महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 319, कुल 2256 में से
संदर्भ में पढ़ेंकृशने कहा—अभिमन्युपुत्र राजा परीक्षित् अकेले शिकार खेलने आये थे। उन्होंने एक शीघ्रगामी हिंसक मृग (पशु)-को बाणसे बींध डाला; किंतु उस विशाल वनमें विचरते हुए राजाको वह मृग कहीं दिखायी न दिया। फिर उन्होंने तुम्हारे मौनी पिताको देखकर उसके विषयमें पूछा ।। ५-६ ।। तं स्थाणुभूतं तिष्ठन्तं क्षुत्पिपासाश्रमातुरः । पुनः पुनर्मृगं नष्टं पप्रच्छ पितरं तव ।। ७ ।। स च मौनव्रतोपेतो नैव तं प्रत्यभाषत । तस्य राजा धनुष्कोट्या सर्पं स्कन्धे समासजत् ।। ८ ।। राजा भूख-प्यास और थकावटसे व्याकुल थे। इधर तुम्हारे पिता काठकी भाँति अविचल भावसे बैठे थे। राजाने बार-बार तुम्हारे पितासे उस भागे हुए मृगके विषयमें प्रश्न किया, परंतु मौन-व्रतावलम्बी होनेके कारण उन्होंने कुछ उत्तर नहीं दिया। तब राजाने धनुषकी नोकसे एक मरा हुआ साँप उठाकर उनके कंधेपर डाल दिया ।। ७-८ ।। शृङ्गिंस्तव पिता सोऽपि तथैवास्ते यतव्रतः । सोऽपि राजा स्वनगरं प्रस्थितो गजसाह्वयम् ।। ९ ।। शृङ्गिन्! संयमपूर्वक व्रतका पालन करनेवाले तुम्हारे पिता अभी उसी अवस्थामें बैठे हैं और वे राजा परीक्षित् अपनी राजधानी हस्तिनापुरको चले गये हैं ।। ९ ।।
सौतिरुवाच
श्रुत्वैवमृषिपुत्रस्तु शवं कन्धे प्रतिष्ठितम् । कोपसंरक्तनयनः प्रज्वलन्निव मन्युना ।। १० ।। उग्रश्रवाजी कहते हैं—शौनकजी! इस प्रकार अपने पिताके कंधेपर मृतक सर्पके रखे जानेका समाचार सुनकर ऋषिकुमार शृंगी क्रोधसे जल उठा। कोपसे उसकी आँखें लाल हो गयीं ।। १० ।। आविष्टः स हि कोपेन शशाप नृपतिं तदा । वार्युपस्पृश्य तेजस्वी क्रोधवेगबलात्कृतः ।। ११ ।। वह तेजस्वी बालक रोषके आवेशमें आकर प्रचण्ड क्रोधके वेगसे युक्त हो गया था। उसने जलसे आचमन करके हाथमें जल लेकर उस समय राजा परीक्षित्को इस प्रकार शाप दिया ।। ११ ।।
शृंग्युवाच
योऽसौ वृद्धस्य तातस्य तथा कृच्छ्रगतस्य ह । स्कन्धे मृतं समासाक्षीत् पन्नगं राजकिल्बिषी ।। १२ ।। तं पापमतिसंक्रुद्धस्तक्षकः पन्नगेश्वरः । आशीविषस्तिग्मतेजा मद्वाक्यबलचोदितः ।। १३ ।।