महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंशरणं च प्रपन्नास्मि त्वामद्य पुरुषोत्तम । दीनाननाथान् कौन्तेय परिरक्षसि नित्यशः ॥ ३१ ॥ पुरुषोत्तम! आज मैं आपकी शरणमें आयी हूँ। कुन्तीकुमार! आप प्रतिदिन न जाने कितने दीनों और अनाथोंकी रक्षा करते हैं ॥ ३१ ॥ साहं शरणमभ्येमि रोरवीमि च दुःखिता । याचे त्वां चाभिकामाहं तस्मात् कुरु मम प्रियम् । स त्वमात्मप्रदानेन सकामां कर्तुमर्हसि ॥ ३२ ॥ मैं भी यही आशा लेकर शरणमें आयी हूँ और बार-बार दुःखी होकर रोती-गिड़गिड़ाती हूँ। मैं आपके प्रति अनुरक्त हूँ और आपसे समागमकी याचना करती हूँ। अतः मेरा प्रिय मनोरथ पूर्ण कीजिये। मुझे आत्मदान देकर मेरी कामना सफल कीजिये ॥ ३२ ॥
वैशम्पायन उवाच
एवमुक्तस्तु कौन्तेयः पन्नगेश्वरकन्यया । कृतवांस्तत् तथा सर्वं धर्ममुद्दिश्य कारणम् ॥ ३३ ॥ वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! नागराजकी कन्या उलूपीके ऐसा कहनेपर कुन्तीकुमार अर्जुनने धर्मको ही सामने रखकर वह सब कार्य पूर्ण किया ॥ ३३ ॥ स नागभवने रात्रिं तामुषित्वा प्रतापवान् । उदितेऽभ्युत्थितः सूर्ये कौरव्यस्य निवेशनात् ॥ ३४ ॥ प्रतापी अर्जुनने नागराजके घरमें ही वह रात्रि व्यतीत की। फिर सूर्योदय होनेपर वे कौरव्यके भवनसे ऊपरको उठे ॥ ३४ ॥ आगतस्तु पुनस्तत्र गङ्गाद्वारं तया सह । परित्यज्य गता साध्वी उलूपी निजमन्दिरम् ॥ ३५ ॥ उलूपीके साथ अर्जुन फिर गंगाद्वारमें आ पहुँचे। साध्वी उलूपी उन्हें वहाँ छोड़कर पुनः अपने घरको लौट गयी ॥ ३५ ॥ दत्त्वा वरमजेयत्वं जले सर्वत्र भारत । साध्या जलचराः सर्वे भविष्यन्ति न संशयः ॥ ३६ ॥ (पुत्रमुत्पादयामास स तस्यां सुमनोहरम् । इरावन्तं महाभागं महाबलपराक्रमम् ॥) भारत! जाते समय उसने अर्जुनको यह वर दिया 'कि आप जलमें सर्वत्र अजेय होंगे और सभी जलचर आपके वशमें रहेंगे, इसमें संशय नहीं है।' इस प्रकार अर्जुनने उलूपीके गर्भसे अत्यन्त मनोहर तथा महान् बल-पराक्रमसे सम्पन्न इरावान् नामक महा उत्पन्न किया ॥ ३६ ॥