महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
महर्षि वसिष्ठद्वारा वसुओंको शाप प्राप्त होनेकी कथा
नवनवतितमोऽध्यायः
महर्षि वसिष्ठद्वारा वसुओंको शाप प्राप्त होनेकी कथा
शान्तनुरुवाच
आपवो नाम को न्वेष वसूनां किं च दुष्कृतम् ।
यस्याभिशापात् ते सर्वे मानुषीं योनिमागताः ॥ १ ॥
**शान्तनुने पूछा—**देवि! ये आपव नामके महात्मा कौन हैं? और वसुओंका क्या अपराध था, जिससे आपके शापसे उन सबको मनुष्य-योनिमें आना पड़ा ॥ १ ॥
अनेन च कुमारेण त्वया दत्तेन किं कृतम् ।
यस्य चैव कृतेनायं मानुषेषु निवत्स्यति ॥ २ ॥
और तुम्हारे दिये हुए इस पुत्रने कौन-सा कर्म किया है, जिसके कारण यह मनुष्यलोकमें निवास करेगा ॥ २ ॥
ईशा वै सर्वलोकस्य वसवस्ते च वै कथम् ।
मानुषेषूदपद्यन्त तन्ममाचक्ष्व जाह्नवि ॥ ३ ॥
जाह्नवि! वसु तो समस्त लोकोंके अधीश्वर हैं, वे कैसे मनुष्यलोकमें उत्पन्न हुए? यह सब बात मुझे बताओ ॥ ३ ॥
वैशम्पायन उवाच
एवमुक्ता तदा गङ्गा राजानमिदमब्रवीत् ।
भर्तारं जाह्नवी देवी शान्तनुं पुरुषर्षभ ॥ ४ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**नरश्रेष्ठ जनमेजय! अपने पति राजा शान्तनुके इस प्रकार पूछनेपर जह्नुपुत्री गङ्गादेवीने उनसे इस प्रकार कहा ॥ ४ ॥
गङ्गोवाच
यं लेभे वरुणः पुत्रं पुरा भरतसत्तम ।
वसिष्ठनामा स मुनिः ख्यात आपव इत्युत ॥ ५ ॥
**गङ्गा बोलीं—**भरतश्रेष्ठ! पूर्वकालमें वरुणने जिन्हें पुत्ररूपमें प्राप्त किया था, वे वसिष्ठ नामक मुनि ही 'आपव' नामसे विख्यात हैं ॥ ५ ॥
तस्याश्रमपदं पुण्यं मृगपक्षिसमन्वितम् ।
मेरोः पार्श्वे नगेन्द्रस्य सर्वर्तुकुसुमावृतम् ॥ ६ ॥
गिरिराज मेरुके पार्श्वभागमें उनका पवित्र आश्रम है; जो मृग और पक्षियोंसे भरा रहता है। सभी ऋतुओंमें विकसित होनेवाले फूल उस आश्रमकी शोभा बढ़ाते हैं ॥ ६ ॥
स वारुणिस्तपस्तेपे तस्मिन् भरतसत्तम ।
वने पुण्यकृतां श्रेष्ठः स्वादुमूलफलोदके ॥ ७ ॥ भरतवंशशिरोमणे! उस वनमें स्वादिष्ट फल, मूल और जलकी सुविधा थी, पुण्यवानोंमें श्रेष्ठ वरुणनन्दन महर्षि वसिष्ठ उसीमें तपस्या करते थे ॥ ७ ॥ दक्षस्य दुहिता या तु सुरभीत्यभिशब्दिता । गां प्रजाता तु सा देवी कश्यपाद् भरतर्षभ ॥ ८ ॥ महाराज! दक्ष प्रजापतिकी पुत्रीने, जो देवी सुरभि नामसे विख्यात है, कश्यपजीके सहवाससे एक गौको जन्म दिया ॥ ८ ॥ अनुग्रहार्थं जगतः सर्वकामदुहां वरा । तां लेभे गां तु धर्मात्मा होमधेनुं स वारुणिः ॥ ९ ॥ वह गौ सम्पूर्ण जगत्पर अनुग्रह करनेके लिये प्रकट हुई थी तथा समस्त कामनाओंको देनेवालोंमें श्रेष्ठ थी। वरुणपुत्र धर्मात्मा वसिष्ठने उस गौको अपनी होमधेनुके रूपमें प्राप्त किया ॥ ९ ॥ सा तस्मिंस्तापसारण्ये वसन्ती मुनिसेविते । चचार पुण्ये रम्ये च गौरपेतभया तदा ॥ १० ॥ वह गौ मुनियोंद्वारा सेवित उस पवित्र एवं रमणीय तापसवनमें रहती हुई सब ओर निर्भय होकर चरती थी ॥ १० ॥ अथ तद् वनमाजग्मुः कदाचिद् भरतर्षभ । पृथ्वाद्या वसवः सर्वे देवा देवर्षिसेवितम् ॥ ११ ॥ भरतश्रेष्ठ! एक दिन उस देवर्षिसेवित वनमें पृथु आदि वसु तथा सम्पूर्ण देवता पधारे ॥ ११ ॥ ते सदारा वनं तच्च व्यचरन्त समन्ततः । रेमिरे रमणीयेषु पर्वतेषु वनेषु च ॥ १२ ॥ वे अपनी स्त्रियोंके साथ उस वनमें चारों ओर विचरने तथा रमणीय पर्वतों और वनोंमें रमण करने लगे ॥ १२ ॥ तत्रैकस्याथ भार्या तु वसोर्वासवविक्रम । संचरन्ती वने तस्मिन् गां ददर्श सुमध्यमा ॥ १३ ॥ इन्द्रके समान पराक्रमी महीपाल! उन वसुओंमेंसे एककी सुन्दरी पत्नीने उस वनमें घूमते समय उस गौको देखा ॥ १३ ॥ नन्दिनीं नाम राजेन्द्र सर्वकामधुगुत्तमाम् । सा विस्मयसमाविष्टा शीलद्रविणसम्पदा ॥ १४ ॥ राजेन्द्र! सम्पूर्ण कामनाओंको देनेवालोंमें उत्तम नन्दिनी नामवाली उस गायको देखकर उसकी शीलसम्पत्तिसे वह वसुपत्नी आश्चर्यचकित हो उठी ॥ १४ ॥ द्यवे वै दर्शयामास तां गां गोवृषभेक्षण ।
आपीनां च सुदोग्ध्रीं च सुवालधिखुरां शुभाम् ॥ १५ ॥ उपपन्नां गुणैः सर्वैः शीलेनानुत्तमेन च । एवंगुणसमायुक्तां वसवे वसुनन्दिनी ॥ १६ ॥ दर्शयामास राजेन्द्र पुरा पौरवनन्दन । द्यौस्तदा तां तु दृष्ट्वैव गां गजेन्द्रेन्द्रविक्रम ॥ १७ ॥ उवाच राजंस्तां देवीं तस्या रूपगुणान् वदन् । एषा गौरुत्तमा देवी वारुणेरसितेक्षणा ॥ १८ ॥ ऋषेस्तस्य वरारोहे यस्येदं वनमुत्तमम् । अस्याः क्षीरं पिबेन्मर्त्यः स्वादु यो वै सुमध्यमे ॥ १९ ॥ दशवर्षसहस्राणि स जीवेत् स्थिरयौवनः । एतच्छ्रुत्वा तु सा देवी नृपोत्तम सुमध्यमा ॥ २० ॥ तमुवाचानवद्याङ्गी भर्तारं दीप्ततेजसम् । अस्ति मे मानुषे लोके नरदेवात्मजा सखी ॥ २१ ॥
वृषभके समान विशाल नेत्रोंवाले महाराज! उस देवीने द्यो नामक वसुको वह शुभ गाय दिखायी, जो भलीभाँति हृष्ट-पुष्ट थी। दूधसे भरे हुए उसके थन बड़े सुन्दर थे, पूँछ और खुर भी बहुत अच्छे थे। वह सुन्दर गाय सभी सद्गुणोंसे सम्पन्न और सर्वोत्तम शील-स्वभावसे युक्त थी। पुरुवंशका आनन्द बढ़ानेवाली सम्राट्! इस प्रकार पूर्वकालमें वसुका आनन्द बढ़ानेवाली देवीने अपने पति वसुको ऐसे सद्गुणोंवाली गौका दर्शन कराया। गजराजके समान पराक्रमी महाराज! द्योने उस गायको देखते ही उसके रूप और गुणोंका वर्णन करते हुए अपनी पत्नीसे कहा—'यह कजरारे नेत्रोंवाली उत्तम गौ दिव्य है। वरारोहे! यह उन वरुणनन्दन महर्षि वसिष्ठकी गाय है, जिनका यह उत्तम तपोवन है। सुमध्यमे! जो मनुष्य इसका स्वादिष्ट दूध पी लेगा, वह दस हजार वर्षोंतक जीवित रहेगा और उतने समयतक उसकी युवावस्था स्थिर रहेगी।' नृपश्रेष्ठ! सुन्दर कटि-प्रदेश और निर्दोष अंगोंवाली वह देवी यह बात सुनकर अपने तेजस्वी पतिसे बोली—'प्राणनाथ! मनुष्यलोकमें एक राजकुमारी मेरी सखी है' ॥ १५—२१ ॥
नाम्ना जितवती नाम रूपयौवनशालिनी । उशीनरस्य राजर्षेः सत्यसंधस्य धीमतः ॥ २२ ॥ दुहिता प्रथिता लोके मानुषे रूपसम्पदा । तस्या हेतोर्महाभाग सवत्सां गां ममेप्सिताम् ॥ २३ ॥
'उसका नाम है जितवती। वह सुन्दर रूप और युवावस्थासे सुशोभित है। सत्यप्रतिज्ञ बुद्धिमान् राजर्षि उशीनरकी पुत्री है। रूपसम्पत्तिकी दृष्टिसे मनुष्यलोकमें उसकी बड़ी ख्याति है। महाभाग! उसीके लिये बछड़ेसहित यह गाय लेनेकी मेरी बड़ी इच्छा है ॥ २२-२३ ॥
आनयस्वामरश्रेष्ठ त्वरितं पुण्यवर्धन । यावदस्याः पयः पीत्वा सा सखी मम मानद ॥ २४ ॥ मानुषेषु भवत्वेका जरारोगविवर्जिता । एतन्मम महाभाग कर्तुमर्हस्यनिन्दित ॥ २५ ॥ ‘सुरश्रेष्ठ! आप पुण्यकी वृद्धि करनेवाले हैं। इस गायको शीघ्र ले आइये। मानद! जिससे इसका दूध पीकर मेरी वह सखी मनुष्यलोकमें अकेली ही जरावस्था एवं रोग-व्याधिसे बची रहे। महाभाग! आप निन्दारहित हैं; मेरे इस मनोरथको पूर्ण कीजिये ॥ २४-२५ ॥
प्रियं प्रियतरं ह्यस्मान्नास्ति मेऽन्यत् कथंचन । एतच्छ्रुत्वा वचस्तस्या देव्याः प्रियचिकीर्षया ॥ २६ ॥ पृथ्वाद्यैर्भ्रातृभिः सार्धं द्यौस्तदा तां जहार गाम् । तया कमलपत्राक्ष्या नियुक्तो द्यौस्तदा नृप ॥ २७ ॥ ऋषेस्तस्य तपस्तीव्रं न शशाक निरीक्षितुम् । हृता गौः सा सदा तेन प्रपातस्तु न तर्कितः ॥ २८ ॥ ‘मेरे लिये किसी तरह भी इससे बढ़कर प्रिय अथवा प्रियतर वस्तु दूसरी नहीं है।' उस देवीका यह वचन सुनकर उसका प्रिय करनेकी इच्छासे द्यौ नामक वसुने पृथु आदि अपने भाइयोंकी सहायतासे उस गौका अपहरण कर लिया। राजन्! कमलदलके समान विशाल नेत्रोंवाली पत्नीसे प्रेरित होकर द्यौने गौका अपहरण तो कर लिया; परंतु उस समय उन महर्षि वसिष्ठकी तीव्र तपस्याके प्रभावकी ओर वे दृष्टिपात नहीं कर सके और न यही सोच सके कि ऋषिके कोपसे मेरा स्वर्गसे पतन हो जायगा ॥ २६—२८ ॥
अथाश्रमपदं प्राप्तः फलान्यादाय वारुणिः । न चापश्यत् स गां तत्र सवत्सां काननोत्तमे ॥ २९ ॥ कुछ समयके बाद वरुणनन्दन वसिष्ठजी फल-मूल लेकर आश्रमपर आये; परंतु उस सुन्दर काननमें उन्हें बछड़ेसहित अपनी गाय नहीं दिखायी दी ॥ २९ ॥
ततः स मृगयामास वने तस्मिंस्तपोधनः । नाध्यगच्छच्च मृगयंस्तां गां मुनिरुदारधीः ॥ ३० ॥ तब तपोधन वसिष्ठजी उस वनमें गायकी खोज करने लगे; परंतु खोजनेपर भी वे उदारबुद्धि महर्षि उस गायको न पा सके ॥ ३० ॥
ज्ञात्वा तथापनीतां तां वसुभिर्दिव्यदर्शनः । ययौ क्रोधवशं सद्यः शशाप च वसूंस्तदा ॥ ३१ ॥ तब उन्होंने दिव्य दृष्टिसे देखा और यह जान गये कि वसुओंने उसका अपहरण किया है। फिर तो वे क्रोधके वशीभूत हो गये और तत्काल वसुओंको शाप दे दिया— ॥ ३१ ॥
यस्मान्मे वसवो जह्रुर्गां वै दोग्ध्रीं सुवालधिम् ।
तस्मात् सर्वे जनिष्यन्ति मानुषेषु न संशयः ॥ ३२ ॥ ‘वसुओंने सुन्दर पूँछवाली मेरी कामधेनु गायका अपहरण किया है, इसलिये वे सब-के-सब मनुष्य-योनिमें जन्म लेंगे, इसमें संशय नहीं है' ॥ ३२ ॥
एवं शशाप भगवान् वसूंस्तान् भरतर्षभ । वशं क्रोधस्य सम्प्राप्त आपवो मुनिसत्तमः ॥ ३३ ॥ भरतर्षभ! इस प्रकार मुनिवर भगवान् वसिष्ठने क्रोधके आवेशमें आकर उन वसुओंको शाप दिया ॥ ३३ ॥
शप्त्वा च तान् महाभागस्तपस्येव मनो दधे । एवं स शप्तवान् राजन् वसूनष्टौ तपोधनः ॥ ३४ ॥ महाप्रभावो ब्रह्मर्षिर्देवान् क्रोधसमन्वितः । अथाश्रमपदं प्राप्तास्ते वै भूयो महात्मनः ॥ ३५ ॥ शप्ताः स्म इति जानन्त ऋषिं तमुपचक्रमुः । प्रसादयन्तस्तमृषिं वसवः पार्थिवर्षभ ॥ ३६ ॥ लेभिरे न च तस्मात् ते प्रसादमृषिसत्तमात् । आपवात् पुरुषव्याघ्र सर्वधर्मविशारदात् ॥ ३७ ॥ उन्हें शाप देकर उन महाभाग महर्षिने फिर तपस्यामें ही मन लगाया। राजन्! तपस्याके धनी ब्रह्मर्षि वसिष्ठका प्रभाव बहुत बड़ा है। इसीलिये उन्होंने क्रोधमें भरकर देवता होनेपर भी उन आठों वसुओंको शाप दे दिया। तदनन्तर हमें शाप मिला है, यह जानकर वे वसु पुनः महामना वसिष्ठके आश्रमपर आये और उन महर्षिको प्रसन्न करनेकी चेष्टा करने लगे। नृपश्रेष्ठ! महर्षि आपव समस्त धर्मोंके ज्ञानमें निपुण थे। महाराज! उनको प्रसन्न करनेकी पूरी चेष्टा करने-पर भी वे वसु उन मुनिश्रेष्ठसे उनका कृपाप्रसाद न पा सके ॥ ३४—३७ ॥
उवाच च स धर्मात्मा शप्ता यूयं धरादयः । अनुसंवत्सरात् सर्वे शापमोक्षमवाप्स्यथ ॥ ३८ ॥ उस समय धर्मात्मा वसिष्ठने उनसे कहा—‘मैंने धर आदि तुम सभी वसुओंको शाप दे दिया है; परंतु तुमलोग तो प्रति वर्ष एक-एक करके सब-के-सब शापसे मुक्त हो जाओगे ॥ ३८ ॥
अयं तु यत्कृते यूयं मया शप्ताः स वत्स्यति । द्यौस्तदा मानुषे लोके दीर्घकालं स्वकर्मणा ॥ ३९ ॥ ‘किंतु यह द्यौ, जिसके कारण तुम सबको शाप मिला है, मनुष्यलोकमें अपने कर्मानुसार दीर्घकालतक निवास करेगा ॥ ३९ ॥
नानृतं तच्चिकीर्षामि क्रुद्धो युष्मान् यदब्रुवम् । न प्रजास्यति चाप्येष मानुषेषु महामनाः ॥ ४० ॥
'मैंने क्रोधमें आकर तुमलोगोंसे जो कुछ कहा है, उसे असत्य करना नहीं चाहता। ये महामना द्यौ मनुष्यलोकमें संतानकी उत्पत्ति नहीं करेंगे ॥ ४० ॥ भविष्यति च धर्मात्मा सर्वशास्त्रविशारदः । पितुः प्रियहिते युक्तः स्त्रीभोगान् वर्जयिष्यति ॥ ४१ ॥ 'और धर्मात्मा तथा सब शास्त्रोंमें निपुण विद्वान् होंगे; पिताके प्रिय एवं हितमें तत्पर रहकर स्त्री-सम्बन्धी भोगोंका परित्याग कर देंगे' ॥ ४१ ॥ एवमुक्त्वा वसून् सर्वान् स जगाम महर्षिः । ततो मामुपजग्मुस्ते समेता वसवस्तदा ॥ ४२ ॥ उन सब वसुओंसे ऐसी बात कहकर वे महर्षि वहाँसे चल दिये। तब वे सब वसु एकत्र होकर मेरे पास आये ॥ ४२ ॥ अयाचन्त च मां राजन् वरं तच्च मया कृतम् । जाताञ्जातान् प्रक्षिपास्मान् स्वयं गङ्गे त्वमम्भसि ॥ ४३ ॥ राजन्! उस समय उन्होंने मुझसे याचना की और मैंने उसे पूर्ण किया। उनकी याचना इस प्रकार थी—'गंगे! हम ज्यों-ज्यों जन्म लें, तुम स्वयं हमें अपने जलमें डाल देना' ॥ ४३ ॥ एवं तेषामहं सम्यक् शप्तानां राजसत्तम । मोक्षार्थं मानुषाल्लोकाद् यथावत् कृतवत्यहम् ॥ ४४ ॥ राजशिरोमणे! इस प्रकार उन शापग्रस्त वसुओंको इस मनुष्यलोकसे मुक्त करनेके लिये मैंने यथावत् प्रयत्न किया है ॥ ४४ ॥ अयं शापादृषेस्तस्य एक एव नृपोत्तम । द्यौ राजन् मानुषे लोके चिरं वत्स्यति भारत ॥ ४५ ॥ भारत! नृपश्रेष्ठ! यह एकमात्र द्यौ ही महर्षिके शापसे दीर्घकालतक मनुष्यलोकमें निवास करेगा ॥ ४५ ॥ (अयं देवव्रतश्चैव गङ्गादत्तश्च मे सुतः । द्विनामा शान्तनोः पुत्रः शान्तनोरधिको गुणैः ॥ अयं कुमारः पुत्रस्ते विवृद्धः पुनरेष्यति । अहं च ते भविष्यामि आह्वानोपगता नृप ॥) राजन्! मेरा यह पुत्र देवव्रत और गंगादत्त—दो नामोंसे विख्यात होगा। आपका बालक गुणोंमें आपसे भी बढ़कर होगा। (अच्छा, अब जाती हूँ) आपका यह पुत्र अभी शिशु-अवस्थामें है। बड़ा होनेपर फिर आपके पास आ जायगा और आप जब मुझे बुलायेंगे तभी मैं आपके सामने उपस्थित हो जाऊँगी।
वैशम्पायन उवाच
एतदाख्याय सा देवी तत्रैवान्तरधीयत । आदाय च कुमारं तं जगामाथ यथेप्सितम् ॥ ४६ ॥ वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! ये सब बातें बताकर गंगादेवी उस नवजात शिशुको साथ ले वहीं अन्तर्धान हो गयीं और अपने अभीष्ट स्थानको चली गयीं ॥ ४६ ॥ स तु देवव्रतो नाम गाङ्गेय इति चाभवत् । द्युनामा शान्तनोः पुत्रः शान्तनोरधिको गुणैः ॥ ४७ ॥ उस बालकका नाम हुआ देवव्रत। कुछ लोग गांगेय भी कहते थे। द्यु* नामवाले वसु शान्तनुके पुत्र होकर गुणोंमें उनसे भी बढ़ गये ॥ ४७ ॥ शान्तनुश्चापि शोकार्तो जगाम स्वपुरं ततः । तस्याहं कीर्तयिष्यामि शान्तनोरधिकान् गुणान् ॥ ४८ ॥ इधर शान्तनु शोकसे आतुर हो पुनः अपने नगरको लौट गये। शान्तनुके उत्तम गुणोंका मैं आगे चलकर वर्णन करूँगा ॥ ४८ ॥ महाभाग्यं च नृपतेर्भारतस्य महात्मनः । यस्येतिहासो द्युतिमान् महाभारतमुच्यते ॥ ४९ ॥ उन भरतवंशी महात्मा नरेशके महान् सौभाग्यका भी मैं वर्णन करूँगा, जिनका उज्ज्वल इतिहास 'महाभारत' नामसे विख्यात है ॥ ४९ ॥
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि आपवोपाख्याने नवनवतितमोऽध्यायः ॥ ९९ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें आपवोपाख्यानविषयक निन्यानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ९९ ॥ (दाक्षिणात्य अधिक पाठके २ श्लोक मिलाकर कुल ५१ श्लोक हैं)
* 'द्यु' का ही नाम 'द्यो' है, जैसा कि पहले कई बार आ चुका है।
१००-
शततमोऽध्यायः
शान्तनुके रूप, गुण और सदाचारकी प्रशंसा, गंगाजीके द्वारा सुशिक्षित पुत्रकी प्राप्ति तथा देवव्रतकी भीष्म-प्रतिज्ञा
वैशम्पायन उवाच
स राजा शान्तनुर्धीमान् देवराजर्षिसत्कृतः ।
धर्मात्मा सर्वलोकेषु सत्यवागिति विश्रुतः ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! राजा शान्तनु बड़े बुद्धिमान् थे; देवता तथा राजर्षि भी उनका सत्कार करते थे। वे धर्मात्मा नरेश सम्पूर्ण जगत्में सत्यवादीके रूपमें विख्यात थे ॥ १ ॥
दमो दानं क्षमा बुद्धिर्ह्रीर्धृतिस्तेज उत्तमम् ।
नित्यान्यासन् महासत्त्वे शान्तनौ पुरुषर्षभे ॥ २ ॥
उन महाबली नरश्रेष्ठ शान्तनुमें इन्द्रियसंयम, दान, क्षमा, बुद्धि, लज्जा, धैर्य तथा उत्तम तेज आदि सद्गुण सदा विद्यमान थे ॥ २ ॥
एवं स गुणसम्पन्नो धर्मार्थकुशलो नृपः ।
आसीद् भरतवंशस्य गोप्ता सर्वजनस्य च ॥ ३ ॥
इस प्रकार उत्तम गुणोंसे सम्पन्न एवं धर्म और अर्थके साधनमें कुशल राजा शान्तनु भरतवंशका पालन तथा सम्पूर्ण प्रजाकी रक्षा करते थे ॥ ३ ॥
कम्बुग्रीवः पृथ्व्यंसो मत्तवारणविक्रमः ।
अन्वितः परिपूर्णार्थैः सर्वैर्नृपतिलक्षणैः ॥ ४ ॥
उनकी ग्रीवा शंखके समान शोभा पाती थी। कंधे विशाल थे। वे मतवाले हाथीके समान पराक्रमी थे। उनमें सभी राजोचित शुभ लक्षण पूर्ण सार्थक होकर निवास करते थे ॥ ४ ॥
तस्य कीर्तिमतो वृत्तमवेक्ष्य सततं नराः ।
धर्म एव परः कामादर्थाच्चेति व्यवस्थिताः ॥ ५ ॥
उन यशस्वी महाराजके धर्मपूर्ण सदाचारको देखकर सब मनुष्य सदा इसी निश्चयपर पहुँचे थे कि काम और अर्थसे धर्म ही श्रेष्ठ है ॥ ५ ॥
एतान्यासन् महासत्त्वे शान्तनौ पुरुषर्षभे ।
न चास्य सदृशः कश्चिद् धर्मतः पार्थिवोऽभवत् ॥ ६ ॥
महान् शक्तिशाली पुरुषश्रेष्ठ शान्तनुमें ये सभी सद्गुण विद्यमान थे। उनके समान धर्मपूर्वक शासन करनेवाला दूसरा कोई राजा नहीं था ॥ ६ ॥
वर्तमानं हि धर्मेषु सर्वधर्मभृतां वरम् ।
तं महीपा महीपालं राजराज्येऽभ्यषेचयन् ॥ ७ ॥ वे धर्ममें सदा स्थिर रहनेवाले और सम्पूर्ण धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ थे; अतः समस्त राजाओंने मिलकर राजा शान्तनुको राजराजेश्वर (सम्राट्)-के पदपर अभिषिक्त कर दिया ॥ ७ ॥ वीतशोकभयाबाधाः सुखस्वप्रनिबोधनाः । पतिं भारत गोप्तारं समपद्यन्त भूमिपाः ॥ ८ ॥ जनमेजय! जब सब राजाओंने शान्तनुको अपना स्वामी तथा रक्षक बना लिया, तब किसीको शोक, भय और मानसिक संताप नहीं रहा। सब लोग सुखसे सोने और जागने लगे ॥ ८ ॥ तेन कीर्तिमता शिष्टाः शक्रप्रतिमतेजसा । यज्ञदानक्रियाशीलाः समपद्यन्त भूमिपाः ॥ ९ ॥ इन्द्रके समान तेजस्वी और कीर्तिशाली शान्तनुके शासनमें रहकर अन्य राजालोग भी दान और यज्ञ कर्मोंमें स्वभावतः प्रवृत्त होने लगे ॥ ९ ॥ शान्तनुप्रमुखैर्गुप्ते लोके नृपतिभिस्तदा । नियमात् सर्ववर्णानां धर्मोत्तरमवर्तत ॥ १० ॥ उस समय शान्तनुप्रधान राजाओंद्वारा सुरक्षित जगत्में सभी वर्णोंके लोग नियमपूर्वक प्रत्येक बर्तावमें धर्मको ही प्रधानता देने लगे ॥ १० ॥ ब्रह्म पर्यचरत् क्षत्रं विशः क्षत्रमनुव्रताः । ब्रह्मक्षत्रानुरक्ताश्च शूद्राः पर्यचरन् विशः ॥ ११ ॥ क्षत्रियलोग ब्राह्मणोंकी सेवा करते, वैश्य ब्राह्मण और क्षत्रियोंमें अनुरक्त रहते तथा शूद्र ब्राह्मण और क्षत्रियोंमें अनुराग रखते हुए वैश्योंकी सेवामें तत्पर रहते थे ॥ ११ ॥ स हास्तिनपुरे रम्ये कुरूणां पुटभेदने । वसन् सागरपर्यन्तामन्वशासद् वसुन्धराम् ॥ १२ ॥ महाराज शान्तनु कुरुवंशकी रमणीय राजधानी हस्तिनापुरमें निवास करते हुए समुद्रपर्यन्त पृथ्वीका शासन और पालन करते थे ॥ १२ ॥ स देवराजसदृशो धर्मज्ञः सत्यवागृजुः । दानधर्मतपोयोगाच्छ्रिया परमया युतः ॥ १३ ॥ वे देवराज इन्द्रके समान पराक्रमी, धर्मज्ञ, सत्यवादी तथा सरल थे। दान, धर्म और तपस्या तीनोंके योगसे उनमें दिव्य कान्तिकी वृद्धि हो रही थी ॥ १३ ॥ अरागद्वेषसंयुक्तः सोमवत् प्रियदर्शनः । तेजसा सूर्यकल्पोऽभूद् वायुवेगसमो जवे । अन्तकप्रतिमः कोपे क्षमया पृथिवीसमः ॥ १४ ॥
उनमें न राग था न द्वेष। चन्द्रमाकी भाँति उनका दर्शन सबको प्यारा लगता था। वे तेजमें सूर्य और वेगमें वायुके समान जान पड़ते थे; क्रोधमें यमराज और क्षमामें पृथ्वीकी समानता करते थे ॥ १४ ॥
वधः पशुवराहाणां तथैव मृगपक्षिणाम् ।
शान्तनौ पृथिवीपाले नावर्तत तथा नृप ॥ १५ ॥
जनमेजय! महाराज शान्तनुके इस पृथ्वीका पालन करते समय पशुओं, वराहों, मृगों तथा पक्षियोंका वध नहीं होता था ॥ १५ ॥
ब्रह्मधर्मोत्तरे राज्ये शान्तनुर्विनयात्मवान् ।
समं शशास भूतानि कामरागविवर्जितः ॥ १६ ॥
उनके राज्यमें ब्रह्म और धर्मकी प्रधानता थी। महाराज शान्तनु बड़े विनयशील तथा काम-राग आदि दोषोंसे दूर रहनेवाले थे। वे सब प्राणियोंका समानभावसे शासन करते थे ॥ १६ ॥
देवर्षिपितृयज्ञार्थमारभ्यन्त तदा क्रियाः ।
न चाधर्मेण केषांचित् प्राणिनामभवद् वधः ॥ १७ ॥
उन दिनों देवयज्ञ, ऋषियज्ञ तथा पितृयज्ञके लिये कर्मोंका आरम्भ होता था। अधर्मका भय होनेके कारण किसी भी प्राणीका वध नहीं किया जाता था ॥ १७ ॥
असुखानांमनाथानां तिर्यग्योनिषु वर्तताम् ।
स एव राजा सर्वेषां भूतानामभवत् पिता ॥ १८ ॥
दुःखी, अनाथ एवं पशु-पक्षीकी योनिमें पड़े हुए जीव—इन सब प्राणियोंका वे राजा शान्तनु ही पिताके समान पालन करते थे ॥ १८ ॥
तस्मिन् कुरुपतिश्रेष्ठे राजराजेश्वरे सति ।
श्रिता वागभवत् सत्यं दानधर्माश्रितं मनः ॥ १९ ॥
कुरुवंशी नरेशोंमें श्रेष्ठ राजराजेश्वर शान्तनुके शासन-कालमें सबकी वाणी सत्यके आश्रित थी—सभी सत्य बोलते थे और सबका मन दान एवं धर्ममें लगता था ॥ १९ ॥
स समाः षोडशाष्टौ च चतस्रोऽष्टौ तथापराः ।
रतिमप्राप्नुवन् स्त्रीषु बभूव वनगोचरः ॥ २० ॥
राजा शान्तनु सोलह, आठ, चार और आठ कुल छत्तीस वर्षोंतक स्त्रीविषयक अनुरागका अनुभव न करते हुए वनमें रहे ॥ २० ॥
तथारूपस्तथाचारस्तथावृत्तस्तथाश्रुतः ।
गाङ्गेयस्तस्य पुत्रोऽभून्नाम्ना देवव्रतो वसुः ॥ २१ ॥
वसुके अवतारभूत गांगेय उनके पुत्र हुए, जिनका नाम देवव्रत था। वे पिताके समान ही रूप, आचार, व्यवहार तथा विद्यासे सम्पन्न थे ॥ २१ ॥
सर्वास्त्रेषु स निष्णातः पार्थिवेष्वितरेषु च ।
महाबलो महासत्त्वो महावीर्यो महारथः ॥ २२ ॥ लौकिक और अलौकिक सब प्रकारके अस्त्रशस्त्रोंकी कलामें वे पारंगत थे। उनके बल, सत्त्व (धैर्य) तथा वीर्य (पराक्रम) महान् थे। वे महारथी वीर थे ॥ २२ ॥ स कदाचिन्मृगं विद्ध्वा गङ्गामनुसरन् नदीम् । भागीरथीमल्पजलां शान्तनुर्दृष्टवान् नृपः ॥ २३ ॥ एक समय किसी हिंसक पशुको बाणोंसे बींधकर राजा शान्तनु उसका पीछा करते हुए भागीरथी गङ्गाके तटपर आये। उन्होंने देखा कि गङ्गाजीमें बहुत थोड़ा जल रह गया है ॥ २३ ॥ तां दृष्ट्वा चिन्तयामास शान्तनुः पुरुषर्षभः । स्यन्दते किं त्वियं नाद्य सरिच्छ्रेष्ठा यथा पुरा ॥ २४ ॥ उसे देखकर पुरुषोंमें श्रेष्ठ महाराज शान्तनु इस चिन्तामें पड़ गये कि यह सरिताओंमें श्रेष्ठ देवनदी आज पहलेकी तरह क्यों नहीं बह रही है ॥ २४ ॥ ततो निमित्तमन्विच्छन् ददर्श स महामनाः । कुमारं रूपसम्पन्नं बृहन्तं चारुदर्शनम् ॥ २५ ॥ दिव्यमस्त्रं विकुर्वाणं यथा देवं पुरन्दरम् । कृत्स्नां गङ्गां समावृत्य शरैस्तीक्ष्णैरवस्थितम् ॥ २६ ॥ तदनन्तर उन महामना नरेशने इसके कारणका पता लगाते हुए जब आगे बढ़कर देखा, तब मालूम हुआ कि एक परम सुन्दर मनोहर रूपसे सम्पन्न विशालकाय कुमार देवराज इन्द्रके समान दिव्यास्त्रका अभ्यास कर रहा है और अपने तीखे बाणोंसे समूची गङ्गाकी धाराको रोककर खड़ा है ॥ २५-२६ ॥ तां शरैराचितां दृष्ट्वा नदीं गङ्गां तदन्तिके । अभवद् विस्मितो राजा दृष्ट्वा कर्मातिमानुषम् ॥ २७ ॥ राजाने उसके निकटकी गङ्गा नदीको उसके बाणोंसे व्याप्त देखा। उस बालकका यह अलौकिक कर्म देखकर उन्हें बड़ा आश्चर्य हुआ ॥ २७ ॥ जातमात्रं पुरा दृष्ट्वा तं पुत्रं शान्तनुस्तदा । नोपलेभे स्मृतिं धीमानभिज्ञातुं तमात्मजम् ॥ २८ ॥ शान्तनुने अपने पुत्रको पहले पैदा होनेके समय ही देखा था; अतः उन बुद्धिमान् नरेशको उस समय उसकी याद नहीं आयी; इसीलिये वे अपने ही पुत्रको पहचान न सके ॥ २८ ॥ स तु तं पितरं दृष्ट्वा मोहयामास मायया । सम्मोह्य तु ततः क्षिप्रं तत्रैवान्तरधीयत ॥ २९ ॥ बालकने अपने पिताको देखकर उन्हें मायासे मोहित कर दिया और मोहित कर दिया और मोहित करके शीघ्र वहीं अन्तर्धान हो गया ॥ २९ ॥
तदद्भुतं ततो दृष्ट्वा तत्र राजा स शान्तनुः । शङ्कमानः सुतं गङ्गामब्रवीद् दर्शयेति ह ॥ ३० ॥ यह अद्भुत बात देखकर राजा शान्तनुको कुछ संदेह हुआ और उन्होंने गंगासे अपने पुत्रको दिखानेको कहा ॥ ३० ॥ दर्शयामास तं गङ्गा बिभ्रती रूपमुत्तमम् । गृहीत्वा दक्षिणे पाणौ तं कुमारमलंकृतम् ॥ ३१ ॥ तब गंगाजी परम सुन्दर रूप धारण करके अपने पुत्रका दाहिना हाथ पकड़े सामने आयीं और दिव्य वस्त्राभूषणोंसे विभूषित कुमार देवव्रतको दिखाया ॥ ३१ ॥ अलंकृतामाभरणैर्विरजोऽम्बरसंवृताम् । दृष्टपूर्वामपि स तां नाभ्यजानात् स शान्तनुः ॥ ३२ ॥ गंगा दिव्य आभूषणोंसे अलंकृत हो स्वच्छ सुन्दर साड़ी पहने हुई थीं। इससे उनका अनुपम सौन्दर्य इतना बढ़ गया था कि पहलेकी देखी होनेपर भी राजा शान्तनु उन्हें पहचान न सके ॥ ३२ ॥
गङ्गोवाच
यं पुत्रमष्टमं राजंस्त्वं पुरा मय्यविन्दथाः । स चायं पुरुषव्याघ्र सर्वास्त्रविदनुत्तमः ॥ ३३ ॥ **गंगाजीने कहा—**महाराज! पूर्वकालमें आपने अपने जिस आठवें पुत्रको मेरे गर्भसे प्राप्त किया था, यह वही है। पुरुषसिंह! यह सम्पूर्ण अस्त्रवेत्ताओंमें अत्यन्त उत्तम है ॥ ३३ ॥
गृहाणेमं महाराज मया संवर्धितं सुतम् । आदाय पुरुषव्याघ्र नयस्वैनं गृहं विभो ॥ ३४ ॥ राजन्! मैंने इसे पाल-पोसकर बड़ा कर दिया है। अब आप अपने इस पुत्रको ग्रहण कीजिये। नरश्रेष्ठ! स्वामिन्! इसे घर ले जाइये ॥ ३४ ॥ वेदानधिजगे साङ्गान्वसिष्ठादेष वीर्यवान् । कृतास्त्रः परमेष्वासो देवराजसमो युधि ॥ ३५ ॥ आपका यह बलवान् पुत्र महर्षि वसिष्ठसे छहों अंगोंसहित समस्त वेदोंका अध्ययन कर चुका है। यह अस्त्र-विद्याका भी पण्डित है, महान् धनुर्धर है और युद्धमें देवराज इन्द्रके समान पराक्रमी है ॥ ३५ ॥ सुराणां सम्मतो नित्यमसुराणां च भारत । उशना वेद यच्छास्त्रमयं तद् वेद सर्वशः ॥ ३६ ॥ भारत! देवता और असुर भी इसका सदा सम्मान करते हैं। शुक्राचार्य जिस (नीति) शास्त्रको जानते हैं, उसका यह भी पूर्णरूपसे जानकार है ॥ ३६ ॥ तथैवाङ्गिरसः पुत्रः सुरासुरनमस्कृतः । यद् वेद शास्त्रं तच्चापि कृत्स्नमस्मिन् प्रतिष्ठितम् ॥ ३७ ॥ तव पुत्रे महाबाहौ साङ्गोपाङ्गं महात्मनि ।
ऋषिः परैरनाधृष्यो जामदग्न्यः प्रतापवान् ॥ ३८ ॥ यदस्त्रं वेद रामश्च तदेतस्मिन् प्रतिष्ठितम् । महेष्वासमिमं राजन् राजधर्मार्थकोविदम् ॥ ३९ ॥ मया दत्तं निजं पुत्रं वीरं वीर गृहं नय ।
इसी प्रकार अंगिराके पुत्र देव-दानव-वन्दित बृहस्पति जिस शास्त्रको जानते हैं, वह भी आपके इस महाबाहु महात्मा पुत्रमें अंग और उपांगोंसहित पूर्णरूपसे प्रतिष्ठित है। जो दूसरोंसे परास्त नहीं होते, वे प्रतापी महर्षि जमदग्निनन्दन परशुराम जिस अस्त्र-विद्याको जानते हैं, वह भी मेरे इस पुत्रमें प्रतिष्ठित है। वीरवर महाराज! यह कुमार राजधर्म तथा अर्थशास्त्रका महान् पण्डित है। मेरे दिये हुए इस महाधनुर्धर वीर पुत्रको आप घर ले जाइये ॥ ३७—३९१/२ ॥
वैशम्पायन उवाच
(इत्युक्त्वा सा महाभागा तत्रैवान्तरधीयत ।) तयैवं समनुज्ञातः पुत्रमादाय शान्तनुः ॥ ४० ॥ भ्राजमानं यथादित्यमाययौ स्वपुरं प्रति । पौरवस्तु पुरीं गत्वा पुरन्दरपुरोपमाम् ॥ ४१ ॥ सर्वकामसमृद्धार्थं मेने सोऽत्मानमात्मना । पौरवेषु ततः पुत्रं राज्यार्थमभयप्रदम् ॥ ४२ ॥ गुणवन्तं महात्मानं यौवराज्येऽभ्यषेचयत् । पौरवाञ्छान्तनोः पुत्रः पितरं च महायशाः ॥ ४३ ॥ राष्ट्रं च रञ्जयामास वृत्तेन भरतर्षभ । स तथा सह पुत्रेण रममाणो महीपतिः ॥ ४४ ॥ वर्तयामास वर्षाणि चत्वार्यमितविक्रमः । स कदाचिद् वनं यातो यमुनाभितो नदीम् ॥ ४५ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**ऐसा कहकर महाभागा गंगादेवी वहीं अन्तर्धान हो गयीं। गंगाजीके इस प्रकार आज्ञा देनेपर महाराज शान्तनु सूर्यके समान प्रकाशित होनेवाले अपने पुत्रको लेकर राजधानीमें आये। उनका हस्तिनापुर इन्द्रनगरी अमरावतीके समान सुन्दर था। पूरुवंशी राजा शान्तनु पुत्रसहित उसमें जाकर अपने-आपको सम्पूर्ण कामनाओंसे सम्पन्न एवं सफलमनोरथ मानने लगे। तदनन्तर उन्होंने सबको अभय देनेवाले महात्मा एवं गुणवान् पुत्रको राजकाजमें सहयोग करनेके लिये समस्त पौरवोंके बीचमें युवराज-पदपर अभिषिक्त कर दिया। जनमेजय! शान्तनुके उस महायशस्वी पुत्रने अपने आचार-व्यवहारसे पिताको, पौरवसमाजको तथा समूचे राष्ट्रको प्रसन्न कर लिया। अमितपराक्रमी राजा शान्तनुने वैसे
गुणवान् पुत्रके साथ आनन्दपूर्वक रहते हुए चार वर्ष व्यतीत किये। एक दिन वे यमुना नदीके निकटवर्ती वनमें गये ॥ ४०—४५ ॥ महीपतिरनिर्देश्यमाजिघ्रद् गन्धमुत्तमम् । तस्य प्रभवमन्विच्छन् विचचार समन्ततः ॥ ४६ ॥ वहाँ राजाको अवर्णनीय एवं परम उत्तम सुगन्धका अनुभव हुआ। वे उसके उद्गमस्थानका पता लगाते हुए सब ओर विचरने लगे ॥ ४६ ॥ स ददर्श तदा कन्यां दाशानां देवरूपिणीम् । तामपृच्छत् स दृष्ट्वैव कन्यामसितलोचनाम् ॥ ४७ ॥ घूमते-घूमते उन्होंने मल्लाहोंकी एक कन्या देखी, जो देवांगनाओंके समान रूपवती थी। श्याम नेत्रोंवाली उस कन्याको देखते ही राजाने पूछा— ॥ ४७ ॥ कस्य त्वमसि का चासि किं च भीरु चिकीर्षसि । साब्रवीद् दाशकन्यास्मि धर्मार्थं वाहये तरिम् ॥ ४८ ॥ पितुर्नियोगाद् भद्रं ते दाशराज्ञो महात्मनः । रूपमाधुर्यगन्धैस्तां संयुक्तां देवरूपिणीम् ॥ ४९ ॥ समीक्ष्य राजा दाशेयीं कामयामास शान्तनुः । स गत्वा पितरं तस्या वरयामास तां तदा ॥ ५० ॥ ‘भीरु! तू कौन है, किसकी पुत्री है और क्या करना चाहती है?’ वह बोली—‘राजन्! आपका कल्याण हो। मैं निषादकन्या हूँ और अपने पिता महामना निषादराजकी आज्ञासे धर्मार्थ नाव चलाती हूँ।’ राजा शान्तनुने रूप, माधुर्य तथा सुगन्धसे युक्त देवांगनाके तुल्य उस निषादकन्याको देखकर उसे प्राप्त करनेकी इच्छा की। तदनन्तर उसके पिताके समीप जाकर उन्होंने उसका वरण किया ॥ ४८—५० ॥ पर्यपृच्छत् ततस्तस्याः पितरं सोऽत्मकारणात् । स च तं प्रत्युवाचेदं दाशराजो महीपतिम् ॥ ५१ ॥ उन्होंने उसके पितासे पूछा—‘मैं अपने लिये तुम्हारी कन्या चाहता हूँ।’ यह सुनकर निषादराजने राजा शान्तनुको यह उत्तर दिया— ॥ ५१ ॥ जातमात्रैव मे देया वराय वरवर्णिनी । हृदि कामस्तु मे कश्चित् तं निबोध जनेश्वर ॥ ५२ ॥ ‘जनेश्वर! जबसे इस सुन्दरी कन्याका जन्म हुआ है, तभीसे मेरे मनमें यह चिन्ता है कि इसका किसी श्रेष्ठ वरके साथ विवाह करना चाहिये; किंतु मेरे हृदयमें एक अभिलाषा है, उसे सुन लीजिये ॥ ५२ ॥ यदीमां धर्मपत्नीं त्वं मत्तः प्रार्थयसेऽनघ । सत्यवागसि सत्येन समयं कुरु मे ततः ॥ ५३ ॥
‘पापरहित नरेश! यदि इस कन्याको अपनी धर्मपत्नी बनानेके लिये आप मुझसे माँग रहे हैं, तो सत्यको सामने रखकर मेरी इच्छा पूर्ण करनेकी प्रतिज्ञा कीजिये; क्योंकि आप सत्यवादी हैं ।। ५३ ।।
समयेन प्रदद्यां ते कन्यामहमिमां नृप ।
न हि मे त्वत्समः कश्चिद् वरो जातु भविष्यति ।। ५४ ।।
‘राजन्! मैं इस कन्याको एक शर्तके साथ आपकी सेवामें दूँगा। मुझे आपके समान दूसरा कोई श्रेष्ठ वर कभी नहीं मिलेगा’ ।। ५४ ।।
शान्तनुरुवाच
श्रुत्वा तव वरं दाश व्यवस्येयमहं तव ।
दातव्यं चेत् प्रदास्यामि न त्वदेयं कथंचन ।। ५५ ।।
शान्तनुने कहा— निषाद! पहले तुम्हारे अभीष्ट वरको सुन लेनेपर मैं उसके विषयमें कुछ निश्चय कर सकता हूँ। यदि देनेयोग्य होगा, तो दूँगा और देनेयोग्य नहीं होगा, तो कदापि नहीं दे सकता ।। ५५ ।।
दाश उवाच
अस्यां जायेत यः पुत्रः स राजा पृथिवीपते ।
त्वदूर्ध्वमभिषेक्तव्यो नान्यः कश्चन पार्थिव ।। ५६ ।।
निषाद बोला— पृथ्वीपते! इसके गर्भसे जो पुत्र उत्पन्न हो, आपके बाद उसीका राजाके पदपर अभिषेक किया जाय, अन्य किसी राजकुमारका नहीं ।। ५६ ।।
वैशम्पायन उवाच
नाकामयत तं दातुं वरं दाशाय शान्तनुः ।
शरीरजेन तीव्रेण दह्यमानोऽपि भारत ।। ५७ ।।
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! राजा शान्तनु प्रचण्ड कामाग्निसे जल रहे थे, तो भी उनके मनमें निषादको वह वर देनेकी इच्छा नहीं हुई ।। ५७ ।।
स चिन्तयन्नेव तदा दाशकन्यां महीपतिः ।
प्रत्यायाद्धास्तिनपुरं कामोपहतचेतनः ।। ५८ ।।
कामकी वेदनासे उनका चित्त चंचल था। वे उस निषादकन्याका ही चिन्तन करते हुए उस समय हस्तिनापुरको लौट गये ।। ५८ ।।
ततः कदाचिच्छोचन्तं शान्तनुं ध्यानमास्थितम् ।
पुत्रो देवव्रतोऽभ्येत्य पितरं वाक्यमब्रवीत् ।। ५९ ।।
तदनन्तर एक दिन राजा शान्तनु ध्यानस्थ होकर कुछ सोच रहे थे—चिन्तामें पड़े थे। इसी समय उनके पुत्र देवव्रत अपने पिताके पास आये और इस प्रकार बोले— ।। ५९ ।।
सर्वतो भवतः क्षेमं विधेयाः सर्वपार्थिवाः ।
तत् किमर्थमिहाभीक्ष्णं परिशोचसि दुःखितः ।। ६० ।।
‘पिताजी! आपका तो सब ओरसे कुशल-मंगल है, भू-मण्डलके सभी नरेश आपकी आज्ञाके अधीन हैं; फिर किसलिये आप निरन्तर दुःखी होकर शोक और चिन्तामें डूबे रहते हैं ।। ६० ।।
ध्यायन्निव च मां राजन्नाभिभाषसि किंचन ।
न चाश्वेन विनिर्यासि विवर्णो हरिणः कृशः ।। ६१ ।।
‘राजन्! आप इस तरह मौन बैठे रहते हैं, मानो किसीका ध्यान कर रहे हों; मुझसे कोई बातचीततक नहीं करते। घोड़ेपर सवार हो कहीं बाहर भी नहीं निकलते। आपकी कान्ति मलिन होती जा रही है। आप पीले और दुबले हो गये हैं ।। ६१ ।।
व्याधिमिच्छामि ते ज्ञातुं प्रतिकुर्यां हि तत्र वै ।
एवमुक्तः स पुत्रेण शान्तनुः प्रत्यभाषत ।। ६२ ।।
‘आपको कौन-सा रोग लग गया है, यह मैं जानना चाहता हूँ, जिससे मैं उसका प्रतीकार कर सकूँ।’ पुत्रके ऐसा कहनेपर शान्तनुने उत्तर दिया— ।। ६२ ।।
असंशयं ध्यानपरो यथा वत्स तथा शृणु ।
अपत्यं नस्त्वमेवैकः कुले महति भारत ।। ६३ ।।
‘बेटा! इसमें संदेह नहीं कि मैं चिन्तामें डूबा रहता हूँ। वह चिन्ता कैसी है, सो बताता हूँ, सुनो। भारत! तुम इस विशाल वंशमें मेरे एक ही पुत्र हो ।। ६३ ।। शस्त्रनित्यश्च सततं पौरुषे पर्यवस्थितः । अनित्यतां च लोकानामनुशोचामि पुत्रक ।। ६४ ।। ‘तुम भी सदा अस्त्र-शस्त्रोंके अभ्यासमें लगे रहते हो और पुरुषार्थके लिये सदैव उद्यत रहते हो। बेटा! मैं इस जगत्की अनित्यताको लेकर निरन्तर शोकग्रस्त एवं चिन्तित रहता हूँ ।। ६४ ।। कथंचित् तव गाङ्गेय विपत्तौ नास्ति नः कुलम् । असंशयं त्वमेवैकः शतादपि वरः सुतः ।। ६५ ।। ‘गाङ्गनन्दन! यदि किसी प्रकार तुमपर कोई विपत्ति आयी, तो उसी दिन हमारा यह वंश समाप्त हो जायगा। इसमें संदेह नहीं कि तुम अकेले ही मेरे लिये सौ पुत्रोंसे भी बढ़कर हो ।। ६५ ।। न चाप्यहं वृथा भूयो दारान् कर्तुमिहोत्सहे । संतानस्याविनाशाय कामये भद्रमस्तु ते ।। ६६ ।। ‘मैं पुनः व्यर्थ विवाह नहीं करना चाहता; किंतु हमारी वंशपरम्पराका लोप न हो, इसीके लिये मुझे पुनः पत्नीकी कामना हुई है। तुम्हारा कल्याण हो ।। ६६ ।। अनपत्यतैकपुत्रत्वमित्याहुर्धर्मवादिनः । (चक्षुरेकं च पुत्रश्च अस्ति नास्ति च भारत । चक्षुर्नाशे तनोर्नाशः पुत्रनाशे कुलक्षयः ।।) अग्निहोत्रं त्रयीविद्यासंतानमपि चाक्षयम् ।। ६७ ।। सर्वाण्येतान्यपत्यस्य कलां नार्हन्ति षोडशीम् । ‘धर्मवादी विद्वान् कहते हैं कि एक पुत्रका होना संतानहीनताके ही तुल्य है। भारत! एक आँख अथवा एक पुत्र यदि है, तो वह भी नहींके बराबर है। नेत्रका नाश होनेपर मानो शरीरका ही नाश हो जाता है, इसी प्रकार पुत्रके नष्ट होनेपर कुलपरम्परा ही नष्ट हो जाती है। अग्निहोत्र, तीनों वेद तथा शिष्य-प्रशिष्यके क्रमसे चलनेवाले विद्याजनित वंशकी अक्षय परम्परा—ये सब मिलकर भी जन्मसे होनेवाली संतानकी सोलहवीं कलाके भी बराबर नहीं है ।। ६७ १/२ ।। एवमेतन्मनुष्येषु तच्च सर्वप्रजास्विति ।। ६८ ।। ‘इस प्रकार संतानका महत्त्व जैसा मनुष्योंमें मान्य है, उसी प्रकार अन्य सब प्राणियोंमें भी है ।। ६८ ।। यदपत्यं महाप्राज्ञ तत्र मे नास्ति संशयः । एषा त्रयीपुराणानां देवतानां च शाश्वती ।। ६९ ।। (अपत्यं कर्म विद्या च त्रीणि ज्योतींषि भारत ।
यदिदं कारणं तात सर्वमाख्यातमञ्जसा ॥) ‘भारत! महाप्राज्ञ! इस बातमें मुझे तनिक भी संदेह नहीं है कि संतान, कर्म और विद्या—ये तीन ज्योतियाँ हैं; इनमें भी जो संतान है, उसका महत्त्व सबसे अधिक है। यही वेदत्रयी पुराण तथा देवताओंका भी सनातन मत है। तात! मेरी चिन्ताका जो कारण है, वह सब तुम्हें स्पष्ट बता दिया ।। ६९ ।। त्वं च शूरः सदामर्षी शस्त्रनित्यश्च भारत । नान्यत्र युद्धात् तस्मात् ते निधनं विद्यते क्वचित् ॥ ७० ॥ ‘भारत! तुम शूरवीर हो। तुम कभी किसीकी बात सहन नहीं कर सकते और सदा अस्त्र-शस्त्रोंके अभ्यासमें ही लगे रहते हो; अतः युद्धके सिवा और किसी कारणसे कभी तुम्हारी मृत्यु होनेकी सम्भावना नहीं है ।। ७० ।। सोऽस्मि संशयमापन्नस्त्वयि शान्ते कथं भवेत् । इति ते कारणं तात दुःखस्योक्तमशेषतः ॥ ७१ ॥ ‘इसीलिये मैं इस संदेहमें पड़ा हूँ कि तुम्हारे शान्त हो जानेपर इस वंशपरम्पराका निर्वाह कैसे होगा? तात! यही मेरे दुःखका कारण है; वह सब-का-सब तुम्हें बता दिया’ ।। ७१ ।।
वैशम्पायन उवाच
ततस्तत्कारणं राज्ञो ज्ञात्वा सर्वमशेषतः । देवव्रतो महाबुद्धिः प्रज्ञया चान्वचिन्तयत् ॥ ७२ ॥ वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! राजाके दुःखका वह सारा कारण जानकर परम बुद्धिमान् देवव्रतने अपनी बुद्धिसे भी उसपर विचार किया ।। ७२ ।। अभ्यगच्छत् तदैवाशु वृद्धामात्यं पितुर्हितम् । तमपृच्छत् तदाभ्येत्य पितुस्तच्छोककारणम् ॥ ७३ ॥ तदनन्तर वे उसी समय तुरंत अपने पिताके हितैषी बूढ़े मन्त्रीके पास गये और पिताके शोकका वास्तविक कारण क्या है, इसके विषयमें उनसे पूछताछ की ।। ७३ ।। तस्मै स कुरुमुख्याय यथावत् परिपृच्छते । वरं शशंस कन्यां तामुद्दिश्य भरतर्षभ ॥ ७४ ॥ भरतश्रेष्ठ! कुरुवंशके श्रेष्ठ पुरुष देवव्रतके भलीभाँति पूछनेपर वृद्ध मन्त्रीने बताया कि महाराज एक कन्यासे विवाह करना चाहते हैं ।। ७४ ।। (सूतं भूयोऽपि संतप्त आह्वयामास वै पितुः ॥ सूतस्तु कुरुमुख्यस्य उपयातस्तदाज्ञया । तमुवाच महाप्राज्ञो भीष्मो वै सारथिं पितुः ॥
उसके बाद भी दुःखसे दुःखी देवव्रतने पिताके सारथिको बुलाया। राजकुमारकी आज्ञा पाकर कुरुराज शान्तनुका सारथि उनके पास आया। तब महाप्राज्ञ भीष्मने पिताके सारथिसे पूछा।
भीष्म उवाच
त्वं सारथे पितुर्मह्यं सखासि रथयुग् यतः ।
अपि जानासि यदि वै कस्यां भावो नृपस्य तु ॥
यथा वक्ष्यसि मे पृष्टः करिष्ये न तदन्यथा ।
**भीष्म बोले—**सारथे! तुम मेरे पिताके सखा हो, क्योंकि उनका रथ जोतनेवाले हो। क्या तुम जानते हो कि महाराजका अनुराग किस स्त्रीमें है? मेरे पूछनेपर तुम जैसा कहोगे, वैसा ही करूँगा, उसके विपरीत नहीं करूँगा।
सूत उवाच
दाशकन्या नरश्रेष्ठ तत्र भावः पितुर्गतः ।
वृतः स नरदेवेन तदा वचनमब्रवीत् ॥
योऽस्यां पुमान् भवेद् गर्भः स राजा त्वदनन्तरम् ।
नाकामयत तं दातुं पिता तव वरं तदा ॥
स चापि निश्चयस्तस्य न च दद्यामतोऽन्यथा ।
एवं ते कथितं वीर कुरुष्व यदनन्तरम् ॥)
**सूत बोला—**नरश्रेष्ठ! एक धीवरकी कन्या है, उसीके प्रति आपके पिताका अनुराग हो गया है। महाराजने धीवरसे उस कन्याको माँगा भी था, परंतु उस समय उसने यह शर्त रखी कि 'इसके गर्भसे जो पुत्र हो, वही आपके बाद राजा होना चाहिये।' आपके पिताजीके मनमें धीवरको ऐसा वर देनेकी इच्छा नहीं हुई। इधर उसका भी पक्का निश्चय है कि यह शर्त स्वीकार किये बिना मैं अपनी कन्या नहीं दूँगा। वीर! यही वृत्तान्त है, जो मैंने आपसे निवेदन कर दिया। इसके बाद आप जैसा उचित समझें, वैसा करें।
ततो देवव्रतो वृद्धैः क्षत्रियैः सहितस्तदा ।
अभिगम्य दाशराजं कन्यां वव्रे पितुः स्वयम् ॥ ७५ ॥
यह सुनकर कुमार देवव्रतने उस समय बूढ़े क्षत्रियोंके साथ निषादराजके पास जाकर स्वयं अपने पिताके लिये उसकी कन्या माँगी ॥ ७५ ॥
तं दाशः प्रतिजग्राह विधिवत् प्रतिपूज्य च ।
अब्रवीच्चैनमासीनं राजसंसदि भारत ॥ ७६ ॥
भारत! उस समय निषादने उनका बड़ा सत्कार किया और विधिपूर्वक पूजा करके आसनपर बैठनेके पश्चात् साथ आये हुए क्षत्रियोंकी मण्डलीमें दाशराजने उनसे कहा ॥ ७६ ॥