महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंशास्त्रीय कर्मोंका आचरण भी नहीं कर सकता ॥ २८ ॥ राज्ञा प्रतिष्ठितो धर्मो धर्मात् स्वर्गः प्रतिष्ठितः । राज्ञो यज्ञक्रियाः सर्वा यज्ञाद् देवाः प्रतिष्ठिताः ॥ २९ ॥ राजासे धर्मकी स्थापना होती है और धर्मसे स्वर्गलोककी प्रतिष्ठा (प्राप्ति) होती है। राजासे सम्पूर्ण यज्ञकर्म प्रतिष्ठित होते हैं और यज्ञसे देवताओंकी प्रतिष्ठा होती है ॥ २९ ॥ देवाद् वृष्टिः प्रवर्तेत वृष्टेरोषधयः स्मृताः । ओषधिभ्यो मनुष्याणां धारयन् सततं हितम् ॥ ३० ॥ मनुष्याणां च यो धाता राजा राज्यकरः पुनः । दशश्रोत्रियसमो राजा इत्येवं मनुरब्रवीत् ॥ ३१ ॥ देवताके प्रसन्न होनेसे वर्षा होती है, वर्षासे अन्न पैदा होता है और अन्नसे निरन्तर मनुष्योंके हितका पोषण करते हुए राज्यका पालन करनेवाला राजा मनुष्योंके लिये विधाता (धारण-पोषण करनेवाला) है। राजा दस श्रोत्रियके समान है, ऐसा मनुजीने कहा है ॥ ३०-३१ ॥ तेनेह क्षुधितेनाद्य श्रान्तेन च तपस्विना । अजानता कृतं मन्ये व्रतमेतदिदं मम ॥ ३२ ॥ वे तपस्वी राजा यहाँ भूखे-प्यासे और थके-माँदे आये थे। उन्हें मेरे इस मौन-व्रतका पता नहीं था, इसलिये मेरे न बोलनेसे रुष्ट होकर उन्होंने ऐसा किया है ॥ ३२ ॥ कस्मादिदं त्वया बाल्यात् सहसा दुष्कृतं कृतम् । न ह्यर्हति नृपः शापमस्मत्तः पुत्र सर्वथा ॥ ३३ ॥ तुमने मूर्खतावश बिना विचारे क्यों यह दुष्कर्म कर डाला? बेटा! राजा हमलोगोंसे शाप पानेके योग्य नहीं हैं ॥ ३३ ॥
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि आस्तीकपर्वणि परिक्षिच्छापे एकचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४१ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत आस्तीकपर्वमें परीक्षित्-शापविषयक इकंतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४१ ॥