भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

पृष्ठ 315, कुल 2256 में से

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पृष्ठ 315

अन्यांश्च विविधान् वन्यांश्चचार पृथिवीपतिः ॥ १२ ॥ महाराज परीक्षित् वराह, तरक्षु (व्याघ्रविशेष), महिष तथा दूसरे-दूसरे नाना प्रकारके वनके हिंसक पशुओंका शिकार खेलते हुए वनमें घूमते रहते थे ॥ १२ ॥

स कदाचिन्मृगं विद्ध्वा बाणेनानतपर्वणा । पृष्ठतो धनुरूदाय ससार गहने वने ॥ १३ ॥ एक दिन उन्होंने गहन वनमें धनुष लेकर झुकी हुई गाँठवाले बाणसे एक हिंसक पशुको बींध डाला और भागनेपर बहुत दूरतक उसका पीछा किया ॥ १३ ॥

यथैव भगवान् रुद्रो विद्ध्वा यज्ञमृगं दिवि । अन्वगच्छद् धनुष्पाणिः पर्यन्वेष्टुमितस्ततः ॥ १४ ॥ जैसे भगवान् रुद्र आकाशमें मृगशिरा नक्षत्रको बींध-कर उसे खोजनेके लिये धनुष हाथमें लिये इधर-उधर घूमते फिरे, उसी प्रकार परीक्षित् भी घूम रहे थे ॥ १४ ॥

न हि तेन मृगो विद्धो जीवन् गच्छति वै वने । पूर्वरूपं तु तत्तूर्णं सोऽगात् स्वर्गगतिं प्रति ॥ १५ ॥ परिक्षितो नरेन्द्रस्य विद्धो यन्नष्टवान् मृगः । दूरं चापहृतस्तेन मृगेण स महीपतिः ॥ १६ ॥ उनके द्वारा घायल किया हुआ मृग कभी वनमें जीवित बचकर नहीं जाता था; परंतु आज जो महाराज परीक्षित्‌का घायल किया हुआ मृग तत्काल अदृश्य हो गया था, वह वास्तवमें उनके स्वर्गवासका मूर्तिमान् कारण था। उस मृगके साथ राजा परीक्षित् बहुत दूरतक खिंचे चले गये ॥ १५-१६ ॥

परिश्रान्तः पिपासार्त आससाद मुनिं वने । गवां प्रचारेष्वासीनं वत्सानां मुखनिःसृतम् ॥ १७ ॥ भूयिष्ठमुपयुञ्जानं फेनमापिबतां पयः । तमभिद्रुत्य वेगेन स राजा संशितव्रतम् ॥ १८ ॥ अपृच्छद् धनुरुद्यम्य तं मुनिं क्षुच्छ्रमान्वितः । भो भो ब्रह्मन्नहं राजा परीक्षिदभिमन्युजः ॥ १९ ॥ मया विद्धो मृगो नष्टः कच्चित् तं दृष्टवानसि । स मुनिस्तं तु नोवाच किंचिन्मौनव्रते स्थितः ॥ २० ॥ उन्हें बड़ी थकावट आ गयी। वे प्याससे व्याकुल हो उठे और इसी दशामें वनमें शमीक मुनिके पास आये। वे मुनि गौओंके रहनेके स्थानमें आसनपर बैठे थे और गौओंका दूध पीते समय बछड़ोंके मुखसे जो बहुत-सा फेन निकलता, उसीको खा-पीकर तपस्या करते थे। राजा परीक्षित्‌ने कठोर व्रतका पालन करनेवाले उन महर्षिके पास बड़े वेगसे आकर पूछा। पूछते समय वे भूख और थकावटसे बहुत आतुर हो रहे थे और धनुषको उन्होंने ऊपर उठा रखा था। वे बोले—'ब्रह्मन्! मैं अभिमन्युका पुत्र राजा परीक्षित् हूँ। मेरे बाणोंसे विद्ध होकर

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