भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

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पृष्ठ 1198

अमोक्षयद् यस्तमनन्ततेजा ग्राहेण संवेष्टितसर्वगात्रम् ॥ १९ ॥ उस अवसरपर धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ अत्यन्त तेजस्वी युधिष्ठिर भीमसेनके लिये द्वीपकी भाँति अवलम्ब हो गये। अजगरने भीमसेनके सम्पूर्ण शरीरको लपेट लिया था, परंतु युधिष्ठिरने (अजगरको उसके प्रश्नोंके उत्तरद्वारा संतुष्ट करके) उन्हें छुड़ा दिया ॥ १९ ॥

ते द्वादशं वर्षमुपोपयातं वने विहर्तुं कुरवः प्रतीताः। तस्माद् वनाच्चैत्ररथप्रकाशात् श्रिया ज्वलन्तस्तपसा च युक्ताः ॥ २० ॥ ततश्च यात्वा मरुधन्वपार्श्वं सदा धनुर्वेदरतिप्रधानाः। सरस्वतीमेत्य निवासकामाः सरस्ततो द्वैतवनं प्रतीयुः ॥ २१ ॥ अब इन पाण्डवोंके वनवासका बारहवाँ वर्ष आ पहुँचा था। उसे भी वनमें सानन्द व्यतीत करनेके लिये उनके मनमें बड़ा उत्साह था। अपनी अद्भुत कान्तिसे प्रकाशित होते हुए तपस्वी पाण्डव चैत्ररथ वनके समान शोभा पानेवाले उस वनसे निकलकर मरुभूमिके पास सरस्वतीके तटपर गये और वहीं निवास करनेकी इच्छासे द्वैतवनके द्वैत सरोवरके समीप गये। उस समय पाण्डवोंका विशेष प्रेम सदा धनुर्वेदमें ही लक्षित होता था ॥

समीक्ष्य तान् द्वैतवने निविष्टान् निवासिनस्तत्र ततोऽभिजग्मुः। तपोदमाचारसमाधियुक्ता- स्तृणोदपात्रावरणाश्मकुट्टाः ॥ २२ ॥ उन्हें द्वैतवनमें आया देख वहाँके निवासी उनके दर्शनके लिये निकट आये। वे सब-के-सब तपस्या, इन्द्रिय-संयम, सदाचार और समाधिमें तत्पर रहनेवाले थे। तिनकेकी चटाई, जलपात्र, ओढ़नेका कपड़ा और सिल-लोढ़े—यही उनके पास सामग्री थी ॥ २२ ॥

प्लक्षाक्षरौहीतकवेतसाश्च तथा बदर्यः खदिराः शिरीषाः। बिल्वेङ्गुदाः पीलुशमीकरीराः सरस्वतीतीररुहा बभूवुः ॥ २३ ॥ तां यक्षगन्धर्वमहर्षिकान्ता- मागारभूतामिव देवतानाम्। सरस्वतीं प्रीतियुताश्चरन्तः सुखं विजह्रर्नरदेवपुत्राः ॥ २४ ॥