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महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास

DevanagariSanskritpublished2,256 pages

अध्याय (पृष्ठ 648)

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सप्ताशीतितमोऽध्यायः

इन्द्रके पूछनेपर ययातिका अपने पुत्र पूरुको दिये हुए उपदेशकी चर्चा करना

वैशम्पायन उवाच

स्वर्गतः स तु राजेन्द्रो निवसन् देववेश्मनि ।
पूजितस्त्रिदशैः साध्यैर्मरुद्भिर्वसुभिस्तथा ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! स्वर्गलोकमें जाकर महाराज ययाति देवभवनमें निवास करने लगे। वहाँ देवताओं, साध्यगणों, मरुद्गणों तथा वसुओंने उनका बड़ा स्वागत-सत्कार किया ॥ १ ॥

देवलोकं ब्रह्मलोकं संचरन् पुण्यकृद् वशी ।
अवसत् पृथिवीपालो दीर्घकालमिति श्रुतिः ॥ २ ॥
सुना जाता है कि पुण्यात्मा तथा जितेन्द्रिय राजा ययाति देवलोक और ब्रह्मलोकमें भ्रमण करते हुए वहाँ दीर्घकालतक रहे ॥ २ ॥

स कदाचिन्नृपश्रेष्ठो ययातिः शक्रमागमत् ।
कथान्ते तत्र शक्रेण स पृष्टः पृथिवीपतिः ॥ ३ ॥
एक दिन नृपश्रेष्ठ ययाति देवराज इन्द्रके पास आये। दोनोंमें वार्तालाप हुआ और अन्तमें इन्द्रने राजा ययातिसे पूछा ॥ ३ ॥

शक्र उवाच

यदा स पूरुस्तव रूपेण राजन्
जरां गृहीत्वा प्रचचार भूमौ ।
तदा च राज्यं सम्प्रदायैव तस्मै
त्वया किमुक्तः कथयेह सत्यम् ॥ ४ ॥
इन्द्रने पूछा— राजन्! जब पूरु तुमसे वृद्धावस्था लेकर तुम्हारे स्वरूपसे इस पृथ्वीपर विचरण करने लगा, तुम सत्य कहो, उस समय राज्य देकर तुमने उसको क्या आदेश दिया था? ॥ ४ ॥

ययातिरुवाच

गङ्गायमुनोर्मध्ये कृत्स्नोऽयं विषयस्तव ।
मध्ये पृथिव्यास्त्वं राजा भ्रातरोऽन्त्याधिपास्तव ॥ ५ ॥
ययातिने कहा— (देवराज! मैंने अपने पुत्र पूरुसे कहा था कि) बेटा! गंगा और यमुनाके बीचका यह सारा प्रदेश तुम्हारे अधिकारमें रहेगा। यह पृथ्वीका मध्य भाग है,

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इसके तुम राजा होओगे और तुम्हारे भाई सीमान्त देशोंके अधिपति होंगे ॥ ५ ॥ (न च कुर्यान्नरो दैन्यं शाठ्यं क्रोधं तथैव च । जैह्म्यं च मत्सरं वैरं सर्वत्रैव न कारयेत् ॥ मातरं पितरं चैव विद्वांसं च तपोधनम् । क्षमावन्तं च देवेन्द्र नावमन्येत बुद्धिमान् ॥ शक्तस्तु क्षमते नित्यमशक्तः क्रुध्यते नरः । दुर्जनः सुजनं द्वेष्टि दुर्बलो बलवत्तरम् ॥ रूपवन्तमरूपी च धनवन्तं च निर्धनः । अकर्मी कर्मिणं द्वेष्टि धार्मिकं च न धार्मिकः ॥ निर्गुणो गुणवन्तं च शक्रैतत् कलिलक्षणम् ।)

देवेन्द्र! (इसके बाद मैंने यह आदेश दिया कि) मनुष्य दीनता, शठता और क्रोध न करे। कुटिलता, मात्सर्य और वैर कहीं न करे। माता-पिता, विद्वान्, तपस्वी तथा क्षमाशील पुरुषका बुद्धिमान् मनुष्य कभी अपमान न करे। शक्तिशाली पुरुष सदा क्षमा करता है। शक्तिहीन मनुष्य सदा क्रोध करता है। दुष्ट मानव साधु पुरुषसे और दुर्बल अधिक बलवान्‌से द्वेष करता है। कुरूप मनुष्य रूपवान्‌से, निर्धन धनवान्‌से, अकर्मण्य कर्मनिष्ठसे और अधार्मिक धर्मात्मासे द्वेष करता है। इसी प्रकार गुणहीन मनुष्य गुणवान्‌से डाह रखता है। इन्द्र! यह कलिका लक्षण है।

अक्रोधनः क्रोधनेभ्यो विशिष्ट- स्तथा तितिक्षुरतितिक्षोर्विशिष्टः । अमानुषेभ्यो मानुषाश्च प्रधाना विद्वांस्तथैवाविदुषः प्रधानः ॥ ६ ॥

क्रोध करनेवालोंसे वह पुरुष श्रेष्ठ है, जो कभी क्रोध नहीं करता। इसी प्रकार असहनशीलसे सहनशील उत्तम है, मनुष्येतर प्राणियोंसे मनुष्य श्रेष्ठ हैं और मूर्खोंसे विद्वान् उत्तम है ॥ ६ ॥

आक्रुश्यमानो नाक्रोशेन्मन्युरेव तितिक्षतः । आक्रोष्टारं निर्दहति सुकृतं चास्य विन्दति ॥ ७ ॥

यदि कोई किसीकी निन्दा करता या उसे गाली देता हो तो वह भी बदलेमें निन्दा या गाली-गलौज न करे; क्योंकि जो गाली या निन्दा सह लेता है, उस पुरुषका आन्तरिक दुःख ही गाली देनेवाले या अपमान करनेवालेको जला डालता है। साथ ही उसके पुण्यको भी वह ले लेता है ॥ ७ ॥

नारन्तुदः स्यान्न नृशंसवादी न हीनतः परमभ्याददीत । ययास्य वाचा पर उद्विजेत

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न तां वदेदुषतीं पापलोक्याम् ॥ ८ ॥ क्रोधवश किसीके मर्म-स्थानमें चोट न पहुँचाये (ऐसा बर्ताव न करे, जिससे किसीको मार्मिक पीड़ा हो)। किसीके प्रति कठोर बात भी मुँहसे न निकाले। अनुचित उपायसे शत्रुको भी वशमें न करे। जो जीको जलानेवाली हो, जिससे दूसरेको उद्वेग होता हो, ऐसी बात मुँहसे न बोले; क्योंकि पापीलोग ही ऐसी बातें बोला करते हैं ॥ ८ ॥

अरुन्तुदं परुषं तीक्ष्णवाचं वाक्कण्टकैर्वितुदन्तं मनुष्यान् । विद्यादलक्ष्मीकतमं जनानां मुखे निबद्धां निर्ऋतिं वहन्तम् ॥ ९ ॥ जो स्वभावका कठोर हो, दूसरोंके मर्ममें चोट पहुँचाता हो, तीखी बातें बोलता हो और कठोर वचनरूपी काँटोंसे दूसरे मनुष्यको पीड़ा देता हो, उसे अत्यन्त लक्ष्मीहीन (दरिद्र या अभागा) समझे। (उसको देखना भी बुरा है; क्योंकि) वह कड़वी बोलीके रूपमें अपने मुँहमें बँधी हुई एक पिशाचिनीको ढो रहा है ॥ ९ ॥

सद्भिः पुरस्तादभिपूजितः स्यात् सद्भिस्तथा पृष्ठतो रक्षितः स्यात् । सदासतामतिवादांस्तितिक्षेत् सतां वृत्तं चाददीतार्यवृत्तः ॥ १० ॥ (अपना बर्ताव और व्यवहार ऐसा रखे, जिससे) साधु पुरुष सामने तो सत्कार करें ही, पीठ-पीछे भी उनके द्वारा अपनी रक्षा हो। दुष्ट लोगोंकी कही हुई अनुचित बातें सदा सह लेनी चाहिये तथा श्रेष्ठ पुरुषोंके सदाचारका आश्रय लेकर साधु पुरुषोंके व्यवहारको ही अपनाना चाहिये ॥ १० ॥

वाक्सायका वदनान्निष्पतन्ति यैराहतः शोचति रात्र्यहानि । परस्य नामर्मसु ते पतन्ति तान् पण्डितो नावसृजेत् परेषु ॥ ११ ॥ दुष्ट मनुष्योंके मुखसे कटु वचनरूपी बाण सदा छूटते रहते हैं, जिनसे आहत होकर मनुष्य रात-दिन शोक और चिन्तामें डूबा रहता है। वे वाग्बाण दूसरोंके मर्मस्थानोंपर ही चोट करते हैं। अतः विद्वान् पुरुष दूसरेके प्रति ऐसी कठोर वाणीका प्रयोग न करे ॥ ११ ॥

न हीदृशं संवननं त्रिषु लोकेषु विद्यते । दया मैत्री च भूतेषु दानं च मधुरा च वाक् ॥ १२ ॥ सभी प्राणियोंके प्रति दया और मैत्रीका बर्ताव, दान और सबके प्रति मधुर वाणीका प्रयोग—तीनों लोकोंमें इनके समान कोई वशीकरण नहीं है ॥ १२ ॥

तस्मात् सान्त्वं सदा वाच्यं न वाच्यं परुषं क्वचित् ।

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पूज्यान् सम्पूजयेद् दद्यान्न च याचेत् कदाचन ।। १३ ।। इसलिये कभी कठोर वचन न बोले। सदा सान्त्वनापूर्ण मधुर वचन ही बोले। पूजनीय पुरुषोंका पूजन (आदर-सत्कार) करे। दूसरोंको दान दे और स्वयं कभी किसीसे कुछ न माँगे ।। १३ ।।

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि उत्तरयायाते सप्ताशीतितमोऽध्यायः ।। ८७ ।। इस प्रकार श्रीमहान्भारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें उत्तरयायातविषयक सत्तासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ८७ ।। (दाक्षिणात्य अधिक पाठके ४ १/३ श्लोक मिलाकर कुल १७ १/३ श्लोक हैं)

अध्याय (पृष्ठ 652)

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अष्टाशीतितमोऽध्यायः

ययातिका स्वर्गसे पतन और अष्टकका उनसे प्रश्न करना

इन्द्र उवाच

सर्वाणि कर्माणि समाप्य राजन्
गृहं परित्यज्य वनं गतोऽसि ।
तत् त्वां पृच्छामि नहुषस्य पुत्र
केनासि तुल्यस्तपसा ययाते ॥ १ ॥

इन्द्रने कहा— राजन्! तुम सम्पूर्ण कर्मोंको समाप्त करके घर छोड़कर वनमें चले गये थे। अतः नहुषपुत्र ययाते! मैं तुमसे पूछता हूँ कि तुम तपस्यामें किसके समान हो ॥ १ ॥

ययातिरुवाच

नाहं देवमनुष्येषु गन्धर्वेषु महर्षिषु ।
आत्मनस्तपसा तुल्यं कंचित् पश्यामि वासव ॥ २ ॥

ययातिने कहा— इन्द्र! मैं देवताओं, मनुष्यों, गन्धर्वों और महर्षियोंमेंसे किसीको भी तपस्यामें अपनी बराबरी करनेवाला नहीं देखता हूँ ॥ २ ॥

इन्द्र उवाच

यदावमंस्थाः सदृशः श्रेयसश्च
अल्पीयसश्चाविदितप्रभावः ।
तस्माल्लोकास्त्वन्तवन्तस्तवेमे
क्षीणे पुण्ये पतितास्यद्य राजन् ॥ ३ ॥

इन्द्र बोले— राजन्! तुमने अपने समान, अपनेसे बड़े और छोटे लोगोंका प्रभाव न जानकर सबका तिरस्कार किया है, अतः तुम्हारे इन पुण्यलोकोंमें रहनेकी अवधि समाप्त हो गयी; क्योंकि (दूसरोंकी निन्दा करनेके कारण) तुम्हारा पुण्य क्षीण हो गया, इसलिये अब तुम यहाँसे नीचे गिरोगे ॥ ३ ॥

ययातिरुवाच

सुरर्षिगन्धर्वनरावमानात्
क्षयं गता मे यदि शक्र लोकाः ।
इच्छाम्यहं सुरलोकाद् विहीनः
सतां मध्ये पतितुं देवराज ॥ ४ ॥

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ययातिने कहा—देवराज इन्द्र! देवता, ऋषि, गन्धर्व और मनुष्य आदिका अपमान करनेके कारण यदि मेरे पुण्यलोक क्षीण हो गये हैं तो इन्द्रलोकसे भ्रष्ट होकर मैं साधु पुरुषोंके बीचमें गिरनेकी इच्छा करता हूँ ॥ ४ ॥

इन्द्र उवाच

सतां सकाशे पतितासि राजं- श्च्युतः प्रतिष्ठां यत्र लब्धासि भूयः। एतद् विदित्वा च पुनर्ययाते त्वं मावमंस्थाः सदृशः श्रेयसश्च ॥ ५ ॥

इन्द्र बोले—राजा ययाति! तुम यहाँसे च्युत होकर साधु पुरुषोंके समीप गिरोगे और वहाँ अपनी खोयी हुई प्रतिष्ठा पुनः प्राप्त कर लोगे। यह सब जानकर तुम फिर कभी अपने बराबर तथा अपनेसे बड़े लोगोंका अपमान न करना ॥ ५ ॥

वैशम्पायन उवाच

ततः प्रहायामरराजजुष्टान् पुण्याँल्लोकान् पतमानं ययातिम्। सम्प्रेक्ष्य राजर्षिवरोऽष्टकस्त- मुवाच सद्धर्मविधानगोप्ता ॥ ६ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! तदनन्तर देवराज इन्द्रके सेवन करनेयोग्य पुण्यलोकोंका परित्याग करके राजा ययाति नीचे गिरने लगे। उस समय राजर्षियोंमें श्रेष्ठ अष्टकने उन्हें गिरते देखा। वे उत्तम धर्म-विधिके पालक थे। उन्होंने ययातिसे कहा ॥ ६ ॥

अध्याय (पृष्ठ 654)

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ययातिका पतन

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अष्टक उवाच

कस्त्वं युवा वासवtul्यरूपः स्वतेजसा दीप्यमानो यथाग्निः । पतस्युदीर्णाम्बुधरान्धकारात् खात् खेचराणां प्रवरो यथार्कः ॥ ७ ॥

अष्टकने पूछा— इन्द्रके समान सुन्दर रूपवाले तरुण पुरुष तुम कौन हो? तुम अपने तेजसे अग्निकी भाँति देदीप्यमान हो रहे हो। मेघरूपी घने अन्धकारवाले आकाशसे आकाशचारी ग्रहोंमें श्रेष्ठ सूर्यके समान तुम कैसे गिर रहे हो? ॥ ७ ॥

दृष्ट्वा च त्वां सूर्यपथात् पतन्तं वैश्वानरार्कद्युतिमप्रमेयम् । किं नु स्विदेतत् पततीति सर्वे वितर्कयन्तः परिमोहिताः स्मः ॥ ८ ॥

तुम्हारा तेज सूर्य और अग्निके सदृश है। तुम अप्रमेय शक्तिशाली जान पड़ते हो। तुम्हें सूर्यके मार्गसे गिरते देख हम सब लोग मोहित होकर इस तर्क-वितर्कमें पड़े हैं कि 'यह क्या गिर रहा है?' ॥ ८ ॥

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दृष्ट्वा च त्वां धिष्ठितं देवमार्गे शक्रार्कविष्णुप्रतिमप्रभावम्। अभ्युद्गतास्त्वां वयमद्य सर्वे तत्त्वं प्रपाते तव जिज्ञासमानाः ॥ ९ ॥ तुम इन्द्र, सूर्य और विष्णुके समान प्रभावशाली हो। तुम्हें आकाशमें स्थित देखकर हम सब लोग अब यह जाननेके लिये तुम्हारे निकट आये हैं कि तुम्हारे पतनका यथार्थ कारण क्या है? ॥ ९ ॥

न चापि त्वां धृष्णुमः प्रष्टुमग्रे न च त्वमस्मान् पृच्छसि ये वयं स्मः। तत् त्वां पृच्छामि स्पृहणीयरूप कस्य त्वं वा किंनिमित्तं त्वमागाः ॥ १० ॥ हम पहले तुमसे कुछ पूछनेका साहस नहीं कर सकते और तुम भी हमसे हमारा परिचय नहीं पूछते हो; कि हम कौन हैं? इसलिये मैं ही तुमसे पूछता हूँ। मनोरम रूपवाले महापुरुष! तुम किसके पुत्र हो? और किसलिये यहाँ आये हो? ॥ १० ॥

भयं तु ते व्येतु विषादमोहौ त्यजाशु चैवेन्द्रसमप्रभाव। त्वां वर्तमानं हि सतां सकाशे नालं प्रसोढुं बलहापि शक्रः ॥ ११ ॥ इन्द्रके तुल्य शक्तिशाली पुरुष! तुम्हारा भय दूर हो जाना चाहिये। अब तुम्हें विषाद और मोहको भी तुरंत त्याग देना चाहिये। इस समय तुम संतोंके समीप विद्यमान हो। बल दानवका नाश करनेवाले इन्द्र भी अब तुम्हारा तेज सहन करनेमें असमर्थ हैं ॥ ११ ॥

सन्तः प्रतिष्ठा हि सुखच्युतानां सतां सदैवामरराजकल्प। ते संगताः स्थावरजङ्गमाेशाः प्रतिष्ठितस्त्वं सदृशेषु सत्सु ॥ १२ ॥ देवेश्वर इन्द्रके समान तेजस्वी महानुभाव! सुखसे वंचित होनेवाले साधु पुरुषोंके लिये सदा संत ही परम आश्रय हैं। वे स्थावर और जंगम सब प्राणियोंपर शासन करनेवाले सत्पुरुष यहाँ एकत्र हुए हैं। तुम अपने समान पुण्यात्मा संतोंके बीचमें स्थित हो ॥ १२ ॥

प्रभुरग्निः प्रतपने भूमिरावपने प्रभुः। प्रभुः सूर्यः प्रकाशित्वे सतां चाभ्यागतः प्रभुः ॥ १३ ॥ जैसे तपनेकी शक्ति अग्निमें है, बोये हुए बीजको धारण करनेकी शक्ति पृथ्वीमें है, प्रकाशित होनेकी शक्ति सूर्यमें है, इसी प्रकार संतोंपर शासन करनेकी शक्ति केवल अतिथिमें है ॥ १३ ॥

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इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि उत्तरयायाते अष्टाशीतितमोऽध्यायः ॥ ८८ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें उत्तरयायातविषयक अठासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ८८ ॥

ययाति और अष्टकका संवाद

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एकोननवतितमोऽध्यायः

ययाति और अष्टकका संवाद

ययातिरुवाच

अहं ययातिर्नहुषस्य पुत्रः
पूरोः पिता सर्वभूतावमानात् ।
प्रभ्रंशितः सुरसिद्धर्षिलोकात्
परिच्युतः प्रपताम्यल्पपुण्यः ॥ १ ॥
ययातिने कहा— महात्मन्! मैं नहुषका पुत्र और पूरुका पिता ययाति हूँ। समस्त प्राणियोंका अपमान करनेसे मेरा पुण्य क्षीण हो जानेके कारण मैं देवताओं, सिद्धों तथा महर्षियोंके लोकसे च्युत होकर नीचे गिर रहा हूँ ॥ १ ॥

अहं हि पूर्वो वयसा भवद्भ्य-
स्तेनाभिवादं भवतां न प्रयुञ्जे ।
यो विद्यया तपसा जन्मना वा
वृद्धः स पूज्यो भवति द्विजानाम् ॥ २ ॥
मैं आपलोगोंसे अवस्थामें बड़ा हूँ, अतः आपलोगोंको प्रणाम नहीं कर रहा हूँ। द्विजातियोंमें जो विद्या, तप और अवस्थामें बड़ा होता है, वह पूजनीय माना जाता है ॥ २ ॥

अष्टक उवाच

अवादीस्त्वं वयसा यः प्रवृद्धः
स वै राजन् नाभ्यधिकः कथ्यते च ।
यो विद्यया तपसा सम्प्रवृद्धः
स एव पूज्यो भवति द्विजानाम् ॥ ३ ॥
अष्टक बोले— राजन्! आपने कहा है कि जो अवस्थामें बड़ा हो, वही अधिक सम्माननीय कहा जाता है। परंतु द्विजोंमें तो जो विद्या और तपस्यामें बढ़ा-चढ़ा हो, वही पूज्य होता है ॥ ३ ॥

ययातिरुवाच

प्रतिकूलं कर्मणां पापमाहु-
स्तद् वर्ततेऽप्रवणे पापलोक्यम् ।
सन्तोऽसतां नानुवर्तन्ति चैतद्
यथा चैषामनुकूलास्तथाऽऽसन् ॥ ४ ॥

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**ययातिने कहा—**पापको पुण्यकर्मोंका नाशक बताया जाता है, वह नरककी प्राप्ति करानेवाला है और वह उद्दण्ड पुरुषोंमें ही देखा जाता है। दुराचारी पुरुषोंके दुराचारका श्रेष्ठ पुरुष अनुसरण नहीं करते हैं। पहलेके साधु पुरुष भी उन श्रेष्ठ पुरुषोंके ही अनुकूल आचरण करते थे ॥ ४ ॥

अभूद् धनं मे विपुलं गतं तद्
विचेष्टमानो नाधिगन्ता तदस्मि ।
एवं प्रधार्यात्महिते निविष्टो
यो वर्तते स विजानाति धीरः ॥ ५ ॥
मेरे पास पुण्यरूपी बहुत धन था; किंतु दूसरोंकी निन्दा करनेके कारण वह सब नष्ट हो गया। अब मैं चेष्टा करके भी उसे नहीं पा सकता। मेरी इस दुरवस्थाको समझ-बूझकर जो आत्मकल्याणमें संलग्न रहता है, वही ज्ञानी और वही धीर है ॥ ५ ॥

महाधनो यो यजते सुयज्ञै-
र्यः सर्वविद्यासु विनीतबुद्धिः ।
वेदानधीत्य तपसाऽऽयोज्य देहं
दिवं समायात् पुरुषो वीतमोहः ॥ ६ ॥
जो मनुष्य बहुत धनी होकर उत्तम यज्ञोंद्वारा भगवान्‌की आराधना करता है, सम्पूर्ण विद्याओंको पाकर जिसकी बुद्धि विनययुक्त है तथा जो वेदोंको पढ़कर अपने शरीरको तपस्यामें लगा देता है, वह पुरुष मोहरहित होकर स्वर्गमें जाता है ॥ ६ ॥

न जातु हृष्येन्महता धनेन
वेदानधीयीतानहंकृतः स्यात् ।
नानाभावा बहवो जीवलोके
दैवाधीना नष्टचेष्टाधिकाराः ।
तत् तत् प्राप्य न विहन्येत धीरो
दिष्टं बलीय इति मत्वाऽऽत्मबुद्ध्या ॥ ७ ॥
महान् धन पाकर कभी हर्षसे उल्लसित न हो, वेदोंका अध्ययन करे, किंतु अहंकारी न बने। इस जीव-जगत्‌में भिन्न-भिन्न स्वभाववाले बहुत-से प्राणी हैं, वे सभी प्रारब्धके अधीन हैं, अतः उनके धनादि पदार्थोंके लिये किये हुए उद्योग और अधिकार सभी व्यर्थ हो जाते हैं। इसलिये धीर पुरुषको चाहिये कि वह अपनी बुद्धिसे 'प्रारब्ध ही बलवान् है' यह जानकर दुःख या सुख जो भी मिले, उसमें विकारको प्राप्त न हो ॥ ७ ॥

सुखं हि जन्तुर्यदि वापि दुःखं
दैवाधीनं विन्दते नात्मशक्त्या ।
तस्माद् दिष्टं बलवन्मन्यमानो
न संज्वरेन्नापि हृष्येत् कथंचित् ॥ ८ ॥

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जीव जो सुख अथवा दुःख पाता है, वह प्रारब्धसे ही प्राप्त होता है, अपनी शक्तिसे नहीं। अतः प्रारब्धको ही बलवान् मानकर मनुष्य किसी प्रकार भी हर्ष अथवा शोक न करे ॥ ८ ॥

दुःखैर्न तप्येन्न सुखैः प्रहृष्येत्
समेन वर्तेत सदैव धीरः ।
दिष्टं बलीय इति मन्यमानो
न संज्वरेन्नापि हृष्येत् कथंचित् ॥ ९ ॥

दुःखोंसे संतप्त न हो और सुखोंसे हर्षित न हो। धीर पुरुष सदा समभावसे ही रहे और भाग्यको ही प्रबल मानकर किसी प्रकार चिन्ता एवं हर्षके वशीभूत न हो ॥ ९ ॥

भये न मुह्याम्यष्टकाहं कदाचित्
संतापो मे मानसो नास्ति कश्चित् ।
धाता यथा मां विदधीत लोके
ध्रुवं तथाहं भवितेति मत्वा ॥ १० ॥

अष्टक! मैं कभी भयमें पड़कर मोहित नहीं होता, मुझे कोई मानसिक संताप भी नहीं होता; क्योंकि मैं समझता हूँ कि विधाता इस संसारमें मुझे जैसे रखेगा, वैसे ही रहूँगा ॥ १० ॥

संस्वेदजा अण्डजाश्चोद्भिदश्च
सरीसृपाः कृमयोऽथाप्सु मत्स्याः ।
तथाश्मानस्तृणकाष्ठं च सर्वे
दिष्टक्षये स्वां प्रकृतिं भजन्ति ॥ ११ ॥

स्वेदज, अण्डज, उद्भिज्ज, सरीसृप, कृमि, जलमें रहनेवाले मत्स्य आदि जीव तथा पर्वत, तृण और काष्ठ—ये सभी प्रारब्ध-भोगका सर्वथा क्षय हो जानेपर अपनी प्रकृतिको प्राप्त हो जाते हैं ॥ ११ ॥

अनित्यतां सुखदुःखस्य बुद्ध्वा
कस्मात् संतापमष्टकाहं भजेयम् ।
किं कुर्यां वै किं च कृत्वा न तप्ये
तस्मात् संतापं वर्जयाम्यप्रमत्तः ॥ १२ ॥

अष्टक! मैं सुख तथा दुःख दोनोंकी अनित्यताको जानता हूँ, फिर मुझे संताप हो तो कैसे? मैं क्या करूँ और क्या करके संतप्त न होऊँ, इन बातोंकी चिन्ता छोड़ चुका हूँ। अतः सावधान रहकर शोक-संतापको अपनेसे दूर रखता हूँ ॥ १२ ॥

(दुःखे न खिद्येन्न सुखेन माद्येत्
समेन वर्तेत स धीरधर्मा ।
दिष्टं बलीयः समवेक्ष्य बुद्ध्या

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न सज्जते चात्र भृशं मनुष्यः ॥)
जो दुःखमें खिन्न नहीं होता, सुखसे मतवाला नहीं हो उठता और सबके साथ समान भावसे बर्ताव करता है, वह धीर कहा गया है। विज्ञ मनुष्य बुद्धिसे प्रारब्धको अत्यन्त बलवान् समझकर यहाँ किसी भी विषयमें अधिक आसक्त नहीं होता।

वैशम्पायन उवाच

एवं ब्रुवाणं नृपतिं ययाति-
मथाष्टकः पुनरेवान्वपृच्छत् ।
मातामहं सर्वगुणोपपन्नं
तत्र स्थितं स्वर्गलोके यथावत् ॥ १३ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! राजा ययाति समस्त सद्गुणोंसे सम्पन्न थे और नातेमें अष्टकके नाना लगते थे। वे अन्तरिक्षमें वैसे ही ठहरे हुए थे, मानो स्वर्गलोकमें हों। जब उन्होंने उपर्युक्त बातें कहीं, तब अष्टकने उनसे पुनः प्रश्न किया ॥ १३ ॥

अष्टक उवाच

ये ये लोकाः पार्थिवेन्द्र प्रधाना-
स्त्वया भुक्ता यं च कालं यथावत् ।
तान् मे राजन् ब्रूहि सर्वान् यथावत्
क्षेत्रज्ञवद् भाषसे त्वं हि धर्मान् ॥ १४ ॥
**अष्टक बोले—**महाराज! आपने जिन-जिन प्रधान लोकोंमें रहकर जितने समयतक वहाँके सुखोंका भलीभाँति उपभोग किया है, उन सबका मुझे यथार्थ परिचय दीजिये। राजन्! आप तो महात्माओंकी भाँति धर्मोंका उपदेश कर रहे हैं ॥ १४ ॥

ययातिरुवाच

राजाहमासमिह सार्वभौम-
स्ततो लोकान् महतश्चाजयं वै ।
तत्रावसं वर्षसहस्रमात्रं
ततो लोकं परमस्म्यभ्युपेतः ॥ १५ ॥
**ययातिने कहा—**अष्टक! मैं पहले समस्त भूमण्डलमें प्रसिद्ध चक्रवर्ती राजा था। तदनन्तर सत्कर्मोंद्वारा बड़े-बड़े लोकोंपर मैंने विजय प्राप्त की और उनमें एक हजार वर्षोंतक निवास किया। इसके बाद उनसे भी उच्चतम लोकमें जा पहुँचा ॥ १५ ॥

ततः पुरीं पुरुहूतस्य रम्यां
सहस्रद्वारां शतयोजनायताम् ।
अध्यावसं वर्षसहस्रमात्रं

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ततो लोकं परमस्म्यभ्युपेतः ॥ १६ ॥
वहाँ सौ योजन विस्तृत और एक हजार दरवाजोंसे युक्त इन्द्रकी रमणीय पुरी प्राप्त हुई। उसमें मैंने केवल एक हजार वर्षोंतक निवास किया और उसके बाद उससे भी ऊँचे लोकमें गया ॥ १६ ॥
ततो दिव्यमजरं प्राप्य लोकं
प्रजापतेर्लोकपतेर्दुरापम् ।
तत्रावसं वर्षसहस्रमात्रं
ततो लोकं परमस्म्यभ्युपेतः ॥ १७ ॥
तदनन्तर लोकपालोंके लिये भी दुर्लभ प्रजापतिके उस दिव्य लोकमें जा पहुँचा, जहाँ जरावस्थाका प्रवेश नहीं है। वहाँ एक हजार वर्षतक रहा, फिर उससे भी उत्तम लोकमें चला गया ॥ १७ ॥
स देवदेवस्य निवेशने च
विहृत्य लोकानवसं यथेष्टम् ।
सम्पूज्यमानस्त्रिदशैः समस्तै-
स्तुल्यप्रभावद्युतिरीश्वराणाम् ॥ १८ ॥
वह देवाधिदेव ब्रह्माजीका धाम था। वहाँ मैं अपनी इच्छाके अनुसार भिन्न-भिन्न लोकोंमें विहार करता हुआ सम्पूर्ण देवताओंसे सम्मानित होकर रहा। उस समय मेरा प्रभाव और तेज देवेश्वरोंके समान था ॥ १८ ॥
तथावसं नन्दने कामरूपी
संवत्सराणामयुतं शतानाम् ।
सहाप्सरोभिर्विहरन् पुण्यगन्धान्
पश्यन् नगान् पुष्पितांश्चारुरूपान् ॥ १९ ॥
इसी प्रकार मैं नन्दनवनमें इच्छानुसार रूप धारण करके अप्सराओंके साथ विहार करता हुआ दस लाख वर्षोंतक रहा। वहाँ मुझे पवित्र गन्ध और मनोहर रूपवाले वृक्ष देखनेको मिले, जो फूलोंसे लदे हुए थे ॥ १९ ॥
तत्र स्थितं मां देवसुखेषु सक्तं
कालेऽतीते महति ततोऽतिमात्रम् ।
दूतो देवानामब्रवीदुग्ररूपो
ध्वंसेत्युच्चैस्त्रिः प्लुतेन स्वरेण ॥ २० ॥
वहाँ रहकर मैं देवलोकके सुखोंमें आसक्त हो गया। तदनन्तर बहुत अधिक समय बीत जानेपर एक भयंकर रूपधारी देवदूत आकर मुझसे ऊँची आवाजमें तीन बार बोला—'गिर जाओ, गिर जाओ, गिर जाओ' ॥ २० ॥
एतावन्मे विदितं राजसिंह

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ततो भ्रष्टोऽहं नन्दनात् क्षीणपुण्यः । वाचोऽश्रौषं चान्तरिक्षे सुराणां सानुक्रोशाः शोचतां मां नरेन्द्र ॥ २१ ॥ राजशिरोमणे! मुझे इतना ही ज्ञात हो सका है। तदनन्तर पुण्य क्षीण हो जानेके कारण मैं नन्दनवनसे नीचे गिर पड़ा। नरेन्द्र! उस समय मेरे लिये शोक करनेवाले देवताओंकी अन्तरिक्षमें यह दयाभरी वाणी सुनायी पड़ी— ।। २१ ।।

अहो कष्टं क्षीणपुण्यो ययातिः पतत्यसौ पुण्यकृत् पुण्यकीर्तिः । तानब्रुवं पतमानस्ततोऽहं सतां मध्ये निपतेयं कथं नु ॥ २२ ॥ ‘अहो! बड़े कष्टकी बात है कि पवित्र कीर्तिवाले ये पुण्यकर्मा महाराज ययाति पुण्य क्षीण होनेके कारण नीचे गिर रहे हैं।’ तब नीचे गिरते हुए मैंने उनसे पूछा—‘देवताओ! मैं साधु पुरुषोंके बीच गिरूँ, इसका क्या उपाय है!’ ।। २२ ।।

तैराख्याता भवतां यज्ञभूमिः समीक्ष्य चेमां त्वरितमुपागतोऽस्मि । हविर्गन्धं देशिकं यज्ञभूमे- र्धूमापाङ्गं प्रतिगृह्य प्रतीतः ॥ २३ ॥ तब देवताओंने मुझे आपकी यज्ञभूमिका परिचय दिया। मैं इसीको देखता हुआ तुरंत यहाँ आ पहुँचा हूँ। यज्ञभूमिका परिचय देनेवाली हविष्यकी सुगन्धका अनुभव तथा धूमप्रान्तका अवलोकन करके मुझे बड़ी प्रसन्नता और सान्त्वना मिली है ।। २३ ।।

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि उत्तरयायाते एकोननवतितमोऽध्यायः ॥ ८९ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें उत्तरयायातविषयक नवासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ८९ ।। (दाक्षिणात्य अधिक पाठके १ श्लोक मिलाकर कुल २४ श्लोक हैं)

अष्टक और ययातिका संवाद

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नवतितमोऽध्यायः

अष्टक और ययातिका संवाद

अष्टक उवाच

यदावसो नन्दने कामरूपी
 संवत्सराणामयुतं शतानाम् ।
किं कारणं कार्तयुगप्रधान
 हित्वा च त्वं वसुधामन्वपद्यः ॥ १ ॥

**अष्टकने पूछा—**सत्ययुगके निष्पाप राजाओंमें प्रधान नरेश! जब आप इच्छानुसार रूप धारण करके दस लाख वर्षोंतक नन्दनवनमें निवास कर चुके हैं, तब क्या कारण है कि आप उसे छोड़कर भूतलपर चले आये? ॥ १ ॥

ययातिरुवाच

ज्ञातिः सुहृत् स्वजनो वा यथेह
 क्षीणे वित्ते त्यज्यते मानवैर्हि ।
तथा तत्र क्षीणपुण्यं मनुष्यं
 त्यजन्ति सद्यः सेश्वरा देवसङ्घाः ॥ २ ॥

**ययाति बोले—**जैसे इस लोकमें जाति-भाई, सुहृद् अथवा स्वजन कोई भी क्यों न हो, धन नष्ट हो जानेपर उसे सब मनुष्य त्याग देते हैं; उसी प्रकार परलोकमें जिसका पुण्य समाप्त हो गया है, उस मनुष्यको देवराज इन्द्रसहित सम्पूर्ण देवता तुरंत त्याग देते हैं ॥ २ ॥

अष्टक उवाच

तस्मिन् कथं क्षीणपुण्या भवन्ति
 सम्मुह्यते मेऽत्र मनोऽतिमात्रम् ।
किं वा विशिष्टाः कस्य धामोपयान्ति
 तद् वै ब्रूहि क्षेत्रवित् त्वं मतो मे ॥ ३ ॥

**अष्टकने पूछा—**देवलोकमें मनुष्योंके पुण्य कैसे क्षीण होते हैं? इस विषयमें मेरा मन अत्यन्त मोहित हो रहा है। प्रजापतिका वह कौन-सा धाम है, जिसमें विशिष्ट (अपुनरावृत्तिकी योग्यतावाले) पुरुष जाते हैं? यह बताइये; क्योंकि आप मुझे क्षेत्रज्ञ (आत्मज्ञानी) जान पड़ते हैं ॥ ३ ॥

ययातिरुवाच

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इमं भौमं नरकं ते पतन्ति लालप्यमाना नरदेव सर्वे । ते कङ्कगोमायुबलाशनार्थं* क्षीणा विवृद्धिं बहुधा व्रजन्ति ॥ ४ ॥ **ययाति बोले—**नरदेव! जो अपने मुखसे अपने पुण्य-कर्मोंका बखान करते हैं, वे सभी इस भौम नरकमें आ गिरते हैं। यहाँ वे गीधों, गीदड़ों और कौओं आदिके खानेयोग्य इस शरीरके लिये बड़ा भारी परिश्रम करके क्षीण होते और पुत्र-पौत्रादिरूपसे बहुधा विस्तारको प्राप्त होते हैं ॥ ४ ॥ तस्मादेतद् वर्जनीयं नरेन्द्र दुष्टं लोके गर्हणीयं च कर्म । आख्यातं ते पार्थिव सर्वमेव भूयश्चेदानीं वद किं ते वदामि ॥ ५ ॥ इसलिये नरेन्द्र! इस लोकमें जो दुष्ट और निन्दनीय कर्म हो उसको सर्वथा त्याग देना चाहिये। भूपाल! मैंने तुमसे सब कुछ कह दिया, बोलो, अब और तुम्हें क्या बताऊँ? ॥ ५ ॥

अष्टक उवाच

यदा तु तान् वितुदन्ते वयांसि तथा गृध्राः शितिकण्ठाः पतङ्गाः । कथं भवन्ति कथमाभवन्ति न भौममन्यं नरकं शृणोमि ॥ ६ ॥ **अष्टकने पूछा—**जब मनुष्योंको मृत्युके पश्चात् पक्षी, गीध, नीलकण्ठ और पतंग ये नोच-नोचकर खा लेते हैं, तब वे कैसे और किस रूपमें उत्पन्न होते हैं? मैंने अबतक भौम नामक किसी दूसरे नरकका नाम नहीं सुना था ॥ ६ ॥

ययातिरुवाच

ऊर्ध्वं देहात् कर्मणा जृम्भमाणाद् व्यक्तं पृथिव्यामनुसंचरन्ति । इमं भौमं नरकं ते पतन्ति नावेक्षन्ते वर्षपूगाननेकान् ॥ ७ ॥ **ययाति बोले—**कर्मसे उत्पन्न होने और बढ़नेवाले शरीरको पाकर गर्भसे निकलनेके पश्चात् जीव सबके समक्ष इस पृथ्वीपर (विषयोंमें) विचरते हैं। उनका यह विचरण ही भौम नरक कहा गया है। इसीमें वे पड़ते हैं। इसमें पड़नेपर वे व्यर्थ बीतनेवाले अनेक वर्षसमूहोंकी ओर दृष्टिपात नहीं करते ॥ ७ ॥

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षष्टिं सहस्राणि पतन्ति व्योम्नि तथा अशीतिं परिवत्सराणि । तान् वै तुदन्ति पततः प्रपातं भीमा भौमा राक्षसास्तीक्ष्णदंष्ट्राः ॥ ८ ॥ कितने ही प्राणी आकाश (स्वर्गादि)-में साठ हजार वर्ष रहते हैं। कुछ अस्सी हजार वर्षोंतक वहाँ निवास करते हैं। इसके बाद वे भूमिपर गिरते हैं। यहाँ उन गिरनेवाले जीवोंको तीखी दाढ़ोंवाले पृथ्वीके भयानक राक्षस (दुष्ट प्राणी) अत्यन्त पीड़ा देते हैं ॥ ८ ॥

अष्टक उवाच

यदेनसस्ते पततस्तुदन्ति भीमा भौमा राक्षसास्तीक्ष्णदंष्ट्राः । कथं भवन्ति कथमाभवन्ति कथंभूता गर्भभूता भवन्ति ॥ ९ ॥ **अष्टकने पूछा—**तीखी दाढ़ोंवाले पृथ्वीके वे भयंकर राक्षस पापवश आकाशसे गिरते हुए जिन जीवोंको सताते हैं, वे गिरकर कैसे जीवित रहते हैं? किस प्रकार इन्द्रिय आदिसे युक्त होते हैं? और कैसे गर्भमें आते हैं? ॥ ९ ॥

ययातिरुवाच

अस्रं रेतः पुष्पफलानुपृक्त- मन्वेति तद् वै पुरुषेण सृष्टम् । स वै तस्या रज आपद्यते वै स गर्भभूतः समुपैति तत्र ॥ १० ॥ **ययाति बोले—**अन्तरिक्षसे गिरा हुआ प्राणी अस्र (जल) होता है। फिर वही क्रमशः नूतन शरीरका बीजभूत वीर्य बन जाता है। वह वीर्य फूल और फलरूपी शेष कर्मोंसे संयुक्त होकर तदनुरूप योनिका अनुसरण करता है। गर्भाधान करनेवाले पुरुषके द्वारा स्त्रीसंसर्ग होनेपर वह वीर्यमें आविष्ट हुआ जीव उस स्त्रीके रजसे मिल जाता है। तदनन्तर वही गर्भरूपमें परिणत हो जाता है ॥ १० ॥

वनस्पतीनोषधीश्चाविशन्ति अपो वायुं पृथिवीं चान्तरिक्षम् । चतुष्पदं द्विपदं चापि सर्व- मेवम्भूता गर्भभूता भवन्ति ॥ ११ ॥ जीव जलरूपसे गिरकर वनस्पतियों और ओषधियोंमें प्रवेश करते हैं। जल, वायु, पृथ्वी और अन्तरिक्ष आदिमें प्रवेश करते हुए कर्मानुसार पशु अथवा मनुष्य सब कुछ होते हैं। इस प्रकार भूमिपर आकर फिर पूर्वोक्त क्रमके अनुसार गर्भभावको प्राप्त होते हैं ॥ ११ ॥

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अष्टक उवाच

अन्यद् वपुर्विदधातीह गर्भ-
मुताहोस्वित् स्वेन कायेन याति ।
आपद्यमानो नरयोनिमेता-
माचक्ष्व मे संशयात् प्रब्रवीमि ॥ १२ ॥

अष्टकने पूछा— राजन्! इस मनुष्ययोनिमें आनेवाला जीव अपने इसी शरीरसे गर्भमें आता है या दूसरा शरीर धारण करता है। आप यह रहस्य मुझे बताइये। मैं संशय होनेके कारण पूछता हूँ ॥ १२ ॥

शरीरभेदाभिसमुच्छ्रयं च
चक्षुःश्रोत्रे लभते केन संज्ञाम् ।
एतत् तत्त्वं सर्वमाचक्ष्व पृष्टः
क्षेत्रज्ञं त्वां तात मन्याम सर्वे ॥ १३ ॥

गर्भमें आनेपर वह भिन्न-भिन्न शरीररूपी आश्रयको, आँख और कान आदि इन्द्रियोंको तथा चेतनाको भी कैसे उपलब्ध करता है? मेरे पूछनेपर ये सब बातें आप बताइये। तात! हम सब लोग आपको क्षेत्रज्ञ (आत्मज्ञानी) मानते हैं ॥ १३ ॥

ययातिरुवाच

वायुः समुत्कर्षति गर्भयोनि-
मृतौ रेतः पुष्परसानुपृक्तम् ।
स तत्र तन्मात्रकृताधिकारः
क्रमेण संवर्धयतीह गर्भम् ॥ १४ ॥

ययाति बोले— ऋतुकालमें पुष्परससे संयुक्त वीर्यको वायु गर्भाशयमें खींच लाता है। वहाँ गर्भाशयमें सूक्ष्मभूत उसपर अधिकार कर लेते हैं और वह क्रमशः गर्भकी वृद्धि करता रहता है ॥ १४ ॥

स जायमानो विगृहीतमात्रः
संज्ञामधिष्ठाय ततो मनुष्यः ।
स श्रोत्राभ्यां वेदयतीह शब्दं
स वै रूपं पश्यति चक्षुषा च ॥ १५ ॥

वह गर्भ बढ़कर जब सम्पूर्ण अवयवोंसे सम्पन्न हो जाता है, तब चेतनताका आश्रय ले योनिसे बाहर निकलकर मनुष्य कहलाता है। वह कानोंसे शब्द सुनता है, आँखोंसे रूप देखता है ॥ १५ ॥

घ्राणेन गन्धं जिह्वयाथो रसं च
त्वचा स्पर्शं मनसा वेद भावम् ।