भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

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पृष्ठ 730

वने पुण्यकृतां श्रेष्ठः स्वादुमूलफलोदके ॥ ७ ॥ भरतवंशशिरोमणे! उस वनमें स्वादिष्ट फल, मूल और जलकी सुविधा थी, पुण्यवानोंमें श्रेष्ठ वरुणनन्दन महर्षि वसिष्ठ उसीमें तपस्या करते थे ॥ ७ ॥ दक्षस्य दुहिता या तु सुरभीत्यभिशब्दिता । गां प्रजाता तु सा देवी कश्यपाद् भरतर्षभ ॥ ८ ॥ महाराज! दक्ष प्रजापतिकी पुत्रीने, जो देवी सुरभि नामसे विख्यात है, कश्यपजीके सहवाससे एक गौको जन्म दिया ॥ ८ ॥ अनुग्रहार्थं जगतः सर्वकामदुहां वरा । तां लेभे गां तु धर्मात्मा होमधेनुं स वारुणिः ॥ ९ ॥ वह गौ सम्पूर्ण जगत्पर अनुग्रह करनेके लिये प्रकट हुई थी तथा समस्त कामनाओंको देनेवालोंमें श्रेष्ठ थी। वरुणपुत्र धर्मात्मा वसिष्ठने उस गौको अपनी होमधेनुके रूपमें प्राप्त किया ॥ ९ ॥ सा तस्मिंस्तापसारण्ये वसन्ती मुनिसेविते । चचार पुण्ये रम्ये च गौरपेतभया तदा ॥ १० ॥ वह गौ मुनियोंद्वारा सेवित उस पवित्र एवं रमणीय तापसवनमें रहती हुई सब ओर निर्भय होकर चरती थी ॥ १० ॥ अथ तद् वनमाजग्मुः कदाचिद् भरतर्षभ । पृथ्वाद्या वसवः सर्वे देवा देवर्षिसेवितम् ॥ ११ ॥ भरतश्रेष्ठ! एक दिन उस देवर्षिसेवित वनमें पृथु आदि वसु तथा सम्पूर्ण देवता पधारे ॥ ११ ॥ ते सदारा वनं तच्च व्यचरन्त समन्ततः । रेमिरे रमणीयेषु पर्वतेषु वनेषु च ॥ १२ ॥ वे अपनी स्त्रियोंके साथ उस वनमें चारों ओर विचरने तथा रमणीय पर्वतों और वनोंमें रमण करने लगे ॥ १२ ॥ तत्रैकस्याथ भार्या तु वसोर्वासवविक्रम । संचरन्ती वने तस्मिन् गां ददर्श सुमध्यमा ॥ १३ ॥ इन्द्रके समान पराक्रमी महीपाल! उन वसुओंमेंसे एककी सुन्दरी पत्नीने उस वनमें घूमते समय उस गौको देखा ॥ १३ ॥ नन्दिनीं नाम राजेन्द्र सर्वकामधुगुत्तमाम् । सा विस्मयसमाविष्टा शीलद्रविणसम्पदा ॥ १४ ॥ राजेन्द्र! सम्पूर्ण कामनाओंको देनेवालोंमें उत्तम नन्दिनी नामवाली उस गायको देखकर उसकी शीलसम्पत्तिसे वह वसुपत्नी आश्चर्यचकित हो उठी ॥ १४ ॥ द्यवे वै दर्शयामास तां गां गोवृषभेक्षण ।