महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें(निवातकवचयुद्धपर्व)
पञ्चषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः
अर्जुनका गन्धमादन पर्वतपर आकर अपने भाइयोंसे मिलना
वैशम्पायन उवाच
ततः कदाचिद्धरिसम्प्रयुक्तं
महेन्द्रवाहं सहसोपयातम् ।
विद्युत्प्रभं प्रेक्ष्य महारथानां
हर्षोऽर्जुनं चिन्तयतां बभूव ॥ १ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! तदनन्तर किसी समय हरे रंगके घोड़ोंसे जुता हुआ देवराज इन्द्रका रथ सहसा आकाशमें प्रकट हुआ, मानो बिजली चमक उठी हो। उसे देखकर अर्जुनका चिन्तन करते हुए महारथी पाण्डवोंको बड़ा हर्ष हुआ ॥ १ ॥
स दीप्यमानः सहसान्तरिक्षं
प्रकाशयन् मातुलिसंगृहीतः ।
बभौ महोल्केव घनान्तरस्था
शिखेव चाग्नेर्ज्वलिता विधूमा ॥ २ ॥
उस रथका संचालन मातलि कर रहे थे। वह दीप्तिमान् रथ सहसा अन्तरिक्षलोकको प्रकाशित करता हुआ इस प्रकार सुशोभित होने लगा, मानो बादलोंके भीतर बड़ी भारी उल्का प्रकट हुई हो अथवा अग्निकी धूमरहित ज्वाला प्रज्वलित हो उठी हो ॥ २ ॥
तमास्थितः संददृशे किरीटी
स्रग्वी नवान्याभरणानि बिभ्रत् ।
धनंजयो वज्रधरप्रभावः
श्रिया ज्वलन् पर्वतमाजगाम ॥ ३ ॥
उस दिव्य रथपर बैठे हुए किरीटधारी अर्जुन स्पष्ट दिखायी देने लगे। उनके कण्ठमें दिव्य हार शोभा पा रहा था और उन्होंने स्वर्गलोकके नूतन आभूषण धारण कर रखे थे। उस समय धनंजयका प्रभाव वज्रधारी इन्द्रके समान जान पड़ता था। वे अपनी दिव्य कान्तिसे प्रकाशित होते हुए गन्धमादन पर्वतपर आ पहुँचे ॥ ३ ॥
स शैलमासाद्य किरीटमाली