महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें‘बेटा! इसमें संदेह नहीं कि मैं चिन्तामें डूबा रहता हूँ। वह चिन्ता कैसी है, सो बताता हूँ, सुनो। भारत! तुम इस विशाल वंशमें मेरे एक ही पुत्र हो ।। ६३ ।। शस्त्रनित्यश्च सततं पौरुषे पर्यवस्थितः । अनित्यतां च लोकानामनुशोचामि पुत्रक ।। ६४ ।। ‘तुम भी सदा अस्त्र-शस्त्रोंके अभ्यासमें लगे रहते हो और पुरुषार्थके लिये सदैव उद्यत रहते हो। बेटा! मैं इस जगत्की अनित्यताको लेकर निरन्तर शोकग्रस्त एवं चिन्तित रहता हूँ ।। ६४ ।। कथंचित् तव गाङ्गेय विपत्तौ नास्ति नः कुलम् । असंशयं त्वमेवैकः शतादपि वरः सुतः ।। ६५ ।। ‘गाङ्गनन्दन! यदि किसी प्रकार तुमपर कोई विपत्ति आयी, तो उसी दिन हमारा यह वंश समाप्त हो जायगा। इसमें संदेह नहीं कि तुम अकेले ही मेरे लिये सौ पुत्रोंसे भी बढ़कर हो ।। ६५ ।। न चाप्यहं वृथा भूयो दारान् कर्तुमिहोत्सहे । संतानस्याविनाशाय कामये भद्रमस्तु ते ।। ६६ ।। ‘मैं पुनः व्यर्थ विवाह नहीं करना चाहता; किंतु हमारी वंशपरम्पराका लोप न हो, इसीके लिये मुझे पुनः पत्नीकी कामना हुई है। तुम्हारा कल्याण हो ।। ६६ ।। अनपत्यतैकपुत्रत्वमित्याहुर्धर्मवादिनः । (चक्षुरेकं च पुत्रश्च अस्ति नास्ति च भारत । चक्षुर्नाशे तनोर्नाशः पुत्रनाशे कुलक्षयः ।।) अग्निहोत्रं त्रयीविद्यासंतानमपि चाक्षयम् ।। ६७ ।। सर्वाण्येतान्यपत्यस्य कलां नार्हन्ति षोडशीम् । ‘धर्मवादी विद्वान् कहते हैं कि एक पुत्रका होना संतानहीनताके ही तुल्य है। भारत! एक आँख अथवा एक पुत्र यदि है, तो वह भी नहींके बराबर है। नेत्रका नाश होनेपर मानो शरीरका ही नाश हो जाता है, इसी प्रकार पुत्रके नष्ट होनेपर कुलपरम्परा ही नष्ट हो जाती है। अग्निहोत्र, तीनों वेद तथा शिष्य-प्रशिष्यके क्रमसे चलनेवाले विद्याजनित वंशकी अक्षय परम्परा—ये सब मिलकर भी जन्मसे होनेवाली संतानकी सोलहवीं कलाके भी बराबर नहीं है ।। ६७ १/२ ।। एवमेतन्मनुष्येषु तच्च सर्वप्रजास्विति ।। ६८ ।। ‘इस प्रकार संतानका महत्त्व जैसा मनुष्योंमें मान्य है, उसी प्रकार अन्य सब प्राणियोंमें भी है ।। ६८ ।। यदपत्यं महाप्राज्ञ तत्र मे नास्ति संशयः । एषा त्रयीपुराणानां देवतानां च शाश्वती ।। ६९ ।। (अपत्यं कर्म विद्या च त्रीणि ज्योतींषि भारत ।