भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

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पृष्ठ 317

उद्दिश्य पितरं तस्य यच्छ्रुत्वा रोषमाहरत् । ऋषिपुत्रेण धर्मार्थे कृशेन द्विजसत्तम ॥ २८ ॥ शृंगी उस दिन आचार्यकी आज्ञा लेकर घरको लौट रहा था। रास्तेमें उसका मित्र ऋषिकुमार कृश, जो धर्मके लिये कष्ट उठानेके कारण सदा ही कृश (दुर्बल) रहा करता था, खेलता मिला। उसने हँसते-हँसते शृंगी ऋषिको उसके पिताके सम्बन्धमें ऐसी बात बतायी, जिसे सुनते ही वह रोषमें भर गया। द्विजश्रेष्ठ! मुनिकुमार शृंगी क्रोधके आवेशमें आनेपर अत्यन्त तीक्ष्ण (कठोर) एवं विषके समान विनाशकारी हो जाता था ॥ २७-२८ ॥

कृश उवाच

तेजस्विनस्तव पिता तथैव च तपस्विनः । शवं स्कन्धेन वहति मा शृंगिन् गर्वितो भव ॥ २९ ॥ **कृशने कहा—**शृंगिन्! तुम बड़े तपस्वी और तेजस्वी बनते हो, किंतु तुम्हारे पिता अपने कंधेपर मुर्दा सर्प ढो रहे हैं। अब कभी अपनी तपस्यापर गर्व न करना ॥ २९ ॥ व्याहरत्स्वृषिपुत्रेषु मा स्म किंचिद् वचो वद । अस्मद्विधेषु सिद्धेषु ब्रह्मवित्सु तपस्विषु ॥ ३० ॥ हम-जैसे सिद्ध, ब्रह्मवेत्ता तथा तपस्वी ऋषिपुत्र जब कभी बातें करते हों, उस समय तुम वहाँ कुछ न बोलना ॥ ३० ॥ क्व ते पुरुषमानित्वं क्व ते वाचस्तथाविधाः । दर्पजाः पितरं द्रष्टा यस्त्वं शवधरं तथा ॥ ३१ ॥ कहाँ है तुम्हारा पौरुषका अभिमान, कहाँ गयीं तुम्हारी वे दर्पभरी बातें? जब तुम अपने पिताको मुर्दा ढोते चुपचाप देख रहे हो! ॥ ३१ ॥ पित्रा च तव तत् कर्म नानुरूपमिवात्मनः । कृतं मुनिजनश्रेष्ठ येनाहं भृशदुःखितः ॥ ३२ ॥ मुनिजनशिरोमणे! तुम्हारे पिताके द्वारा कोई अनुचित कर्म नहीं बना था; इसलिये जैसे मेरे ही पिताका अपमान हुआ हो उस प्रकार तुम्हारे पिताके तिरस्कारसे मैं अत्यन्त दुःखी हो रहा हूँ ॥ ३२ ॥

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि आस्तीकपर्वणि परिक्षिदुपाख्याने चत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४० ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत आस्तीकपर्वमें परीक्षित्-उपाख्यानविषयक चालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४० ॥