भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

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पृष्ठ 1253

ब्राह्मण उवाच

यस्मादभोज्यमन्नं मे ददाति स नृपाधमः । तस्मात् तस्यैव मूढस्य भविष्यत्यत्र लोलुपा ॥ ३५ ॥ ब्राह्मणने कहा— वह नीच राजा मुझे न खाने-योग्य अन्न दे रहा है, अतः उसी मूर्खकी जिह्वा ऐसे अन्नके लिये लालायित रहेगी ॥ ३५ ॥

सक्तो मानुषमांसेषु यथोक्तः शक्तिना तथा । उद्वेजनीयो भूतानां चरिष्यति महीमिमाम् ॥ ३६ ॥ जैसा कि शक्ति मुनिने कहा है, वह मनुष्योंके मांसमें आसक्त हो समस्त प्राणियोंका उद्वेगपात्र बनकर इस पृथ्वीपर विचरेगा ॥ ३६ ॥

द्विरनुव्याहृते राज्ञः स शापो बलवानभूत् । रक्षोबलसमाविष्टो विसंज्ञश्चाभवन्नृपः ॥ ३७ ॥ दो बार इस तरहकी बात कही जानेके कारण राजाका शाप प्रबल हो गया। उसके साथ उनमें राक्षसके बलका समावेश हो जानेके कारण राजाकी विवेकशक्ति सर्वथा लुप्त हो गयी ॥ ३७ ॥

ततः स नृपतिश्रेष्ठो रक्षसापहृतेन्द्रियः । उवाच शक्तिं तं दृष्ट्वा न चिरादिव भारत ॥ ३८ ॥ भारत! राक्षसने राजाके मन और इन्द्रियोंको काबूमें कर लिया था, अतः उन नृपश्रेष्ठने कुछ ही दिनों बाद उक्त शक्ति मुनिको अपने सामने देखकर कहा— ॥ ३८ ॥

यस्मादसद्दशः शापः प्रयुक्तोऽयं मयि त्वया । तस्मात् त्वत्तः प्रवर्तिष्ये खादितुं पुरुषानहम् ॥ ३९ ॥ ‘चूँकि तुमने मुझे यह सर्वथा अयोग्य शाप दिया है, अतः अब मैं तुम्हींसे मनुष्योंका भक्षण आरम्भ करूँगा’ ॥ ३९ ॥

एवमुक्त्वा ततः सद्यस्तं प्राणैर्विप्रयुज्य च । शक्तिनं भक्षयामास व्याघ्रः पशुमिवेप्सितम् ॥ ४० ॥ यों कहकर राजाने तत्काल ही शक्तिके प्राण ले लिये और जैसे बाघ अपनी रुचिके अनुकूल पशुको चबा जाता है, उसी प्रकार वे भी शक्तिको खा गये ॥ ४० ॥

शक्तिनं तु मृतं दृष्ट्वा विश्वामित्रः पुनः पुनः । वसिष्ठस्यैव पुत्रेषु तद् रक्षः संदिदेश ह ॥ ४१ ॥ शक्तिको मारा गया देख विश्वामित्र बार-बार वसिष्ठके पुत्रोंपर ही आक्रमण करनेके लिये उस राक्षसको प्रेरित करते थे ॥ ४१ ॥

स ताञ्छक्त्यवरान् पुत्रान् वसिष्ठस्य महात्मनः । भक्षयामास संक्रुद्धः सिंहः क्षुद्रमृगानिव ॥ ४२ ॥