महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसंदिश्य कुशलप्रश्नं कार्यवृत्तान्तमेव च । शिष्यं गौरमुखं नाम शीलवन्तं समाहितम् ॥ १४ ॥ **उग्रश्रवाजी कहते हैं—**उत्तम व्रतका पालन करनेवाले दयालु एवं महातपस्वी शमीक मुनिने अपने गौरमुख नामवाले एकाग्रचित्त एवं शीलवान् शिष्यको इस प्रकार आदेश दे कुशल-प्रश्न, कार्य एवं वृत्तान्तका संदेश देकर राजा परीक्षित्के पास भेजा ॥ १३-१४ ॥ सोऽभिगम्य ततः शीघ्रं नरेन्द्रं कुरुवर्धनम् । विवेश भवनं राज्ञः पूर्वं द्वाःस्थैर्निवेदितः ॥ १५ ॥ गौरमुख वहाँसे शीघ्र कुरुकुलकी वृद्धि करनेवाले महाराज परीक्षित्के पास चला गया। राजधानीमें पहुँचनेपर द्वारपालने पहले महाराजको उसके आनेकी सूचना दी और उनकी आज्ञा मिलनेपर गौरमुखने राजभवनमें प्रवेश किया ॥ १५ ॥ पूजितस्तु नरेन्द्रेण द्विजो गौरमुखस्तदा । आचख्यौ च परिश्रान्तो राज्ञः सर्वमशेषतः ॥ १६ ॥ शमीकवचनं घोरं यथोक्तं मन्त्रिसन्निधौ । महाराज परीक्षित्ने उस समय गौरमुख ब्राह्मणका बड़ा सत्कार किया। जब उसने विश्राम कर लिया, तब शमीकके कहे हुए घोर वचनको मन्त्रियोंके समीप राजाके सामने पूर्णरूपसे कह सुनाया ॥ १६½ ॥
गौरमुख उवाच शमीको नाम राजेन्द्र वर्तते विषये तव ॥ १७ ॥ ऋषिः परमधर्मात्मा दान्तः शान्तो महातपाः । तस्य त्वया नरव्याघ्र सर्पः प्राणैर्वियोजितः ॥ १८ ॥ अवसक्तो धनुष्कोट्या स्कन्धे मौनान्वितस्य च । क्षान्तवांस्तव तत् कर्म पुत्रस्तस्य न चक्षमे ॥ १९ ॥ **गौरमुख बोला—**महाराज! आपके राज्यमें शमीक नामवाले एक परम धर्मात्मा महर्षि रहते हैं। वे जितेन्द्रिय, मनको वशमें रखनेवाले और महान् तपस्वी हैं। नरव्याघ्र! आपने मौन व्रत धारण करनेवाले उन महात्माके कंधेपर धनुषकी नोकसे उठाकर एक मरा हुआ साँप रख दिया था। महर्षिने तो उसके लिये आपको क्षमा कर दिया था, किंतु उनके पुत्रको वह सहन नहीं हुआ ॥ १७—१९ ॥ तेन शप्तोऽसि राजेन्द्र पितुरज्ञातमद्य वै । तक्षकः सप्तरात्रेण मृत्युस्तव भविष्यति ॥ २० ॥ राजेन्द्र! उस ऋषिकुमारने आज अपने पिताके अनजानमें ही आपके लिये यह शाप दिया है कि 'आजसे सात रातके बाद ही तक्षक नाग आपकी मृत्युका कारण हो जायगा' ॥ २० ॥