महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंऋषिः परैरनाधृष्यो जामदग्न्यः प्रतापवान् ॥ ३८ ॥ यदस्त्रं वेद रामश्च तदेतस्मिन् प्रतिष्ठितम् । महेष्वासमिमं राजन् राजधर्मार्थकोविदम् ॥ ३९ ॥ मया दत्तं निजं पुत्रं वीरं वीर गृहं नय ।
इसी प्रकार अंगिराके पुत्र देव-दानव-वन्दित बृहस्पति जिस शास्त्रको जानते हैं, वह भी आपके इस महाबाहु महात्मा पुत्रमें अंग और उपांगोंसहित पूर्णरूपसे प्रतिष्ठित है। जो दूसरोंसे परास्त नहीं होते, वे प्रतापी महर्षि जमदग्निनन्दन परशुराम जिस अस्त्र-विद्याको जानते हैं, वह भी मेरे इस पुत्रमें प्रतिष्ठित है। वीरवर महाराज! यह कुमार राजधर्म तथा अर्थशास्त्रका महान् पण्डित है। मेरे दिये हुए इस महाधनुर्धर वीर पुत्रको आप घर ले जाइये ॥ ३७—३९१/२ ॥
वैशम्पायन उवाच
(इत्युक्त्वा सा महाभागा तत्रैवान्तरधीयत ।) तयैवं समनुज्ञातः पुत्रमादाय शान्तनुः ॥ ४० ॥ भ्राजमानं यथादित्यमाययौ स्वपुरं प्रति । पौरवस्तु पुरीं गत्वा पुरन्दरपुरोपमाम् ॥ ४१ ॥ सर्वकामसमृद्धार्थं मेने सोऽत्मानमात्मना । पौरवेषु ततः पुत्रं राज्यार्थमभयप्रदम् ॥ ४२ ॥ गुणवन्तं महात्मानं यौवराज्येऽभ्यषेचयत् । पौरवाञ्छान्तनोः पुत्रः पितरं च महायशाः ॥ ४३ ॥ राष्ट्रं च रञ्जयामास वृत्तेन भरतर्षभ । स तथा सह पुत्रेण रममाणो महीपतिः ॥ ४४ ॥ वर्तयामास वर्षाणि चत्वार्यमितविक्रमः । स कदाचिद् वनं यातो यमुनाभितो नदीम् ॥ ४५ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**ऐसा कहकर महाभागा गंगादेवी वहीं अन्तर्धान हो गयीं। गंगाजीके इस प्रकार आज्ञा देनेपर महाराज शान्तनु सूर्यके समान प्रकाशित होनेवाले अपने पुत्रको लेकर राजधानीमें आये। उनका हस्तिनापुर इन्द्रनगरी अमरावतीके समान सुन्दर था। पूरुवंशी राजा शान्तनु पुत्रसहित उसमें जाकर अपने-आपको सम्पूर्ण कामनाओंसे सम्पन्न एवं सफलमनोरथ मानने लगे। तदनन्तर उन्होंने सबको अभय देनेवाले महात्मा एवं गुणवान् पुत्रको राजकाजमें सहयोग करनेके लिये समस्त पौरवोंके बीचमें युवराज-पदपर अभिषिक्त कर दिया। जनमेजय! शान्तनुके उस महायशस्वी पुत्रने अपने आचार-व्यवहारसे पिताको, पौरवसमाजको तथा समूचे राष्ट्रको प्रसन्न कर लिया। अमितपराक्रमी राजा शान्तनुने वैसे