भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

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पृष्ठ 332

'विप्रवर! महाराज परीक्षित् ब्राह्मणके शापसे तिरस्कृत हैं और उनकी आयु भी समाप्त हो चली है। ऐसी दशामें उन्हें जिलानेके लिये चेष्टा करनेपर तुम्हें सिद्धि प्राप्त होगी, इसमें संदेह है ।। १४ ।।
ततो यशः प्रदीप्तं ते त्रिषु लोकेषु विश्रुतम् ।
निरंशुरिव घर्माशुरन्तर्धानमितो व्रजेत् ।। १५ ।।
'यदि तुम सफल न हुए तो तीनों लोकोंमें विख्यात एवं प्रकाशित तुम्हारा यश किरणरहित सूर्यके समान इस लोकसे अदृश्य हो जायगा' ।। १५ ।।

काश्यप उवाच

धनार्थी याम्यहं तत्र तन्मे देहि भुजङ्गम ।
ततोऽहं विनिवर्तिष्ये स्वापतेयं प्रगृह्य वै ।। १६ ।।
**काश्यपने कहा—**नागराज तक्षक! मैं तो वहाँ धनके लिये ही जाता हूँ, वह तुम्हीं मुझे दे दो तो उस धनको लेकर मैं घर लौट जाऊँगा ।। १६ ।।

तक्षक उवाच

यावद्धनं प्रार्थयसे तस्माद् राज्ञस्ततोऽधिकम् ।
अहमेव प्रदास्यामि निवर्तस्व द्विजोत्तम ।। १७ ।।
**तक्षक बोला—**द्विजश्रेष्ठ! तुम राजा परीक्षित्से जितना धन पाना चाहते हो, उससे अधिक मैं ही दे दूँगा, अतः लौट जाओ ।। १७ ।।

सौतिरुवाच

तक्षकस्य वचः श्रुत्वा काश्यपो द्विजसत्तमः ।
प्रदध्यौ सुमहातेजा राजानं प्रति बुद्धिमान् ।। १८ ।।
**उग्रश्रवाजी कहते हैं—**तक्षककी बात सुनकर परम बुद्धिमान् महातेजस्वी विप्रवर काश्यपने राजा परीक्षित्के विषयमें कुछ देर ध्यान लगाकर सोचा ।। १८ ।।
दिव्यज्ञानः स तेजस्वी ज्ञात्वा तं नृपतिं तदा ।
क्षीणायुषं पाण्डवेयमपावर्तत काश्यपः ।। १९ ।।
लब्ध्वा वित्तं मुनिवरस्तक्षकाद् यावदीप्सितम् ।
निवृत्ते काश्यपे तस्मिन् समयेन महात्मनि ।। २० ।।
जगाम तक्षकस्तूर्णं नगरं नागसाह्वयम् ।
अथ शुश्राव गच्छन् स तक्षको जगतीपतिम् ।। २१ ।।
मन्त्रैर्गदैर्विषहरै रक्ष्यमाणं प्रयत्नतः ।

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