महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1310, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंनवत्यधिकशततमोऽध्यायः
युगान्तकालिक कलियुगके समयके बर्तावका तथा कल्कि-अवतारका वर्णन
वैशम्पायन उवाच
युधिष्ठिरस्तु कौन्तेयो मार्कण्डेयं महामुनिम्।
पुनः पप्रच्छ साम्राज्ये भविष्यां जगतो गतिम्॥ १॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! तदनन्तर कुन्तीनन्दन युधिष्ठिरने महामुनि मार्कण्डेयसे अपने साम्राज्यमें जगत्की भावी गतिविधिके विषयमें पुनः इस प्रकार प्रश्न किया॥ १॥
युधिष्ठिर उवाच
आश्चर्यभूतं भवतः श्रुतं नो वदतां वर।
मुने भार्गव यद् वृत्तं युगादौ प्रभवात्ययम्॥ २॥
युधिष्ठिर बोले— वक्ताओंमें श्रेष्ठ! भृगुवंशविभूषण महर्षे! हमने आपके मुखसे युगके आदिमें संघटित हुई उत्पत्ति और प्रलयके सम्बन्धमें बड़े आश्चर्यकी बातें सुनी हैं॥ २॥
अस्मिन् कलियुगे त्वस्ति पुनः कौतूहलं मम।
समाकुलेषु धर्मेषु किं नु शेषं भविष्यति॥ ३॥
अब मुझे इस कलियुगके विषयमें पुनः विशेषरूपसे सुननेका कुतूहल हो रहा है। जब सारे धर्मोंका उच्छेद हो जायगा, उस समय क्या शेष रह जायगा?॥ ३॥
किंवीर्या मानवास्तत्र किमाहारविहारिणः।
किमायुषः किंवसना भविष्यन्ति युगक्षये॥ ४॥
युगान्तकालमें कलियुगके मनुष्योंका बल-पराक्रम कैसा होगा? उनके आहार-विहार कैसे होंगे? उनकी आयु कितनी होगी और उनके परिधान—वस्त्राभूषण कैसे होंगे॥ ४॥
कां च काष्ठां समासाद्य पुनः सम्पत्स्यते कृतम्।
विस्तरेण मुने ब्रूहि विचित्राणीह भाषसे॥ ५॥
कलियुगके किस सीमातक पहुँच जानेपर पुनः सत्ययुग आरम्भ हो जायगा? मुने! इन सब बातोंका विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिये; क्योंकि आपकी कथा बड़ी विचित्र होती है॥ ५॥
इत्युक्तः स मुनिश्रेष्ठः पुनरेवाभ्यभाषत।
रमयन् वृष्णिशार्दूलं पाण्डवांश्च महानृषिः॥ ६॥