भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

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पृष्ठ 1478

एवं विनिश्चित्य ततः कुन्तीपुत्रो धनंजयः । अनुप्रविश्य राजानमापृच्छ्य च विशाम्पते ॥ २१ ॥ धनुरादाय संहृष्टो ब्राह्मणं प्रत्यभाषत । जनमेजय! ऐसा निश्चय करके कुन्तीकुमार धनंजयने राजासे पूछकर घरके भीतर प्रवेश करके धनुष ले लिया और (बाहर आकर) प्रसन्नतापूर्वक ब्राह्मणसे कहा— ॥ २१ १/२ ॥

ब्राह्मणागम्यतां शीघ्रं यावत् परधनैषिणः ॥ २२ ॥ न दूरे ते गताः क्षुद्रास्तावद् गच्छावहे सह । यावन्निवर्तयाम्यद्य चौरहस्ताद् धनं तव ॥ २३ ॥ ‘विप्रवर! शीघ्र आइये। जबतक दूसरोंके धन हड़पनेकी इच्छावाले वे क्षुद्र चोर दूर नहीं चले जाते, तभीतक हम दोनों एक साथ वहाँ पहुँच जायँ। मैं अभी आपका गोधन चोरोंके हाथसे छीनकर आपको लौटा देता हूँ’ ॥ २२-२३ ॥

सोऽनुसृत्य महाबाहुर्धन्वी वर्मी रथी ध्वजी । शरैर्विध्वस्य तांश्चौरानवजित्य च तद् धनम् ॥ २४ ॥ ऐसा कहकर महाबाहु अर्जुनने धनुष और कवच धारण करके ध्वजायुक्त रथपर आरूढ़ हो उन चोरोंका पीछा किया और बाणोंसे चोरोंका विनाश करके सारा गोधन जीत