महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगृहाणेमं महाराज मया संवर्धितं सुतम् । आदाय पुरुषव्याघ्र नयस्वैनं गृहं विभो ॥ ३४ ॥ राजन्! मैंने इसे पाल-पोसकर बड़ा कर दिया है। अब आप अपने इस पुत्रको ग्रहण कीजिये। नरश्रेष्ठ! स्वामिन्! इसे घर ले जाइये ॥ ३४ ॥ वेदानधिजगे साङ्गान्वसिष्ठादेष वीर्यवान् । कृतास्त्रः परमेष्वासो देवराजसमो युधि ॥ ३५ ॥ आपका यह बलवान् पुत्र महर्षि वसिष्ठसे छहों अंगोंसहित समस्त वेदोंका अध्ययन कर चुका है। यह अस्त्र-विद्याका भी पण्डित है, महान् धनुर्धर है और युद्धमें देवराज इन्द्रके समान पराक्रमी है ॥ ३५ ॥ सुराणां सम्मतो नित्यमसुराणां च भारत । उशना वेद यच्छास्त्रमयं तद् वेद सर्वशः ॥ ३६ ॥ भारत! देवता और असुर भी इसका सदा सम्मान करते हैं। शुक्राचार्य जिस (नीति) शास्त्रको जानते हैं, उसका यह भी पूर्णरूपसे जानकार है ॥ ३६ ॥ तथैवाङ्गिरसः पुत्रः सुरासुरनमस्कृतः । यद् वेद शास्त्रं तच्चापि कृत्स्नमस्मिन् प्रतिष्ठितम् ॥ ३७ ॥ तव पुत्रे महाबाहौ साङ्गोपाङ्गं महात्मनि ।