महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकुर्यान्न निन्दितं कर्म न नृशंसं कथंचन । इति पूर्वे महात्मान आपद्धर्मविदो विदुः ॥ ११ ॥ श्रेयांस्तु सहदारस्य विनाशोऽद्य मम स्वयम् । ब्राह्मणस्य वधं नाहमनुमंस्ये कदाचन ॥ १२ ॥ आपद्धर्मके ज्ञाता प्राचीन महात्माओंने कहा है कि किसी प्रकार भी क्रूर एवं निन्दित कर्म नहीं करना चाहिये। अतः आज अपनी पत्नीके साथ स्वयं मेरा विनाश हो जाय, यह श्रेष्ठ है; किंतु ब्राह्मणवधकी अनुमति मैं कदापि नहीं दे सकता ॥ ११-१२ ॥
कुन्त्युवाच ममाप्येषा मतिर्ब्रह्मन् विप्रा रक्ष्या इति स्थिरा । न चाप्यनिष्टः पुत्रो मे यदि पुत्रशतं भवेत् ॥ १३ ॥ न चासौ राक्षसः शक्तो मम पुत्रविनाशने । वीर्यवान् मन्त्रसिद्धश्च तेजस्वी च सुतो मम ॥ १४ ॥ कुन्ती बोली—ब्रह्मन्! मेरा भी यह स्थिर विचार है कि ब्राह्मणोंकी रक्षा करनी चाहिये। यों तो मुझे भी अपना कोई पुत्र अप्रिय नहीं है, चाहे मेरे सौ पुत्र ही क्यों न हों। किंतु वह राक्षस मेरे पुत्रका विनाश करनेमें समर्थ नहीं है; क्योंकि मेरा पुत्र पराक्रमी, मन्त्रसिद्ध और तेजस्वी है ॥ १३-१४ ॥
राक्षसाय च तत् सर्वं प्रापयिष्यति भोजनम् । मोक्षयिष्यति चात्मानमिति मे निश्चिता मतिः ॥ १५ ॥ मेरा यह निश्चित विश्वास है कि वह सारा भोजन राक्षसके पास पहुँचा देगा और उससे अपने-आपको भी छुड़ा लेगा ॥ १५ ॥
समागताश्च वीरेण दृष्टपूर्वाश्च राक्षसाः । बलवन्तो महाकाया निहताश्चाप्यनेकंशः ॥ १६ ॥ मैंने पहले भी बहुत-से बलवान् और विशालकाय राक्षस देखे हैं, जो मेरे वीर पुत्रसे भिड़कर अपने प्राणोंसे हाथ धो बैठे हैं ॥ १६ ॥
न त्विदं केषुचिद् ब्रह्मन् व्याहर्तव्यं कथंचन । विद्यार्थिनो हि मे पुत्रान् विप्रकुर्युः कुतूहलात् ॥ १७ ॥ परंतु ब्रह्मन्! आपको किसीसे भी किसी तरह यह बात कहनी नहीं चाहिये। नहीं तो लोग मन्त्र सीखनेके लोभसे कौतूहलवश मेरे पुत्रोंको तंग करेंगे ॥ १७ ॥
गुरुणा चाननुज्ञातो ग्राहयेद् यत् सुतो मम । न स कुर्यात् तथा कार्यं विद्ययेति सतां मतम् ॥ १८ ॥ और यदि मेरा पुत्र गुरुकी आज्ञा लिये बिना अपना मन्त्र किसीको सिखा देगा तो वह सीखनेवाला मनुष्य उस मन्त्रसे वैसा कार्य नहीं कर सकेगा, जैसा मेरा पुत्र कर लेता है। इस