भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

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पृष्ठ 1259

ततः प्रतिनिवृत्तः स तया वध्वा सहानघ । कल्माषपादमासीनं ददर्श विजने वने ॥ १७ ॥ अनघ! तब वे अपनी पुत्रवधूके साथ आश्रमकी ओर लौटने लगे। इतनेमें ही मुनिने निर्जन वनमें बैठे हुए राजा कल्माषपादको देखा ॥ १७ ॥ स तु दृष्ट्वैव तं राजा क्रुद्ध उत्थाय भारत । आविष्टो रक्षसोग्रेण इयेषात्तुं तदा मुनिम् ॥ १८ ॥ भारत! भयानक राक्षससे आविष्ट हुए राजा कल्माषपाद मुनिको देखते ही क्रोधमें भरकर उठे और उसी समय उन्हें खा जानेकी इच्छा करने लगे ॥ १८ ॥ अदृश्यन्ती तु तं दृष्ट्वा क्रूरकर्माणमग्रतः । भयसंविग्नया वाचा वसिष्ठमिदमब्रवीत् ॥ १९ ॥ उस क्रूरकर्मी राक्षसको सामने देख अदृश्यन्तीने भयाकुल वाणीमें वसिष्ठजीसे यह कहा — ॥ १९ ॥ असौ मृत्युरिवोग्रेण दण्डेन भगवन्नितः । प्रगृहीतेन काष्ठेन राक्षसोऽभ्येति दारुणः ॥ २० ॥ 'भगवन्! वह भयंकर राक्षस एक बहुत बड़ा काठ लेकर इधर ही आ रहा है, मानो साक्षात् यमराज भयानक दण्ड लिये आ रहे हों ॥ २० ॥ तं निवारयितुं शक्तो नान्योऽस्ति भुवि कश्चन । त्वदृतेऽद्य महाभाग सर्ववेदविदां वर ॥ २१ ॥ 'महाभाग! आप सम्पूर्ण वेदवेत्ताओंमें श्रेष्ठ हैं। (इस समय) इस भूतलपर आपके सिवा दूसरा कोई नहीं है, जो उस राक्षसका वेग रोक सके ॥ २१ ॥ पाहि मां भगवन् पापादस्माद् दारुणदर्शनात् । राक्षसोऽयमिहात्तुं वै नूनमावां समीहते ॥ २२ ॥ 'भगवन्! देखनेमें अत्यन्त भयंकर इस पापीसे मेरी रक्षा कीजिये। निश्चय ही यह राक्षस यहाँ हम दोनोंको खा जानेकी घातमें लगा है' ॥ २२ ॥ वसिष्ठ उवाच मा भैः पुत्रि न भेतव्यं राक्षसात् तु कथंचन । नैतद् रक्षो भयं यस्मात् पश्यसि त्वमुपस्थितम् ॥ २३ ॥ वसिष्ठजीने कहा—बेटी! भयभीत न हो। इस राक्षससे तो किसी प्रकार न डरो। जिससे तुम्हें भय उपस्थित दिखायी देता है, यह वास्तवमें राक्षस नहीं है ॥ २३ ॥ राजा कल्माषपादोऽयं वीर्यवान् प्रथितो भुवि । स एषोऽस्मिन् वनोद्देशे निवसत्यतिभीषणः ॥ २४ ॥