भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1247

विश्वामित्रः क्षत्रभावान्निर्विण्णो वाक्यमब्रवीत् । धिक् बलं क्षत्रियबलं ब्रह्मतेजोबलं बलम् ।। ४५ ।। ब्रह्मतेजका यह अत्यन्त आश्चर्यजनक चमत्कार देखकर विश्वामित्र क्षत्रियत्वसे खिन्न एवं उदासीन हो यह बात बोले—'क्षत्रिय-बल तो नाममात्रका ही बल है, उसे धिक्कार है। ब्रह्मतेजजनित बल ही वास्तविक बल है' ।। ४४-४५ ।। बलाबलं विनिश्चित्य तप एव परं बलम् । स राज्यं स्फीतमुत्सृज्य तां च दीप्तां नृपश्रियम् ।। ४६ ।। भोगांश्च पृष्ठतः कृत्वा तपस्येव मनो दधे । स गत्वा तपसा सिद्धिं लोकान् विष्टभ्य तेजसा ।। ४७ ।। तताप सर्वान् दीप्तौजा ब्राह्मणत्वमवाप्तवान् । अपिबच्च ततः सोममिन्द्रेण सह कौशिकः ।। ४८ ।। इस प्रकार बलाबलका विचार करके उन्होंने तपस्याको ही सर्वोत्तम बल निश्चित किया और अपने समृद्धिशाली राज्य तथा देदीप्यमान राज्यलक्ष्मीको छोड़कर, भोगोंको पीछे करके तपस्यामें ही मन लगाया। इस तपस्यासे सिद्धिको प्राप्त हो उद्दीप्त तेजवाले विश्वामित्रजीने अपने प्रभावसे सम्पूर्ण लोकोंको स्तब्ध एवं संतप्त कर दिया और (अन्ततोगत्वा) ब्राह्मणत्व प्राप्त कर लिया; फिर वे इन्द्रके साथ सोमपान करने लगे ।। ४६—४८ ।।

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि चैत्ररथपर्वणि वासिष्ठे विश्वामित्रपराभवे चतुःसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः ।। १७४ ।। इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत चैत्ररथपर्वमें वसिष्ठजीके चरित्रके प्रसंगमें विश्वामित्र-पराभवविषयक एक सौ चौहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १७४ ।। (दाक्षिणात्य अधिक पाठके १० १/३ श्लोक मिलाकर कुल ५८ १/३ श्लोक हैं)


१. गौओंके मस्तक आदि छः अंगोंका बड़ा एवं विस्तृत होना शुभ माना गया है। जैसा कि शास्त्रका वचन है— शिरो ग्रीवा सक्थिनी च सास्ना पुच्छमथ स्तनाः । शुभान्येतानि धेनूनामायतानि प्रचक्षते ।। २. गौओंका ललाट, दोनों नेत्र और दोनों कान—ये पाँचों अंग पृथु (पुष्ट एवं विस्तृत) हों तो विद्वानोंद्वारा अच्छे माने जाते हैं। जैसा कि शास्त्रका वचन है— ललाटं श्रवणौ चैव नयनद्वितयं तथा । पृथून्यैतानि शस्यन्ते धेनूनां पञ्च सूरिभिः ।। [नीलकण्ठी टीकासे]