महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 733, कुल 2256 में से
संदर्भ में पढ़ेंतस्मात् सर्वे जनिष्यन्ति मानुषेषु न संशयः ॥ ३२ ॥ ‘वसुओंने सुन्दर पूँछवाली मेरी कामधेनु गायका अपहरण किया है, इसलिये वे सब-के-सब मनुष्य-योनिमें जन्म लेंगे, इसमें संशय नहीं है' ॥ ३२ ॥
एवं शशाप भगवान् वसूंस्तान् भरतर्षभ । वशं क्रोधस्य सम्प्राप्त आपवो मुनिसत्तमः ॥ ३३ ॥ भरतर्षभ! इस प्रकार मुनिवर भगवान् वसिष्ठने क्रोधके आवेशमें आकर उन वसुओंको शाप दिया ॥ ३३ ॥
शप्त्वा च तान् महाभागस्तपस्येव मनो दधे । एवं स शप्तवान् राजन् वसूनष्टौ तपोधनः ॥ ३४ ॥ महाप्रभावो ब्रह्मर्षिर्देवान् क्रोधसमन्वितः । अथाश्रमपदं प्राप्तास्ते वै भूयो महात्मनः ॥ ३५ ॥ शप्ताः स्म इति जानन्त ऋषिं तमुपचक्रमुः । प्रसादयन्तस्तमृषिं वसवः पार्थिवर्षभ ॥ ३६ ॥ लेभिरे न च तस्मात् ते प्रसादमृषिसत्तमात् । आपवात् पुरुषव्याघ्र सर्वधर्मविशारदात् ॥ ३७ ॥ उन्हें शाप देकर उन महाभाग महर्षिने फिर तपस्यामें ही मन लगाया। राजन्! तपस्याके धनी ब्रह्मर्षि वसिष्ठका प्रभाव बहुत बड़ा है। इसीलिये उन्होंने क्रोधमें भरकर देवता होनेपर भी उन आठों वसुओंको शाप दे दिया। तदनन्तर हमें शाप मिला है, यह जानकर वे वसु पुनः महामना वसिष्ठके आश्रमपर आये और उन महर्षिको प्रसन्न करनेकी चेष्टा करने लगे। नृपश्रेष्ठ! महर्षि आपव समस्त धर्मोंके ज्ञानमें निपुण थे। महाराज! उनको प्रसन्न करनेकी पूरी चेष्टा करने-पर भी वे वसु उन मुनिश्रेष्ठसे उनका कृपाप्रसाद न पा सके ॥ ३४—३७ ॥
उवाच च स धर्मात्मा शप्ता यूयं धरादयः । अनुसंवत्सरात् सर्वे शापमोक्षमवाप्स्यथ ॥ ३८ ॥ उस समय धर्मात्मा वसिष्ठने उनसे कहा—‘मैंने धर आदि तुम सभी वसुओंको शाप दे दिया है; परंतु तुमलोग तो प्रति वर्ष एक-एक करके सब-के-सब शापसे मुक्त हो जाओगे ॥ ३८ ॥
अयं तु यत्कृते यूयं मया शप्ताः स वत्स्यति । द्यौस्तदा मानुषे लोके दीर्घकालं स्वकर्मणा ॥ ३९ ॥ ‘किंतु यह द्यौ, जिसके कारण तुम सबको शाप मिला है, मनुष्यलोकमें अपने कर्मानुसार दीर्घकालतक निवास करेगा ॥ ३९ ॥
नानृतं तच्चिकीर्षामि क्रुद्धो युष्मान् यदब्रुवम् । न प्रजास्यति चाप्येष मानुषेषु महामनाः ॥ ४० ॥