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महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

अध्याय (पृष्ठ 313)

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चत्वारिंशोऽध्यायः

जरत्कारुकी तपस्या, राजा परीक्षित्का उपाख्यान तथा राजाद्वारा मुनिके कंधेपर मृतक साँप रखनेके कारण दुःखी हुए कृशका शृंगीको उत्तेजित करना

शौनक उवाच

जरत्कारुरिति ख्यातो यस्त्वया सूतनन्दन ।
इच्छामि तदहं श्रोतुं ऋषेस्तस्य महात्मनः ॥ १ ॥
किं कारणं जरत्कारोर्नामैतत् प्रथितं भुवि ।
जरत्कारुनिरुक्तिं त्वं यथावद् वक्तुमर्हसि ॥ २ ॥

**शौनकजीने पूछा—**सूतनन्दन! आपने जिन जरत्कारु ऋषिका नाम लिया है, उन महात्मा मुनिके सम्बन्धमें मैं यह सुनना चाहता हूँ कि पृथ्वीपर उनका जरत्कारु नाम क्यों प्रसिद्ध हुआ? जरत्कारु शब्दकी व्युत्पत्ति क्या है? यह आप ठीक-ठीक बतानेकी कृपा करें ॥ १-२ ॥

सौतिरुवाच

जरेति क्षयमाहुर्वै दारुणं कारुसंज्ञितम् ।
शरीरं कारु तस्यासीत्तत् स धीमाञ्छनैः शनैः ॥ ३ ॥
क्षपयामास तीव्रेण तपसेत्यत उच्यते ।
जरत्कारुरिति ब्रह्मन् वासुकेर्भगिनी तथा ॥ ४ ॥

**उग्रश्रवाजीने कहा—**शौनकजी! जरा कहते हैं क्षयको और कारु शब्द दारुणका वाचक है। पहले उनका शरीर कारु अर्थात् खूब हट्टा-कट्टा था। उसे परम बुद्धिमान् महर्षिने धीरे-धीरे तीव्र तपस्याद्वारा क्षीण बना दिया। ब्रह्मन्! इसलिये उनका नाम जरत्कारु पड़ा। वासुकिकी बहिनके भी जरत्कारु नाम पड़नेका यही कारण था ॥ ३-४ ॥

एवमुक्तस्तु धर्मात्मा शौनकः प्राहसत् तदा ।
उग्रश्रवासमामन्त्र्य उपपन्नमिति ब्रुवन् ॥ ५ ॥

उग्रश्रवाजीके ऐसा कहनेपर धर्मात्मा शौनक उस समय खिलखिलाकर हँस पड़े और फिर उग्रश्रवाजीको सम्बोधित करके बोले—'तुम्हारी बात उचित है' ॥ ५ ॥

शौनक उवाच

उक्तं नाम यथापूर्वं सर्वं तच्छ्रुतवानहम् ।
यथा तु जातो ह्यास्तीक एतदिच्छामि वेदितुम् ।

तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य सौतिः प्रोवाच शास्त्रतः ॥ ६ ॥ **शौनकजी बोले—**सूतपुत्र! आपने पहले जो जरत्कारु नामकी व्युत्पत्ति बतायी है, वह सब मैंने सुन ली। अब मैं यह जानना चाहता हूँ कि आस्तीक मुनिका जन्म किस प्रकार हुआ? शौनकजीका यह वचन सुनकर उग्रश्रवाजीने पुराणशास्त्रके अनुसार आस्तीकके जन्मका वृत्तान्त बताया ॥ ६ ॥

सौतिरुवाच संदिश्य पन्नगान् सर्वान् वासुकिः सुसमाहितः । स्वसारमुद्यम्य तदा जरत्कारुमृषिं प्रति ॥ ७ ॥ **उग्रश्रवाजी बोले—**नागराज वासुकिने एकाग्रचित्त हो खूब सोच-समझकर सब सर्पोंको यह संदेश दे दिया—'मुझे अपनी बहिनका विवाह जरत्कारु मुनिके साथ करना है' ॥ ७ ॥

अथ कालस्य महतः स मुनिः संशितव्रतः । तपस्यभिरतो धीमान् स दारान् नाभ्यकाङ्क्षत ॥ ८ ॥ तदनन्तर दीर्घकाल बीत जानेपर भी कठोर व्रतका पालन करनेवाले परम बुद्धिमान् जरत्कारु मुनि केवल तपमें ही लगे रहे। उन्होंने स्त्रीसंग्रहकी इच्छा नहीं की ॥ ८ ॥

स तूर्ध्वरेतास्तपसि प्रसक्तः स्वाध्यायवान् वीतभयः कृतात्मा । चचार सर्वां पृथिवीं महात्मा न चापि दारान् मनसाध्यकाङ्क्षत ॥ ९ ॥ वे ऊर्ध्वरेता ब्रह्मचारी थे। तपस्यामें संलग्न रहते थे। नित्य नियमपूर्वक वेदोंका स्वाध्याय करते थे। उन्हें कहींसे कोई भय नहीं था। वे मन और इन्द्रियोंको सदा काबूमें रखते थे। महात्मा जरत्कारु सारी पृथ्वीपर घूम आये; किंतु उन्होंने मनसे कभी स्त्रीकी अभिलाषा नहीं की ॥ ९ ॥

ततोऽपरस्मिन् सम्प्राप्ते काले कस्मिंश्चिदेव तु । परिक्षिन्नाम राजासीद् ब्रह्मन् कौरववंशजः ॥ १० ॥ ब्रह्मन्! तदनन्तर किसी दूसरे समयमें इस पृथ्वीपर कौरववंशी राजा परीक्षित् राज्य करने लगे ॥ १० ॥

यथा पाण्डुर्महाबाहुर्धनुर्धरवरो युधि । बभूव मृगयाशीलः पुरास्य प्रपितामहः ॥ ११ ॥ युद्धमें समस्त धनुर्धारियोंमें श्रेष्ठ उनके प्रपितामह महाबाहु पाण्डु जिस प्रकार पूर्वकालमें शिकार खेलनेके शौकीन हुए थे, उसी प्रकार राजा परीक्षित् भी थे ॥ ११ ॥

मृगान् विध्यन् वराहांश्च तरक्षून् महिषांस्तथा ।

अन्यांश्च विविधान् वन्यांश्चचार पृथिवीपतिः ॥ १२ ॥ महाराज परीक्षित् वराह, तरक्षु (व्याघ्रविशेष), महिष तथा दूसरे-दूसरे नाना प्रकारके वनके हिंसक पशुओंका शिकार खेलते हुए वनमें घूमते रहते थे ॥ १२ ॥

स कदाचिन्मृगं विद्ध्वा बाणेनानतपर्वणा । पृष्ठतो धनुरूदाय ससार गहने वने ॥ १३ ॥ एक दिन उन्होंने गहन वनमें धनुष लेकर झुकी हुई गाँठवाले बाणसे एक हिंसक पशुको बींध डाला और भागनेपर बहुत दूरतक उसका पीछा किया ॥ १३ ॥

यथैव भगवान् रुद्रो विद्ध्वा यज्ञमृगं दिवि । अन्वगच्छद् धनुष्पाणिः पर्यन्वेष्टुमितस्ततः ॥ १४ ॥ जैसे भगवान् रुद्र आकाशमें मृगशिरा नक्षत्रको बींध-कर उसे खोजनेके लिये धनुष हाथमें लिये इधर-उधर घूमते फिरे, उसी प्रकार परीक्षित् भी घूम रहे थे ॥ १४ ॥

न हि तेन मृगो विद्धो जीवन् गच्छति वै वने । पूर्वरूपं तु तत्तूर्णं सोऽगात् स्वर्गगतिं प्रति ॥ १५ ॥ परिक्षितो नरेन्द्रस्य विद्धो यन्नष्टवान् मृगः । दूरं चापहृतस्तेन मृगेण स महीपतिः ॥ १६ ॥ उनके द्वारा घायल किया हुआ मृग कभी वनमें जीवित बचकर नहीं जाता था; परंतु आज जो महाराज परीक्षित्‌का घायल किया हुआ मृग तत्काल अदृश्य हो गया था, वह वास्तवमें उनके स्वर्गवासका मूर्तिमान् कारण था। उस मृगके साथ राजा परीक्षित् बहुत दूरतक खिंचे चले गये ॥ १५-१६ ॥

परिश्रान्तः पिपासार्त आससाद मुनिं वने । गवां प्रचारेष्वासीनं वत्सानां मुखनिःसृतम् ॥ १७ ॥ भूयिष्ठमुपयुञ्जानं फेनमापिबतां पयः । तमभिद्रुत्य वेगेन स राजा संशितव्रतम् ॥ १८ ॥ अपृच्छद् धनुरुद्यम्य तं मुनिं क्षुच्छ्रमान्वितः । भो भो ब्रह्मन्नहं राजा परीक्षिदभिमन्युजः ॥ १९ ॥ मया विद्धो मृगो नष्टः कच्चित् तं दृष्टवानसि । स मुनिस्तं तु नोवाच किंचिन्मौनव्रते स्थितः ॥ २० ॥ उन्हें बड़ी थकावट आ गयी। वे प्याससे व्याकुल हो उठे और इसी दशामें वनमें शमीक मुनिके पास आये। वे मुनि गौओंके रहनेके स्थानमें आसनपर बैठे थे और गौओंका दूध पीते समय बछड़ोंके मुखसे जो बहुत-सा फेन निकलता, उसीको खा-पीकर तपस्या करते थे। राजा परीक्षित्‌ने कठोर व्रतका पालन करनेवाले उन महर्षिके पास बड़े वेगसे आकर पूछा। पूछते समय वे भूख और थकावटसे बहुत आतुर हो रहे थे और धनुषको उन्होंने ऊपर उठा रखा था। वे बोले—'ब्रह्मन्! मैं अभिमन्युका पुत्र राजा परीक्षित् हूँ। मेरे बाणोंसे विद्ध होकर

एक मृग कहीं भाग निकला है। क्या आपने उसे देखा है?' मुनि मौन-व्रतका पालन कर रहे थे, अतः उन्होंने राजाको कुछ भी उत्तर नहीं दिया ॥ १७—२० ॥

तस्य स्कन्धे मृतं सर्पं क्रुद्धो राजा समासजत् ।
समुत्क्षिप्य धनुष्कोट्या स चैनं समुपैक्षत ॥ २१ ॥
तब राजाने कुपित हो धनुषकी नोकसे एक मरे हुए साँपको उठाकर उनके कंधेपर रख दिया, तो भी मुनिने उनकी उपेक्षा कर दी ॥ २१ ॥

न स किंचिदुवाचैनं शुभं वा यदि वाशुभम् ।
स राजा क्रोधमुत्सृज्य व्यथितस्तं तथागतम् ।
दृष्ट्वा जगाम नगरमृषिस्त्वासीत् तथैव सः ॥ २२ ॥
उन्होंने राजासे भला या बुरा कुछ भी नहीं कहा। उन्हें इस अवस्थामें देख राजा परीक्षित्ने क्रोध त्याग दिया और मन-ही-मन व्यथित हो पश्चात्ताप करते हुए वे अपनी राजधानीको चले गये। वे महर्षि ज्यों-के-त्यों बैठे रहे ॥ २२ ॥

न हि तं राजशार्दूलं क्षमाशीलो महामुनिः ।
स्वधर्मनिरतं भूपं समाक्षिप्तोऽप्यधर्षयत् ॥ २३ ॥
राजाओंमें श्रेष्ठ भूपाल परीक्षित् अपने धर्मके पालनमें तत्पर रहते थे, अतः उस समय उनके द्वारा तिरस्कृत होनेपर भी क्षमाशील महामुनिने उन्हें अपमानित नहीं किया ॥ २३ ॥

न हि तं राजशार्दूलस्तथा धर्मपरायणम् ।
जानाति भरतश्रेष्ठस्तत एनमधर्षयत् ॥ २४ ॥
भरतवंशशिरोमणि नृपश्रेष्ठ परीक्षित् उन धर्मपरायण मुनिको यथार्थरूपमें नहीं जानते थे; इसीलिये उन्होंने महर्षिका अपमान किया ॥ २४ ॥

तरुणस्तस्य पुत्रोऽभूत् तिग्मतेजा महातपाः ।
शृङ्गी नाम महाक्रोधो दुष्प्रसादो महाव्रतः ॥ २५ ॥
मुनिके शृंगी नामक एक पुत्र था, जिसकी अभी तरुणावस्था थी। वह महान् तपस्वी, दुःसह तेजसे सम्पन्न और महान् व्रतधारी था। उसमें क्रोधकी मात्रा बहुत अधिक थी; अतः उसे प्रसन्न करना अत्यन्त कठिन था ॥ २५ ॥

स देवं परमासीनं सर्वभूतहिते रतम् ।
ब्रह्माणमुपतस्थे वै काले काले सुसंयतः ॥ २६ ॥
वह समय-समयपर मन और इन्द्रियोंको संयममें रखकर सम्पूर्ण प्राणियोंके हितमें तत्पर रहनेवाले, उत्तम आसनपर विराजमान आचार्यदेवकी सेवामें उपस्थित हुआ करता था ॥ २६ ॥

स तेन समनुज्ञातो ब्रह्मणा गृहमेयिवान् ।
सख्योक्तः क्रीडमानेन स तत्र हसता किल ॥ २७ ॥
संरम्भात् कोपनोऽतीव विषकल्पो मुनेः सुतः ।

उद्दिश्य पितरं तस्य यच्छ्रुत्वा रोषमाहरत् । ऋषिपुत्रेण धर्मार्थे कृशेन द्विजसत्तम ॥ २८ ॥ शृंगी उस दिन आचार्यकी आज्ञा लेकर घरको लौट रहा था। रास्तेमें उसका मित्र ऋषिकुमार कृश, जो धर्मके लिये कष्ट उठानेके कारण सदा ही कृश (दुर्बल) रहा करता था, खेलता मिला। उसने हँसते-हँसते शृंगी ऋषिको उसके पिताके सम्बन्धमें ऐसी बात बतायी, जिसे सुनते ही वह रोषमें भर गया। द्विजश्रेष्ठ! मुनिकुमार शृंगी क्रोधके आवेशमें आनेपर अत्यन्त तीक्ष्ण (कठोर) एवं विषके समान विनाशकारी हो जाता था ॥ २७-२८ ॥

कृश उवाच

तेजस्विनस्तव पिता तथैव च तपस्विनः । शवं स्कन्धेन वहति मा शृंगिन् गर्वितो भव ॥ २९ ॥ **कृशने कहा—**शृंगिन्! तुम बड़े तपस्वी और तेजस्वी बनते हो, किंतु तुम्हारे पिता अपने कंधेपर मुर्दा सर्प ढो रहे हैं। अब कभी अपनी तपस्यापर गर्व न करना ॥ २९ ॥ व्याहरत्स्वृषिपुत्रेषु मा स्म किंचिद् वचो वद । अस्मद्विधेषु सिद्धेषु ब्रह्मवित्सु तपस्विषु ॥ ३० ॥ हम-जैसे सिद्ध, ब्रह्मवेत्ता तथा तपस्वी ऋषिपुत्र जब कभी बातें करते हों, उस समय तुम वहाँ कुछ न बोलना ॥ ३० ॥ क्व ते पुरुषमानित्वं क्व ते वाचस्तथाविधाः । दर्पजाः पितरं द्रष्टा यस्त्वं शवधरं तथा ॥ ३१ ॥ कहाँ है तुम्हारा पौरुषका अभिमान, कहाँ गयीं तुम्हारी वे दर्पभरी बातें? जब तुम अपने पिताको मुर्दा ढोते चुपचाप देख रहे हो! ॥ ३१ ॥ पित्रा च तव तत् कर्म नानुरूपमिवात्मनः । कृतं मुनिजनश्रेष्ठ येनाहं भृशदुःखितः ॥ ३२ ॥ मुनिजनशिरोमणे! तुम्हारे पिताके द्वारा कोई अनुचित कर्म नहीं बना था; इसलिये जैसे मेरे ही पिताका अपमान हुआ हो उस प्रकार तुम्हारे पिताके तिरस्कारसे मैं अत्यन्त दुःखी हो रहा हूँ ॥ ३२ ॥

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि आस्तीकपर्वणि परिक्षिदुपाख्याने चत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४० ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत आस्तीकपर्वमें परीक्षित्-उपाख्यानविषयक चालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४० ॥

अध्याय (पृष्ठ 318)

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एकचत्वारिंशोऽध्यायः

शृंगी ऋषिका राजा परीक्षित्‌को शाप देना और शमीकका अपने पुत्रको शान्त करते हुए शापको अनुचित बताना

सौतिरुवाच

एवमुक्तः स तेजस्वी शृङ्गी कोपसमन्वितः ।
मृतधारं गुरुं श्रुत्वा पर्यतप्यत मन्युना ॥ १ ॥
**उग्रश्रवाजी कहते हैं—**शौनकजी! कृशके ऐसा कहनेपर तेजस्वी शृंगी ऋषिको बड़ा क्रोध हुआ। अपने पिताके कंधेपर मृतक (सर्प) रखे जानेकी बात सुनकर वह रोष और शोकसे संतप्त हो उठा ॥ १ ॥

स तं कृशमभिप्रेक्ष्य सूनृतां वाचमुत्सृजन् ।
अपृच्छत् तं कथं तातः स मेऽद्य मृतधारकः ॥ २ ॥
उसने कृशकी ओर देखकर मधुर वाणीमें पूछा—'भैया! बताओ तो, आज मेरे पिता अपने कंधेपर मृतक कैसे धारण कर रहे हैं?' ॥ २ ॥

कृश उवाच

राज्ञा परिक्षिता तात मृगयां परिधावता ।
अवसक्तः पितुस्तेऽद्य मृतः स्कन्धे भुजङ्गमः ॥ ३ ॥
**कृशने कहा—**तात! आज राजा परीक्षित् अपने शिकारके पीछे दौड़ते हुए आये थे। उन्होंने तुम्हारे पिताके कंधेपर मृतक साँप रख दिया है ॥ ३ ॥

शृंग्युवाच

किं मे पित्रा कृतं तस्य राज्ञोऽनिष्टं दुरात्मनः ।
ब्रूहि तत् कृश तत्त्वेन पश्य मे तपसो बलम् ॥ ४ ॥
**शृंगी बोला—**कृश! ठीक-ठीक बताओ, मेरे पिताने उस दुरात्मा राजाका क्या अपराध किया था? फिर मेरी तपस्याका बल देखना ॥ ४ ॥

कृश उवाच

स राजा मृगयां यातः परिक्षिदभिमन्युजः ।
ससार मृगमेकाकी विद्ध्वा बाणेन शीघ्रगम् ॥ ५ ॥
न चापश्यन्मृगं राजा चरंस्तस्मिन् महावने ।
पितरं ते स दृष्ट्वैव पप्रच्छानभिभाषिणम् ॥ ६ ॥

कृशने कहा—अभिमन्युपुत्र राजा परीक्षित् अकेले शिकार खेलने आये थे। उन्होंने एक शीघ्रगामी हिंसक मृग (पशु)-को बाणसे बींध डाला; किंतु उस विशाल वनमें विचरते हुए राजाको वह मृग कहीं दिखायी न दिया। फिर उन्होंने तुम्हारे मौनी पिताको देखकर उसके विषयमें पूछा ।। ५-६ ।। तं स्थाणुभूतं तिष्ठन्तं क्षुत्पिपासाश्रमातुरः । पुनः पुनर्मृगं नष्टं पप्रच्छ पितरं तव ।। ७ ।। स च मौनव्रतोपेतो नैव तं प्रत्यभाषत । तस्य राजा धनुष्कोट्या सर्पं स्कन्धे समासजत् ।। ८ ।। राजा भूख-प्यास और थकावटसे व्याकुल थे। इधर तुम्हारे पिता काठकी भाँति अविचल भावसे बैठे थे। राजाने बार-बार तुम्हारे पितासे उस भागे हुए मृगके विषयमें प्रश्न किया, परंतु मौन-व्रतावलम्बी होनेके कारण उन्होंने कुछ उत्तर नहीं दिया। तब राजाने धनुषकी नोकसे एक मरा हुआ साँप उठाकर उनके कंधेपर डाल दिया ।। ७-८ ।। शृङ्गिंस्तव पिता सोऽपि तथैवास्ते यतव्रतः । सोऽपि राजा स्वनगरं प्रस्थितो गजसाह्वयम् ।। ९ ।। शृङ्गिन्! संयमपूर्वक व्रतका पालन करनेवाले तुम्हारे पिता अभी उसी अवस्थामें बैठे हैं और वे राजा परीक्षित् अपनी राजधानी हस्तिनापुरको चले गये हैं ।। ९ ।।

सौतिरुवाच

श्रुत्वैवमृषिपुत्रस्तु शवं कन्धे प्रतिष्ठितम् । कोपसंरक्तनयनः प्रज्वलन्निव मन्युना ।। १० ।। उग्रश्रवाजी कहते हैं—शौनकजी! इस प्रकार अपने पिताके कंधेपर मृतक सर्पके रखे जानेका समाचार सुनकर ऋषिकुमार शृंगी क्रोधसे जल उठा। कोपसे उसकी आँखें लाल हो गयीं ।। १० ।। आविष्टः स हि कोपेन शशाप नृपतिं तदा । वार्युपस्पृश्य तेजस्वी क्रोधवेगबलात्कृतः ।। ११ ।। वह तेजस्वी बालक रोषके आवेशमें आकर प्रचण्ड क्रोधके वेगसे युक्त हो गया था। उसने जलसे आचमन करके हाथमें जल लेकर उस समय राजा परीक्षित्को इस प्रकार शाप दिया ।। ११ ।।

शृंग्युवाच

योऽसौ वृद्धस्य तातस्य तथा कृच्छ्रगतस्य ह । स्कन्धे मृतं समासाक्षीत् पन्नगं राजकिल्बिषी ।। १२ ।। तं पापमतिसंक्रुद्धस्तक्षकः पन्नगेश्वरः । आशीविषस्तिग्मतेजा मद्वाक्यबलचोदितः ।। १३ ।।

सप्तरात्रादितो नेता यमस्य सदनं प्रति ।
द्विजानामवमन्तारं कुरूणामयशस्करम् ॥ १४ ॥
शृंगी बोला—जिस पापात्मा नरेशने वैसे धर्म-संकटमें पड़े हुए मेरे बूढ़े पिताके कंधेपर मरा साँप रख दिया है, ब्राह्मणोंका अपमान करनेवाले उस कुरुकुलकलंक पापी परीक्षित्को आजसे सात रातके बाद प्रचण्ड तेजस्वी पन्नगोत्तम तक्षक नामक विषैला नाग अत्यन्त कोपमें भरकर मेरे वाक्यबलसे प्रेरित हो यमलोक पहुँचा देगा ॥ १२—१४ ॥

सौतिरुवाच

इति शप्त्वातिसंक्रुद्धः शृंगी पितरमभ्यगात् ।
आसीनं गोव्रजे तस्मिन् वहन्तं शवपन्नगम् ॥ १५ ॥
उग्रश्रवाजी कहते हैं—इस प्रकार अत्यन्त क्रोधपूर्वक शाप देकर शृंगी अपने पिताके पास आया, जो उस गोष्ठमें कंधेपर मृतक सर्प धारण किये बैठे थे ॥ १५ ॥
स तमालक्ष्य पितरं शृङ्गी स्कन्धगतेन वै ।
शवेन भुजगेनासीद् भूयः क्रोधसमाकुलः ॥ १६ ॥
कंधेपर रखे हुए मुर्दे साँपसे संयुक्त पिताको देखकर शृंगी पुनः क्रोधसे व्याकुल हो उठा ॥ १६ ॥
दुःखाच्चाश्रूणि मुमुचे पितरं चेदमब्रवीत् ।
श्रुत्वेमां धर्षणां तात तव तेन दुरात्मना ॥ १७ ॥
राज्ञा परिक्षिता कोपादशपं तमहं नृपम् ।
यथार्हति स एवोग्रं शापं कुरुकुलाधमः ।
सप्तमेऽहनि तं पापं तक्षकः पन्नगोत्तमः ॥ १८ ॥
वैवस्वतस्य सदनं नेता परमदारुणम् ।
तमब्रवीत् पिता ब्रह्मंस्तथा कोपसमन्वितम् ॥ १९ ॥
वह दुःखसे आँसू बहाने लगा। उसने पितासे कहा—'तात! उस दुरात्मा राजा परीक्षित्‌के द्वारा आपके इस अपमानकी बात सुनकर मैंने उसे क्रोधपूर्वक जैसा शाप दिया है, वह कुरुकुलाधम वैसे ही भयंकर शापके योग्य है। आजके सातवें दिन नागराज तक्षक उस पापीको अत्यन्त भयंकर यमलोकमें पहुँचा देगा।' ब्रह्मन्! इस प्रकार क्रोधमें भरे हुए पुत्रसे उसके पिता शमीकने कहा ॥ १७—१९ ॥

शमीक उवाच

न मे प्रियं कृतं तात नैष धर्मस्तपस्विनाम् ।
वयं तस्य नरेन्द्रस्य विषये निवसामहे ॥ २० ॥
न्यायतो रक्षितास्तेन तस्य शापं न रोचये ।
सर्वथा वर्तमानस्य राज्ञो ह्यस्मद्विधैः सदा ॥ २१ ॥

क्षन्तव्यं पुत्र धर्मो हि हतो हन्ति न संशयः । यदि राजा न संरक्षेत् पीडा नः परमा भवेत् ॥ २२ ॥ **शमीक बोले—**वत्स! तुमने शाप देकर मेरा प्रिय कार्य नहीं किया है। यह तपस्वियोंका धर्म नहीं है। हमलोग उन महाराज परीक्षित्के राज्यमें निवास करते हैं और उनके द्वारा न्यायपूर्वक हमारी रक्षा होती है। अतः उनको शाप देना मुझे पसंद नहीं है। हमारे-जैसे साधु पुरुषोंको तो वर्तमान राजा परीक्षित्के अपराधको सब प्रकारसे क्षमा ही करना चाहिये। बेटा! यदि धर्मको नष्ट किया जाय तो वह मनुष्यका नाश कर देता है, इसमें संशय नहीं है। यदि राजा रक्षा न करे तो हमें भारी कष्ट पहुँच सकता है ॥ २०—२२ ॥ न शक्नुयाम चरितुं धर्मं पुत्र यथासुखम् । रक्ष्यमाणा वयं तात राजभिर्धर्मदृष्टिभिः ॥ २३ ॥ चरामो विपुलं धर्मं तेषां भागोऽस्ति धर्मतः । सर्वथा वर्तमानस्य राज्ञः क्षन्तव्यमेव हि ॥ २४ ॥ पुत्र! हम राजाके बिना सुखपूर्वक धर्मका अनुष्ठान नहीं कर सकते। तात! धर्मपर दृष्टि रखनेवाले राजाओंके द्वारा सुरक्षित होकर हम अधिक-से-अधिक धर्मका आचरण कर पाते हैं। अतः हमारे पुण्यकर्मोंमें धर्मतः उनका भी भाग है। इसलिये वर्तमान राजा परीक्षित्के अपराधको तो क्षमा ही कर देना चाहिये ॥ २३-२४ ॥ परीक्षित्तु विशेषेण यथास्य प्रपितामहः । रक्षत्यस्मांस्तथा राज्ञा रक्षितव्याः प्रजा विभो ॥ २५ ॥ परीक्षित् तो विशेषरूपसे अपने प्रपितामह युधिष्ठिर आदिकी भाँति हमारी रक्षा करते हैं। शक्तिशाली पुत्र! प्रत्येक राजाको इसी प्रकार प्रजाकी रक्षा करनी चाहिये ॥ २५ ॥ तेनेह क्षुधितेनाद्य श्रान्तेन च तपस्विना । अजानता कृतं मन्ये व्रतमेतदिदं मम ॥ २६ ॥ वे आज भूखे और थके-माँदे यहाँ आये थे। वे तपस्वी नरेश मेरे इस मौन-व्रतको नहीं जानते थे; मैं समझता हूँ इसीलिये उन्होंने मेरे साथ ऐसा बर्ताव कर दिया ॥ २६ ॥ अराजके जनपदे दोषा जायन्ति वै सदा । उद्वृत्तं सततं लोकं राजा दण्डेन शास्ति वै ॥ २७ ॥ जिस देशमें राजा न हो वहाँ अनेक प्रकारके दोष (चोर आदिके भय) पैदा होते हैं। धर्मकी मर्यादा त्यागकर उच्छृंखल बने हुए लोगोंको राजा अपने दण्डके द्वारा शिक्षा देता है ॥ २७ ॥ दण्डात् प्रतिभयं भूयः शान्तिरुत्पद्यते तदा । नोद्विग्नश्चरते धर्मं नोद्विग्नश्चरते क्रियाम् ॥ २८ ॥ दण्डसे भय होता है, फिर भयसे तत्काल शान्ति स्थापित होती है। जो चोर आदिके भयसे उद्विग्न है, वह धर्मका अनुष्ठान नहीं कर सकता। वह उद्विग्न पुरुष यज्ञ, श्राद्ध आदि

शास्त्रीय कर्मोंका आचरण भी नहीं कर सकता ॥ २८ ॥ राज्ञा प्रतिष्ठितो धर्मो धर्मात् स्वर्गः प्रतिष्ठितः । राज्ञो यज्ञक्रियाः सर्वा यज्ञाद् देवाः प्रतिष्ठिताः ॥ २९ ॥ राजासे धर्मकी स्थापना होती है और धर्मसे स्वर्गलोककी प्रतिष्ठा (प्राप्ति) होती है। राजासे सम्पूर्ण यज्ञकर्म प्रतिष्ठित होते हैं और यज्ञसे देवताओंकी प्रतिष्ठा होती है ॥ २९ ॥ देवाद् वृष्टिः प्रवर्तेत वृष्टेरोषधयः स्मृताः । ओषधिभ्यो मनुष्याणां धारयन् सततं हितम् ॥ ३० ॥ मनुष्याणां च यो धाता राजा राज्यकरः पुनः । दशश्रोत्रियसमो राजा इत्येवं मनुरब्रवीत् ॥ ३१ ॥ देवताके प्रसन्न होनेसे वर्षा होती है, वर्षासे अन्न पैदा होता है और अन्नसे निरन्तर मनुष्योंके हितका पोषण करते हुए राज्यका पालन करनेवाला राजा मनुष्योंके लिये विधाता (धारण-पोषण करनेवाला) है। राजा दस श्रोत्रियके समान है, ऐसा मनुजीने कहा है ॥ ३०-३१ ॥ तेनेह क्षुधितेनाद्य श्रान्तेन च तपस्विना । अजानता कृतं मन्ये व्रतमेतदिदं मम ॥ ३२ ॥ वे तपस्वी राजा यहाँ भूखे-प्यासे और थके-माँदे आये थे। उन्हें मेरे इस मौन-व्रतका पता नहीं था, इसलिये मेरे न बोलनेसे रुष्ट होकर उन्होंने ऐसा किया है ॥ ३२ ॥ कस्मादिदं त्वया बाल्यात् सहसा दुष्कृतं कृतम् । न ह्यर्हति नृपः शापमस्मत्तः पुत्र सर्वथा ॥ ३३ ॥ तुमने मूर्खतावश बिना विचारे क्यों यह दुष्कर्म कर डाला? बेटा! राजा हमलोगोंसे शाप पानेके योग्य नहीं हैं ॥ ३३ ॥

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि आस्तीकपर्वणि परिक्षिच्छापे एकचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४१ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत आस्तीकपर्वमें परीक्षित्-शापविषयक इकंतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४१ ॥

अध्याय (पृष्ठ 323)

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द्विचत्वारिंशोऽध्यायः

शमीकका अपने पुत्रको समझाना और गौरमुखको राजा परीक्षित्‌के पास भेजना, राजाद्वारा आत्मरक्षाकी व्यवस्था तथा तक्षक नाग और काश्यपकी बातचीत

शृङ्ग्युवाच

यद्येतत् साहसं तात यदि वा दुष्कृतं कृतम् ।
प्रियं वाप्यप्रियं वा ते वागुक्ता न मृषा भवेत् ॥ १ ॥
**शृंगी बोला—**तात! यदि यह साहस है अथवा यदि मेरे द्वारा दुष्कर्म हो गया है तो हो जाय। आपको यह प्रिय लगे या अप्रिय, किंतु मैंने जो बात कह दी है, वह झूठी नहीं हो सकती ॥ १ ॥

नैवान्यथेदं भविता पितरेष ब्रवीमि ते ।
नाहं मृषा ब्रवीम्येवं स्वैरेष्वपि कुतः शपन् ॥ २ ॥
पिताजी! मैं आपसे सच कहता हूँ, अब यह शाप टल नहीं सकता। मैं हँसी-मजाकमें भी झूठ नहीं बोलता, फिर शाप देते समय कैसे झूठी बात कह सकता हूँ ॥ २ ॥

शमीक उवाच

जानाम्युग्रप्रभावं त्वां तात सत्यगिरं तथा ।
नानृतं चोक्तपूर्वं ते नैतन्मिथ्या भविष्यति ॥ ३ ॥
**शमीकने कहा—**बेटा! मैं जानता हूँ तुम्हारा प्रभाव उग्र है, तुम बड़े सत्यवादी हो, तुमने पहले भी कभी झूठी बात नहीं कही है; अतः यह शाप मिथ्या नहीं होगा ॥ ३ ॥

पित्रा पुत्रो वयःस्थोऽपि सततं वाच्य एव तु ।
यथा स्याद् गुणसंयुक्तः प्राप्नुयाच्च महद् यशः ॥ ४ ॥
तथापि पिताको उचित है कि वह अपने पुत्रको बड़ी अवस्थाका हो जानेपर भी सदा सत्कर्मोंका उपदेश देता रहे; जिससे वह गुणवान् हो और महान् यश प्राप्त करे ॥ ४ ॥

किं पुनर्बाल एव त्वं तपसा भावितः सदा ।
वर्धते च प्रभवतां कोपोऽतीव महात्मनाम् ॥ ५ ॥
फिर तुम्हें उपदेश देनेकी तो बात ही क्या है, तुम तो अभी बालक ही हो। तुमने सदा तपस्याके द्वारा अपनेको दिव्य शक्तिसे सम्पन्न किया है। जो योगजनित ऐश्वर्यसे सम्पन्न हैं, ऐसे प्रभावशाली तेजस्वी पुरुषोंका भी क्रोध अधिक बढ़ जाता है; फिर तुम-जैसे बालकको क्रोध हो, इसमें कहना ही क्या है ॥ ५ ॥

सोऽहं पश्यामि वक्तव्यं त्वयि धर्मभृतां वर ।

पुत्रत्वं बालतां चैव तवावेक्ष्य च साहसम् ॥ ६ ॥ (किंतु यह क्रोध धर्मका नाशक होता है) इसलिये धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ पुत्र! तुम्हारे बचपन और दुःसाहसपूर्ण कार्यको देखकर मैं तुम्हें कुछ कालतक उपदेश देनेकी आवश्यकता समझता हूँ ॥ ६ ॥

स त्वं शमपरो भूत्वा वन्यमाहारमाचरन् । चर क्रोधमिमं हत्वा नैवं धर्मं प्रहास्यसि ॥ ७ ॥ तुम मन और इन्द्रियोंके निग्रहमें तत्पर होकर जंगली कन्द, मूल, फलका आहार करते हुए इस क्रोधको मिटाकर उत्तम आचरण करो; ऐसा करनेसे तुम्हारे धर्मकी हानि नहीं होगी ॥ ७ ॥

क्रोधो हि धर्मं हरति यतीनां दुःखसंचितम् । ततो धर्मविहीनानां गतिरिष्टा न विद्यते ॥ ८ ॥ क्रोध प्रयत्नशील साधकोंके अत्यन्त दुःखसे उपार्जित धर्मका नाश कर देता है। फिर धर्महीन मनुष्योंको अभीष्ट गति नहीं मिलती है ॥ ८ ॥

शम एव यतीनां हि क्षमिणां सिद्धिकारकः । क्षमावतामयं लोकः परश्चैव क्षमावताम् ॥ ९ ॥ शम (मनोनिग्रह) ही क्षमाशील साधकोंको सिद्धिकी प्राप्ति करानेवाला है। जिनमें क्षमा है, उन्हींके लिये यह लोक और परलोक दोनों कल्याणकारक हैं ॥ ९ ॥

तस्माच्चरेथाः सततं क्षमाशीलो जितेन्द्रियः । क्षमया प्राप्स्यसे लोकान् ब्रह्मणः समनन्तरान् ॥ १० ॥ इसलिये तुम सदा इन्द्रियोंको वशमें रखते हुए क्षमाशील बनो। क्षमासे ही ब्रह्माजीके निकटवर्ती लोकोंमें जा सकोगे ॥ १० ॥

मया तु शममास्थाय यच्छक्यं कर्तुमद्य वै । तत् करिष्याम्यहं तात प्रेषयिष्ये नृपाय वै ॥ ११ ॥ मम पुत्रेण शप्तोऽसि बालेन कृशबुद्धिना । ममेमां धर्षणां त्वत्तः प्रेक्ष्य राजन्नमर्षिणा ॥ १२ ॥ तात! मैं तो शान्ति धारण करके अब जो कुछ किया जा सकता है, वह करूँगा। राजाके पास यह संदेश भेज दूँगा कि ‘राजन्! तुम्हारे द्वारा मुझे जो तिरस्कार प्राप्त हुआ है उसे देखकर अमर्षमें भरे हुए मेरे अल्पबुद्धि एवं मूढ़ पुत्रने तुम्हें शाप दे दिया है’ ॥ ११-१२ ॥

सौतिरुवाच

एवमादिश्य शिष्यं स प्रेषयामास सुव्रतः । परिक्षिते नृपतये दयापन्नो महातपाः ॥ १३ ॥

संदिश्य कुशलप्रश्नं कार्यवृत्तान्तमेव च । शिष्यं गौरमुखं नाम शीलवन्तं समाहितम् ॥ १४ ॥ **उग्रश्रवाजी कहते हैं—**उत्तम व्रतका पालन करनेवाले दयालु एवं महातपस्वी शमीक मुनिने अपने गौरमुख नामवाले एकाग्रचित्त एवं शीलवान् शिष्यको इस प्रकार आदेश दे कुशल-प्रश्न, कार्य एवं वृत्तान्तका संदेश देकर राजा परीक्षित्‌के पास भेजा ॥ १३-१४ ॥ सोऽभिगम्य ततः शीघ्रं नरेन्द्रं कुरुवर्धनम् । विवेश भवनं राज्ञः पूर्वं द्वाःस्थैर्निवेदितः ॥ १५ ॥ गौरमुख वहाँसे शीघ्र कुरुकुलकी वृद्धि करनेवाले महाराज परीक्षित्‌के पास चला गया। राजधानीमें पहुँचनेपर द्वारपालने पहले महाराजको उसके आनेकी सूचना दी और उनकी आज्ञा मिलनेपर गौरमुखने राजभवनमें प्रवेश किया ॥ १५ ॥ पूजितस्तु नरेन्द्रेण द्विजो गौरमुखस्तदा । आचख्यौ च परिश्रान्तो राज्ञः सर्वमशेषतः ॥ १६ ॥ शमीकवचनं घोरं यथोक्तं मन्त्रिसन्निधौ । महाराज परीक्षित्‌ने उस समय गौरमुख ब्राह्मणका बड़ा सत्कार किया। जब उसने विश्राम कर लिया, तब शमीकके कहे हुए घोर वचनको मन्त्रियोंके समीप राजाके सामने पूर्णरूपसे कह सुनाया ॥ १६½ ॥

गौरमुख उवाच शमीको नाम राजेन्द्र वर्तते विषये तव ॥ १७ ॥ ऋषिः परमधर्मात्मा दान्तः शान्तो महातपाः । तस्य त्वया नरव्याघ्र सर्पः प्राणैर्वियोजितः ॥ १८ ॥ अवसक्तो धनुष्कोट्या स्कन्धे मौनान्वितस्य च । क्षान्तवांस्तव तत् कर्म पुत्रस्तस्य न चक्षमे ॥ १९ ॥ **गौरमुख बोला—**महाराज! आपके राज्यमें शमीक नामवाले एक परम धर्मात्मा महर्षि रहते हैं। वे जितेन्द्रिय, मनको वशमें रखनेवाले और महान् तपस्वी हैं। नरव्याघ्र! आपने मौन व्रत धारण करनेवाले उन महात्माके कंधेपर धनुषकी नोकसे उठाकर एक मरा हुआ साँप रख दिया था। महर्षिने तो उसके लिये आपको क्षमा कर दिया था, किंतु उनके पुत्रको वह सहन नहीं हुआ ॥ १७—१९ ॥ तेन शप्तोऽसि राजेन्द्र पितुरज्ञातमद्य वै । तक्षकः सप्तरात्रेण मृत्युस्तव भविष्यति ॥ २० ॥ राजेन्द्र! उस ऋषिकुमारने आज अपने पिताके अनजानमें ही आपके लिये यह शाप दिया है कि 'आजसे सात रातके बाद ही तक्षक नाग आपकी मृत्युका कारण हो जायगा' ॥ २० ॥

तत्र रक्षां कुरुष्वेति पुनः पुनरथाब्रवीत् । तदन्यथा न शक्यं च कर्तुं केनचिदप्युत ॥ २१ ॥ इस दशामें आप अपनी रक्षाकी व्यवस्था करें। यह मुनिने बार-बार कहा है। उस शापको कोई भी टाल नहीं सकता ॥ २१ ॥ न हि शक्नोति तं यन्तुं पुत्रं कोपसमन्वितम् । ततोऽहं प्रेषितस्तेन तव राजन् हितार्थिना ॥ २२ ॥ स्वयं महर्षि भी क्रोधमें भरे हुए अपने पुत्रको शान्त नहीं कर पा रहे हैं। अतः राजन्! आपके हितकी इच्छासे उन्होंने मुझे यहाँ भेजा है ॥ २२ ॥

सौतिरुवाच

इति श्रुत्वा वचो घोरं स राजा कुरुनन्दनः । पर्यतप्यत तत् पापं कृत्वा राजा महातपाः ॥ २३ ॥ **उग्रश्रवाजी कहते हैं—**यह घोर वचन सुनकर कुरुनन्दन राजा परीक्षित् मुनिका अपराध करनेके कारण मन-ही-मन संतप्त हो उठे ॥ २३ ॥ तं च मौनव्रतं श्रुत्वा वने मुनिवरं तदा । भूय एवाभवद् राजा शोकसंतप्तमानसः ॥ २४ ॥ वे श्रेष्ठ महर्षि उस समय वनमें मौन-व्रतका पालन कर रहे थे, यह सुनकर राजा परीक्षित्का मन और भी शोक एवं संतापमें डूब गया ॥ २४ ॥ अनुक्रोशात्मतां तस्य शमीकस्यावधार्य च । पर्यतप्यत भूयोऽपि कृत्वा तत् किल्बिषं मुनेः ॥ २५ ॥ शमीक मुनिकी दयालुता और अपने द्वारा उनके प्रति किये हुए उस अपराधका विचार करके वे अधिकाधिक संतप्त होने लगे ॥ २५ ॥ न हि मृत्युं तथा राजा श्रुत्वा वै सोऽन्वतप्यत । अशोचदमरप्रख्यो यथा कृत्वेह कर्म तत् ॥ २६ ॥ देवतुल्य राजा परीक्षित्को अपनी मृत्युका शाप सुनकर वैसा संताप नहीं हुआ जैसा कि मुनिके प्रति किये हुए अपने उस बर्तावको याद करके वे शोकमग्न हो रहे थे ॥ २६ ॥ ततस्तं प्रेषयामास राजा गौरमुखं तदा । भूयः प्रसादं भगवान् करोत्विह ममेति वै ॥ २७ ॥ तदनन्तर राजाने यह संदेश देकर उस समय गौरमुखको विदा किया कि 'भगवान् शमीक मुनि यहाँ पधारकर पुनः मुझपर कृपा करें' ॥ २७ ॥ तस्मिंश्च गतमात्रेऽथ राजा गौरमुखे तदा । मन्त्रिभिर्मन्त्रयामास सह संविग्नमानसः ॥ २८ ॥

गौरमुखके चले जानेपर राजाने उद्विग्नचित्त हो मन्त्रियोंके साथ गुप्त मन्त्रणा की ॥ २८ ॥
सम्मन्त्र्य मन्त्रिभिश्चैव स तथा मन्त्रतत्त्ववित् ।
प्रासादं कारयामास एकस्तम्भं सुरक्षितम् ॥ २९ ॥
मन्त्र-तत्त्वके ज्ञाता महाराजने मन्त्रियोंसे सलाह करके एक ऊँचा महल बनवाया; जिसमें एक ही खंभा लगा था। वह भवन सब ओरसे सुरक्षित था ॥ २९ ॥
रक्षां च विदधे तत्र भिषजश्चौषधानि च ।
ब्राह्मणान् मन्त्रसिद्धांश्च सर्वतो वै न्ययोजयत् ॥ ३० ॥
राजाने वहाँ रक्षाके लिये आवश्यक प्रबन्ध किया, उन्होंने सब प्रकारकी ओषधियाँ जुटा लीं और वैद्यों तथा मन्त्रसिद्ध ब्राह्मणोंको सब ओर नियुक्त कर दिया ॥ ३० ॥
राजकार्याणि तत्रस्थः सर्वाण्येवाकरोच्च सः ।
मन्त्रिभिः सह धर्मज्ञः समन्तात् परिरक्षितः ॥ ३१ ॥
वहीं रहकर वे धर्मज्ञ नरेश सब ओरसे सुरक्षित हो मन्त्रियोंके साथ सम्पूर्ण राज-कार्यकी व्यवस्था करने लगे ॥ ३१ ॥
न चैनं कश्चिदारूढं लभते राजसत्तमम् ।
वातोऽपि निश्वरंस्तत्र प्रवेशे विनिवार्यते ॥ ३२ ॥
उस समय महलमें बैठे हुए महाराजसे कोई भी मिलने नहीं पाता था। वायुको भी वहाँसे निकल जानेपर पुनः प्रवेशके समय रोका जाता था ॥ ३२ ॥
प्राप्ते च दिवसे तस्मिन् सप्तमे द्विजसत्तमः ।
काश्यपोऽभ्यागमद् विद्वांस्तं राजानं चिकित्सितुम् ॥ ३३ ॥
सातवाँ दिन आनेपर मन्त्रशास्त्रके ज्ञाता द्विजश्रेष्ठ काश्यप राजाकी चिकित्सा करनेके लिये आ रहे थे ॥ ३३ ॥
श्रुतं हि तेन तदभूद् यथा तं राजसत्तमम् ।
तक्षकः पन्नगश्रेष्ठो नेष्यते यमसादनम् ॥ ३४ ॥
उन्होंने सुन रखा था कि 'भूपशिरोमणि परीक्षित्को आज नागोंमें श्रेष्ठ तक्षक यमलोक पहुँचा देगा' ॥ ३४ ॥
तं दष्टं पन्नगेन्द्रेण करिष्येऽहमपज्वरम् ।
तत्र मेऽर्थश्च धर्मश्च भवितेति विचिन्तयन् ॥ ३५ ॥
अतः उन्होंने सोचा कि नागराजके डँसे हुए महाराजका विष उतारकर मैं उन्हें जीवित कर दूँगा। ऐसा करनेसे वहाँ मुझे धन तो मिलेगा ही, लोकोपकारी राजाको जिलानेसे धर्म भी होगा ॥ ३५ ॥
तं ददर्श स नागेन्द्रस्तक्षकः काश्यपं पथि ।
गच्छन्तमेकमनसं द्विजो भूत्वा वयोऽतिगः ॥ ३६ ॥

तमब्रवीत् पन्नगेन्द्रः काश्यपं मुनिपुङ्गवम् । क्व भवांस्त्वरितो याति किं च कार्यं चिकीर्षति ॥ ३७ ॥ मार्गमें नागराज तक्षकने काश्यपको देखा। वे एकचित्त होकर हस्तिनापुरकी ओर बढ़े जा रहे थे। तब नागराजने बूढ़े ब्राह्मणका वेश बनाकर मुनिवर काश्यपसे पूछा—‘आप कहाँ बड़ी उतावलीके साथ जा रहे हैं और कौन-सा कार्य करना चाहते हैं?’ ॥ ३६-३७ ॥

काश्यप उवाच

नृपं कुरुकुलोत्पन्नं परिक्षितमरिन्दमम् । तक्षकः पन्नगश्रेष्ठस्तेजसाद्य प्रधक्ष्यति ॥ ३८ ॥ काश्यपने कहा—कुरुकुलमें उत्पन्न शत्रुदमन महाराज परीक्षित्को आज नागराज तक्षक अपनी विषाग्निसे दग्ध कर देगा ॥ ३८ ॥ तं दष्टं पन्नगेन्द्रेण तेनाग्निसमतेजसा । पाण्डवानां कुलकरं राजानममितौजसम् । गच्छामि त्वरितं सौम्य सद्यः कर्तुमपज्वरम् ॥ ३९ ॥ वे राजा पाण्डवोंकी वंशपरम्पराको सुरक्षित रखने-वाले तथा अत्यन्त पराक्रमी हैं। अतः सौम्य! अग्निके समान तेजस्वी नागराजके डँस लेनेपर उन्हें तत्काल विषरहित करके जीवित कर देनेके लिये मैं जल्दी-जल्दी जा रहा हूँ ॥ ३९ ॥

तक्षक उवाच

अहं स तक्षको ब्रह्मंस्तं धक्ष्यामि महीपतिम् । निवर्तस्व न शक्तस्त्वं मया दष्टं चिकित्सितुम् ॥ ४० ॥ तक्षक बोला—ब्रह्मन्! मैं ही वह तक्षक हूँ। आज राजाको भस्म कर डालूँगा। आप लौट जाइये। मैं जिसे डँस लूँ, उसकी चिकित्सा आप नहीं कर सकते ॥ ४० ॥

काश्यप उवाच

अहं तं नृपतिं गत्वा त्वया दष्टमपज्वरम् । करिष्यामीति मे बुद्धिविद्याबलसमन्विता ॥ ४१ ॥ काश्यपने कहा—मैं तुम्हारे डँसे हुए राजाको वहाँ जाकर विषसे रहित कर दूँगा। यह विद्याबलसे सम्पन्न मेरी बुद्धिका निश्चय है ॥ ४१ ॥

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि आस्तीकपर्वणि काश्यपागमने द्विचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४२ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत आस्तीकपर्वमें काश्यपागमनविषयक बयालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४२ ॥

अध्याय (पृष्ठ 330)

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त्रिचत्वारिंशोऽध्यायः

तक्षकका धन देकर कश्यपको लौटा देना और छलसे राजा परीक्षित्के समीप पहुँचकर उन्हें डँसना

तक्षक उवाच

यदि दष्टं मयेह त्वं शक्तः किंचिच्चिकित्सितुम् ।
ततो वृक्षं मया दष्टमिमं जीवय काश्यप ॥ १ ॥
तक्षक बोला— काश्यप! यदि इस जगत्में मेरे डँसे हुए रोगीकी कुछ भी चिकित्सा करनेमें तुम समर्थ हो तो मेरे डँसे हुए इस वृक्षको जीवित कर दो ॥ १ ॥
परं मन्त्रबलं यत् ते तद् दर्शय यतस्व च ।
न्यग्रोधमेनं धक्ष्यामि पश्यतस्ते द्विजोत्तम ॥ २ ॥
द्विजश्रेष्ठ! तुम्हारे पास जो उत्तम मन्त्रका बल है, उसे दिखाओ और यत्न करो। लो, तुम्हारे देखते-देखते इस वटवृक्षको मैं भस्म कर देता हूँ ॥ २ ॥

काश्यप उवाच

दश नागेन्द्र वृक्षं त्वं यद्येतदभिमन्यसे ।
अहमेनं त्वया दष्टं जीवयिष्ये भुजङ्गम ॥ ३ ॥
काश्यपने कहा— नागराज! यदि तुम्हें इतना अभिमान है तो इस वृक्षको डँसो। भुजंगम! तुम्हारे डँसे हुए इस वृक्षको मैं अभी जीवित कर दूँगा ॥ ३ ॥

सौतिरुवाच

एवमुक्तः स नागेन्द्रः काश्यपेन महात्मना ।
अदशद् वृक्षमभ्येत्य न्यग्रोधं पन्नगोत्तमः ॥ ४ ॥
उग्रश्रवाजी कहते हैं— महात्मा काश्यपके ऐसा कहनेपर सर्पोंमें श्रेष्ठ नागराज तक्षकने निकट जाकर बरगदके वृक्षको डँस लिया ॥ ४ ॥
स वृक्षस्तेन दष्टस्तु पन्नगेन महात्मना ।
आशीविषविषोपेतः प्रजज्वाल समन्ततः ॥ ५ ॥
उस महाकाय विषधर सर्पके डँसते ही उसके विषसे व्याप्त हो वह वृक्ष सब ओरसे जल उठा ॥ ५ ॥
तं दग्ध्वा स नगं नागः काश्यपं पुनरब्रवीत् ।
कुरु यत्नं द्विजश्रेष्ठ जीवयैनं वनस्पतिम् ॥ ६ ॥
इस प्रकार उस वृक्षको जलाकर नागराज पुनः काश्यपसे बोला— 'द्विजश्रेष्ठ! अब तुम यत्न करो और इस वृक्षको जिला दो' ॥ ६ ॥

सौतिरुवाच

भस्मीभूतं ततो वृक्षं पन्नगेन्द्रस्य तेजसा । भस्म सर्वं समाहृत्य काश्यपो वाक्यमब्रवीत् ॥ ७ ॥ उग्रश्रवाजी कहते हैं—शौनकेजी! नागराजके तेजसे भस्म हुए उस वृक्षकी सारी भस्मराशिको एकत्र करके काश्यपने कहा— ॥ ७ ॥

विद्याबलं पन्नगेन्द्र पश्य मेऽद्य वनस्पतौ । अहं संजीवयाम्येनं पश्यतस्ते भुजङ्गम ॥ ८ ॥ 'नागराज! इस वनस्पतिपर आज मेरी विद्याका बल देखो। भुजंगम! मैं तुम्हारे देखते-देखते इस वृक्षको जीवित कर देता हूँ' ॥ ८ ॥

ततः स भगवान् विद्वान् काश्यपो द्विजसत्तमः । भस्मराशीकृतं वृक्षं विद्यया समजीवयत् ॥ ९ ॥ तदनन्तर सौभाग्यशाली विद्वान् द्विजश्रेष्ठ काश्यपने भस्मराशिके रूपमें विद्यमान उस वृक्षको विद्याके बलसे जीवित कर दिया ॥ ९ ॥

अङ्कुरं कृतवांस्तत्र ततः पर्णद्वयान्वितम् । पलाशिनं शाखिनं च तथा विटपिनं पुनः ॥ १० ॥ पहले उन्होंने उसमेंसे अंकुर निकाला, फिर उसे दो पत्तेका कर दिया। इसी प्रकार क्रमशः पल्लव, शाखा और प्रशाखाओंसे युक्त उस महान् वृक्षको पुनः पूर्ववत् खड़ा कर दिया ॥ १० ॥

तं दृष्ट्वा जीवितं वृक्षं काश्यपेन महात्मना । उवाच तक्षको ब्रह्मन् नैतदत्यद्भुतं त्वयि ॥ ११ ॥ महात्मा काश्यपद्वारा जिलाये हुए उस वृक्षको देखकर तक्षकने कहा—'ब्रह्मन्! तुम-जैसे मन्त्रवेत्तामें ऐसे चमत्कारका होना कोई अद्भुत बात नहीं है ॥ ११ ॥

द्विजेन्द्र यद् विषं हन्या मम वा मद्विधस्य वा । कं त्वमर्थमभिप्रेप्सुर्यासि तत्र तपोधन ॥ १२ ॥ 'तपस्याके धनी द्विजेन्द्र! जब तुम मेरे या मेरे-जैसे दूसरे सर्पके विषको अपनी विद्याके बलसे नष्ट कर सकते हो तो बताओ, तुम कौन-सा प्रयोजन सिद्ध करनेकी इच्छासे वहाँ जा रहे हो ॥ १२ ॥

यत् तेऽभिलषितं प्राप्तुं फलं तस्मान्नृपोत्तमात् । अहमेव प्रदास्यामि तत् ते यद्यपि दुर्लभम् ॥ १३ ॥ 'उस श्रेष्ठ राजासे जो फल प्राप्त करना तुम्हें अभीष्ट है, वह अत्यन्त दुर्लभ हो तो भी मैं ही तुम्हें दे दूँगा ॥ १३ ॥

विप्रशापाभिभूते च क्षीणायुषि नराधिपे । घटमानस्य ते विप्र सिद्धिः संशयिता भवेत् ॥ १४ ॥

'विप्रवर! महाराज परीक्षित् ब्राह्मणके शापसे तिरस्कृत हैं और उनकी आयु भी समाप्त हो चली है। ऐसी दशामें उन्हें जिलानेके लिये चेष्टा करनेपर तुम्हें सिद्धि प्राप्त होगी, इसमें संदेह है ।। १४ ।।
ततो यशः प्रदीप्तं ते त्रिषु लोकेषु विश्रुतम् ।
निरंशुरिव घर्माशुरन्तर्धानमितो व्रजेत् ।। १५ ।।
'यदि तुम सफल न हुए तो तीनों लोकोंमें विख्यात एवं प्रकाशित तुम्हारा यश किरणरहित सूर्यके समान इस लोकसे अदृश्य हो जायगा' ।। १५ ।।

काश्यप उवाच

धनार्थी याम्यहं तत्र तन्मे देहि भुजङ्गम ।
ततोऽहं विनिवर्तिष्ये स्वापतेयं प्रगृह्य वै ।। १६ ।।
**काश्यपने कहा—**नागराज तक्षक! मैं तो वहाँ धनके लिये ही जाता हूँ, वह तुम्हीं मुझे दे दो तो उस धनको लेकर मैं घर लौट जाऊँगा ।। १६ ।।

तक्षक उवाच

यावद्धनं प्रार्थयसे तस्माद् राज्ञस्ततोऽधिकम् ।
अहमेव प्रदास्यामि निवर्तस्व द्विजोत्तम ।। १७ ।।
**तक्षक बोला—**द्विजश्रेष्ठ! तुम राजा परीक्षित्से जितना धन पाना चाहते हो, उससे अधिक मैं ही दे दूँगा, अतः लौट जाओ ।। १७ ।।

सौतिरुवाच

तक्षकस्य वचः श्रुत्वा काश्यपो द्विजसत्तमः ।
प्रदध्यौ सुमहातेजा राजानं प्रति बुद्धिमान् ।। १८ ।।
**उग्रश्रवाजी कहते हैं—**तक्षककी बात सुनकर परम बुद्धिमान् महातेजस्वी विप्रवर काश्यपने राजा परीक्षित्के विषयमें कुछ देर ध्यान लगाकर सोचा ।। १८ ।।
दिव्यज्ञानः स तेजस्वी ज्ञात्वा तं नृपतिं तदा ।
क्षीणायुषं पाण्डवेयमपावर्तत काश्यपः ।। १९ ।।
लब्ध्वा वित्तं मुनिवरस्तक्षकाद् यावदीप्सितम् ।
निवृत्ते काश्यपे तस्मिन् समयेन महात्मनि ।। २० ।।
जगाम तक्षकस्तूर्णं नगरं नागसाह्वयम् ।
अथ शुश्राव गच्छन् स तक्षको जगतीपतिम् ।। २१ ।।
मन्त्रैर्गदैर्विषहरै रक्ष्यमाणं प्रयत्नतः ।