महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 737, कुल 2256 में से
संदर्भ में पढ़ेंतं महीपा महीपालं राजराज्येऽभ्यषेचयन् ॥ ७ ॥ वे धर्ममें सदा स्थिर रहनेवाले और सम्पूर्ण धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ थे; अतः समस्त राजाओंने मिलकर राजा शान्तनुको राजराजेश्वर (सम्राट्)-के पदपर अभिषिक्त कर दिया ॥ ७ ॥ वीतशोकभयाबाधाः सुखस्वप्रनिबोधनाः । पतिं भारत गोप्तारं समपद्यन्त भूमिपाः ॥ ८ ॥ जनमेजय! जब सब राजाओंने शान्तनुको अपना स्वामी तथा रक्षक बना लिया, तब किसीको शोक, भय और मानसिक संताप नहीं रहा। सब लोग सुखसे सोने और जागने लगे ॥ ८ ॥ तेन कीर्तिमता शिष्टाः शक्रप्रतिमतेजसा । यज्ञदानक्रियाशीलाः समपद्यन्त भूमिपाः ॥ ९ ॥ इन्द्रके समान तेजस्वी और कीर्तिशाली शान्तनुके शासनमें रहकर अन्य राजालोग भी दान और यज्ञ कर्मोंमें स्वभावतः प्रवृत्त होने लगे ॥ ९ ॥ शान्तनुप्रमुखैर्गुप्ते लोके नृपतिभिस्तदा । नियमात् सर्ववर्णानां धर्मोत्तरमवर्तत ॥ १० ॥ उस समय शान्तनुप्रधान राजाओंद्वारा सुरक्षित जगत्में सभी वर्णोंके लोग नियमपूर्वक प्रत्येक बर्तावमें धर्मको ही प्रधानता देने लगे ॥ १० ॥ ब्रह्म पर्यचरत् क्षत्रं विशः क्षत्रमनुव्रताः । ब्रह्मक्षत्रानुरक्ताश्च शूद्राः पर्यचरन् विशः ॥ ११ ॥ क्षत्रियलोग ब्राह्मणोंकी सेवा करते, वैश्य ब्राह्मण और क्षत्रियोंमें अनुरक्त रहते तथा शूद्र ब्राह्मण और क्षत्रियोंमें अनुराग रखते हुए वैश्योंकी सेवामें तत्पर रहते थे ॥ ११ ॥ स हास्तिनपुरे रम्ये कुरूणां पुटभेदने । वसन् सागरपर्यन्तामन्वशासद् वसुन्धराम् ॥ १२ ॥ महाराज शान्तनु कुरुवंशकी रमणीय राजधानी हस्तिनापुरमें निवास करते हुए समुद्रपर्यन्त पृथ्वीका शासन और पालन करते थे ॥ १२ ॥ स देवराजसदृशो धर्मज्ञः सत्यवागृजुः । दानधर्मतपोयोगाच्छ्रिया परमया युतः ॥ १३ ॥ वे देवराज इन्द्रके समान पराक्रमी, धर्मज्ञ, सत्यवादी तथा सरल थे। दान, धर्म और तपस्या तीनोंके योगसे उनमें दिव्य कान्तिकी वृद्धि हो रही थी ॥ १३ ॥ अरागद्वेषसंयुक्तः सोमवत् प्रियदर्शनः । तेजसा सूर्यकल्पोऽभूद् वायुवेगसमो जवे । अन्तकप्रतिमः कोपे क्षमया पृथिवीसमः ॥ १४ ॥