ २८ ॥
प्रतिलभ्य ततः संज्ञामभिवाद्य कृताञ्जलिः ।
उवाच नृपतिः काले वसिष्ठमृषिसत्तमम् ॥ २९ ॥
तदनन्तर सचेत होनेपर राजा कल्माषपादने तत्काल ही मुनिश्रेष्ठ वसिष्ठको प्रणाम किया और हाथ जोड़कर कहा— ॥ २९ ॥
सौदासोऽहं महाभाग याज्यस्ते मुनिसत्तम ।
अस्मिन् काले यदिष्टं ते ब्रूहि किं करवाणि ते ॥ ३० ॥
'महाभाग मुनिश्रेष्ठ! मैं आपका यजमान सौदास हूँ। इस समय आपकी जो अभिलाषा हो, कहिये—मैं आपकी क्या सेवा करूँ?' ॥ ३० ॥
वसिष्ठ उवाच
वृत्तमेतद् यथाकालं गच्छ राज्यं प्रशाधि वै ।
ब्राह्मणं तु मनुष्येन्द्र मावमंस्थाः कदाचन ॥ ३१ ॥
**वसिष्ठजीने कहा—**नरेन्द्र! मेरी जो अभिलाषा थी, वह समयानुसार सिद्ध हो गयी। अब जाओ, अपना राज्य सँभालो। (आजसे फिर) कभी ब्राह्मणका अपमान न करना ॥ ३१ ॥
राजोवाच
नावमंस्ये महाभाग कदाचिद् ब्राह्मणानहम् ।
त्वन्निदेशे स्थितः सम्यक् पूजयिष्याम्यहं द्विजान् ॥ ३२ ॥
**राजा बोले—**महाभाग! मैं कभी ब्राह्मणोंका अपमान नहीं करूँगा। आपकी आज्ञाके पालनमें संलग्न हो (सदा) ब्राह्मणोंकी भलीभाँति पूजा करूँगा ॥ ३२ ॥
इक्ष्वाकूणां च येनाहमनृणः स्यां द्विजोत्तम ।
तत् त्वत्तः प्राप्तुमिच्छामि सर्ववेदविदां वर ॥ ३३ ॥
समस्त वेदवेत्ताओंमें अग्रगण्य द्विजश्रेष्ठ! मैं आपसे एक पुत्र प्राप्त करना चाहता हूँ, जिसके द्वारा मैं अपने इक्ष्वाकुवंशी पितरोंके ऋणसे उऋण हो सकूँ ॥ ३३ ॥
अपत्यमीप्सितं मह्यं दातुमर्हसि सत्तम ।
शीलरूपगुणोपेतमिक्ष्वाकुकुलवृद्धये ॥ ३४ ॥
साधुशिरोमणे! इक्ष्वाकुवंशकी वृद्धिके लिये आप मुझे ऐसी अभीष्ट संतान दीजिये, जो उत्तम स्वभाव, सुन्दर रूप और श्रेष्ठ गुणोंसे सम्पन्न हो ॥ ३४ ॥
गन्धर्व उवाच
ददानीत्येव तं तत्र राजानं प्रत्युवाच ह ।
वसिष्ठः परमेष्वासं सत्यसंधो द्विजोत्तमः ॥ ३५ ॥
गन्धर्व कहता है—कुन्तीनन्दन! तब सत्यप्रतिज्ञ विप्रवर वसिष्ठने महान् धनुर्धर राजा कल्माषपादसे उत्तरमें कहा—'मैं तुम्हें वैसा ही पुत्र दूँगा' ॥ ३५ ॥
ततः प्रतिययौ काले वसिष्ठः सह तेन वै ।
ख्यातां पुरीमिमां लोकेष्वयोध्यां मनुजेश्वर ॥ ३६ ॥
मनुजेश्वर! तदनन्तर यथासमय राजाके साथ वसिष्ठजी उनकी राजधानीमें गये, जो लोकोंमें अयोध्या पुरीके नामसे प्रसिद्ध है ॥ ३६ ॥
तं प्रजाः प्रतिमोदन्त्यः सर्वाः प्रत्युद्गतास्तदा ।
विपाप्मानं महात्मानं दिवौकस इवेश्वरम् ॥ ३७ ॥
अपने पापरहित महात्मा नरेशका आगमन सुनकर अयोध्याकी सारी प्रजा अत्यन्त प्रसन्न हो उनकी अगवानीके लिये ठीक उसी तरह बाहर निकल आयी, जैसे देवतालोग अपने स्वामी इन्द्रका स्वागत करते हैं ॥ ३७ ॥
सुचिराय मनुष्येन्द्रो नगरीं पुण्यलक्षणाम् ।
विवेश सहितस्तेन वसिष्ठेन महर्षिणा ॥ ३८ ॥
ददृशुस्तं महीपालमयोध्यावासिनो जनाः ।
पुरोहितेन सहितं दिवाकरमिवोदितम् ॥ ३९ ॥
बहुत वर्षोंके बाद राजाने उस पुण्यमयी नगरीमें प्रसिद्ध महर्षि वसिष्ठके साथ प्रवेश किया। अयोध्या-वासी लोगोंने पुरोहितके साथ आये हुए राजा कल्माष-पादका उसी प्रकार दर्शन किया, जैसे (प्रातःकाल) प्रजा उदित हुए भगवान् सूर्यका दर्शन करती है ॥ ३८-३९ ॥
स च तां पूरयामास लक्ष्म्या लक्ष्मीवतां वरः ।
अयोध्यां व्योम शीतांशुः शरत्काल इवोदितः ॥ ४० ॥
जैसे शीतल किरणोंवाले चन्द्रमा शरत्कालमें उदित हो आकाशको अपनी ज्योत्स्नासे जगमग कर देते हैं, उसी प्रकार लक्ष्मीवानोंमें श्रेष्ठ नरेशने उस अयोध्यापुरीको शोभासे परिपूर्ण कर दिया ॥ ४० ॥
संसिक्तमृष्टपन्थानं पताकाध्वजशोभितम् ।
मनः प्रह्लादयामास तस्य तत् पुरमुत्तमम् ॥ ४१ ॥
नगरकी सड़कोंको झाड़-बुहारकर उनपर छिड़काव किया गया था। सब ओर लगी हुई ध्वजा-पताकाएँ उस पुरीकी शोभा बढ़ा रही थीं। इस प्रकार राजाकी वह उत्तम नगरी दर्शकोंके मनको उत्तम आह्लाद प्रदान कर रही थी ॥ ४१ ॥
तुष्टपुष्टजनाकीर्णा सा पुरी कुरुनन्दन ।
अशोभत तदा तेन शक्रेणेवामरावती ॥ ४२ ॥ कुरुनन्दन! जैसे इन्द्रसे अमरावतीकी शोभा होती है, उसी प्रकार संतुष्ट एवं पुष्ट मनुष्योंसे भरी हुई अयोध्यापुरी उस समय महाराज कल्माषपादकी उपस्थितिसे बड़ी शोभा पा रही थी ॥ ४२ ॥
ततः प्रविष्टे राजर्षौ तस्मिंस्तत् पुरमुत्तमम् । राज्ञस्तस्याज्ञया देवी वसिष्ठमुपचक्रमे ॥ ४३ ॥ राजर्षि कल्माषपादके उस उत्तम नगरीमें प्रवेश करनेके पश्चात् उक्त महाराजकी आज्ञाके अनुसार महारानी (मदयन्ती) महर्षि वसिष्ठजीके समीप गयीं ॥ ४३ ॥
ऋतावथ महर्षिः स सम्बभूव तया सह । देव्या दिव्येन विधिना वसिष्ठः श्रेष्ठभागृषिः ॥ ४४ ॥ तत्पश्चात् भगवद्भक्त महर्षि वसिष्ठने ऋतुकालमें शास्त्रकी अलौकिक विधिके अनुसार महारानीके साथ नियोग किया ॥ ४४ ॥
ततस्तस्यां समुत्पन्ने गर्भे स मुनिसत्तमः । राज्ञाभिवादितस्तेन जगाम मुनिराश्रमम् ॥ ४५ ॥ तदनन्तर रानीकी कुक्षिमें गर्भ स्थापित हो जानेपर उक्त राजासे वन्दित हो (उनसे विदा लेकर) मुनिवर वसिष्ठ अपने आश्रमको लौट गये ॥ ४५ ॥
दीर्घकालेन सा गर्भं सुषुवे न तु तं यदा । तदा देव्यश्मना कुक्षिं निर्बिभेद यशस्विनी ॥ ४६ ॥ जब बहुत समय बीतनेके बाद (भी) वह गर्भ बाहर न निकला, तब यशस्विनी रानी (मदयन्ती)-ने अश्म (पत्थर)-से अपने गर्भाशयपर प्रहार किया ॥ ४६ ॥
ततोऽपि द्वादशे वर्षे स जज्ञे पुरुषर्षभः । अश्मको नाम राजर्षिः पौदन्यं यो न्यवेशयत् ॥ ४७ ॥ तदनन्तर बारहवें वर्षमें बालकका जन्म हुआ। वही पुरुषश्रेष्ठ राजर्षि अश्मकके नामसे प्रसिद्ध हुआ, जिन्होंने पौदन्य नामका नगर बसाया था ॥ ४७ ॥
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि चैत्ररथपर्वणि वासिष्ठे सौदाससुतोत्पत्तौ षट्सप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १७६ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत चैत्ररथपर्वमें वसिष्ठचरित्रके प्रसंगमें सौदासको पुत्र-प्राप्तिविषयक एक सौ छिहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १७६ ॥
१७७-
सप्तसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः
शक्तिपुत्र पराशरका जन्म और पिताकी मृत्युका हाल सुनकर कुपित हुए पराशरको शान्त करनेके लिये वसिष्ठजीका उन्हें और्वोपाख्यान सुनाना
गन्धर्व उवाच
आश्रमस्था ततः पुत्रमदृश्यन्ती व्यजायत ।
शक्तेः कुलकरं राजन् द्वितीयमिव शक्तिनम् ॥ १ ॥
गन्धर्व कहता है—अर्जुन! तदनन्तर (वसिष्ठजीके) आश्रममें रहती हुई अदृश्यन्तीने शक्तिके वंशको बढ़ानेवाले एक पुत्रको जन्म दिया, मानो उस बालकके रूपमें दूसरे शक्ति मुनि ही हों ॥ १ ॥
जातकर्मादिकास्तस्य क्रियाः स मुनिसत्तमः ।
पौत्रस्य भरतश्रेष्ठ चकार भगवान् स्वयम् ॥ २ ॥
भरतश्रेष्ठ! मुनिवर भगवान् वसिष्ठने स्वयं अपने पौत्रके जातकर्म आदि संस्कार किये ॥ २ ॥
परासुः स यतस्तेन वसिष्ठः स्थापितो मुनिः ।
गर्भस्थेन ततो लोके पराशर इति स्मृतः ॥ ३ ॥
उस बालकने गर्भमें आकर परासु (मरनेकी इच्छावाले) वसिष्ठ मुनिको पुनः जीवित रहनेके लिये उत्साहित किया था; इसलिये वह लोकमें ‘पराशर’ के नामसे विख्यात हुआ ॥ ३ ॥
अमन्यत स धर्मात्मा वसिष्ठं पितरं मुनिः ।
जन्मप्रभृति तस्मिंस्तु पितरीवान्ववर्तत ॥ ४ ॥
धर्मात्मा पराशर मुनि वसिष्ठको ही अपना पिता मानते थे और जन्मसे ही उनके प्रति पितृभाव रखते थे ॥ ४ ॥
स तात इति विप्रर्षिर्वसिष्ठं प्रत्यभाषत ।
मातुः समक्षं कौन्तेय अदृश्यन्त्याः परंतप ॥ ५ ॥
परंतप कुन्तीकुमार! एक दिन ब्रह्मर्षि पराशरने अपनी माता अदृश्यन्तीके सामने ही वसिष्ठजीको ‘तात’ कहकर पुकारा ॥ ५ ॥
तातेति परिपूर्णार्थं तस्य तन्मधुरं वचः ।
अदृश्यन्त्यश्रुपूर्णाक्षी शृण्वती तमुवाच ह ॥ ६ ॥
बेटेके मुखसे परिपूर्ण अर्थका बोधक 'तात' यह मधुर वचन सुनकर अदृश्यन्तीके नेत्रोंमें आँसू भर आये और वह उससे बोली— ।। ६ ।।
मा तात तात तातेति ब्रूह्येनं पितरं पितुः ।
रक्षसा भक्षितस्तात तव तातो वनान्तरे ।। ७ ।।
'बेटा! ये तुम्हारे पिताके भी पिता हैं। तुम इन्हें 'तात तात!' कहकर न पुकारो। वत्स! तुम्हारे पिताको तो वनके भीतर राक्षस खा गया ।। ७ ।।
मन्यसे यं तु तातेति नैष तातस्तवानघ ।
आर्य एष पिता तस्य पितुस्तव यशस्विनः ।। ८ ।।
'अनघ! तुम जिन्हें तात मानते हो, ये तुम्हारे तात नहीं हैं। ये तो तुम्हारे यशस्वी पिताके भी पूजनीय पिता हैं' ।। ८ ।।
स एवमुक्तो दुःखार्तः सत्यवागृषिसत्तमः ।
सर्वलोकविनाशाय मतिं चक्रे महामनाः ।। ९ ।।
माताके यों कहनेपर सत्यवादी मुनिश्रेष्ठ महामना पराशर दुःखसे आतुर हो उठे। उन्होंने उसी समय सब लोकोंको नष्ट कर डालनेका विचार किया ।। ९ ।।
तं तथा निश्चितात्मानं स महात्मा महातपाः ।
ऋषिर्ब्रह्मविदां श्रेष्ठो मैत्रावरुणिरन्त्यधीः ।। १० ।।
वसिष्ठो वारयामास हेतुना येन तच्छृणु ।
उनके मनका ऐसा निश्चय जान ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ महातपस्वी, महात्मा एवं तात्त्विक बुद्धिवाले मित्रावरुणनन्दन वसिष्ठजीने पराशरको ऐसा करनेसे रोक दिया। जिस हेतु और युक्तिसे वे उन्हें रोकनेमें सफल हुए, वह (बताता हूँ,) सुनिये ।। १० ½ ।।
वसिष्ठ उवाच
कृतवीर्य इति ख्यातो बभूव पृथिवीपतिः ।। ११ ।।
याज्यो वेदविदां लोके भृगूणां पार्थिवर्षभः ।
स तानग्रभुजस्तात धान्येन च धनेन च ।। १२ ।।
सोमान्ते तर्पयामास विपुलेन विशाम्पतिः ।
तस्मिन् नृपतिशार्दूले स्वर्गतेऽथ कथंचन ।। १३ ।।
बभूव तत्कुलेयानां द्रव्यकार्यमुपस्थितम् ।
भृगूणां तु धनं ज्ञात्वा राजानः सर्व एव ते ।। १४ ।।
याचिष्णवोऽभिजग्मुस्तांस्ततो भार्गवसत्तमान् ।
भूमौ तु निदधुः केचिद् भृगवो धनमक्षयम् ।। १५ ।।
**वसिष्ठजीने (पराशरसे) कहा—**वत्स! इस पृथ्वीपर कृतवीर्य नामसे प्रसिद्ध एक राजा थे। वे नृपश्रेष्ठ वेदज्ञ भृगुवंशी ब्राह्मणोंके यजमान थे। तात! उन महाराजने सोमयज्ञ
करके उसके अन्तमें उन अग्रभोजी भार्गवोंको विपुल धन और धान्य देकर उसके द्वारा पूर्ण संतुष्ट किया। राजाओंमें श्रेष्ठ कृतवीर्यके स्वर्गवासी हो जानेपर उनके वंशजोंको किसी तरह द्रव्यकी आवश्यकता आ पड़ी। भृगुवंशी ब्राह्मणोंके यहाँ धन है, यह जानकर वे सभी राजपुत्र उन श्रेष्ठ भार्गवोंके पास याचक बनकर गये। उस समय कुछ भार्गवोंने अपनी अक्षय धनराशिको धरतीमें गाड़ दिया ।। ११—१५ ।।
ददुः केचिद् द्विजातिभ्यो ज्ञात्वा क्षत्रियतो भयम् ।
भृगवस्तु ददुः केचित् तेषां वित्तं यथेप्सितम् ॥ १६ ॥
कुछने क्षत्रियोंसे भय समझकर अपना धन ब्राह्मणोंको दे दिया और कुछ भृगुवंशियोंने उन क्षत्रियोंको यथेष्ट धन दे भी दिया ।। १६ ।।
क्षत्रियाणां तदा तात कारणान्तरदर्शनात् ।
ततो महीतलं तात क्षत्रियेण यदृच्छया ।। १७ ।।
खनताधिगतं वित्तं केनचिद् भृगुवेश्मनि ।
तद् वित्तं ददृशुः सर्वे समेताः क्षत्रियर्षभाः ।। १८ ।।
तात! कुछ दूसरे-दूसरे कारणोंका विचार करके उस समय उन्होंने क्षत्रियोंको धन प्रदान किया था। वत्स! तदनन्तर किसी क्षत्रियने अकस्मात् धरती खोदते-खोदते किसी भृगुवंशीके घरमें गड़ा हुआ धन पा लिया। तब सभी श्रेष्ठ क्षत्रियोंने एकत्र होकर उस धनको देखा ।। १७-१८ ।।
अवमन्य ततः क्रोधाद् भृगूंस्ताञ्छरणागतान् ।
निजघ्नुः परमेष्वासाः सर्वांस्तान् निशितैः शरैः ।। १९ ।।
फिर तो उन्होंने क्रोधमें भरकर शरणमें आये हुए भृगुवंशियोंका भी अपमान किया। उन महान् धनुर्धर वीरोंने (वहाँ आये हुए) समस्त भार्गवोंको तीखे बाणोंसे मारकर यमलोक पहुँचा दिया ।। १९ ।।
आगर्भादवकृन्तन्तश्चेरुः सर्वां वसुन्धराम् ।
तत उच्छिद्यमानेषु भृगुष्वेवं भयात् तदा ।। २० ।।
भृगुपत्न्यो गिरिं दुर्गं हिमवन्तं प्रपेदिरे ।
तासामन्यतमा गर्भं भयाद् दध्रे महौजसम् ।। २१ ।।
ऊरुणैकेन वामोरुभर्तुः कुलविवृद्धये ।
तद् गर्भमुपलभ्याशु ब्राह्मणी या भयार्दिता ।। २२ ।।
गत्वाैका कथयामास क्षत्रियाणामुपह्वरे ।
ततस्ते क्षत्रिया जग्मुस्तं गर्भं हन्तुमुद्यताः ।। २३ ।।
तदनन्तर भृगुवंशियोंके गर्भस्थ बालकोंकी भी हत्या करते हुए वे क्रोधान्ध क्षत्रिय सारी पृथ्वीपर विचरने लगे। इस प्रकार भृगुवंशका उच्छेद आरम्भ होनेपर भृगुवंशियोंकी पत्नियाँ उस समय भयके मारे हिमालयकी दुर्गम कन्दरामें जा छिपीं। उनमेंसे एक स्त्रीने अपने
महान् तेजस्वी गर्भको भयके मारे एक ओरकी जाँघको चीरकर उसमें रख लिया। उस वामोरुने अपने पतिके वंशकी वृद्धिके लिये ऐसा साहस किया था। उस गर्भका समाचार जानकर कोई ब्राह्मणी बहुत डर गयी और उसने शीघ्र ही अकेली जाकर क्षत्रियोंके समीप उसकी खबर पहुँचा दी। फिर तो वे क्षत्रियलोग उस गर्भकी हत्या करनेके लिये उद्यत हो वहाँ गये।। २०—२३।।
ददृशुर्ब्राह्मणीं तेऽथ दीप्यमानां स्वतेजसा।
अथ गर्भः स भित्त्वोरुं ब्राह्मण्या निर्जगाम ह॥ २४॥
उन्होंने देखा, वह ब्राह्मणी अपने तेजसे प्रकाशित हो रही है। उसी समय उस ब्राह्मणीका वह गर्भस्थ शिशु उसकी जाँघ फाड़कर बाहर निकल आया॥ २४॥
मुष्णन् दृष्टीः क्षत्रियाणां मध्याह्न इव भास्करः।
ततश्चक्षुर्विहीनास्ते गिरिदुर्गेषु बभ्रमुः॥ २५॥
बाहर निकलते ही दोपहरके प्रचण्ड सूर्यकी भाँति उस तेजस्वी शिशुने (अपने तेजसे) उन क्षत्रियोंकी आँखोंकी ज्योति छीन ली। तब वे अंधे होकर उस पर्वतके बीहड़ स्थानोंमें भटकने लगे॥ २५॥
ततस्ते मोहमापन्ना राजानो नष्टदृष्टयः।
ब्राह्मणीं शरणं जग्मुर्दृष्ट्यर्थं तामनिन्दिताम्॥ २६॥
फिर मोहके वशीभूत हो अपनी दृष्टिको खो देनेवाले क्षत्रियोंने पुनः दृष्टि प्राप्त करनेके लिये उसी सती-साध्वी ब्राह्मणीकी शरण ली॥ २६॥
ऊचुश्चैनां महाभागां क्षत्रियास्ते विचेतसः।
ज्योतिः प्रहीणा दुःखार्ताः शान्तार्चिष इवाग्नयः॥ २७॥
भगवत्याः प्रसादेन गच्छेत् क्षत्रं सचक्षुषम्।
उपारम्य च गच्छेम सहिताः पापकर्मिणः॥ २८॥
वे क्षत्रिय उस समय आँखकी ज्योतिसे वंचित हो बुझी हुई लपटोंवाली आगके समान अत्यन्त दुःखसे आतुर एवं अचेत हो रहे थे। अतः वे उस महान् सौभाग्यशालिनी देवीसे इस प्रकार बोले—‘देवि! यदि आपकी कृपा हो तो नेत्र पाकर यह क्षत्रियोंका दल अब लौट जायगा, थोड़ी देर विश्राम करके हम सभी पापाचारी यहाँसे साथ ही चले जायँगे’॥ २७-२८॥
सपुत्रा त्वं प्रसादं नः कर्तुमर्हसि शोभने।
पुनर्दृष्टिप्रदानेन राज्ञः संत्रातुमर्हसि॥ २९॥
‘शोभने! तुम अपने पुत्रके साथ हम सबपर प्रसन्न हो जाओ और पुनः नूतन दृष्टि देकर हम सभी राजपुत्रोंकी रक्षा करो’॥ २९॥