महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1248, कुल 2256 में से
संदर्भ में पढ़ेंपञ्चसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः
शक्तिके शापसे कल्माषपादका राक्षस होना, विश्वामित्रकी प्रेरणासे राक्षसद्वारा वसिष्ठके पुत्रोंका भक्षण और वसिष्ठका शोक
गन्धर्व उवाच
कल्माषपाद इत्येवं लोके राजा बभूव ह ।
इक्ष्वाकुवंशजः पार्थ तेजसासदृशो भुवि ॥ १ ॥
गन्धर्व कहता है—अर्जुन! इक्ष्वाकुवंशमें एक राजा हुए, जो लोकमें कल्माषपादके नामसे प्रसिद्ध थे। इस पृथ्वीपर वे एक असाधारण तेजस्वी राजा थे ॥ १ ॥
स कदाचिद् वनं राजा मृगयां निर्ययौ पुरात् ।
मृगान् विध्यन् वराहांश्च चचार रिपुमर्दनः ॥ २ ॥
एक दिन वे नगरसे निकलकर वनमें हिंसक पशुओंको मारनेके लिये गये। वहाँ वे रिपुमर्दन नरेश वराहों और अन्य हिंसक पशुओंको मारते हुए इधर-उधर विचरने लगे ॥ २ ॥
तस्मिन् वने महाघोरे खड्गांश्च बहुशोऽहनत् ।
हत्वा च सुचिरं श्रान्तो राजा निववृते ततः ॥ ३ ॥
उस महाभयानक वनमें उन्होंने बहुत-से गैंडे भी मारे। बहुत देरतक हिंस्र पशुओंको मारकर जब राजा थक गये, तब वहाँसे नगरकी ओर लौटे ॥ ३ ॥
अकामयत् तं याज्यार्थे विश्वामित्रः प्रतापवान् ।
स तु राजा महात्मानं वासिष्ठमृषिसत्तमम् ॥ ४ ॥
तृषार्तश्च क्षुधार्तश्च एकायनगतः पथि ।
अपश्यदजितः संख्ये मुनिं प्रतिमुखागतम् ॥ ५ ॥
प्रतापी विश्वामित्र उन्हें अपना यजमान बनाना चाहते थे। राजा कल्माषपाद युद्धमें कभी पराजित नहीं होते थे। उस दिन वे भूख-प्याससे पीड़ित थे और ऐसे तंग रास्तेपर आ पहुँचे थे, जहाँ एक ही आदमी आ-जा सकता था। वहाँ आनेपर उन्होंने देखा, सामनेकी ओरसे मुनिश्रेष्ठ महामना वसिष्ठकुमार आ रहे हैं ॥ ४-५ ॥
शक्तिं नाम महाभागं वसिष्ठकुलवर्धनम् ।
ज्येष्ठं पुत्रं पुत्रशताद् वसिष्ठस्य महात्मनः ॥ ६ ॥
वे वसिष्ठजीके वंशकी वृद्धि करनेवाले महाभाग शक्ति थे। महात्मा वसिष्ठजीके सौ पुत्रोंमें सबसे बड़े वे ही थे ॥ ६ ॥