भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

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पृष्ठ 1249

अपगच्छ पथोऽस्माकमित्येवं पार्थिवोऽब्रवीत् । तथा ऋषिरुवाचैनं सान्त्वयञ्श्लक्ष्णया गिरा ॥ ७ ॥ उन्हें देखकर राजाने कहा—'हमारे रास्तेसे हट जाओ।' तब शक्ति मुनिने मधुर वाणीमें उन्हें समझाते हुए कहा— ॥ ७ ॥

मम पन्था महाराज धर्म एष सनातनः । राज्ञा सर्वेषु धर्मेषु देयः पन्था द्विजातये ॥ ८ ॥ 'महाराज! मार्ग तो मुझे ही मिलना चाहिये। यही सनातन धर्म है। सभी धर्मोंमें राजाके लिये यही उचित है कि ब्राह्मणको मार्ग दे' ॥ ८ ॥

एवं परस्परं तौ तु पथोऽर्थं वाक्यमूचतुः । अपसर्पापसर्पेति वागुत्तरमकुर्वताम् ॥ ९ ॥ इस प्रकार वे दोनों आपसमें रास्तेके लिये वाग्युद्ध करने लगे। एक कहता, 'तुम हटो' तो दूसरा कहता, 'नहीं, तुम हटो।' इस प्रकार वे उत्तर-प्रत्युत्तर करने लगे ॥ ९ ॥

ऋषिस्तु नापचक्राम तस्मिन् धर्मपथे स्थितः । नापि राजा मुनेर्मानात् क्रोधाच्चाथ जगाम ह ॥ १० ॥ अमुञ्चन्तं तु पन्थानं तमृषिं नृपसत्तमः । जघान कशया मोहात् तदा राक्षससन्मुनिम् ॥ ११ ॥ ऋषि तो धर्मके मार्गमें स्थित थे, अतः वे रास्ता छोड़कर नहीं हटे। उधर राजा भी मान और क्रोधके वशीभूत हो मुनिके मार्गसे इधर-उधर नहीं हट सके। राजाओंमें श्रेष्ठ कल्माषपादने मार्ग न छोड़नेवाले शक्ति मुनिके ऊपर मोह-वश राक्षसकी भाँति कोड़ेसे आघात किया ॥ १०-११ ॥

कशाप्रहाराभिहतस्ततः स मुनिसत्तमः । तं शशाप नृपश्रेष्ठं वासिष्ठः क्रोधमूर्च्छितः ॥ १२ ॥ कोड़ेकी चोट खाकर मुनिश्रेष्ठ शक्तिने क्रोधसे मूर्च्छित हो उन उत्तम नरेशको शाप दे दिया ॥ १२ ॥

हंसि राक्षसवद् यस्माद् राजापसद तापसम् । तस्मात् त्वमद्यप्रभृति पुरुषादो भविष्यसि ॥ १३ ॥ मनुष्यपिशिते सक्तश्चरिष्यसि महीमिमाम् । गच्छ राजाधमेत्युक्तः शक्तिना वीर्यशक्तिना ॥ १४ ॥ तपस्याकी प्रबल शक्तिसे सम्पन्न शक्तिमुनिने कहा—'राजाओंमें नीच कल्माषपाद! तू एक तपस्वी ब्राह्मणको राक्षसकी भाँति मार रहा है, इसलिये आजसे नरभक्षी राक्षस हो जायगा तथा अबसे तू मनुष्योंके मांसमें आसक्त होकर इस पृथ्वीपर विचरता रहेगा। नृपाधम! जा यहाँसे' ॥ १३-१४ ॥