महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1147, कुल 2256 में से
संदर्भ में पढ़ें‘पितरलोग मुझसे उत्पन्न होनेवाले दौहित्रसे अपने उद्धारकी सदा अभिलाषा रखते हैं, इसलिये मैं स्वयं ही पिताके जीवनकी रक्षा करती हुई उन सबका उद्धार करूँगी ॥ ६ ॥ भ्राता च मम बालोऽयं गते लोकममुं त्वयि । अचिरेणैव कालेन विनश्येत न संशयः ॥ ७ ॥ ‘यदि आप परलोकवासी हो गये तो यह मेरा नन्हा-सा भाई थोड़े ही समयमें नष्ट हो जायगा, इसमें संशय नहीं है ॥ ७ ॥ तातेऽपि हि गते स्वर्गं विनष्टे च ममानुजे । पिण्डः पितॄणां व्युच्छिद्येत् तत् तेषां विप्रियं भवेत् ॥ ८ ॥ ‘पिता स्वर्गवासी हो जायें और मेरा भैया भी नष्ट हो जाय, तो पितरोंका पिण्ड ही लुप्त हो जायगा, जो उनके लिये बहुत ही अप्रिय होगा ॥ ८ ॥ पित्रा त्यक्ता तथा मात्रा भ्रात्रा चाहमसंशयम् । दुःखाद् दुःखतरं प्राप्य म्रियेयमतथोचिता ॥ ९ ॥ ‘पिता, माता और भाई—तीनोंसे परित्यक्त होकर मैं एक दुःखसे दूसरे महान् दुःखमें पड़कर निश्चय ही मर जाऊँगी। यद्यपि मैं ऐसा दुःख भोगनेके योग्य नहीं हूँ, तथापि आप लोगोंके बिना मुझे वह सब भोगना ही पड़ेगा ॥ ९ ॥ त्वयि त्वरोगे निर्मुक्ते माता भ्राता च मे शिशुः । संतानश्चैव पिण्डश्च प्रतिष्ठास्यत्यसंशयम् ॥ १० ॥ ‘यदि आप मृत्युके संकटसे मुक्त एवं नीरोग रहे तो मेरी माता, मेरा नन्हा-सा भाई, संतान-परम्परा और पिण्ड (श्राद्धकर्म)—ये सब स्थिर रहेंगे; इसमें संशय नहीं है ॥ १० ॥ आत्मा पुत्रः सखा भार्या कृच्छ्रं तु दुहिता किल । स कृच्छ्रान्मोचयात्मानं मां च धर्मे नियोजय ॥ ११ ॥ ‘कहते हैं पुत्र अपना आत्मा है, पत्नी मित्र है; किंतु पुत्री निश्चय ही संकट है, अतः आप इस संकटसे अपनेको बचा लीजिये और मुझे भी धर्ममें लगाइये ॥ ११ ॥ अनाथा कृपणा बाला यत्रक्वचनगामिनी । भविष्यामि त्वया तात विहीना कृपणा सदा ॥ १२ ॥ ‘पिताजी! आपके बिना मैं सदाके लिये दीन और असहाय हो जाऊँगी, अनाथ और दयनीय समझी जाऊँगी। अरक्षित बालिका होनेके कारण मुझे जहाँ कहीं भी जानेके लिये विवश होना पड़ेगा ॥ १२ ॥ अथवाहं करिष्यामि कुलस्यास्य विमोचनम् । फलसंस्था भविष्यामि कृत्वा कर्म सुदुष्करम् ॥ १३ ॥ ‘अथवा मैं अपनेको मृत्युके मुखमें डालकर इस कुलको संकटसे छुड़ाऊँगी। यह अत्यन्त दुष्कर कर्म कर लेनेसे मेरी मृत्यु सफल हो जायगी ॥ १३ ॥ अथवा यास्यसे तत्र त्यक्त्वा मां द्विजसत्तम ।