महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1251, कुल 2256 में से
संदर्भ में पढ़ेंस तु शप्तस्तदा तेन शक्तिना वै नृपोत्तमः । जगाम शरणं शक्तिं प्रसादयितुमर्हयन् ॥ १९ ॥ जब शक्तिने शाप दे दिया, तब नृपतिशिरोमणि कल्माषपाद उनकी स्तुति करते हुए उन्हें प्रसन्न करनेके लिये उनके शरण होने चले ॥ १९ ॥
तस्य भावं विदित्वा स नृपतेः कुरुसत्तम । विश्वामित्रस्ततो रक्ष आदिशेद् नृपं प्रति ॥ २० ॥ कुरुश्रेष्ठ! राजाके मनोभावको समझकर उक्त विश्वामित्रजीने एक राक्षसको राजाके भीतर प्रवेश करनेके लिये आज्ञा दी ॥ २० ॥
शापात् तस्य तु विप्रर्षेर्विश्वामित्रस्य चाज्ञया । राक्षसः किंकरो नाम विवेश नृपतिं तदा ॥ २१ ॥ ब्रह्मर्षि शक्तिके शाप तथा विश्वामित्रजीकी आज्ञासे किंकर नामक राक्षसने तब राजाके भीतर प्रवेश किया ॥ २१ ॥
रक्षसा तं गृहीतं तु विदित्वा मुनिसत्तमः । विश्वामित्रोऽप्यपाक्रामत् तस्माद् देशादरिंदम ॥ २२ ॥ शत्रुसूदन! राक्षसने राजाको आविष्ट कर लिया है, यह जानकर मुनिवर विश्वामित्रजी भी उस स्थानसे चले गये ॥ २२ ॥
ततः स नृपतिस्तेन रक्षसान्तर्गतेन वै । बलवत् पीडितः पार्थ नान्यबुध्यत किंचन ॥ २३ ॥ कुन्तीनन्दन! भीतर घुसे हुए राक्षससे अत्यन्त पीड़ित हो उन नरेशको किसी भी बातकी सुध-बुध न रही ॥ २३ ॥
ददर्शार्थ द्विजः कश्चिद् राजानं प्रस्थितं वनम् । अयाचत क्षुधापन्नः समांसं भोजनं तदा ॥ २४ ॥ एक दिन किसी ब्राह्मणने (राक्षससे आविष्ट) राजाको वनकी ओर जाते देखा और भूखसे अत्यन्त पीड़ित होनेके कारण उनसे मांससहित भोजन माँगा ॥ २४ ॥
तमुवाचाथ राजर्षिर्द्विजं मित्रसहस्तदा । आस्स्व ब्रह्मंस्त्वमत्रैव मुहूर्तं प्रतिपालयन् ॥ २५ ॥ तब राजर्षि मित्रसह (कल्माषपाद)-ने उस द्विजसे कहा—'ब्रह्मन्! आप यहीं बैठिये और दो घड़ीतक प्रतीक्षा कीजिये ॥ २५ ॥
निवृत्तः प्रतिदास्यामि भोजनं ते यथेप्सितम् । इत्युक्त्वा प्रययौ राजा तस्थौ च द्विजसत्तमः ॥ २६ ॥ 'मैं वनसे लौटनेपर आपको यथेष्ट भोजन दूँगा।' यह कहकर राजा चले गये और वह ब्राह्मण (वहाँ) ठहर गया ॥ २६ ॥
ततो राजा परिक्रम्य यथाकामं यथासुखम् ।