भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

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पृष्ठ 1143

(मितं ददाति हि पिता मितं माता मितं सुतः । अमितस्य हि दातारं का पतिं नाभिनन्दति ॥) पिता, माता और पुत्र—ये सब परिमित मात्रामें ही सुख देते हैं, अपरिमित सुखको देनेवाला तो केवल पति है। ऐसे पतिका कौन स्त्री आदर नहीं करेगी? परित्यक्तः सुतश्चायं दुहितेयं तथा मया । बान्धवाश्च परित्यक्तास्त्वदर्थं जीवितं च मे ॥ २३ ॥ आर्यपुत्र! आपके लिये मैंने यह पुत्र और पुत्री भी छोड़ दी, समस्त बन्धु-बान्धवोंको भी छोड़ दिया और अब अपना यह जीवन भी त्याग देनेको उद्यत हूँ ॥ २३ ॥ यज्ञैस्तपोभिर्नियमैर्दानैश्च विविधैस्तथा । विशिष्यते स्त्रिया भर्तुर्नित्यं प्रियहिते स्थितिः ॥ २४ ॥ स्त्री यदि सदा अपने स्वामीके प्रिय और हितमें लगी रहे तो यह उसके लिये बड़े-बड़े यज्ञों, तपस्याओं, नियमों और नाना प्रकारके दानोंसे भी बढ़कर है ॥ २४ ॥ तदिदं यच्चिकीर्षामि धर्मं परमसम्मतम् । इष्टं चैव हितं चैव तव चैव कुलस्य च ॥ २५ ॥ अतः मैं जो यह कार्य करना चाहती हूँ, यह श्रेष्ठ पुरुषोंसे सम्मत धर्म है और आपके तथा इस कुलके लिये सर्वथा अनुकूल एवं हितकारक है ॥ २५ ॥ इष्टानि चाप्यपत्यानि द्रव्याणि सुहृदः प्रियाः । आपद्धर्मप्रमोक्षाय भार्या चापि सतां मतम् ॥ २६ ॥ अनुकूल संतान, धन, प्रिय, सुहृद् तथा पत्नी—ये सभी आपद्धर्मसे छूटनेके लिये ही वांछनीय हैं; ऐसा साधु पुरुषोंका मत है ॥ २६ ॥ आपदर्थे धनं रक्षेद् दारान् रक्षेद् धनैरपि । आत्मानं सततं रक्षेद् दारैरपि धनैरपि ॥ २७ ॥ आपत्तिके लिये धनकी रक्षा करे, धनके द्वारा स्त्रीकी रक्षा करे और स्त्री तथा धन दोनोंके द्वारा सदा अपनी रक्षा करे ॥ २७ ॥ दृष्टादृष्टफलार्थं हि भार्या पुत्रो धनं गृहम् । सर्वमेतद् विधातव्यं बुधानामेष निश्चयः ॥ २८ ॥ पत्नी, पुत्र, धन और घर—ये सब वस्तुएँ दृष्ट और अदृष्ट फल (लौकिक और पारलौकिक लाभ)-के लिये संग्रहणीय हैं। विद्वानोंका यह निश्चय है ॥ २८ ॥ एकतो वा कुलं कृत्स्नमात्मा वा कुलवर्धनः । न समं सर्वमेवेति बुधानामेष निश्चयः ॥ २९ ॥ एक ओर सम्पूर्ण कुल हो और दूसरी ओर उस कुलकी वृद्धि करनेवाला शरीर हो तो उन दोनोंकी तुलना करनेपर वह सारा कुल उस शरीरके बराबर नहीं हो सकता; यह विद्वानोंका निश्चय है ॥ २९ ॥