भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

पृष्ठ 732, कुल 2256 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 732

आनयस्वामरश्रेष्ठ त्वरितं पुण्यवर्धन । यावदस्याः पयः पीत्वा सा सखी मम मानद ॥ २४ ॥ मानुषेषु भवत्वेका जरारोगविवर्जिता । एतन्मम महाभाग कर्तुमर्हस्यनिन्दित ॥ २५ ॥ ‘सुरश्रेष्ठ! आप पुण्यकी वृद्धि करनेवाले हैं। इस गायको शीघ्र ले आइये। मानद! जिससे इसका दूध पीकर मेरी वह सखी मनुष्यलोकमें अकेली ही जरावस्था एवं रोग-व्याधिसे बची रहे। महाभाग! आप निन्दारहित हैं; मेरे इस मनोरथको पूर्ण कीजिये ॥ २४-२५ ॥

प्रियं प्रियतरं ह्यस्मान्नास्ति मेऽन्यत् कथंचन । एतच्छ्रुत्वा वचस्तस्या देव्याः प्रियचिकीर्षया ॥ २६ ॥ पृथ्वाद्यैर्भ्रातृभिः सार्धं द्यौस्तदा तां जहार गाम् । तया कमलपत्राक्ष्या नियुक्तो द्यौस्तदा नृप ॥ २७ ॥ ऋषेस्तस्य तपस्तीव्रं न शशाक निरीक्षितुम् । हृता गौः सा सदा तेन प्रपातस्तु न तर्कितः ॥ २८ ॥ ‘मेरे लिये किसी तरह भी इससे बढ़कर प्रिय अथवा प्रियतर वस्तु दूसरी नहीं है।' उस देवीका यह वचन सुनकर उसका प्रिय करनेकी इच्छासे द्यौ नामक वसुने पृथु आदि अपने भाइयोंकी सहायतासे उस गौका अपहरण कर लिया। राजन्! कमलदलके समान विशाल नेत्रोंवाली पत्नीसे प्रेरित होकर द्यौने गौका अपहरण तो कर लिया; परंतु उस समय उन महर्षि वसिष्ठकी तीव्र तपस्याके प्रभावकी ओर वे दृष्टिपात नहीं कर सके और न यही सोच सके कि ऋषिके कोपसे मेरा स्वर्गसे पतन हो जायगा ॥ २६—२८ ॥

अथाश्रमपदं प्राप्तः फलान्यादाय वारुणिः । न चापश्यत् स गां तत्र सवत्सां काननोत्तमे ॥ २९ ॥ कुछ समयके बाद वरुणनन्दन वसिष्ठजी फल-मूल लेकर आश्रमपर आये; परंतु उस सुन्दर काननमें उन्हें बछड़ेसहित अपनी गाय नहीं दिखायी दी ॥ २९ ॥

ततः स मृगयामास वने तस्मिंस्तपोधनः । नाध्यगच्छच्च मृगयंस्तां गां मुनिरुदारधीः ॥ ३० ॥ तब तपोधन वसिष्ठजी उस वनमें गायकी खोज करने लगे; परंतु खोजनेपर भी वे उदारबुद्धि महर्षि उस गायको न पा सके ॥ ३० ॥

ज्ञात्वा तथापनीतां तां वसुभिर्दिव्यदर्शनः । ययौ क्रोधवशं सद्यः शशाप च वसूंस्तदा ॥ ३१ ॥ तब उन्होंने दिव्य दृष्टिसे देखा और यह जान गये कि वसुओंने उसका अपहरण किया है। फिर तो वे क्रोधके वशीभूत हो गये और तत्काल वसुओंको शाप दे दिया— ॥ ३१ ॥

यस्मान्मे वसवो जह्रुर्गां वै दोग्ध्रीं सुवालधिम् ।