भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

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पृष्ठ 321

क्षन्तव्यं पुत्र धर्मो हि हतो हन्ति न संशयः । यदि राजा न संरक्षेत् पीडा नः परमा भवेत् ॥ २२ ॥ **शमीक बोले—**वत्स! तुमने शाप देकर मेरा प्रिय कार्य नहीं किया है। यह तपस्वियोंका धर्म नहीं है। हमलोग उन महाराज परीक्षित्के राज्यमें निवास करते हैं और उनके द्वारा न्यायपूर्वक हमारी रक्षा होती है। अतः उनको शाप देना मुझे पसंद नहीं है। हमारे-जैसे साधु पुरुषोंको तो वर्तमान राजा परीक्षित्के अपराधको सब प्रकारसे क्षमा ही करना चाहिये। बेटा! यदि धर्मको नष्ट किया जाय तो वह मनुष्यका नाश कर देता है, इसमें संशय नहीं है। यदि राजा रक्षा न करे तो हमें भारी कष्ट पहुँच सकता है ॥ २०—२२ ॥ न शक्नुयाम चरितुं धर्मं पुत्र यथासुखम् । रक्ष्यमाणा वयं तात राजभिर्धर्मदृष्टिभिः ॥ २३ ॥ चरामो विपुलं धर्मं तेषां भागोऽस्ति धर्मतः । सर्वथा वर्तमानस्य राज्ञः क्षन्तव्यमेव हि ॥ २४ ॥ पुत्र! हम राजाके बिना सुखपूर्वक धर्मका अनुष्ठान नहीं कर सकते। तात! धर्मपर दृष्टि रखनेवाले राजाओंके द्वारा सुरक्षित होकर हम अधिक-से-अधिक धर्मका आचरण कर पाते हैं। अतः हमारे पुण्यकर्मोंमें धर्मतः उनका भी भाग है। इसलिये वर्तमान राजा परीक्षित्के अपराधको तो क्षमा ही कर देना चाहिये ॥ २३-२४ ॥ परीक्षित्तु विशेषेण यथास्य प्रपितामहः । रक्षत्यस्मांस्तथा राज्ञा रक्षितव्याः प्रजा विभो ॥ २५ ॥ परीक्षित् तो विशेषरूपसे अपने प्रपितामह युधिष्ठिर आदिकी भाँति हमारी रक्षा करते हैं। शक्तिशाली पुत्र! प्रत्येक राजाको इसी प्रकार प्रजाकी रक्षा करनी चाहिये ॥ २५ ॥ तेनेह क्षुधितेनाद्य श्रान्तेन च तपस्विना । अजानता कृतं मन्ये व्रतमेतदिदं मम ॥ २६ ॥ वे आज भूखे और थके-माँदे यहाँ आये थे। वे तपस्वी नरेश मेरे इस मौन-व्रतको नहीं जानते थे; मैं समझता हूँ इसीलिये उन्होंने मेरे साथ ऐसा बर्ताव कर दिया ॥ २६ ॥ अराजके जनपदे दोषा जायन्ति वै सदा । उद्वृत्तं सततं लोकं राजा दण्डेन शास्ति वै ॥ २७ ॥ जिस देशमें राजा न हो वहाँ अनेक प्रकारके दोष (चोर आदिके भय) पैदा होते हैं। धर्मकी मर्यादा त्यागकर उच्छृंखल बने हुए लोगोंको राजा अपने दण्डके द्वारा शिक्षा देता है ॥ २७ ॥ दण्डात् प्रतिभयं भूयः शान्तिरुत्पद्यते तदा । नोद्विग्नश्चरते धर्मं नोद्विग्नश्चरते क्रियाम् ॥ २८ ॥ दण्डसे भय होता है, फिर भयसे तत्काल शान्ति स्थापित होती है। जो चोर आदिके भयसे उद्विग्न है, वह धर्मका अनुष्ठान नहीं कर सकता। वह उद्विग्न पुरुष यज्ञ, श्राद्ध आदि