महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1477, कुल 2256 में से
संदर्भ में पढ़ेंतस्य चार्थस्य तैर्वाक्यैश्चोद्यमानः पुनः पुनः । आक्रन्दे तत्र कौन्तेयश्चिन्तयामास दुःखितः ॥ १४ ॥ इधर उस आर्त ब्राह्मणकी बातें उन्हें बार-बार शस्त्र ले आनेको प्रेरित कर रही थीं। जब वह अधिक रोने-चिल्लाने लगा, तब अर्जुनने दुःखी होकर सोचा— ॥ १४ ॥
ह्रियमाणे धने तस्मिन् ब्राह्मणस्य तपस्विनः । अश्रुप्रमार्जनं तस्य कर्तव्यमिति निश्चयः ॥ १५ ॥ 'इस तपस्वी ब्राह्मणके गोधनका अपहरण हो रहा है; अतः ऐसे समयमें इसके आँसू पोंछना मेरा कर्तव्य है। यही मेरा निश्चय है ॥ १५ ॥
उपक्षेपणजोऽधर्मः सुमहान् स्यान्महीपतेः । यद्यस्य रुदतो द्वारि न करोम्यद्य रक्षणम् ॥ १६ ॥ 'यदि मैं राजद्वारपर रोते हुए इस ब्राह्मणकी रक्षा आज नहीं करूँगा, तो महाराज युधिष्ठिरको उपेक्षाजनित महान् अधर्मका भागी होना पड़ेगा ॥ १६ ॥
अनास्तिक्यं च सर्वेषामस्माकमपि रक्षणे । प्रतितिष्ठेत लोकेऽस्मिन्नधर्मश्चैव नो भवेत् ॥ १७ ॥ 'इसके सिवा लोकमें यह बात फैल जायगी कि हम सब लोग किसी आर्तकी रक्षारूप धर्मके पालनमें श्रद्धा नहीं रखते। साथ ही हमें अधर्म भी प्राप्तहोगा ॥ १७ ॥
अनादृत्य तु राजानं गते मयि न संशयः । अजातशत्रोर्नृपतेर्मम चैवानृतं भवेत् ॥ १८ ॥ 'यदि राजाका अनादर करके मैं घरके भीतर चला जाऊँ, तो महाराज अजातशत्रुके प्रति मेरी प्रतिज्ञा मिथ्या होगी ॥ १८ ॥
अनुप्रवेशे राज्ञस्तु वनवासो भवेन्मम । सर्वमन्यत् परिहृतं धर्षणात् तु महीपतेः ॥ १९ ॥ 'राजाकी उपस्थितिमें घरके भीतर प्रवेश करनेपर मुझको वनमें निवास करना होगा। इसमें महाराजके तिरस्कारके सिवा और सारी बातें तुच्छ होनेके कारण उपेक्षणीय हैं ॥ १९ ॥
अधर्मो वै महानस्तु वने वा मरणं मम । शरीरस्य विनाशेन धर्म एव विशिष्यते ॥ २० ॥ 'चाहे राजाके तिरस्कारसे मुझे नियमभंगका महान् दोष प्राप्त हो अथवा वनमें ही मेरी मृत्यु हो जाय तथापि शरीरको नष्ट करके भी गौ-ब्राह्मण-रक्षारूप धर्मका पालन ही श्रेष्ठ है' ॥ २० ॥